शनिवार, 4 नवंबर 2017

👉 हमारा महान शत्रु-आलस्य (भाग 1)

🔶 किसी भी कार्य की सिद्धि में आलस्य सबसे बड़ा बाधक है, उत्साह की मन्दता प्रवृत्ति में शिथिलता लाती है। हमारे बहुत से कार्य आलस्य के कारण ही सम्पन्न नहीं हो पाते। दो मिनट के कार्य के लिए आलसी व्यक्ति फिर करूंगा, कल करूंगा-करते-करते लम्बा समय यों ही बिता देता है। बहुत बार आवश्यक कार्यों का भी मौका चूक जाता है और फिर केवल पछताने के आँतरिक कुछ नहीं रह जाता।

🔷 हमारे जीवन का बहुत बड़ा भाग आलस्य में ही बीतता है अन्यथा उतने समय में कार्य तत्पर रहे तो कल्पना से अधिक कार्य-सिद्धि हो सकती है। इसका अनुभव हम प्रतिपल कार्य में संलग्न रहने वाले मनुष्यों के कार्य कलापों द्वारा भली-भाँति कर सकते हैं। बहुत बार हमें आश्चर्य होता है कि आखिर एक व्यक्ति इतना काम कब एवं कैसे कर लेता है। स्वर्गीय पिताजी के बराबर जब हम तीन भाई मिल कर भी कार्य नहीं कर पाते, तो उनकी कार्य क्षमता अनुभव कर हम विस्मय-विमुग्ध हो जाते हैं। जिन कार्यों को करते हुए हमें प्रातःकाल 9-10 बज जाते हैं, वे हमारे सो कर उठने से पहले ही कर डालते थे।

🔶 जब कोई काम करना हुआ, तुरन्त काम में लग गये और उसको पूर्ण करके ही उन्होंने विश्राम किया। जो काम आज हो सकता है, उसे घंटा बाद करने की मनोवृत्ति, आलस्य की निशानी है। एक-एक कार्य हाथ में लिया और करते चले गये तो बहुत से कार्य पूर्ण कर सकेंगे, पर बहुत से काम एक साथ लेने से- किसे पहले किया जाय, इसी इतस्ततः में समय बीत जाता है और एक भी काम पूरा और ठीक से नहीं हो पाता। अतः पहली बात ध्यान में रखने की यह है कि जो कार्य आज और अभी हो सकता है, उसे कल के लिए न छोड़, तत्काल कर डालिए, कहा भी है-
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब॥

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/September/v1.12

http://literature.awgp.org

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Nov 2017

🔶 इस संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्यांकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्यांकन करता है उससे अधिक सफलता उसे कदापित नहीं मिल पाती। प्रत्येक व्यक्ति जो आगे बढ़ने की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त सम्भावनाओं के बीज डाल दिये हैं। इतना ही नहीं, उसके अस्तित्व में सभी सम्भावनाओं के बीज डालने के साथ-साथ उनके अंकुरित होने की क्षमताएँ भी भर दी है। लेकिन प्रायः देखने में यह आता है कि अधिकांश व्यक्ति अपने प्रति ही अविश्वास से भरे होते हैं तथा उन क्षमताओं और सम्भावनाओं के बीजों को विकसित तथा अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही, उनके सम्बन्ध में विचार तक नहीं करना चाहते।

🔷 ‘श्रद्धा’ सत् तत्त्वों के प्रति ही सघन होती है, असत् के प्रति नहीं। श्रेष्ठता का समावेश जहाँ भी होता है, श्रद्धा वहीं टिकती है, अन्यत्र नहीं। वस्तुस्थिति प्रकट होने पर श्रेष्ठता के भ्रम में विकसित हुई श्रद्धा-अश्रद्धा में बदल जाती है। श्रेष्ठता का पाखण्ड जैसे ही ध्वस्त होता है, अपने साथ श्रद्धा को भी विनष्ट कर देता है। परमात्मा के प्रति श्रद्धा न डिगने के कारण उसके अस्तित्व एवं अनुग्रह के प्रति तनिक भी आशंका का न होना ही है। प्रगाढ़ श्रद्धा तो मिट्टी में भी भगवान् का दर्शन करा देती है।

🔶 ईश्वर के राज्य में जो माँगेगा, उसे दिया जाएगा और जो खटखटायेगा उसके लिए खटखटाया जाएगा। यह नियम या सिद्धान्त बहुत ही सरल प्रतीत होता है। माँगने मात्र से मिल जाने का सिद्धान्त सच भी है अर्थात् जो भी आकांक्षा की जाती है, वह तत्काल पूरी होती है। लेकिन वास्तविक जीवन में इसका उल्टा प्रतीत होता है। लोगों की हजार आकांक्षाएँ रहती है और उनमें से अधिकांश अधूरी रह जाती है। यह देखते हुए सहज ही लगने लगता है कि यह सिद्धान्त गलत है; किन्तु हजारों बार ऋषियों और मनीषियों ने कहा है कि प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। वह अवश्य पूर्ण होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/11/4-nov-2017.html

👉 भाव-संवेदना का विकास करना ही साधुता है (भाग 2)

🔶 हमने जो समर्पण किया, उसके बदले में हमारी मार्गदर्शक सत्ता ने हमें स्वयं सौंप दिया। हमारे अन्दर प्रभावोत्पादकता भर दी। वाणी में, लेखनी में, व्यक्तित्व में दैनन्दिन आचरण में। यही तुम्हारे अन्दर भी आ जाएगी। भगवान् के हम कोई सम्बन्धी थोड़े ही हैं, जो उनने हमारे साथ कोई विशेष पक्षपात किया हो तब तुम्हें भी क्यों नहीं वही सब मिल सकता है जो हमें मिला। बस कसौटी एक ही ‘अहं’ को गलाना, विसर्जन, समर्पण। जब तक अहंकार जिन्दा है, आदमी दो कौड़ी का है। जिस दिन यह मिट जाएगा आदमी बेशकीमती हो जाएगा। ‘अहं’ ही है, जिसके कारण न सिद्धान्त, न सेवा, न आदर्श आ पाते हैं।
        
🔷 व्यक्ति लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करके भी उच्छृंखल स्तर का अनगढ़ बना रहता है। तुम्हें ईसामसीह की बात सुनाता हूँ। उनके शिष्य ने उनसे कहा कि हम भी आपके समान महान और बड़ा बनना चाहते हैं। हम क्या करें? तो उन्होंने एक ही जवाब दिया-बच्चों जीवन भर मैं तिनका बना, विनम्र बना, गला तथा इसलिए इतने बड़े वृक्ष के रूप में विकसित हो सका। अपनी इच्छा समाप्त कर दीं तो सही अर्थों में बड़े बन गए। पहले तुम सब भी तिनके के समान छोटे बनो। तुम वैसा बन गए तो पेड़ बन सकोगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है। वास्तव में सेण्टपाल भी इसी प्रकार सच्चे ईसाई थे। वे ईसा के बाद विकसित हुए। उनकी पीढ़ी के दूसरे महापुरुष भी विनम्रता-सेवा भावना, निरहंकारिता के कारण ही बने।

🔶 व्यक्ति को पहचानने की एक ही कसौटी है कि उसकी वाणी घटिया है या बढ़िया। व्याख्यान कला अलग है। मंच पर तो सभी शानदार मालूम पड़ते हैं। प्रत्यक्ष सम्पर्क में आते ही व्यक्ति नंगा हो जाता है। जो प्राण वाणी में है, वही परस्पर चर्चा-व्यवहार में परिलक्षित होता है। वाणी ही व्यक्ति का स्तर बताती है। व्यक्तित्व बनाने के लिए वाणी की विनम्रता जरूरी है। प्याज खाने वाले के मुँह से, शराब पीने वाले मसूड़े के मुँह से जो बदबू आती है, वाणी की कठोरता ठीक इसी प्रकार मुँह से निकलती है। अशिष्टता छिप नहीं सकती। यह वाणी से पता चल ही जाती है। अनगढ़ता मिटाओ, दूसरों का सम्मान करना सीखो। तुम्हें प्रशंसा करना आता ही नहीं, मात्र निन्दा करना आता है। व्यक्ति के अच्छे गुण देखो, उनका सम्मान करना सीखो। तुरन्त तुम्हें परिणाम मिलना चालू हो जाएँगे।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Porridge in a Filthy Bowl

🔶 A rich man once arrived at Lord Buddha's monastery. He wanted Lord Buddha to give him the wisdom of self-realization. Buddha promised to come to his home the next day.

🔷 Since Buddha himself was arriving, the rich man ordered his chef to prepare the best possible porridge. Finally, Lord Buddha arrived carrying a bowl in his hand. "O Lord!" , said the rich man, "special porridge has been cooked for you, please accept it" Buddha asked the porridge to be served in the bowl he had brought with him. The rich man was shocked to notice that the bowl was filled with filth and cried, "Your bowl is filthy! My special porridge will be wasted if served in it"

🔷 Buddha laughed and said, "Son, the precious wisdom of self-realization will be wasted unless you cleanse your thoughts and character, just like the porridge can't be served in a filthy bowl!" 

📖 From Pragya Puran

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 154)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 अगले दिनों एक विश्व, एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति का प्रावधान बनने जा रहा है। जाति, लिंग, वर्ण और धन के आधार पर बरती जाने वाली विषमता का अंत समय अब निकट आ गया। इसके लिए जो कुछ करना आवश्यक है, वह सूझेगा भी और विचारशील लोगों के द्वारा पराक्रम पूर्वक किया भी जाएगा। यह समय निकट है। इसकी हम सब उत्सुकता से प्रतीक्षा कर सकते हैं।

🔶 बड़ी और कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर ही किसी महिमा और गरिमा का पता चलता है। प्रतिस्पर्धाओं में उत्तीर्ण होने पर ही पदाधिकारी बना जाता है। खेलों में बाजी मारने वाले पुरस्कार पाते हैं। खरे सोने की पहचान अग्नि में तपाने और कसौटी पर कसने से ही होती है। हीरा इसीलिए कीमती माना जाता है कि वह साधारण आरी या रेती से कटता नहीं है। मोर्चे फतह करके लौटने वाले सेनापति ही सम्मान पाते और विजय श्री का वरण करते हैं।

🔷 चुनौतियाँ स्वीकार करने वाले ही साहसी कहलाते हैं। उन्हें अपनी वरिष्ठता भयानक कठिनाइयों को पार करके ही सिद्ध करनी पड़ती है। योगी, तपस्वी जानबूझकर कष्टसाध्य प्रक्रिया अपनाते हैं। कृष्ण की गरिमा को जिनने जाना वे दुर्दान्त उन्हें बर्बाद करने के लिए आरम्भ से ही अपनी आक्रामकता का प्रदर्शन करते रहे। बकासुर, अघासुर, कालिया सर्प, कंस आदि अनेकों के आघातों का सामना करना पड़ा। पूतना तो जन्म के समय ही विष देने आई थी। आगे भी जीवन भर उन्हें संघर्षों का सामना करना पड़ा। महानता का मार्ग ऐसा ही है जिस पर चलने ओर बढ़ने वाले को पग-पग पर खतरे उठाने पड़ते हैं। दधीचि, भागीरथ, हरिश्चंद्र और मोरध्वज आदि की महिमा उनके तप-त्याग के कारण ही उजागर हुई।

🔶 भगवान् जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्निपरीक्षाओं में होकर गुजारते हैं। भगवान् का प्यार बाजीगरी जैसे चमत्कार देखने-दिखाने में नहीं है। मनोकामनाओं की पूर्ति भी वहाँ नहीं होती।

🌹 क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.176

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

👉 बेटी या बहू

🔷 सुजाता को लड़का हुआ, नॉर्मल डिलीवरी होने के कारण उसी दिन हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई, घर में सभी बहुत खुश थे क्योंकी पहले एक तीन साल की लड़की थी, सासू जी बहू के आराम के लिए हाल के पास वाले कमरे में बिस्तर लगा रही थी।

🔶 बहू शाम को घर आ गई, बच्चे को देखने और सुजाता की खबर पूछने रिश्तेदार व पड़ोसी आने लगे, सासु माँ घर का सारा काम भी करती, सुजाता व बच्चे का ध्यान रखती और आनेवालों का स्वागत भी करती।

🔷 कहते हैं सभी एक जैसे नहीं होते, सभी अपनी अपनी सलाह सुजाता की सास को देकर जाते, सुजाता को सब अंदर सुनाई देता था, उसी समय एक पड़ोसी की पत्नी आई और कहने लगी, देखो वैसे तो हम डिलीवरी में पूरा मेवा "काजु,बदाम,पिस्ता सब डालकर लड्डू बनाते हैं पर अपनी बेटियों के लिए, अब बहु है तो थोड़ा कम ज्यादा भी चल जाता है, बादाम बहुत मंहंगी है इसलिए 500 ग्राम के बदले 150 ग्राम ले लेना और वैसे ही सभी मेवा थोड़ा थोड़ा कम कर देना और लड्डू कम न बने इसके लिए गेहूं का आटा ज्यादा ले लेना, सुजाता की सास सब सुनती रही अंदर सुजाता भी सब सुन रही थी, पड़ोसन चली गई, ससुर जी बोले " देखो में बाजार जा रहा हूँ तूम मुझे क्या लाना है लिखवा दो?

🔶 कोई चीज बाकी ना रहे, तभी सुजाता की सास ने सामान लिखवाया, हर चीज बेटी की डिलीवरी के समय से ज्यादा ही थी ससुर जी ने पूछा इस बार सभी सामान ज्यादा है क्या तूम भी लड्डू खाने वाली हो? तब सुजाता की सास बोली "सुनों जब बेटी को डिलिवरी आई थी तब हमारी परिस्थिति अच्छी नहीं थी और आवक भी कम थी तब आप अकेले कमाते थे अब बेटा भी कमाता है इसलिए मैं चाहती हूँ की बहू के समय, में वो सब चीजें बनाऊँ जो बेटी के समय नहीं कर पाई, क्या बहू हमारी बेटी नहीं है।

🔷 और सबसे बड़ी बात यह की बच्चा होते समय तकलीफ तो दोनों को एक सी ही होती है इसलिए मैंने बादाम ज्यादा लिखे हैं लड्डू में तो डालूंगी पर बाद में भी हलवा बनाकर खिलाउंगी, जिससे बहू को कमजोरी नहीं आये और बहू -पोता, हमेंशा स्वस्थ रहें!

🔶 सुजाता अंदर सबकुछ सुन रही थी और सोच रही थी में कितनी खुशकिस्मत हूँ। और थोड़ी देर बाद जब सासुजी रूम में आई तो सुजाता बोली "क्या मैं आपको मम्मीजी की जगह मम्मी कहूँ?

🔷 बस फिर क्या? दोनों की आँखों में आँसू थे।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 Nov 2017

🔶 इच्छा शक्ति वह है जब एक ही बात पर सारे विचार केन्द्रीभूत हो जायें उसी को प्राप्त करने की सच्ची लगन लग जाय। संदेह कच्चापन या संकल्प-विकल्प इसमें न होने चाहिए। गीता कहती है-‘संशयात्मा विनश्यति’ अर्थात् संशय करने वाला नष्ट हो जाता है। पहले किसी काम के हानि-लाभ को खूब सोच-समझ लिया जाय। जब कार्य उचित प्रतीत हो तब उसमें हाथ डालना चाहिए, किन्तु किसी काम को करते समय ऐसे संकल्प विकल्प न करते रहना चाहिए कि ‘जाने यह कार्य पूरा हो या नहीं’। सफलता देने वाला निश्चय वह है जिसकी को पहचान कर नेपोलियन ने कहा था कि ‘असंभव शब्द मूर्खों के कोष में है।’ निश्चयात्मक इच्छा शक्ति ही सच्ची चाह है।

🔷 जीवन जीना, आदर्श और उद्देश्य के लिए संग्राम करना है। जीवन जागरण की धारा है। जब तक जियो प्रतिज्ञाबद्ध जियो। अपने जीवन का सच्चा उद्देश्य तलाश करो और जब एक बार उसे जान लो तो उसे प्राप्त करने के लिए जुट जाओ। जियो और विजय प्राप्त करो।

🔶 वस्तुओं एवं परिस्थितियों का उज्ज्वल पक्ष देखना और उसके सौन्दर्य से पुलकित होना मनुष्य शरीर में पाये जाने वाले देवत्व का लक्षण है। यह दिव्य दृष्टि हर किसी के भाग्य में नहीं, पर जिन्होंने उसे संस्कारवश अथवा प्रयत्नपूर्वक पाया है, वे हर परिस्थिति में सुखद सम्वेदनाओं का अनुभव करते और एक अनुपम सरसता का हर घड़ी रसास्वादन करते पाये जाते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Nov 2017


👉 आज का सद्चिंतन 4 Nov 2017


👉 भाव-संवेदना का विकास करना ही साधुता है (भाग 1)

🔶 हमारे तुम सबके बीच आने का एक ही उद्देश्य है कि हम समाज को सही व्यक्ति देकर जाएँ। व्यक्ति होते तो यह सारा समाज नया हो जाता। सारे समाज का कायाकल्प हो जाता। पचास आदमी गाँधी के, बुद्ध के साथ थे। वे युग-परिवर्तन कर सके, क्योंकि उनके पास काम के इनसान थे। विवेकानन्द के पास निवेदिता व कुछ काम के व्यक्ति थे। आज जहाँ देखो, वहीं जानवर नजर आते हैं। यदि काम के इनसान होते तो जमीन पलट दी गई होती। तुम सब यहाँ आए हो तो काम के आदमी बन जाओ। हमने जीवन भर व्यक्ति के मर्म को छुआ है व अपना ब्राह्मण स्वरूप खोलकर रख दिया है। नतीजा यह कि हमारे साथ अनगिनत आदमी जुड़े। तुम यदि सही अर्थों में जुड़े हो तो अपना भीतर वाला हिस्सा भी लोकसेवी का बना लो व समाज के लिए कुछ कर डालने का संकल्प ले डालो।
        
🔷 यहाँ शान्तिकुञ्ज में न्यूनतम पाँच सौ कार्यकर्ताओं की, आदमियों की सही मायने में जरूरत है। आदमियों के लिए जमीन प्यासी है व आकाश प्यासा है। यदि पूर्ति हो जाए तो सारा सपना हमारा पूरा हो जाए। हमने ठहरने, खाने-पीने की सारी व्यवस्था कर दी है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति अध्यात्म के, समाज-सेवा के रंग में रँग कर जाए, यही हमारा उद्देश्य है। यह काम अकेले सम्भव नहीं है। तुम्हारा सहयोग इसके लिए हमें चाहिए। इसके लिए हमें तुमसे और कुछ भी नहीं केवल व्यक्तित्व की साधना व तुम्हारा निष्काम समर्पण चाहिए।

🔶 गाँधी जी ने अपने साथ में रहने वाले सभी व्यक्तियों का व्यक्तित्व बना दिया था। वे, जो पूरी तरह जुड़े धन्य हो गए। श्रेय-सौभाग्य के अधिकारी बने। तुम भी सही अर्थों में जुड़ जाओ तो तुम सबका व्यक्तित्व बने, सभी सँवर जाएँ। आज से ६३ वर्ष पूर्व हमने वसन्त पर्व पर अपने भगवान से दीक्षा ली थी। यह कहा था कि अब ‘मैं’ समाप्त होता हूँ व ‘आप’ जीवित होते हैं। आपकी इच्छा प्रमुख मेरी इच्छा गौण। समर्पण किया था हमने। अनगिनत उसकी उपलब्धियाँ हैं। हमारा व्यक्तित्व हमारी मार्गदर्शक सत्ता ने शानदार बना दिया। तुम सबका भी ऐसा ही बन जाए, यदि तुम मन व आत्मा से समर्पण कर दो। यह हम कह इसलिए रहे हैं कि कहीं भावावेश में घर छोड़कर आए हो व मन में तुम्हारे दुःख-क्लेश बना रहे, इसके स्थान पर एक ही बार में सारी स्थिति स्पष्ट हो जाए। कहीं के तो बन सको तुम।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 153)

🌹  ‘‘विनाश नहीं सृजन’’ हमारा भविष्य कथन

🔷 वर्तमान समस्याएँ एक दूसरे से गुँथी हुईं हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ सम्बन्ध है, चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव, बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएँ। एक को सुलझा लिया जाए और बाकी सब उलझी पड़ी रहें, ऐसा नहीं हो सकता समाधान एक मुश्त खोजने पड़ेंगे और यदि इच्छा सच्ची है, तो उनके हल निकल कर ही रहेंगे।

🔶 शक्तियों में दो ही प्रमुख हैं। इन्हीं के माध्यम से कुछ बनता या बिगड़ता है। एक शस्त्रबल-धनबल। दूसरा बुद्धि बल-संगठन बल। पिछले बहुत समय से शस्त्र बल और धन बल के आधार पर मनुष्य को गिराया और अनुचित रीति से दबाया और जो मन में आया सो कराया जाता रहा है यही दानवी शक्ति है। अगले दिनों दैवी शक्ति को आगे आना है और बुद्धिबल तथा संगठन बल का प्रभाव अनुभव कराना है। सही दिशा में चलने पर यह दैवी सामर्थ्य क्या कुछ दिखा सकती है, इसकी अनुभूति सबको करानी है।

🔷 न्याय की प्रतिष्ठा हो, नीति को सब ओर से मान्यता मिले, सब लोग हिलमिल कर रहें और मिल बाँटकर खाएँ, इस सिद्धांत को जन भावना द्वारा सच्चे मन से स्वीकारा जाएगा, तो दिशा मिलेगी, उपाय सूझेंगे, नई योजनाएँ बनेंगी, प्रयास चलेंगे और अंततः लक्ष्य तक पहुँचने का उपाय बन ही जाएगा।

🔶 ‘‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’’ और ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ यह दो ही सिद्धांत ऐसे हैं, जिन्हें अपना लिए जाने के उपरांत तत्काल यह सूझ पड़ेगा कि इन दिनों किन अवांछनीयताओं को अपनाया गया है और उन्हें छोड़ने के लिए क्या साहस अपनाना पड़ेगा, किस स्तर का संघर्ष करना पड़ेगा? मनुष्य की सामर्थ्य अपार है। वह जिसे करने की यदि ठान ले और औचित्य के आधार पर अपना ले तो कोई कठिन कार्य ऐसा नहीं है, जिसे पूरा न किया जा सके।

🌹 क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 152)

🌹  ‘‘विनाश नहीं सृजन’’ हमारा भविष्य कथन
🔷 उपासना का वर्तमान चरण सूक्ष्मीकरण की सावित्री साधना के रूप में चल रहा है। इस प्रक्रिया के पीछे किसी व्यक्ति विशेष की ख्याति, सम्पदा, वरिष्ठता या विभूति नहीं हैं। एक मात्र प्रयोजन यही है कि मानवी सत्ता और गरिमा के लड़खड़ाते हुए पैर स्थिर हो सकें। पाँच वीरभद्रों के कंधों पर वे अपना उद्देश्य लादकर उसे सम्पन्न भी कर सकते हैं। हनुमान के कंधों पर राम-लक्ष्मण दोनों बैठे फिरते थे। यह श्रेष्ठता प्रदान करना भर है। इसे माध्यम का चयन कह सकते हैं। एक गाण्डीव धनुष के आधार पर किस प्रकार इतना विशालकाय महाभारत लड़ा जा सकता था। इसे सामान्य बुद्धि से असम्भव ही कहा जा सकता है, पर भगवान् की जो इच्छा होती है वह तो किसी न किसी प्रकार पूरी होकर रहती है। महाबली हिरण्याक्ष को शूकर भगवान ने फाड़-चीरकर रख दिया था, उसमें भी भगवान् की ही इच्छा थी।

🔶 इस बार भी हमारी निज की अनुभूति है कि असुरता द्वारा उत्पन्न हुई विभीषिकाओं को सफल नहीं होने दिया जाएगा। परिवर्तन इस प्रकार होगा कि जो लोग इस महाविनाश में संलग्न हैं, इसकी संरचना कर रहे हैं, वे उलट जाएँगे या उनके उलट देने वाले नए पैदा हो जाएँगे। विश्व-शान्ति में भारत की निश्चित ही कोई बड़ी भूमिका हो सकती है।

🔷 समस्त संसार के मूर्धन्यों, शक्तिवानों और विचारवानों की आशंका एक ही है कि विनाश होने जा रहा है। हमारा अकेले का कथन यह है कि उलटे को उलटकर ही सीधा किया जाएगा। हमारे भविष्य कथन को अभी ही बड़ी गम्भीरता पूर्वक समझ लिया जाए। विनाश की घटाओं को तूफानी प्रवाह अगले दिनों उड़ाकर कहीं ले जाएगा और अँधेरा चीरते हुए प्रकाश से भरा वातावरण दृष्टिगोचर होगा। यह ऋषियों के पराक्रम से ही सम्भावित है, इसमें कुछ दृश्यमान व कुछ परोक्ष भूमिका भी हो सकती हैं।

🔶 यह मानकर चलना चाहिए कि सामान्य स्तर के लोगों की इच्छाशक्ति भी काम करती है। जनमत का भी दबाव पड़ता है। जिन लोगों के हाथ में इन दिनों विश्व की परिस्थितियाँ बिगाड़ने की क्षमता है, उन्हें जागृत लोकमत के सामने झुकना ही पड़ेगा। लोकमत को जागृत करने का अभियान ‘‘प्रज्ञा-आंदोलन’’ द्वारा चल रहा है। यह क्रमशः बढ़ता और सशक्त होता जाएगा। इसका दबाव हर प्रभावशाली क्षेत्र की समर्थ शक्तियों पर पड़ेगा और उनका मन बदलेगा कि अपने कौशल चातुर्य को विनाश की योजनाएँ बनाने की अपेक्षा विकास के निमित्त लगाना चाहिए। प्रतिभा एक महान शक्ति है। वह जिधर भी अग्रसर होती है, उधर ही चमत्कार प्रस्तुत करती जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.171

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (अन्तिम भाग)

🔶 तो क्या करें महाराज जी? आप अपने ब्राह्मणत्व को जगा दीजिये, साधु को जगा दीजिये ताकि आप अपनी नाव स्वयं पार कर सकें, अन्यथा हम यही कहेंगे कि शायद हमारा तप कम है नहीं तो कहीं न कहीं हमें ब्राह्मण, साधु मिल ही जाते। आपके पास धन नहीं तो अपनी भावना, विचार, श्रद्धा तो समाज में बिखेर ही सकते हैं। वही बिखेरिए, सन्त बनकर अपना परिचय दीजिये। सन्त दानी होता है, सन्त उदार होता है।
        
🔷 हमारा मन था कि अपने बचे हुए शेष दिनों में ब्राह्मण तथा सन्त का काम अधिक से अधिक कर सकूँ। लोगों की मध्यमा वाणी से, परावाणी से अधिक से अधिक सेवा कर सकूँ। यह हमारा मन है, मैं आप को एक ही बात कह सकता हूँ कि आप अपने को निचोड़िये-निचोड़िये बचत कीजिये। आपके श्रम, समय, धन और विचारणा-भावना की समाज को जरूरत है, संस्कृति को जरूरत है। इसे विलासिता में खर्च मत कीजिये। अगर किसी में ब्राह्मणत्व एवं सन्त जिन्दा है तो उसे निचोड़िये। उसे आप बिखेर दीजिये। हमने प्रार्थना की है कि यदि आप लोगों में कहीं भी किसी भी कोने में यदि ब्राह्मणत्व या सन्त जिन्दा हो तो वह जग जाये। उपासना-साधना के नाम पर आप जादूगरी बन्द कीजिये। देवता को गुमराह करने वाली, मनोकामना सिद्ध करने वाली पूजा बन्द कीजिए।

🔶 साधना किसे कहते हैं आपको मालूम नहीं? आप हनुमान जी की पूजा करते हैं, सन्तोषी माता की पूजा करते हैं। यह मन्त्र है, न यन्त्र है, न पूजा है। आप हनुमान जी या सन्तोषी माता को साधते हैं। अरे पहले अपने आपको तो साधिये न, पर यह जो जादूगरी आप करते हैं, वह बदमाशी के सिवा कुछ नहीं है। अगर आप पूजा-उपासना करते हैं, तो ठीक, यह आपकी मर्जी है, पर यह न तो कोई मन्त्र जप है, न भजन है, यह मात्र धूर्तगीरी है। पूजा के नाम पर यदि आप ऐसी बदमाशी करते हैं तो आपकी मर्जी, पर इससे कुछ होने वाला नहीं है। पहले आप समर्पण करना सीखिये, यह मोटी-मोटी बातें थीं जो हमने किसी तरह से आपसे कह दीं।

🔷 हमारे गुरुजी की यही मर्जी है कि हम आपमें से-हर आदमी में से ब्राह्मण तथा सन्त को जिन्दा करें और हम यही चाहते हैं कि अगर हमारे अन्दर बल हो तथा आपके अन्दर ब्राह्मणत्व तथा साधु हो तो वह जिन्दा हो जाए। इस विदाई के अवसर पर यही कहकर हम आप लोगों को विदा कर रहे हैं। मित्रों, गुरुजी ने हमेशा दिया है, आगे भी देते रहेंगे, शर्त एक ही है कि आप अपनी ब्राह्मण तथा सन्त की प्रवृत्ति जिन्दा करें। आप जाइये एवं अपने-अपने कामों में जुट जाइये।

🌹 समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Saint Gyaneshwar and Ornaments

🔶 "Wisdom, power and devotion is sanctioned by God only to the worthy", said saint Gyaneshwar. Hearing this, a lady reacted sharply, "Then where is the greatness of God? He should scatter his grace equally on everyone!" The saint kept quite and the discussion came to an end.

🔷 The next morning, the saint sent for a stupid person and asked him to go to the lady's home and request her to lend all her ornaments. He did the same. The lady scolded him and immediately turned him away.

🔶 After some time, saint Gyaneshwar himself went to the lady and politely requested her to lend her ornaments for a day. Without asking a single question the lady opened her safe and happily gave all her ornaments. Now, returning the ornaments, the saint asked, "In the morning another person had come to you with the same request, why did you turn him away?"

🔷 "How could I give my valuable ornaments to an unreliable person?", the lady retorted. Saint Gyaneshwar smiled and said, "Dear sister, when you can't entrust your ornaments to a person without considering his worthiness, then how can God bestow His priceless divine blessings upon unworthy people?" Our worthiness is tested repeatedly to assess our capacity to receive God's grace.

📖 From Pragya Puran

👉 आज का सद्चिंतन 3 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Nov 2017


बुधवार, 1 नवंबर 2017

👉 बस यही सोच

🔷 कार से उतरकर भागते हुए हॉस्पिटल में पहुंचे नोजवान बिजनेस मैन ने पूछा..

🔶 “डॉक्टर, अब कैसी हैं माँ?“ हाँफते हुए उसने पूछा।

🔷 “अब ठीक हैं। माइनर सा स्ट्रोक था। ये बुजुर्ग लोग उन्हें सही समय पर लें आये, वरना कुछ बुरा भी हो सकता था। “

🔶 डॉ ने पीछे बेंच पर बैठे दो बुजुर्गों की तरफ इशारा कर के जवाब दिया।

🔷 “रिसेप्शन से फॉर्म इत्यादि की फार्मैलिटी करनी है अब आपको।” डॉ ने जारी रखा।

🔶 “थैंक यू डॉ. साहेब, वो सब काम मेरी सेक्रेटरी कर रही हैं“ अब वो रिलैक्स था।

🔷 फिर वो उन बुजुर्गों की तरफ मुड़ा.. “थैंक्स अंकल, पर मैनें आप दोनों को नहीं पहचाना।“

🔶 “सही कह रहे हो बेटा, तुम नहीं पहचानोगे क्योंकि हम तुम्हारी माँ के वाट्सअप फ्रेंड हैं ।” एक ने बोला।

🔷 “क्या, वाट्सअप फ्रेंड ?” चिंता छोड़ , उसे अब, अचानक से अपनी माँ पर गुस्सा आया।

🔶 “60 + नॉम का  वाट्सप ग्रुप है हमारा।” “सिक्सटी प्लस नाम के इस ग्रुप में साठ साल व इससे ज्यादा उम्र के लोग जुड़े हुए हैं। इससे जुड़े हर मेम्बर को उसमे रोज एक मेसेज भेज कर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी अनिवार्य होती है, साथ ही अपने आस पास के बुजुर्गों को इसमें जोड़ने की भी ज़िम्मेदारी दी जाती है।”

🔷 “महीने में एक दिन हम सब किसी पार्क में मिलने का भी प्रोग्राम बनाते हैं।”

🔶 “जिस किसी दिन कोई भी मेम्बर मैसेज नहीं भेजता है तो उसी दिन उससे लिंक लोगों द्वारा, उसके घर पर, उसके हाल चाल का पता लगाया जाता है।”

🔷 आज सुबह तुम्हारी माँ का मैसेज न आने पर हम 2 लोग उनके घर पहुंच गए..।

🔶 वह गम्भीरता से सुन रहा था। “पर माँ ने तो कभी नहीं बताया।" उसने धीरे से कहा।

🔷 “माँ से अंतिम बार तुमने कब बात की थी बेटा? क्या तुम्हें याद है ?” एक ने पूछा।

🔶 बिज़नेस में उलझा, तीस मिनट की दूरी पर बने माँ के घर जाने का समय निकालना कितना मुश्किल बना लिया था खुद उसने।

🔷 हाँ पिछली दीपावली को ही तो मिला था वह उनसे गिफ्ट देने के नाम पर।

🔶 बुजुर्ग बोले..  “बेटा, तुम सबकी दी हुई सुख सुविधाओं के बीच, अब कोई और माँ या बाप अकेले घर मे कंकाल न बन जाएं... बस यही सोच ये ग्रुप बनाया है हमने। वरना दीवारों से बात करने की तो हम सब की आदत पड़ चुकी है।”

🔷 उसके सर पर हाथ फेर कर दोनों बुज़ुर्ग अस्पताल से बाहर की ओर निकल पड़े। नवयुवक एकटक उनको जाते हुए देखता ही रह गया।

🙏अगर ये आपको कुछ सीख दे तो कृपया किसी और को भी भेजने में संकोच ना करे?

👉 आज का सद्चिंतन 2 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Nov 2017


👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 11)

🔶 अगर आपने अपने आपको निचोड़ दिया तो हमारा एक काम जरूर करना और वह यह कि हमारे विचार-हमारी आग को लोगों तक पहुँचाना। हम लेखक नहीं हैं। हमारे लिखे शब्दों में से आग निकलती है। विचारों की आग, भावनाओं की-क्रान्ति की आग निकलती है। आज जनता भी प्यासी, हम भी प्यासे हैं। हमारी विचारधारा ही आग है। हम आग उगलते हैं। हम लेखक नहीं हैं। हमारे लेखनी में से निकलती है आग, मस्तिष्क में से निकलती है आग, हमारी आँखों में से निकलती है आग। हमारे विचारणा की आग, भावनाओं की आग, संवेदनाओं की आग को आप घर-घर पहुँचाइये। आप में से हर आदमी को लालबहादुर शास्त्री जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल होना चाहिए। गाँधी जी के आदेश पर वे खादी धकेल पर रखकर बेचने गये थे।
        
🔷 ईसाई मिशन की महिलाएँ भी घर-घर जाती हैं और यह कहती हैं कि हमारी एक पैसा की किताब जरूर खरीदिये। अगर अच्छी न लगे तो कल मैं वापस ले लूँगी। अरे यह किताब बेचना नहीं है बाबा, मेरे विचार को घर-घर पहुँचाना है। आप लोगों के जिम्मे हमारा एक सूत्रीय कार्यक्रम है। आप जाइये, अपने को निचोड़िये। आपका घर का खर्च यदि १००० रुपये है तो निचोड़िये इसको और उसमें से बचत को ज्ञानयज्ञ के लिए खर्च कीजिये। हमारी आग को बिखेर दीजिये, वातावरण को गरम कर दीजिये, उससे अज्ञानता को जला दीजिये। आप लोग जाइये और अपने आपको निचोड़िये। ज्ञानघट का पैसा खर्च कीजिये तो क्या हम अपनी बीबी को बेच दें? बच्चे को बेच दें? चुप कंजूस कहीं के ऊपर से कहते हैं हम गरीब हैं। आप गरीब नहीं कंजूस हैं।

🔶 हर आदमी के ऊपर हमारा आक्रोश है। हमें आग लग रही है और आप निचोड़ते नहीं हैं। इनसान का ईमान, व्यक्तित्व समाप्त हो रहा है। आज शक्तिपीठें, प्रज्ञापीठें जितनी बढ़ती जा रही हैं, उतना ही आदमी का अहंकार बढ़ता जा रहा है। आपस में लड़ाई-झगड़े बढ़ते जा रहे हैं। सब हविश के मालिक बनते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि अब पन्द्रह-बीस हजार में फूस के शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ बन जाते तो कम से कम लोगों का राग-द्वेष अहंकार तो नहीं बढ़ता। आज आप लोगों से एक ही निवेदन कि आप हमारी आग स्वयं बिखेरिए, नौकरी से नहीं, सेवा से। आप जाइये एवं हमारा साहित्य पढ़िए तथा लोगों को पढ़ाइए और हम क्या कहना चाहते थे।

हम दो ही बात आपसे कहना चाहते हैं- पहली हमारी आग को घर-घर पहुँचाइये, दूसरी ब्राह्मण एवं सन्त को जिन्दा कीजिये ताकि हमारा प्याऊ एवं अस्पताल चल सके, ताकि लोगों को-अपने बच्चों को खिला सकें तथा उन्हें जिन्दा रख सकें तथा मरी हुई संस्कृति को जिन्दा कर सकें। आप ११ माला जप करते हैं-आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। यह जादूगरी नहीं है। किसी माला में कोई जादू नहीं है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि मनोकामना की मालाएँ, जादूगरी की माला में आग लगा दीजिये, आप मनोकामना की माला, जादूगरी की माला, आज्ञाचक्र जाग्रत करने की माला को पानी में बहा दीजिये।

🌹 क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 जिज्ञासु के लक्षण-श्रद्धा और नम्रता

🔷 एक बार राजा जातश्रुति के राजमहल की छत पर हंस आकर बैठे और आपस में बात करने लगे। एक हंस ने कहा जिसके राजमहल पर हम बैठे है, वह बड़ा धर्मात्मा और दानी है। इसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई है। इस पर दूसरे हंस ने कहा- गाड़ीवान रैक्य की तुलना में यह न तो ज्ञानी है और न दानी।

🔶 इस वार्ता को जातश्रुति सुन रहे थे। उन्हें गाड़ीवान रैक्य से भेंट करने की इच्छा हुई। उनने चारों दिशाओं में दूत भेजे। पर वे निराश होकर लौटे। उनने कहा-राजन् हमने सभी नगर, मन्दिर, मठ ढूँढ़ डाले पर वे कही नहीं मिले। तब राजा ने विचार किया ब्रह्मज्ञानी पुरुषों का विषयी लोगों के बीच रहना कैसे हो सकता है। अवश्य ही वे कही साधना के उपयुक्त एकान्त स्थान में होंगे वही उन्हें तलाश कराना चाहिए।

🔷 अब की बार दूत फिर भेजे गये तो वे एक निर्जन प्रदेश में अपनी गाड़ी के नीचे बैठे मिल गये। यही उनका घर था। राजा उनके पास बहुत धन, आभूषण, गाऐं, रथ आदि लेकर पहुँचा। उसका विचार था कि रैक्य इस वैभव को देखकर प्रसन्न होंगे और मुझे ब्रह्मज्ञान का उपदेश देंगे। पर परिणाम वैसा नहीं हुआ। रैक्य ने कहा- अरे शूद्र! यह धन वैभव तू मेरे लिए व्यर्थ ही लाया है। इन्हें अपने पास ही रख।” ऋषि को क्रुद्ध देखकर राजा निराश वापिस लौट आया और सोचता रहा कि किस वस्तु से उन्हें प्रसन्न करूँ। सोचते-सोचते उसे सूझा कि विनय और श्रद्धा से ही सत्पुरूष प्रसन्न होते है। तब वह हाथ में समिधाएं लेकर, राजसी ठाठ-बाठ छोड़कर एक विनीत जिज्ञासु के रूप में उनके पास पहुँचा। रैक्य ने राजा में जिज्ञासु के लक्षण देखे तो वे गदगद हो उठे। उनने जातश्रुति को हृदय से लगा लिया और प्रेम पूर्वक ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से बड़ी

🔷 परिस्थितियाँ आज भी विषम हैं। वैभव और विनाश के झूले में झूल रही मानव जाति को उबारने के लिये आस्थाओं के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा और मानवी गरिमा को उभारने, दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाने वाला प्रचण्ड पुरुषार्थ करना होगा। साधन इस कार्य में कोई योगदान दे सकते हैं, यह सोचना भ्रांतिपूर्ण है। दुर्बल आस्था अन्तराल को तत्त्वदर्शन और साधना प्रयोग के उर्वरक की आवश्यकता है। अध्यात्म वेत्ता इस मरुस्थल की देखभाल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते व समय-समय पर संव्याप्त भ्रान्तियों से मानवता को उबारते हैं। अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से भी बड़ी है।

🔶 अध्यात्म ही व्यक्ति के अन्तराल में विकृतियों के माहौल से लड़ सकने- निरस्त कर पाने में सक्षम तत्वों की प्रतिष्ठापना कर पाता है। हमने व्यक्तियों में पवित्रता व प्रखरता का समावेश करने के लिए मनीषा को ही अपना माध्यम बनाया एवं उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा है।

🔷 हमने अपने भावी जीवनक्रम के लिए जो महत्वपूर्ण निर्धारण किए हैं, उनमें सर्वोपरि है लोक चिन्तन को सही दिशा देने हेतु एक ऐसा विचार प्रवाह खड़ा करना जो किसी भी स्थिति में अवांछनीयताओं को टिकने ही न दे। आज जन समुदाय के मन-मस्तिष्क में जो दुर्मति घुस पड़ी है, उसी की परिणति ऐसी परिस्थितियों के रूप में नजर आती है जिन्हें जटिल, भयावह समझा जा रहा है। ऐसे वातावरण को बदलने के लिए व्यास की तरह, बुद्ध, गाँधी, कार्लमार्क्स की तरह, मार्टिन लूथर, अरविन्द, महर्षि रमण की तरह भूमिका निभाने वाले मुनि व ऋषि के युग्म की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों द्वारा विचार क्रान्ति का प्रयोजन पूरा कर सके। यह पुरुषार्थ अन्तःक्षेत्र की प्रचण्ड तप साधना द्वारा ही सम्भव हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष रूप युग मनीषा का हो सकता है जो अपनी लेखनी शक्ति द्वारा उस उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके जिसे युगान्तरकारी कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जो संकल्प हमने आज से सैंतालीस वर्ष पूर्व लिया था, उसे अनवरत निभाते रहने का हमारा नैतिक दायित्व है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.21

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 151)

🌹  ‘‘विनाश नहीं सृजन’’ हमारा भविष्य कथन

🔷 पत्रकारों और राजनीतिज्ञों के क्षेत्रों में इस बार एक अत्यधिक चिंता यह संव्याप्त है कि इन दिनों जैसा संकट मनुष्य जाति के सामने है, वैसा मानवी उत्पत्ति के समय से कभी भी नहीं आया। शान्ति परिषद आदि अनेक संस्थाएँ इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि महाविनाश का जो संकट सिर पर छाया हुआ है, वह किसी प्रकार टले। छुट-पुट लड़ाइयाँ तो विभिन्न क्षेत्रों में होती ही रहती हैं। शीतयुद्ध किसी भी दिन महाविनाश के रूप में विकसित हो सकता है, यह अनुमान हर कोई लगा सकता है।

🔶 भूतकाल में भी देवासुर संग्राम होते रहे हैं, पर जन-जीवन के सर्वनाश की प्रत्यक्ष सम्भावना का, सर्व सम्मत ऐसा अवसर इससे पूर्व कभी भी नहीं आया।

🔷 इन संकटों को ऋषि-कल्प सूक्ष्मधारी आत्माएँ भली प्रकार देख और समझ रही हैं। ऐसे अवसरों में वे मौन नहीं रह सकतीं। ऋषियों के तप, स्वर्ग, मुक्ति एवं सिद्धि प्राप्त करने के लिए नहीं होते। उपलब्धियाँ तो आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने वाले स्थूल शरीरधारी भी प्राप्त कर लेते हैं। यह महामानवों को प्राप्त होने वाली विभूतियाँ हैं। ऋषियों को भगवान् का कार्य संभालना पड़ता है और वे उसी प्रयास को लक्ष्य मानकर संलग्न रहते हैं।

🔶 हमारे ऊपर जिन ऋषि का, दैवी सत्ता का अनुग्रह है, उनने सभी कार्य लोकमंगल के निमित्त कराए हैं। आरम्भिक २४ महापुरश्चरण भी इसी निमित्त कराए हैं कि आत्मिक समर्थता इस स्तर की प्राप्त हो सके, जिसके सहारे लोकमंगल के अतिमहत्त्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने में कठिनाई न पड़े।

🔷 विश्व के ऊपर छाए हुए संकटों को टालने के लिए उन्हें चिंता है। चिंता ही नहीं प्रयास भी किए हैं। इन्हीं प्रयासों में एक हमारे व्यक्तित्व को पवित्रता और प्रखरता से भर देना भी है। आध्यात्मिक सामर्थ्य इसी आधार पर विकसित होती है।

🌹 क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 10)

🔶 आप अकेले चलें। हमारे गुरु अकेले चले हैं। हम अकेले चले हैं। आप भी अकेले चलिये। संगठन के फेर में मत पड़िये। आपको बोलना नहीं आता है। आप कहते हैं कि व्याख्यान सिखा दीजिये। आप हैं कौन? हमें बतलाइये। भाषण से क्या होगा? आप हमारी बात मानिये। आपको बोलना नहीं आता है तो हम क्या करें? आप पोस्टमैन का काम करिये। हम बोलना सिखा देंगे। लड़कियों को सिखा दिया था। महाराज जी हमें भी बोलना सिखा दीजिए। आप त्याग करके तो हमें बतलाइये। जवाहरलाल नेहरू एवं शास्त्री जी को गाँधी जी ने खादी बेचने को कहा था। वे घर-घर जाकर खादी बेचते थे। घर-घर धकेल गाड़ी लेकर जाते थे तथा लोगों से कहते थे कि आप खादी पहनिये तो क्या वे खादी बेचते थे? हाँ बेटे, खादी बेचते थे।
        
🔷 आप अपने आप को निचोड़िये। ये हमारा बेटा, यह हमारी पत्नी। देखना यही तुझे ऐसा मारेंगे कि तुझे याद रहेगा। हमारा बेटा, हमारी पत्नी-यही रटता रहेगा कि कुछ समाज के लिए, भगवान् के लिए भी करेगा। नहीं गुरुजी हम तो हनुमान चालीस पढ़ते हैं, गायत्री चालीसा पढ़ते हैं। अरे स्वार्थी कहीं का, तेरी तो अक्ल खराब हो गयी है। अहंकार बढ़ गया है। हमने आपमें से हर किसी को कहा है कि आप ब्राह्मण बनिये। नहीं गुरुजी, हमने तो चन्दा इकट्ठा कर लिया, तो हम क्या करेंगे इसका? आप आदमी तो बनें पहले। आप आदमी बनना सीखें। आप घटियापन छोड़िये, सुबह से शाम तक काम कीजिये। पात्रता बढ़ाइये।

🔶 ऋषियों ने अपने रक्त को एक घड़े में भरा था, जिससे सीताजी उत्पन्न हुई थीं। आपको भी संस्कृति की सीता की खोज करनी है। समाज के लिए, संस्कृति के लिए आप भी अपना समय, अपना पैसा निकालिये, अपना रक्त निकालिये। आप अपने आप को निचोड़िये तो सही। निचोड़ने के नाम पर अँगूठा दिखाते हैं, त्याग के नाम पर जीभ निकालते हैं। बकवास के नाम पर, घूमने के नाम पर बिना मतलब के आडम्बर बना रखे हैं। अपने आपको निचोड़िये। आप अपने को यदि निचोड़ेंगे तो फिर देख लेना आप क्या बन जाते हैं? हमने अपने आपको निचोड़ा तो देखिये क्या बन गये?

🌹 क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Association Begets Blessings

🔶 As soon as the human consciousness gets connected with the God's treasure of greatness, blessings start flowing in spontaneously. Sudama was leading a life of scarcity although he had been Lord Krishna's classmate. However, Sudama really got associated with the greatness of Lord Krishna, when he surrendered his ego and visited him at Dwarika. And then Lord Krishna showered his material and spiritual blessings upon Sudama. Similarly, when Saint Kabir surrendered himself completely in the hands of God, he got back immense wisdom and spiritual enlightenment which made him famous.

🔷 When Vibhishana, who was Ravana's younger brother associated himself with Lord Ram, his fortune changed profoundly. Lord Ram immediately addressed him as the 'King of Lanka', and in due course he actually became the king of golden Lanka. All these instances point to a simple fact - a close association with greatness is a prerequisite for God's blessings.

📖 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 Nov 2017

🔶 जो क्रियाशील है वह यदि आज बुरे कर्म करता है तो कल अच्छे कर्म भी कर सकता है किन्तु जिसके मन और शरीर को आलस्य ने घेर लिया है वह साँस लेता हुआ मुर्दा है। पृथ्वी का भार बढ़ाने के अतिरिक्त उसका और कोई प्रयोजन नहीं। उसके मन में अच्छे विचार उठ नहीं सकते। आलस्य का मुख पतन की ओर है जो उसे नीच योनियों में ले जाता है। जिसने आलस्य को अपनाया उसने अपने सबसे बड़े और अत्यन्त भयंकर शत्रु को घर में बसाया है। ऐसे व्यक्ति को सफलता कोसों दूर से नमस्कार करती है। आप अपने जीवन को नष्ट नहीं होने देना चाहते हैं तो उसे क्रियाशील रखें। स्फूर्ति, उत्साह, लगन और काम में लगे रहने की धुन हर समय अपने अन्दर होनी चाहिये।

🔷 अल्प में असन्तोष - यह अवगुण क्षुद्र हृदय का द्योतक है। हर स्थिति में संतुष्ट रहना यह मन का दैवी गुण है, मानसिक शान्ति के लिये इसकी आवश्यकता है। किन्तु यदि ये बात काम करने के बार में उतर आवे तो समझना चाहिये कि इसका कारण या तो आलस्य है या क्षुद्र हृदयता। एक पुस्तक पढ़कर, एक मिनट भजन करके, जरा सा परिश्रम करके, तुच्छ सी जन सेवा करके, कुछ ही पैसे कमाकर, जो संतुष्ट हो जाता है वह संतोषी नहीं अकर्मण्य है। मनुष्य के करने के लिए अपार काम पड़ा हुआ है। जितना अधिक हो सके, काम करना चाहिए और अपने उद्देश्य के अनुसार ऊँची से ऊँची सीढ़ी पर पहुँचने का प्रयत्न जारी रखना चाहिएं।

🔶 वासना - तरह-तरह के इन्द्रिय सुखों पर मन ललचाना और उनके सम्बन्ध में खयाली पुलाव पकाते रहना, मनुष्य जीवन की सार्थकता के बारे में एक बहुत बड़ा विघ्न है। इन्द्रियों के सुख अतृप्त हैं ज्यों-ज्यों उन्हें पूरा करते हैं त्यों-त्यों वह आग भड़कती है और साथ ही वह शरीर एवं मन को जलाती जाती है। सुस्वाद भोजन, शिश्नेन्द्रिय की परायणता तमाशे देखने की रुचि इनके प्रलोभन मन को अपना दास बना लेते हैं और दूसरे किसी महान कार्य की ओर जाने नहीं देते। यदि जाता है तो बार -बार उचट देते हैं जिसका मन बार-बार उचटता हो तो समझे कि इन्द्रियों के सुख उसे बार बार बहका रहे हैं। आपको किसी उपेक्षा की पूर्ति करनी है तो इन्द्रिय सुखों को फटकार दीजिये। क्योंकि वे जैसे-जैसे तृप्त किये जाते हैं वैसे ही वैसे उग्र रूप धारण करके आपको उल्टा खाते हैं और अन्त में अपने वश में करके नष्ट कर डालते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 1 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Nov 2017

👉 यह समय चूकने का नहीं है ।

🔶 यह समय युग परिवर्तन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य का है। इसे आदर्शवादी कठोर सैनिकों के लिये परीक्षा की घड़ी कहा जाये, तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं समझी जानी चाहिये। पुराना कचरा हटता है और उसके स्थान पर नवीनता के उत्साह भरे सरंजाम जुटते हैं। यह महान् परिवर्तन की-महाक्रान्ति की वेला है।...यहाँ तो प्रसंग हथियारों से सुसज्जित सेना का चल रहा है। वे ही यदि समय की महत्ता, आवश्यकता को, न समझते हुए, जहाँ-तहाँ मटरगस्ती करते फिरें और समय पर हथियार न पाने के कारण समूची सेना को परास्त होना पड़े तो ऐसे व्यक्तियों पर तो हर किसी का रोष ही बरसेगा, जिनने-आपात स्थिति में भी प्रमाद बरता और अपना तथा अपने देश के गौरव को मटियामेट करके रख दिया।

🔷 जीवन्तों, जाग्रतों और प्राणवान् में से प्रत्येक को अनुभव करना चाहिये कि यह ऐसा विशेष समय है जैसा कि हजारों-लाखों वर्षों बाद कभी एक बार आता है। गाँधी के सत्याग्रही और बुद्ध के परिव्राजक बनने का श्रेय, समय निकल जाने पर अब कोई किसी भी मूल्य पर नहीं पा सकता। हनुमान और अर्जुन की भूमिका हेतु फिर से लालायित होने वाला कोई व्यक्ति कितने ही प्रयत्न करे, अब दुबारा वैसा अवसर हस्तगत नहीं कर सकता। समय की प्रतीक्षा तो की जा सकती है, पर समय किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। भगीरथ, दधीचि और हरिश्चन्द्र जैसा सौभाग्य अब उनसे भी अधिक त्याग करने पर भी पाया नहीं जा सकता ।

🔶 समय बदल रहा है। प्रभातकाल का ब्रह्ममुहूर्त अभी है। अरुणोदय के दर्शन अभी हो सकते हैं। कुछ घण्टे ऐसे हैं उन्हें यदि प्रमाद में गँवा दिये जायें, तो अब वह गया समय लौटकर फिर किस प्रकार आ सकेगा? युग-परिवर्तन की वेला ऐतिहासिक, असाधारण अवधि है। इसमें जिनका जितना पुरुषार्थ होगा, वह उतना ही उच्च कोटि का शौर्य पदक पा सकेगा। समय निकल जाने पर, साँप निकल जाने पर लकीर को लाठियों से पीटना भर ही शेष रह जाता है।

🔷 इन दिनों मनुष्य का भाग्य और भविष्य नये सिरे से लिखा और गढ़ा जा रहा है। ऐसा विलक्षण समय कभी हजारों-लाखों वर्षों बाद आता है। इसे चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते हैं और जो उसका सदुपयोग कर लेते हैं, वे अपने आपको सदा-सर्वदा के लिये अजर-अमर बना लेते हैं। गोवर्धन एक बार ही उठाया गया था। समुद्र पर सेतु भी एक ही बार बना था। कोई यह सोचता रहे कि ऐसे समय तो बार-बार आते ही रहेंगे और हमारा जब भी मन करेगा, तभी उसका लाभ उठा लेंगे, तो ऐसा समझने वाले भूल ही कर रहे होंगे। इस भूल का परिमार्जन फिर कभी कदाचित् ही हो सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा अवतार की विस्तार प्रक्रिया

http://literature.awgp.org/book/Pragyavtar_Ki_Vistar_Prakriya/v1

http://literature.awgp.org

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

👉 अन्न का प्रभाव

🔷 शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह मृत्यु से पूर्व आवश्यक उपदेश पाण्डवों को दे रहे थे। उन्हें इस प्रकार धर्मोपदेश देते देखकर द्रौपदी के मन में आया कि जब दुर्योधन मेरी इज्जत उतार रहा था तब इनने उसे कुछ उपदेश नहीं किया और आज धर्म की इतनी लम्बी-चौड़ी बातें कर रहे है। द्रौपदी इन मनोभावों के साथ हंस पड़ी।

🔶 द्रौपदी के मनोभाव भीष्म ने जान लिये। उनने कहा-बेटी उस समय मेरे शरीर में कौरवों का अन्न भरा हुआ था जिसके कारण मेरी बुद्धि वैसी ही अधर्मयुक्त हो रही थी। अब युद्ध में वह रक्त निकल गया, कई दिन से मैंने भोजन भी नहीं किये इससे मेरे पेट में कोई अन्न न होने से मेरे विचार शुद्ध है और अब मैं धर्मोपदेश देने की स्थिति में होने के कारण उत्तम शिक्षाऐं आप लोगों को दे रहा हूँ।

🔷 दुष्टों का अन्न खाने से सत्पुरुषों की भी बुद्धि दूषित हो जाती है अन्न का मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 150)

🌹  ‘‘विनाश नहीं सृजन’’ हमारा भविष्य कथन

🔷 अगला समय संकटों से भरा-पूरा है, इस बात को विभिन्न मूर्धन्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न प्रकार के जोरदार शब्दों में कहा। ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल में जिस ‘‘सेविन टाइम्स’’ में प्रलय काल जैसी विपत्ति आने का उल्लेख किया है, उसका ठीक समय यही है। इस्लाम धर्म में चौदहवीं सदी के महान संकट का उल्लेख है। भविष्य पुराण में इन्हीं दिनों महती विपत्ति टूट पड़ने का संकेत है। सिखों के गुरु ग्रंथसाहिब में भी ऐसी ही अनेक भविष्यवाणियाँ हैं। कवि सूरदास ने इन्हीं दिनों विपत्ति आने का इशारा किया था। मिस्र के पिरामिडों में भी ऐसे ही शिलालेख पाए गए हैं। अनेक भारतीय भविष्यवक्ताओं ने इन दिनों भयंकर उथल-पुथल के कारण अध्यात्म आधार पर और दृश्य गणित ज्योतिष के सहारे ऐसी ही सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं।

🔶 पाश्चात्य देशों में जिन भविष्य वक्ताओं की धाक है और जिनकी भविष्यवाणियाँ ९९ प्रतिशत सही निकलती रही हैं, उनमें जीन डिक्शन, प्रो०हरार, एंडरशन, जॉनबावेरी, कीरो, आर्थर क्लार्क, नोस्ट्राडेमस, मदर शिम्टन, आनंदाचार्य आदि ने इस समय के सम्बन्ध में जो सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं, वे भयावह हैं। कोरिया में पिछले दिनों समस्त संसार के दैवज्ञों का एक सम्मेलन हुआ था, उसमें भी डरावनी सम्भावनाओं की ही आगाही व्यक्त की गई थी। टोरंटो-कनाडा में, संसार भर के भविष्य विज्ञान विशेषज्ञों (फ्यूचराण्टालाजिस्टा) का एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें वर्तमान परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करते हुए कहा था कि बुरे दिन अति समीप आ गए हैं। ग्रह-नक्षत्रों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने वालों ने इन दिनों सूर्य पर बढ़ते धब्बों और लगातार पड़ने वाले सूर्यग्रहणों को धरती निवासियों के लिए हानिकारक बताया है। इन दिनों सन् ८५ के प्रारम्भ में उदय हुआ ‘‘हैली धूमकेतु’’ की विषैली गैसों का परिणाम पृथ्वीवासियों के लिए हानिकारक बताया गया है।

🔷 सामान्य बुद्धि के लोग भी जानते हैं कि अंधा-धुंध बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अगले दिनों अन्न-जल तो क्या सड़कों पर चलने का रास्ता तक न मिलेगा। औद्योगीकरण-मशीनीकरण की भरमार से हवा और पानी भी कम पड़ रहा है और विषाक्त हो चला है। खनिज तेल और धातुएँ, कोयला, पचास वर्ष तक के लिए नहीं है। अणु परीक्षणों से उत्पन्न विकिरण से अगली पीढ़ी और वर्तमान जन समुदाय को कैंसर जैसे भयानक रोगों की भरमार होने का भय है। कहीं अणु युद्ध हो गया तो इससे न केवल मनुष्य, वरन् अन्य प्राणियों और वनस्पतियों का भी सफाया हो जाएगा। असंतुलित हुए तापमान से ध्रुवों की बर्फ पिघल पड़ने, समुद्र में तूफान आने और हिमयुग के लौट पड़ने की सम्भावना बताई जा रही है और अनेक प्रकार के संकटों के अनेकानेक कारण विद्यमान हैं। इस संदर्भ में साहित्य इकट्ठा करना हो, तो उनसे ऐसी सम्भावनाएँ सुनिश्चित दिखाई पड़ती हैं, जिनके कारण इन वर्षों में भयानक उथल-पुथल हो। सन् २००० में युग परिवर्तन की घोषणा है, ऐसे समय में भी विकास से पूर्व विनाश की, ढलाई से पूर्व गलाई की सम्भावना का अनुमान लगाया जा सकता है। किसी भी पहलू से विचार किया जाए, प्रत्यक्षदर्शी और भावनाशील मनीषी-भविष्यवक्ता इन दिनों  विश्व संकट को अधिकाधिक गहरा होता देखते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.170

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 9)

🔶 हर रोज चिट्ठियाँ आती हैं, हर शाखाओं में मारकाट-मारकाट मुझे मैनेजर बनाइये, इस मैनेजर को निकालिये। हमने शाखा तथा शक्तिपीठें इसलिए नहीं बनाई थीं, देवता को इसलिए नहीं बैठाया था कि लोगों का अहंकार बढ़े। हमने ट्रस्टी इसलिए नहीं बनाया था कि इसे बरबाद करो। हमने स्वयं गलती की इन लोगों को मालिक, ट्रस्टी बनाकर, इनके अहंकार एवं स्वार्थपरता को आगे बढ़ाकर। अब पंचायत समितियों में जिस प्रकार झगड़ा होते हैं, हमारे शक्तिपीठों में भी हर जगह चाण्डालपन है, हमें क्या दिखता नहीं? क्या हमने शक्तिपीठें इसीलिए बनाई थीं, पूजा इसीलिए प्रारम्भ की थी, इसीलिए संगठन बनाया था कि आप लोग अहंकारी बन जाइये और आपस में ही एक-दूसरे की टाँग-खिचाई कीजिये, आप ऐसी पूजा को बंद कीजिए, पूजा मत कीजिये, पर यह घटियापन बन्द कीजिये। आप नास्तिक हो जाइये, भले ही पर आप इसी तरह के संगठन बनाना बन्द कर दीजिए। आप शक्तिपीठों को बनाना बन्द कर दीजिये।
        
🔷 यहाँ हम एक बात अवश्य कहेंगे कि आप आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिये। पूजा को पीछे हटाइए, आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिये। आप यह मत सोचिये कि गुरुजी ने चौबीस-चौबीस लाख का जप किया था। नहीं, हम और चौबीस लाख के जप करने वालों का नाम बता सकते हैं जो आज बिलकुल खाली एवं छूँछ हैं। जप करने वाले कुछ नहीं कर सकते हैं, हम ब्राह्मण की शक्ति, सन्त की शक्ति जगाना चाहते हैं। आप राम का नाम लें या न लें। अब तो मैं यहाँ तक कहता हूँ कि अब माला जप करें या न करें, एक माला जप करें या ८१ माला जप करें, परन्तु मुख्य बात यह है कि आप अपने ब्राह्मणत्व को जगाइए। प्याऊ को कौन चलाएगा। हनुमान चालीसा पाठ करने वालों ने कितनों का भला किया है? ब्राह्मणों ने भला किया है, सन्तों ने भला किया है? ब्राह्मणों की वाणी में, सन्तों की तपस्या में बल होता है। आपको इसी प्रकार कोई मिल जाएगा तो आप नास्तिक हो जाएँगे। आप पूजा का महत्त्व बढ़ाइये। अध्यात्म इन लोगों के द्वारा ही टिका हुआ है।

🔶 आपके पास बैंक में धन जमा नहीं है, तो चैक कैसे काट सकते हैं। आपकी बैंक में पूँजी होनी चाहिए। पहले जमा तो कीजिए कुछ। केवल पूजा से ही काम चलने वाला नहीं है। हमारी सबसे बड़ी पूजा समाज की सेवा है। हमने लाखों आदमियों की ही नहीं, वरन् सारे विश्व की सेवा की है। हमने अपनी अक्ल, धन, अनुष्ठान, वर्चस् सभी इसी में लगाया है। हमने खेती करने वालों, मकान बनाने वालों को देखा है कि सेवा के नाम पर नगण्य हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 31 Oct 2017

🔶 सत्य का सज्जनता से अनन्य सम्बन्ध है। सत्यनिष्ठा उसी की निभेगी जो सज्जन होगा। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि सत्यनिष्ठा से सज्जनता के सभी आवश्यक गुण उत्पन्न हो जायेंगे। एक के बिना दूसरी बात निभ ही नहीं सकेगी। तामसी राजसी इच्छाओं और आवश्यकताओं वाला व्यक्ति सत्यनिष्ठ रह सके यह कठिन है। सत्य केवल सच बोलने तक ही सीमित नहीं है। वरन् वह एक सर्वांगीण सर्वतोमुखी जीवन साधना है। वैसी ही साधना जैसी अन्यान्य कष्ट साध्य योग साधनाएँ परमात्मा को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। सत्य पालन की साधना से भी जीवात्मा परमात्मा तक इसी प्रकार पहुँच सकती है जैसे अन्यान्य योगों के साधक तपस्वी लोग ब्रह्म सायुज्य की स्थिति तक पहुँचते हैं। जिस प्रकार सभी साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।

🔷 सफलता क्षेत्र में सत्य का भी वही स्थान है जो ईश्वर का। जिस प्रकार शिव, विष्णु आदि की उपासना की जाती है उसी प्रकार ही सत्य की भी आराधना है। सिद्ध हुआ सत्य भी साधक को वैसे ही वरदान दे सकता है जैसे कोई अन्य देवता या साक्षात् परमात्मा प्रसन्न होने पर अपने आराधक को प्रदान करते हैं।
पातञ्जलि योगदर्शन साधन पाद के सूत्र 36 में कहा गया है—
सत्य प्रतिष्ठायाँ क्रिया फलाश्रित्वम्।
अर्थात्—सत्य में स्थिति दृढ़ हो जाने पर क्रिया फल का आश्रय बन जाती है।

🔶 सत्यनिष्ठ की वाणी के द्वारा जो क्रिया होती है अर्थात् जो कुछ वह कहता है सो फलीभूत सफल होता है। उसकी वाणी कभी असत्य नहीं होती। अनेकों पुण्य कार्य करने से जो फल अन्य लोगों को मिलते हैं वह फल सत्यनिष्ठ को अपनी वाणी साधना से ही मिल जाते हैं। यदि वह किसी को शाप या वरदान दे तो पूर्ण सफल होता है। किसी ने जो शुभ नहीं किया है उसका सत्परिणाम उपस्थित कर देने की शक्ति उसमें उत्पन्न हो जाती है। यह तो एक प्रत्यक्ष एवं प्रकट सिद्धि है। इसके अतिरिक्त भी सत्यनिष्ठ अनेक आध्यात्मिक सफलताओं से सम्पन्न हो जाता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 31 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Oct 2017


सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 8)

🔶 क्या हम जिन्दगी भर, अपने बीबी-बच्चों को ही खिलाते रहेंगे? जिस पर मनुष्य का भविष्य टिका है, क्या उसके लिए कुछ नहीं कर सकेंगे? अपने लिये अधिक, समाज के लिए इतना कम। यह कैसे होगा? मेरे गुरु ने दुखियारों की सेवा, समाज की सेवा कम की है, परन्तु उसने सारे विश्व को हिला दिया है। दूसरों के दुःखों को देखकर यह सोचते हैं कि इसके लिए हम क्या करें? उस समय मैं रो पड़ता हूँ तथा उसे सहायता किये बिना मेरा मन नहीं मानता है। यह क्रम चलेगा ही। परन्तु एक काम और है, इनसान को ऊँचा उठाने का। हम सोचते हैं कि और यदि यह काम भी किया होता तो मजा आ जाता। आप जितने लोग बैठे हैं, अगर आपको हम फुटबॉल की तरह ऊँचे उछाल दिये होते तो मजा आ जाता।
       
🔷 आप लोगों को उछाल दें तो आप में से हर एक आदमी हनुमान, ऋषि विवेकानन्द दिखाई पड़ेगा। आप लोगों में से एक भी आदमी ऐसा नहीं है, जो रैदास की तुलना में गरीब हो। परन्तु आप इतने भारी हैं कि आपके सेल्स काम नहीं कर रहे हैं, आपके हाथ उठ नहीं पा रहे हैं। मानसिक दृष्टि से एक-एक बेड़ियाँ इतनी भारी हैं जैसे हजार मन की हों। ऐसे में आपको कैसे उठाऊँ? आपकी बेड़ियों को मैं काटूँगा क्योंकि हमारे बाद इन बच्चों को खिलाने वाला, नर्सिंगहोम चलाने वाला कहाँ से लायेंगे? यह अस्पताल बन्द हो जाने पर आपके अनुभव के बिना इनका ऑपरेशन कौन करेगा? इनसान को उठाया नहीं जा सका तो बात कैसे बनेगी?

🔶 इसी काम के लिए हम समय लगाना चाहते हैं। सवाल हमारे समय का है, आप तो केवल पूजा के पीछे पड़े हैं। देवी-देवता के पीछे लगे हैं कि मनोकामना पूरी हो जाए। किसी दिन मेरे दिमाग में गुस्सा आ गया तो पूजा को ही बन्द कर दूँगा और कहूँगा कि इसी के पीछे पड़ा है। पूजा के चक्कर में पड़ा है। पूजा से आज्ञाचक्र जगेगा। सुन लेना एक दिन मैं पूजा को गालियाँ दूँगा, यदि यही रटता रहा कि सब कुछ पूजा से मिल जाएगा और यही समझता रहा कि माला घुमाने को पूजा कहते हैं। देवी-देवता को पकड़ने का नाम पूजा है। अज्ञानी लोग, भ्रमित लोग मनुष्य को दबाने तथा चक्कर में डालने के नाम को पूजा कहते हैं।

🔷 देवी-देवताओं को पकड़ने के लिए, मनोकामना पूर्ण करने के लिए जो आपने पूजा का स्वरूप बना रखा है, वह बहुत ही घटिया रूप है। पूजा ऐसी नहीं हो सकती, ध्यान ऐसा नहीं हो सकता, जैसा कि आप लोगों ने समझ रखा है कि अगरबत्तियाँ चढ़ाएँगे, चावल चढ़ाएँगे, शक्कर की गोली चढ़ाएँगे और मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। इतना घटिया अध्यात्म नहीं हो सकता है जैसा कि आप लोगों ने सोच रखा है। आपकी पूजा घटिया, आपके देवता घटिया सब घटिया हैं। इसको समझना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Elephant and the Five Blind Men

🔶 Someone said to five blind men, "There is an elephant in front of you, can you guess how it looks like?" The first blind men caught the elephant's tail, the second its ears, the third its legs, the fourth its tusks, and the fifth one touched its back. Based on their experience they all came up with radically different answers. The first blind man who had caught the elephant's tail concluded, "The elephant is definitely like a rope."

🔷 The second one, who had caught its ears strongly disagreed and said, "No! It's like a saucepan." The third blind man who had caught its leg concluded that an elephant is like fat pole. The fourth one, who had caught the tusk, thought it was like a stick, and the fifth one, who touched the back was absolutely sure it was like a rock. They all started quarreling over the matter and never reached a conclusion.

🔶 Telling this story to his disciples, a holy man said, "Just like the five blind men, most people have only partially experienced God, and useless quarrels take place in religious discourses."

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Oct 2017

🔶 आत्मा के विकास को सीधा उठते चलते, उर्ध्वगामी होने में सबसे बड़ी बाधा असत्य की ही है। छल, कपट, दुराव, छिपाव के कारण अंतर्मन में अनेक प्रकार के असमंजस पैदा होते हैं, आगा पीछा सोचना पड़ता है। झूठ खुलने का भय उत्पन्न होता है, असत्यभाषी कपटी ठहराये जाने पर जो निन्दा घृणा और अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है उसके भय से अन्तःकरण निरन्तर संत्रस्त रहता है। इन विकृतियों के रहते हुए आध्यात्मिक विकास में बाधा पड़ती है। जिस पौधे का जन्म किसी भारी पत्थर के नीचे हुआ हो उसे ऊपर उठने में बहुत असुविधा होती है, टेढ़ा तिरछा होकर वह मुश्किल से ही उस पत्थर के नीचे से बाहर निकल पाता है। निकल कर भी धीरे धीरे बढ़ता है और फिर भी टेढ़ा कुबड़ा कुरूप ही रहता है। जीव के विकास मार्ग में भी प्रधान बाधा यही है।

🔷 सरलता ही साधुता का चिन्ह है। जो जितना सीधा भोला भाला है जिसमें जितनी है निश्छलता, और सद्भावना है वह उतना ही बड़ा सन्त कहा जा सकता है। धर्म कर्तव्यों में सत्य की गणना सर्व प्रथम सर्वोपरि तत्वों में की गई है। इसलिए श्रेयार्थी को ईश्वर की ही भाँति सत्य का भी उपासक बनना पड़ता है। कोई व्यक्ति उपासना को प्रेम पूर्वक करता है किन्तु उसका मन असत्याचरण में अभिप्रेत है तो उसकी साधना अपूर्ण एवं अधूरी ही मानी जाएगी। उसे बहुत श्रम करने पर भी वह लाभ न मिल सकेगा जो सत्य निष्ठ-शुद्ध आचरण और सद्विचारों वाला व्यक्ति थोड़ी सी ही साधना से प्राप्त कर सकता है।

🔶 विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए सच्चे सत्य प्रेमी को उन कष्टों को सहने के लिए तैयार रहना चाहिए जो इस मार्ग के पथिक की परीक्षा करने के लिए आती हैं। यदि साधक डरे नहीं, असुविधाओं और विरोधों से घबराये नहीं, अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं को सीमित रखे, कष्ट सहिष्णुता का विपत्ति में हँसते रहने का और विरोधी के प्रति सद्भाव रखने का स्वभाव बना ले तो उसकी सत्यनिष्ठा आसानी से निभ सकती है। जो लोग सत्य पालन के महान लाभों से लाभान्वित होना चाहते हैं उन्हें उसके लिए अपने स्वभाव में इन आवश्यक गुणों को भी उत्पन्न करना ही पड़ेगा। सत्य सेवी का श्रेय तो प्राप्त हो जाए पर विरोध, हानि, अपमान, असुविधा एवं आपत्ति का सामना न करना पड़े ऐसा नहीं हो सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 30 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Oct 2017


👉 बेटे के जन्मदिन पर .....

🔷 रात के 1:30 बजे फोन आता है, बेटा फोन उठाता है तो माँ बोलती है....
"जन्म दिन मुबारक लल्ला"

🔶 बेटा गुस्सा हो जाता है और माँ से कहता है - सुबह फोन करती। इतनी रात को नींद खराब क्यों की? कह कर फोन रख देता है।

🔷 थोडी देर बाद पिता का फोन आता है। बेटा पिता पर गुस्सा नहीं करता, बल्कि कहता है ..." सुबह फोन करते "

🔶 फिर पिता ने कहा - मैनें तुम्हे इसलिए फोन किया है कि तुम्हारी माँ पागल है, जो तुम्हे इतनी रात को फोन किया।

🔷 वो तो आज से 25 साल पहले ही पागल हो गई थी। जब उसे डॉक्टर ने ऑपरेशन करने को कहा और उसने मना किया था। वो मरने के लिए तैयार हो गई, पर ऑपरेशन नहीं करवाया।

🔶 रात के 1:30 को तुम्हारा जन्म हुआ। शाम 6 बजे से रात 1:30 तक वो प्रसव पीड़ा से परेशान थी ।

🔷 लेकिन तुम्हारा जन्म होते ही वो सारी पीड़ा भूल गय ।उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । तुम्हारे जन्म से पहले डॉक्टर ने दस्तखत करवाये थे, कि अगर कुछ हो जाये, तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे।

🔶 तुम्हे साल में एक दिन फोन किया, तो तुम्हारी नींद खराब हो गई......मुझे तो रोज रात को 25 साल से, रात के 1:30 बजे उठाती है और कहती है, देखो हमारे लल्ला का जन्म इसी वक्त हुआ था।

🔷 बस यही कहने के लिए तुम्हे फोन किया था। इतना कहके पिता फोन रख देते हैं।

🔶 बेटा सुन्न हो जाता है। सुबह माँ के घर जा कर माँ के पैर पकड़कर माफी मांगता है....तब माँ कहती है, देखो जी मेरा लाल आ गया।

🔷 फिर पिता से माफी मांगता है, तब पिता कहते हैं .....आज तक ये कहती थी, कि हमे कोई चिन्ता नहीं; हमारी चिन्ता करने वाला हमारा लाल है।

🔶 पर अब तुम चले जाओ, मैं तुम्हारी माँ से कहूंगा कि चिन्ता मत करो।

🔷 मैं तुम्हारा हमेशा की तरह आगे भी ध्यान रखुंगा।

🔶 तब माँ कहती है -माफ कर दो, बेटा है।

🔷 सब जानते हैं दुनियाँ में एक माँ ही है, जिसे जैसा चाहे कहो, फिर भी वो गाल पर प्यार से हाथ फेरेगी।

🔶 पिता अगर तमाचा न मारे, तो बेटा सर पर बैठ जाये। इसलिए पिता का सख्त होना भी जरुरी है।

🔷 माता पिता को आपकी दौलत नही, बल्कि आपका प्यार और वक्त चाहिए। उन्हें प्यार दीजिए। माँ की ममता तो अनमोल है।

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 7 )

🔶 हमारे मरने के बाद आप देखेंगे कि गुरुजी के मरने के बाद उनका समय, धन, श्रम किस काम में खर्च हुआ है। हमारी शक्ति एवं सामर्थ्य बच्चों को खिलाने में, अस्पताल खोलकर मरीजों की सेवा में खर्च हुई हैं। हमने अभी तक समाज को चालीस प्रतिशत दिया है और लोगों को, दुखियारे को पाँच प्रतिशत दिया है। अब हमारा मन है कि इसका हिस्सा बढ़ाया जा सके। जब हम मौन धारण कर लेंगे तो हमारा ब्राह्मण और जाग जाएगा, उस समय हम व्यक्तियों की भी ज्यादा सेवा कर सकेंगे। ठोस सेवा कर सकेंगे। अभी तक हमारी सहानुभूति का अंश ज्यादा रहा है, सेवा का हिस्सा कम रहा है। हमने सहानुभूति दी है तथा पायी है।
      
🔷 अगर हमने किसी की एक किलोग्राम सेवा की है तो उसमें पाँच सौ ग्राम सहानुभूति भी है। उस समय हम साधन सम्पन्न एवं समर्थ थे। पर अगले दिनों जब जीवात्मा को हम और ऊपर उठा लेंगे तब हम अधिक सेवा कर सकेंगे। आपके लिए हमने कुछ किया है या नहीं? इसका सबूत देखना हो तो दृष्टि पसारकर देखिये कि कुछ हुआ है, तो आप पायेंगे कि इसी कारण से यह पचास लाख आदमी हमसे जुड़े हैं, अन्यथा इतने आदमी कहाँ से आते? यह हम कहाँ कहते हैं कि कुछ नहीं हुआ। ५० लाख आदमी हमारे एक इशारे पर खड़े हो सकते हैं। इतने शक्तिपीठ कहाँ से बन गये? ५० लाख मुट्ठियाँ ५० लाख लोगों का एक घण्टे का समयदान कुछ मायने रखता है।

🔶 हम अपने ब्राह्मण को फिर जिन्दा करेंगे। सन्त दानी होता है। आदमी को दानी बनने के लिए सन्त बनना होगा। हम ब्राह्मण और सन्त को पुनः जिन्दा करेंगे। ब्राह्मण जमा करता है, सन्त उसे खर्च कर देता है। हमने निश्चय किया है, विचार किया है कि जिन्दगी के इन आखिरी क्षणों में अपने ब्राह्मण एवं सन्त को साधकर सबके लिए एक मिसाल स्थापित कर दूँ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 28 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Oct 2017


शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 6 )

🔶 साथियों! हमारे मौन धारण करने का एक और कारण है। आप यह मत सोचिये कि मैं अपना प्याऊ बन्द करने जा रहा हूँ। हमें बच्चों को खिलाने का शौक है। हमें बच्चों को प्यार करना, उन्हें गुब्बारा देना बहुत प्यारा लगता है। स्वयं घोड़ा बन जाना तथा बच्चों को पीठ पर बैठा लेना तथा घुमाना बहुत प्यारा लगता है।
      
🔷 हम जो भी सहायता आपकी कर सकते हैं, वह अवश्य करेंगे, परन्तु आपको भी स्वयं में संवेदना पैदा करनी होगी। हमने कहा है कि आप उपासना करिये, जप करिये ताकि आपको उस समय परा एवं पश्यन्ति वाणी से दिशा दे सकूँ, अन्यथा मैं अपने मौन की शक्ति प्रेषित करूँगा और आपको नुकसान होगा।

🔶 मेरे गुरु के व्याख्यान देने का कार्य बन्द हो गया तो क्या उनकी शक्ति कम हो गई? हम नहीं बोल रहे हैं, हमारा गुरु बोल रहा है। आप भी उनकी शक्ति से बोलेंगे। प्रज्ञापुराण जब आप पढ़ेंगे और लोगों को सुनाएँगे तब वह आपकी वाणी में नहीं, बल्कि मेरे गुरु की वाणी में होगा, जिसमें अधिक ताकत होगी। आपकी वाणी में कोई ताकत नहीं होगी, आप ऐसे ही बकवास करते रहेंगे। हम मौन हो जाएँगे तो हमारी शक्ति बढ़ जाएगी। हमारी परा एवं पश्यन्ति वाणी की ताकत बढ़ जाएगी। आप मेरी उस वाणी को सुनेंगे तो आपके आँखों में पानी आएगा, भाव-संवेदना जगेगी। इससे हम आपकी सहायता ज्यादा कर सकेंगे।

🔷 आप क्या सोचते हैं कि आप लोगों के ऊपर हमारा कोई असर नहीं पड़ता है। यह हमारा मौन ब्राह्मणत्व है। यह तपस्वी की वाणी है। हमने सेवा करने में सन्त की प्रवृत्ति को जिन्दा रखा है कि हम समाज की सेवा करेंगे। आज व्यक्ति की सेवा ज्यादा है, समाज की सेवा गौण हो गयी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Oct 2017

🔶 यदि विघ्न बाधाएँ आती हैं, आपको झटका-मारती हैं, तो आप गिर जाते हैं हिम्मत पस्त हो जाते हैं किन्तु इससे काम नहीं चलेगा। गिरकर भी उठिये फिर चलने का प्रयास कीजिए। एक बार नहीं अनेकों बार आपको गिरना पड़े किन्तु गिर कर भी उठिये और आगे बढ़िये। उस छोटे बालक को देखिये जो बार-बार गिरता है किन्तु फिर उठने का प्रयत्न करता है और एक दिन चलना सीख जाता है। आप की सफलता, विकास, उत्थान भी उतना ही सुनिश्चित है। अतः रुकिए नहीं, उठिए। ठोकरें खा कर भी आगे बढ़िये, सफलता एक दिन आपका स्वागत करने को तैयार मिलेगी।

🔷 आने वाले विघ्नों, कठिनाइयों में भी अपना धर्म न छोड़ें। स्मरण रखिये प्रत्येक विघ्न-बाधा का सर्व प्रथम आघात आपके उत्साह आशा और भविष्य के प्रति आकर्षण पर होता है। इनका सीधा वार आपके हृदय पर होता है किन्तु कहीं आपका हृदय टूट नहीं पाये, इसके लिए यह सोच लीजिए कि जिस प्रकार घोर अन्धकार के बाद सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है उसी प्रकार आपका उज्ज्वल भविष्य प्रकाशित होने वाला है। अमावस की काली रात के पश्चात् चन्द्रमा की चाँदनी सहज ही फूट पड़ती है। आज का कठिन समय भी गुजर जाएगा, इसे हृदयंगम कर लीजिए। अपने आशावादी दृष्टिकोण, आकाँक्षाओं, उत्साह की सम्पत्ति को यों ही न खोइये। उनका बचाव कीजिए और प्रगति के पथ पर आशा और उत्साह के साथ आगे बढ़ते ही जाइये।

🔶 मनुष्य दूसरों की दृष्टि में कैसा जँचता है, इसका बहुत कुछ आधार उसके अपने व्यक्तित्व पर निर्भर रहता है। लोग विद्या पढ़ने, धन कमाने, पोशाक और साज सज्जा बनाने पर तो ध्यान देते हैं, पर अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने की दिशा में उपेक्षा ही बरतते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जितना महत्व योग्यता और सम्पदा का है उससे कम मूल्य व्यक्तित्व का नहीं है। व्यक्तित्व का प्रभावशाली होना बड़ी से बड़ी सम्पदा या योग्यता से कम मूल्य का नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को किसी से विशेष स्वार्थ या लगाव है तो बात दूसरी है, नहीं तो यदि कोई किसी से प्रभावित होता है तो उसका मूल आधार उसका व्यक्तित्व ही होता है। शरीर का सुडौल या रूपवान् होना, दूसरों को कुछ हद तक प्रभावित करता है, वस्तुतः सच्चा प्रभाव तो उसके उन लक्षणों का पड़ता है जो उसके मन की भीतरी स्थिति के अनुरूप क्रिया और चेष्टाओं से पल-पल पर झलकते रहते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 28 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Oct 2017


👉 सामयिक चेतावनी (भाग 2)

आत्मिक मार्ग की विभूतियाँ महान् हैं। शरीर को सुख देने वाले भौतिक लाभ उन आत्मिक लाभों की तुलना में अत्यन्त ही तुच्छ और अस्थिर हैं। पर आत्मिक ...