गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017
बुधवार, 11 अक्टूबर 2017
👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 7)
🔴 कामना करने वाले भक्त नहीं हो सकते। भक्त शब्द के साथ में भगवान की इच्छाएँ पूरी करने की बात जुड़ी रहती है। कामनापूर्ति आपकी नहीं भगवान की। भक्त की रक्षा करने का भगवान व्रत लिए हैं—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’। यह सही है कि भगवान ने योग क्षेम को पूरा करने का व्रत लिया हुआ है, पर हविस पूरी करने का जिम्मा नहीं लिया। आपका योग और क्षेम अर्थात् आपकी शारीरिक आवश्यकताएँ और मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना उनकी जिम्मेदारी है। आपकी बौद्धिक, मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना भगवान् की जिम्मेदारी है, पर आपकी हविस पूरी नहीं हो सकती। हविसों के लिए, तृष्णाओं के लिए भागिए मत।
🔵 यह भगवान् की शान में, भक्त की शान में, भजन की शान में गुस्ताखी है, सबकी शान में गुस्ताखी है। भक्त और भगवान का सिलसिला इसी तरह से चलता रहा है और इसी तरीके से चलता रहेगा। भक्त माँगते नहीं दिया करते हैं। भगवान कोई इनसान नहीं हैं, उसे तो हमने बना लिया है। भगवान वास्तव में सिद्धान्तों का समुच्चय है, आदर्शों का नाम है, श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति, आदर्शों के प्रति आदमी के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः यही भगवान् की भक्ति है। देवत्व इसी का नाम है।
🔴 प्रामाणिकता आदमी की इतनी बड़ी दौलत है कि जनता का उस पर सहयोग बरसता है, स्नेह बरसता है, समर्थन बरसता है। जहाँ स्नेह, समर्थन और सहयोग बरसता है, वहाँ आदमी के पास चीज की कमी नहीं रह सकती। बुद्ध की प्रामाणिकता के लिए, सद्भावना के लिए, उदारता लोकहित के लिए थी। व्यक्तिगत जीवन में श्रेष्ठता और प्रामाणिकता को लेकर चलने के बाद में वे भक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होते चले गये। सारे समाज ने उनको सहयोग दिया, दान दिया और उनकी आज्ञा का पालन किया।
🔵 लाखों लोग उनके कहने पर जेल चले गए, लाखों लोगों ने अपने सीने पर गोलियाँ खाईं। क्या यह हो सकता है? हाँ! शर्त एक ही है कि आप प्रकाश की ओर चलें, छाया आपके पीछे-पीछे चलेगी। आप तो छाया के पीछे-पीछे भागते हैं, छाया ही आप पर हावी हो गई है। छाया का अर्थ है माया। आप प्रकाश की ओर चलिए, भगवान् की ओर चलिए, सिद्धान्तों की ओर चलिए। आदर्श और सिद्धान्त, इन्हीं का नाम हनुमान है, इन्हीं का नाम भगवान है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 यह भगवान् की शान में, भक्त की शान में, भजन की शान में गुस्ताखी है, सबकी शान में गुस्ताखी है। भक्त और भगवान का सिलसिला इसी तरह से चलता रहा है और इसी तरीके से चलता रहेगा। भक्त माँगते नहीं दिया करते हैं। भगवान कोई इनसान नहीं हैं, उसे तो हमने बना लिया है। भगवान वास्तव में सिद्धान्तों का समुच्चय है, आदर्शों का नाम है, श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति, आदर्शों के प्रति आदमी के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः यही भगवान् की भक्ति है। देवत्व इसी का नाम है।
🔴 प्रामाणिकता आदमी की इतनी बड़ी दौलत है कि जनता का उस पर सहयोग बरसता है, स्नेह बरसता है, समर्थन बरसता है। जहाँ स्नेह, समर्थन और सहयोग बरसता है, वहाँ आदमी के पास चीज की कमी नहीं रह सकती। बुद्ध की प्रामाणिकता के लिए, सद्भावना के लिए, उदारता लोकहित के लिए थी। व्यक्तिगत जीवन में श्रेष्ठता और प्रामाणिकता को लेकर चलने के बाद में वे भक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होते चले गये। सारे समाज ने उनको सहयोग दिया, दान दिया और उनकी आज्ञा का पालन किया।
🔵 लाखों लोग उनके कहने पर जेल चले गए, लाखों लोगों ने अपने सीने पर गोलियाँ खाईं। क्या यह हो सकता है? हाँ! शर्त एक ही है कि आप प्रकाश की ओर चलें, छाया आपके पीछे-पीछे चलेगी। आप तो छाया के पीछे-पीछे भागते हैं, छाया ही आप पर हावी हो गई है। छाया का अर्थ है माया। आप प्रकाश की ओर चलिए, भगवान् की ओर चलिए, सिद्धान्तों की ओर चलिए। आदर्श और सिद्धान्त, इन्हीं का नाम हनुमान है, इन्हीं का नाम भगवान है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 6)
🔴 मित्रो ! भगवान जब प्रसन्न होते हैं तो वह चीज नहीं देते जो आप माँगते हैं। फिर क्या चीज देते हैं? वह चीज देते हैं, जिससे आदमी अपने बलबूते पर खड़ा हो जाता है और चारों ओर से उसको सफलताएँ मिलती हुई चली जाती हैं। सारे के सारे महापुरुषों को आप देखते चले जाइए, कोई भी आदमी दुनिया के पर्दे पर आज तक ऐसा नहीं हुआ है, जिसको दैवी-सहयोग न मिला हो, जिसको जनता का सहयोग न मिला हो, जिसको भगवान् का सहयोग न मिला हो।
🔵 ऐसे एक भी आदमी का नाम आप बतलाइए जिसके अन्दर से विशेषताएँ पैदा न हुई हों जिनसे आप दूर रहना चाहते हैं, जिनसे आप बचना चाहते हैं। जिनके प्रति आपका कोई लगाव नहीं है। वे चीजें जिनको हम आदर्शवाद कहते हैं, सिद्धान्तवाद कहते हैं, दुनिया के हिस्से का हर आदमी जिसको श्रेय भी मिला हो, धन भी मिला हो। जहाँ आदमी को श्रेय मिलेगा वहीं उसे वैभव भी मिले बिना रहेगा नहीं। सन्त गरीब नहीं होते। वे उदार होते हैं और जो पाते हैं—खाते नहीं, दूसरों को खिला देते हैं। देवत्व इसी को कहते हैं।
🔴 आदमी के भीतर का माद्दा जब विकसित होता है तो बाहरी दौलत उसके नजदीक बढ़ती चली जाती है। उदाहरण क्या बताऊँ—प्रत्येक सिद्धान्तवादी का यही उदाहरण है। उन्हीं को मैं देवभक्त कहता हूँ। देवोपासक उन्हीं को मैं कहता हूँ। उन्हीं की देवभक्ति को मैं सार्थक मानता हूँ जो अपने आकर्षण में खींच सकने में समर्थ हुए। आपकी भाषा में कहूँ तो देवता जब प्रसन्न होते हैं तो आदमी को देवत्व के गुण देते हैं, देवत्व के कर्म देते हैं, देवत्व का चिन्तन देते हैं और देवत्व का स्वभाव देते हैं। यह मैंने आपकी भाषा में कहा है। हमारी परिभाषा इससे अलग है।
🔵 मैं यह कह सकता हूँ कि आदमी अपने देवत्व के गुणों के आधार पर देवता को मजबूर करता है, देवता पर दबाव डालता है, उसे विवश करता है और यह कहता है कि हमारी सहायता करनी चाहिए और सहायता करनी पड़ेगी। भक्त इतना मजबूत होता है जो भगवान के ऊपर दबाव डालता है और कहता है कि हमारा ड्यू है। आप हमारी सहायता क्यों नहीं करते? वह भगवान से लड़ने को आमादा हो जाता है कि आपको हमारी सहायता करनी चाहिए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 ऐसे एक भी आदमी का नाम आप बतलाइए जिसके अन्दर से विशेषताएँ पैदा न हुई हों जिनसे आप दूर रहना चाहते हैं, जिनसे आप बचना चाहते हैं। जिनके प्रति आपका कोई लगाव नहीं है। वे चीजें जिनको हम आदर्शवाद कहते हैं, सिद्धान्तवाद कहते हैं, दुनिया के हिस्से का हर आदमी जिसको श्रेय भी मिला हो, धन भी मिला हो। जहाँ आदमी को श्रेय मिलेगा वहीं उसे वैभव भी मिले बिना रहेगा नहीं। सन्त गरीब नहीं होते। वे उदार होते हैं और जो पाते हैं—खाते नहीं, दूसरों को खिला देते हैं। देवत्व इसी को कहते हैं।
🔴 आदमी के भीतर का माद्दा जब विकसित होता है तो बाहरी दौलत उसके नजदीक बढ़ती चली जाती है। उदाहरण क्या बताऊँ—प्रत्येक सिद्धान्तवादी का यही उदाहरण है। उन्हीं को मैं देवभक्त कहता हूँ। देवोपासक उन्हीं को मैं कहता हूँ। उन्हीं की देवभक्ति को मैं सार्थक मानता हूँ जो अपने आकर्षण में खींच सकने में समर्थ हुए। आपकी भाषा में कहूँ तो देवता जब प्रसन्न होते हैं तो आदमी को देवत्व के गुण देते हैं, देवत्व के कर्म देते हैं, देवत्व का चिन्तन देते हैं और देवत्व का स्वभाव देते हैं। यह मैंने आपकी भाषा में कहा है। हमारी परिभाषा इससे अलग है।
🔵 मैं यह कह सकता हूँ कि आदमी अपने देवत्व के गुणों के आधार पर देवता को मजबूर करता है, देवता पर दबाव डालता है, उसे विवश करता है और यह कहता है कि हमारी सहायता करनी चाहिए और सहायता करनी पड़ेगी। भक्त इतना मजबूत होता है जो भगवान के ऊपर दबाव डालता है और कहता है कि हमारा ड्यू है। आप हमारी सहायता क्यों नहीं करते? वह भगवान से लड़ने को आमादा हो जाता है कि आपको हमारी सहायता करनी चाहिए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017
सोमवार, 9 अक्टूबर 2017
👉 दुनियाँ बदलने के लिए खुद को बदलिये
🔴 एक बार की बात है किसी दूर राज्य में राजा शासन करता था। उसके राज्य में सारी प्रजा बहुत संपन्न थी किसी को कोई भी दुःख नहीं था ना ही किसी का कोई ऋण था। राजा के पास भी खजाने की कमी नहीं थी वह बहुत वैभवशाली जीवन जीता था।
🔵 एक बार राजा के मन में ख्याल आया कि क्यों ना अपने राज्य का निरिक्षण किया जाये, देखा जाये कि राज्य में क्या चल रहा है और लोग कैसे रह रहे हैं। तो राजा ने कुछ सोचकर निश्चय किया कि वह बिना किसी वाहन के पैदल ही भेष राज्य में घूमेगा जिससे वो लोगों की बातें सुन सके और उनके विचार जान सके । फिर अगले दिन से ही राजा भेष बदल कर अकेला ही राज्य में घूमने निकल गया उसे कहीं कोई दुखी व्यक्ति दिखाई नहीं दिया फिर धीरे धीरे उसने अपने कई किलों और भवनों का निरिक्षण भी किया।
🔴 जब राजा वापस लौटा तो वह खुश था कि उसका राज्य संपन्न है लेकिन अब उसके पैरों में बहुत दर्द था क्योंकी ये पहला मौका था जब राजा इतना ज्यादा पैदल चला हो । उसने तुरंत अपने मंत्री को बुलाया और कहा – राज्य में सड़के इतने कठोर पत्थर की क्यों बनाई हुई हैं देखो मेरे पैरों में घाव हो गए हैं, मैं इसी वक्त आदेश देता हूँ कि पुरे राज्य में सड़कों पे चमड़ा बिछवा दिया जाये जिससे चलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। मंत्री यह सुनते की सन्न रह गया, बोला – महाराज इतना सारा चमड़ा कहाँ से आएगा और इतने चमड़े के लिए ना जाने कितने जानवरों की हत्या करनी पड़ेगी और पैसा भी बहुत लगेगा। राजा को लगा कि मंत्री उसकी बात ना मान कर उसका अपमान कर रहा है, इस पर राजा ने कहा- आपको जो आदेश दिया गया उसका पालन करो देखो मेरे पैरों में पत्थर की सड़क पे चलने से कितना दर्द हो रहा है।
🔵 मंत्री बहुत बुद्धिमान था, मंत्री ने शांत स्वर में कहा – महाराज पुरे राज्य में सड़क पर चमड़ा बिछवाने से अच्छा है आप चमड़े के जूते क्यों नहीं खरीद लेते। मंत्री की बात सुनते ही राजा निशब्द सा होकर रह गया।
🔴 मित्रों इसी तरह हम रोज अपनी जिन्दगी में ना जाने कितनी परेशानियों को झेलते हैं और हम सारी परेशानियों के लिए हमेशा दूसरों को दोषी ठहराते हैं, कुछ लोगों को तो दुनिया की हर चीज़ और हर नियम में दोष दिखाई देता है। हम सोचते हैं कि फलां आदमी की वजह से आज मेरा वो काम बिगड़ गया या फलां व्यक्ति की वजह से मैं आज ऑफिस के लिए लेट हो गया या फलां व्यक्ति की वजह से मैं फेल हो गया, सड़क पर पड़े कूड़े को देखकर सभी लोग नाक पर रुमाल रखकर दूसरों को गलियां देते हुए निकल जाते हैं लेकिन कभी खुद सफाई के लिए आगे नहीं आ पाते वगैहरा वगैहरा।
🌹 लेकिन हम कभी खुद को सुधारने की कोशिश नहीं करते, कभी खुद परिवर्तन का हिस्सा बनने की कोशिश नहीं करते। मित्रों एक एक बूंद से घड़ा भरता है और आपका प्रयास एक बूंद ही सही लेकिन वो बूंद घड़ा भरने के लिए बहुत जरुरी है। दूसरों को दोष देना छोड़िये और खुद को बदलिये फिर देखिये दुनियाँ खुद बदल जाएगी।
🔵 एक बार राजा के मन में ख्याल आया कि क्यों ना अपने राज्य का निरिक्षण किया जाये, देखा जाये कि राज्य में क्या चल रहा है और लोग कैसे रह रहे हैं। तो राजा ने कुछ सोचकर निश्चय किया कि वह बिना किसी वाहन के पैदल ही भेष राज्य में घूमेगा जिससे वो लोगों की बातें सुन सके और उनके विचार जान सके । फिर अगले दिन से ही राजा भेष बदल कर अकेला ही राज्य में घूमने निकल गया उसे कहीं कोई दुखी व्यक्ति दिखाई नहीं दिया फिर धीरे धीरे उसने अपने कई किलों और भवनों का निरिक्षण भी किया।
🔴 जब राजा वापस लौटा तो वह खुश था कि उसका राज्य संपन्न है लेकिन अब उसके पैरों में बहुत दर्द था क्योंकी ये पहला मौका था जब राजा इतना ज्यादा पैदल चला हो । उसने तुरंत अपने मंत्री को बुलाया और कहा – राज्य में सड़के इतने कठोर पत्थर की क्यों बनाई हुई हैं देखो मेरे पैरों में घाव हो गए हैं, मैं इसी वक्त आदेश देता हूँ कि पुरे राज्य में सड़कों पे चमड़ा बिछवा दिया जाये जिससे चलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। मंत्री यह सुनते की सन्न रह गया, बोला – महाराज इतना सारा चमड़ा कहाँ से आएगा और इतने चमड़े के लिए ना जाने कितने जानवरों की हत्या करनी पड़ेगी और पैसा भी बहुत लगेगा। राजा को लगा कि मंत्री उसकी बात ना मान कर उसका अपमान कर रहा है, इस पर राजा ने कहा- आपको जो आदेश दिया गया उसका पालन करो देखो मेरे पैरों में पत्थर की सड़क पे चलने से कितना दर्द हो रहा है।
🔵 मंत्री बहुत बुद्धिमान था, मंत्री ने शांत स्वर में कहा – महाराज पुरे राज्य में सड़क पर चमड़ा बिछवाने से अच्छा है आप चमड़े के जूते क्यों नहीं खरीद लेते। मंत्री की बात सुनते ही राजा निशब्द सा होकर रह गया।
🔴 मित्रों इसी तरह हम रोज अपनी जिन्दगी में ना जाने कितनी परेशानियों को झेलते हैं और हम सारी परेशानियों के लिए हमेशा दूसरों को दोषी ठहराते हैं, कुछ लोगों को तो दुनिया की हर चीज़ और हर नियम में दोष दिखाई देता है। हम सोचते हैं कि फलां आदमी की वजह से आज मेरा वो काम बिगड़ गया या फलां व्यक्ति की वजह से मैं आज ऑफिस के लिए लेट हो गया या फलां व्यक्ति की वजह से मैं फेल हो गया, सड़क पर पड़े कूड़े को देखकर सभी लोग नाक पर रुमाल रखकर दूसरों को गलियां देते हुए निकल जाते हैं लेकिन कभी खुद सफाई के लिए आगे नहीं आ पाते वगैहरा वगैहरा।
🌹 लेकिन हम कभी खुद को सुधारने की कोशिश नहीं करते, कभी खुद परिवर्तन का हिस्सा बनने की कोशिश नहीं करते। मित्रों एक एक बूंद से घड़ा भरता है और आपका प्रयास एक बूंद ही सही लेकिन वो बूंद घड़ा भरने के लिए बहुत जरुरी है। दूसरों को दोष देना छोड़िये और खुद को बदलिये फिर देखिये दुनियाँ खुद बदल जाएगी।
👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Oct 2017
🔵 हराम की कमाई खाने वाले,भष्ट्राचारी बेईमान लोगों के विरुद्ध इतनी तीव्र प्रतिक्रिया उठानी होगी जिसके कारण उन्हें सड़क पर चलना और मुँह दिखाना कठिन हो जाये। जिधर से वे निकलें उधर से ही धिक्कार की आवाजें ही उन्हें सुननी पडें। समाज में उनका उठना-बैठना बन्द हो जाये और नाई, धोबी, दर्जी कोई उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग करने के लिए तैयार न हों।
🔴 व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरम्भ किया जाये। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरम्भ किये धर्म युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगो को योध्धा कहा जाता था, अब माप दण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुध्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके उसे उतना बड़ा बहादुर माना जायेगा। उस बहादुरी के ऊपर ही शोषण में विहीन समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। दुर्बुध्धि से कुत्सा और कुण्ठा से लड सकने में जो लोग समर्थ होंगे उन्हीं का पुरुषार्थ पीड़ित मानवता को त्राण दे सकने का यश संचित कर सकेगा।
🔵 उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है- ‘सपनेहु आन पुरुष जग नाही।’ आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रो! हमारे भीतर श्रद्धा है। हमने एक पल्ला पकड़ लिया है और सारे जीवन भर उसी का पल्ला पकड़े रहेंगे। हमारा प्रियतम कितना अच्छा है। उससे अधिक रूपवान, सौंदर्यवान, दयालु और संपत्तिवान और कोई हो नहीं सकता। हमारा वही सब कुछ है, वही हमारा भगवान् है।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरम्भ किया जाये। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरम्भ किये धर्म युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगो को योध्धा कहा जाता था, अब माप दण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुध्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके उसे उतना बड़ा बहादुर माना जायेगा। उस बहादुरी के ऊपर ही शोषण में विहीन समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। दुर्बुध्धि से कुत्सा और कुण्ठा से लड सकने में जो लोग समर्थ होंगे उन्हीं का पुरुषार्थ पीड़ित मानवता को त्राण दे सकने का यश संचित कर सकेगा।
🔵 उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है- ‘सपनेहु आन पुरुष जग नाही।’ आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रो! हमारे भीतर श्रद्धा है। हमने एक पल्ला पकड़ लिया है और सारे जीवन भर उसी का पल्ला पकड़े रहेंगे। हमारा प्रियतम कितना अच्छा है। उससे अधिक रूपवान, सौंदर्यवान, दयालु और संपत्तिवान और कोई हो नहीं सकता। हमारा वही सब कुछ है, वही हमारा भगवान् है।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 पराया धन, धूलि समान
🔴 भक्त राँका बाँका अपनी स्त्री समेत भगवत् उपासना में लगे रहते है। वे दोनों जंगल से लकड़ी काट-काट अपना गुजारा करते है और भक्ति भावना में तल्लीन रहते हैं। अपने परिश्रम पर ही गुजर करना उनका व्रत था। दान या पराये धन को वे भक्ति मार्ग में बाधक मानते थे। रास्ते में मुहरों की थैली पड़ी मिली। वे पैर से उस पर मिट्टी डालने लगे। इतने में पीछे से उनकी स्त्री आ गई। उसने पूछा थैली को दबा क्यों रहे हैं? उनने उत्तर दिया मैंने सोचा तुम पीछे आ रही हो कही पराई चीज के प्रति तुम्हें लोभ न आ जाय इसलिये उसे दाब रहा था। स्त्री ने कहा- मेरे मन में सोने और मिट्टी में कोई अन्तर नहीं आप व्यर्थ ही यह कष्ट कर रहे थे। उस दिन सूखी लकड़ी न मिलने से उन्हें भूखा रहना पड़ा तो भी उनका मन पराई चीज पर विचलित न हुआ।
🔵 पराये धन को धूलि समान समझने वाले, अपने ही श्रम पर निर्भर करने वाले साधारण दीखने वाले भक्त भी उन लोगों से अनेक गुने श्रेष्ठ है जो सन्त महन्त का आडम्बर बनाकर पराये परिश्रम के धन से गुलछर्रे उड़ाते हैं।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961
🔵 पराये धन को धूलि समान समझने वाले, अपने ही श्रम पर निर्भर करने वाले साधारण दीखने वाले भक्त भी उन लोगों से अनेक गुने श्रेष्ठ है जो सन्त महन्त का आडम्बर बनाकर पराये परिश्रम के धन से गुलछर्रे उड़ाते हैं।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961
👉 Yudhishthir wins time
🔴 Once a Brahmin went to Yudhishthir and asked for donation. He was busy in his work so he asked the Brahmin to come the next day. This incident didn’t please Bhim much. He called some servant and asked them to play victorious music and he himself started playing an instrument. Hearing this Yudhishthir came running and asked the reason for the celebration.
🔵 Bhim told him, “Maharaj, we are happy that you have conquered time so we are playing the instruments. Calling the Brahmin tomorrow means that you have control over time till tomorrow.” Yudhishthir understood his intent and said, “Really Bhim, we shouldn’t delay in doing good work.”
🌹 From Pragya Puran
🔵 Bhim told him, “Maharaj, we are happy that you have conquered time so we are playing the instruments. Calling the Brahmin tomorrow means that you have control over time till tomorrow.” Yudhishthir understood his intent and said, “Really Bhim, we shouldn’t delay in doing good work.”
🌹 From Pragya Puran
👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 5)
🔴 यहाँ देवता की प्रशंसा कर रहा हूँ। देवता कैसे होते हैं? देवता ऐसे होते हैं जो आदमी के ईमान में घुसे रहते हैं और उसके भीतर से एक ऐसी हूक, एक ऐसी उमंग और एक ऐसी तड़पन पैदा करते हैं जो सारे के सारे जाल-जंजालों को मकड़ी के जाले की तरीके से तोड़ती हुई सिद्धान्तों की ओर, आदर्शों की ओर बढ़ने के लिए आदमी को मजबूर कर देती है। इसे कहते हैं देवता का वरदान। इससे कम में देवता का वरदान नहीं हो सकता। आदमी के भीतर जब गुणों की, कर्मों की, स्वभाव की विशेषताएँ पैदा हो जाती हैं तो विश्वास रखिए तब उसकी उन्नति के दरवाजे खुल जाते हैं। गुणों के हिसाब से दुनिया के इतिहास में जितने भी आदमी आज तक विकसित हुए हैं, किसी भी क्षेत्र में सफल हुए हैं और जिनके सम्मान हुए हैं, वे प्रत्येक व्यक्ति गुणों के आधार पर बढ़े हैं।
🔵 देवता का वरदान गुण और चिन्तन की उत्कृष्टता है। संसार के महापुरुषों में से हर एक सफल व्यक्ति का इतिहास यही रहा है। सभी छोटे-छोटे खानदानों में पैदा हुए थे। छोटे-छोटे घरों में, परिस्थितियों में पैदा हुए थे, लेकिन उन्नति के ऊँचे शिखर पर, ऊँचे से ऊँचे स्थान पर जरूर पहुँचते चले गए ।। कौन जा पहुँचे? लालबहादुर शास्त्री को लीजिए, जिनके ऊपर देवता का अनुग्रह था। एक ही अनुग्रह की पहचान है—जिम्मेदार और समझदारी का होना। भक्त और भगवान के बीच में यही सिलसिला चला है। इनसान के यहाँ और भगवान के यहाँ एक ही तरीका है।
🔴 पूजा क्यों करते हैं? पूजा का मतलब एक ही है—इनसानी गुणों का विकास, इनसानी कर्म का विकास, इनसानी स्वभाव का विकास। आपने जो समझ रखा है कि पूजा के आधार पर यह मिलेगा, वह मिलेगा, यह सारी गलतफहमी इसलिए हुई है। पूजा के आधार पर वस्तुतः दयानतदारी मिलती है, शराफत मिलती है, ईमानदारी मिलती है। आदमी को ऊँचा दृष्टिकोण मिलता है। अगर आपने गलत पूजा की होगी, तब आप भटक रहे होंगे। पूजा आपको इस एक ही तरीके से करनी चाहिए कि जो पूजा के लाभ आज तक इतिहास में मनुष्यों को मिले हैं, हमको भी मिलने चाहिए। हमारे गुणों का विकास, कर्म का विकास, चरित्र का विकास और भावनाओं का विकास होना चाहिए। देवत्व इसी का नाम है।
🔵 देवत्व अगर आपके पास आएगा तो आपके पास सफलताएँ आवेंगी। हिन्दुस्तान के इतिहास पर दृष्टि डालिए, उसके पन्ने पर जो बेहतरीन आदमी दिखाई पड़ते हैं, वे अपनी योग्यता के आधार पर नहीं, अपनी विशेषता के आधार पर महान् बने हैं। महामना मालवीय जी का उदाहरण सुना है आपने, कैसे शानदार व्यक्ति थे वे। उन पर देवताओं का अनुग्रह बरसा था और छोटे आदमी से वे महान हो गए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 देवता का वरदान गुण और चिन्तन की उत्कृष्टता है। संसार के महापुरुषों में से हर एक सफल व्यक्ति का इतिहास यही रहा है। सभी छोटे-छोटे खानदानों में पैदा हुए थे। छोटे-छोटे घरों में, परिस्थितियों में पैदा हुए थे, लेकिन उन्नति के ऊँचे शिखर पर, ऊँचे से ऊँचे स्थान पर जरूर पहुँचते चले गए ।। कौन जा पहुँचे? लालबहादुर शास्त्री को लीजिए, जिनके ऊपर देवता का अनुग्रह था। एक ही अनुग्रह की पहचान है—जिम्मेदार और समझदारी का होना। भक्त और भगवान के बीच में यही सिलसिला चला है। इनसान के यहाँ और भगवान के यहाँ एक ही तरीका है।
🔴 पूजा क्यों करते हैं? पूजा का मतलब एक ही है—इनसानी गुणों का विकास, इनसानी कर्म का विकास, इनसानी स्वभाव का विकास। आपने जो समझ रखा है कि पूजा के आधार पर यह मिलेगा, वह मिलेगा, यह सारी गलतफहमी इसलिए हुई है। पूजा के आधार पर वस्तुतः दयानतदारी मिलती है, शराफत मिलती है, ईमानदारी मिलती है। आदमी को ऊँचा दृष्टिकोण मिलता है। अगर आपने गलत पूजा की होगी, तब आप भटक रहे होंगे। पूजा आपको इस एक ही तरीके से करनी चाहिए कि जो पूजा के लाभ आज तक इतिहास में मनुष्यों को मिले हैं, हमको भी मिलने चाहिए। हमारे गुणों का विकास, कर्म का विकास, चरित्र का विकास और भावनाओं का विकास होना चाहिए। देवत्व इसी का नाम है।
🔵 देवत्व अगर आपके पास आएगा तो आपके पास सफलताएँ आवेंगी। हिन्दुस्तान के इतिहास पर दृष्टि डालिए, उसके पन्ने पर जो बेहतरीन आदमी दिखाई पड़ते हैं, वे अपनी योग्यता के आधार पर नहीं, अपनी विशेषता के आधार पर महान् बने हैं। महामना मालवीय जी का उदाहरण सुना है आपने, कैसे शानदार व्यक्ति थे वे। उन पर देवताओं का अनुग्रह बरसा था और छोटे आदमी से वे महान हो गए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 143)
🌹 इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है
🔵 अब प्रश्न यह रहा है कि पाँच वीरभद्रों को काम क्या सौंपना पड़ेगा और किस प्रकार वे क्या करेंगे? उसका उत्तर भी अधिक जिज्ञासा रहने के कारण अब मिल गया। इससे निश्चिंतता भी हुई और प्रसन्नता भी।
🔴 संसार में आज भी ऐसी कितनी ही प्रतिभाएँ हैं, जो दिशा पलट जाने पर अभी जो कर रही हैं, उसकी तुलना में अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य करने लगेंगी। उलटे को उलट कर सीधा करने के लिए जिस प्रचण्ड शक्ति की आवश्यकता होती है उसी को हमारे अंग-अंग वीरभद्र करने लगेंगे। प्रतिभाओं की सोचने की यदि दिशा बदली जा सके तो उनका परिवर्तन चमत्कारी जैसा हो सकता है।
🔵 नारद ने पार्वती, ध्रुव, प्रह्लाद, वाल्मीकि, सावित्री आदि की जीवन दिशा बदली, तो वे जिन परिस्थितियों में रह रहे थे। उसे लात मारकर दूसरी दिशा में चल पड़े और संसार के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन गए। भगवान् बुद्ध ने आनन्द, कुमार जीव, अंगुलिमाल, अंबपाली, अशोक, हर्षवर्धन, संघमित्रा आदि का मन बदल दिया तो वे जो कुछ कर रहे थे, उसके ठीक उलटा करने लगे और विश्व विख्यात हो गए। विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र को एक मामूली राजा नहीं रहने दिया वरन् इतना वरेण्य बना दिया कि उनकी लीला अभिनय देखने मात्र से गाँधी जी विश्ववंद्य हो गए। महाकृपण भामाशाह को संत विठोबा ने अंतःप्रेरणा दी और उनका सारा धन महाराणा प्रताप के लिए उगलवा दिया। आद्य शंकराचार्य की प्रेरणा से मान्धाता ने चारों धामों के मठ बना दिए।
🔴 अहिल्या बाई को एक संत ने प्रेरणा देकर कितने ही मंदिरों घाटों का जीर्णोद्धार करा लिया और दुर्गम स्थानों पर नए देवालय बनाने के संकल्प को पूर्ण कर दिखाने के लिए सहमत कर लिया। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को वह काम करने की अंतःप्रेरणा दी जिसे वे अपनी इच्छा से कदाचित ही कर पाते। रामकृष्ण परमहंस ही थे, जिन्होंने नरेन्द्र के पीछे पड़कर उसे विवेकानन्द बना दिया। राजा गोपीचंद का मन वैराग्य में लगा देने का श्रेय संत भर्तृहरि को था।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.162
🔵 अब प्रश्न यह रहा है कि पाँच वीरभद्रों को काम क्या सौंपना पड़ेगा और किस प्रकार वे क्या करेंगे? उसका उत्तर भी अधिक जिज्ञासा रहने के कारण अब मिल गया। इससे निश्चिंतता भी हुई और प्रसन्नता भी।
🔴 संसार में आज भी ऐसी कितनी ही प्रतिभाएँ हैं, जो दिशा पलट जाने पर अभी जो कर रही हैं, उसकी तुलना में अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य करने लगेंगी। उलटे को उलट कर सीधा करने के लिए जिस प्रचण्ड शक्ति की आवश्यकता होती है उसी को हमारे अंग-अंग वीरभद्र करने लगेंगे। प्रतिभाओं की सोचने की यदि दिशा बदली जा सके तो उनका परिवर्तन चमत्कारी जैसा हो सकता है।
🔵 नारद ने पार्वती, ध्रुव, प्रह्लाद, वाल्मीकि, सावित्री आदि की जीवन दिशा बदली, तो वे जिन परिस्थितियों में रह रहे थे। उसे लात मारकर दूसरी दिशा में चल पड़े और संसार के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन गए। भगवान् बुद्ध ने आनन्द, कुमार जीव, अंगुलिमाल, अंबपाली, अशोक, हर्षवर्धन, संघमित्रा आदि का मन बदल दिया तो वे जो कुछ कर रहे थे, उसके ठीक उलटा करने लगे और विश्व विख्यात हो गए। विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र को एक मामूली राजा नहीं रहने दिया वरन् इतना वरेण्य बना दिया कि उनकी लीला अभिनय देखने मात्र से गाँधी जी विश्ववंद्य हो गए। महाकृपण भामाशाह को संत विठोबा ने अंतःप्रेरणा दी और उनका सारा धन महाराणा प्रताप के लिए उगलवा दिया। आद्य शंकराचार्य की प्रेरणा से मान्धाता ने चारों धामों के मठ बना दिए।
🔴 अहिल्या बाई को एक संत ने प्रेरणा देकर कितने ही मंदिरों घाटों का जीर्णोद्धार करा लिया और दुर्गम स्थानों पर नए देवालय बनाने के संकल्प को पूर्ण कर दिखाने के लिए सहमत कर लिया। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को वह काम करने की अंतःप्रेरणा दी जिसे वे अपनी इच्छा से कदाचित ही कर पाते। रामकृष्ण परमहंस ही थे, जिन्होंने नरेन्द्र के पीछे पड़कर उसे विवेकानन्द बना दिया। राजा गोपीचंद का मन वैराग्य में लगा देने का श्रेय संत भर्तृहरि को था।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.162
रविवार, 8 अक्टूबर 2017
👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 4)
🔴 क्या आप चाहते है? आपको देवत्व के स्थान पर तीन चार सौ रुपये की नौकरी दिलवा दें। कोई देवता, सन्त या आशीर्वाद या कोई मन्त्र तो वह नाचीज हो सकती है। लेकिन अगर देवता देवत्व प्रदान करते हैं, तो वह नौकरी आपके लिए इतनी कीमत की करवा देंगे कि आप निहाल हो जाएँगे। विवेकानन्द रामकृष्ण परमहंस के पास नौकरी माँगने गए थे, पर मिला क्या, देवत्व, भक्ति, शक्ति और शान्ति। यह क्या चीज थे—गुण। मनुष्य के ऊपर कभी सन्त कृपा करते हैं। सन्तों ने कभी किसी को दिया है तो उन्होंने एक ही चीज दी है अन्तरंग में उमंग। एक ऐसी उमंग, जो आदमी को घसीटकर सिद्धान्तों की ओर ले जाती है।
🔵 जब आदमी के ऊपर सिद्धान्तों का नशा चढ़ता है, तब उसका मैग्नेट, उसका आकर्षण, उसकी वाणी, उसकी प्रामाणिकता इस कदर सही हो जाती है कि हर आदमी खिंचता हुआ चला आता है और हर कोई सहयोग करता है। विवेकानन्द को सम्मान और सहयोग दोनों मिला। यह किसने दी थी—काली ने। काली अगर किसी को कुछ देगी तो यही चीज देगी। अगर दुनिया में दुबारा कोई रामकृष्ण जिन्दा होंगे या पैदा होंगे, तो इसी प्रकार का आशीर्वाद देंगे, जिससे आदमी के व्यक्तित्व विकसित होते चले जाएँ। व्यक्तित्व अगर विकसित होगा तो जिसको आप चाहते हैं वह सहयोग बरसेगा। सहयोग माँगा नहीं जाता, बरसता है। आदमी फेंकता जाता है और सहयोग बरसता है। देवत्व जब आता है तब सहयोग बरसता है। बाबा साहब आम्टे का उदाहरण आपके सामने है, जिन्होंने कुष्ठ रोगियों के लिए, अपंगों के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया। यह क्या है? सिद्धान्त है, आदर्श है और वरदान है। इससे कम में न किसी को वरदान मिला है और न इससे ज्यादा में किसी को मिलेगा। भीख माँगने से न किसी को मिला है और न भविष्य में मिलेगा।
🔴 देवता एक काम करते हैं। क्या कहते हैं? फूल बरसाते हैं। रामायण में कोई पचास जगह किस्से आते हैं, जब देवताओं ने फूल क्या बरसाते हैं, सहयोग बरसाते हैं। फूल किसे कहते हैं? सहयोग को कहते हैं। कौन बरसाता है? देवत्व जो इस दुनिया में अभी जिन्दा है। देवत्व ही दुनिया में जिन्दा था और जिन्दा ही रहने वाला है। देवत्व मरेगा नहीं। यदि हैवान या शैतान नहीं पर सका तो भगवान् क्यों मरेगा? इनसान, इनसान को देखकर आकर्षित होता है और भगवान, भगवान को देखकर आकर्षित होता है और श्रेष्ठता को देखकर सहयोग आकर्षित करता है। पहले भी यही होता रहा था, अभी भी होता है और आगे भी होता रहेगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 जब आदमी के ऊपर सिद्धान्तों का नशा चढ़ता है, तब उसका मैग्नेट, उसका आकर्षण, उसकी वाणी, उसकी प्रामाणिकता इस कदर सही हो जाती है कि हर आदमी खिंचता हुआ चला आता है और हर कोई सहयोग करता है। विवेकानन्द को सम्मान और सहयोग दोनों मिला। यह किसने दी थी—काली ने। काली अगर किसी को कुछ देगी तो यही चीज देगी। अगर दुनिया में दुबारा कोई रामकृष्ण जिन्दा होंगे या पैदा होंगे, तो इसी प्रकार का आशीर्वाद देंगे, जिससे आदमी के व्यक्तित्व विकसित होते चले जाएँ। व्यक्तित्व अगर विकसित होगा तो जिसको आप चाहते हैं वह सहयोग बरसेगा। सहयोग माँगा नहीं जाता, बरसता है। आदमी फेंकता जाता है और सहयोग बरसता है। देवत्व जब आता है तब सहयोग बरसता है। बाबा साहब आम्टे का उदाहरण आपके सामने है, जिन्होंने कुष्ठ रोगियों के लिए, अपंगों के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया। यह क्या है? सिद्धान्त है, आदर्श है और वरदान है। इससे कम में न किसी को वरदान मिला है और न इससे ज्यादा में किसी को मिलेगा। भीख माँगने से न किसी को मिला है और न भविष्य में मिलेगा।
🔴 देवता एक काम करते हैं। क्या कहते हैं? फूल बरसाते हैं। रामायण में कोई पचास जगह किस्से आते हैं, जब देवताओं ने फूल क्या बरसाते हैं, सहयोग बरसाते हैं। फूल किसे कहते हैं? सहयोग को कहते हैं। कौन बरसाता है? देवत्व जो इस दुनिया में अभी जिन्दा है। देवत्व ही दुनिया में जिन्दा था और जिन्दा ही रहने वाला है। देवत्व मरेगा नहीं। यदि हैवान या शैतान नहीं पर सका तो भगवान् क्यों मरेगा? इनसान, इनसान को देखकर आकर्षित होता है और भगवान, भगवान को देखकर आकर्षित होता है और श्रेष्ठता को देखकर सहयोग आकर्षित करता है। पहले भी यही होता रहा था, अभी भी होता है और आगे भी होता रहेगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Picture of opportunity
🔴 Once an artist displayed his paintings. Several rich and famous people of the town came to see it. A girl also came to see the paintings. She saw a man portrayed in the last painting whose face was covered with hairs and who had wings attached to his legs. Under the painting was written in big letters “opportunity”. The painting was not very attractive so most people would move on without noticing it.
🔵 The girl’s attention was there on the painting from the beginning. The girl went near the artist and asked, “Why are the hairs covering the person’s face and the wings attached to his feet in the painting?” To this the painter replied,”Daughter, this is painting of opportunity. Since normally people can’t recognize it so I have covered its face so that at least people become curious to know who he is. Wings are attached to his feet because opportunity which is there today won’t be there tomorrow and thus it should be grabbed before it flies off and utilized to maximum”. The girl got the message and got engaged in making her destiny.
🔴 Time is life. Nobody has control over time.
🌹 From Pragya Puran
🔵 The girl’s attention was there on the painting from the beginning. The girl went near the artist and asked, “Why are the hairs covering the person’s face and the wings attached to his feet in the painting?” To this the painter replied,”Daughter, this is painting of opportunity. Since normally people can’t recognize it so I have covered its face so that at least people become curious to know who he is. Wings are attached to his feet because opportunity which is there today won’t be there tomorrow and thus it should be grabbed before it flies off and utilized to maximum”. The girl got the message and got engaged in making her destiny.
🔴 Time is life. Nobody has control over time.
🌹 From Pragya Puran
शनिवार, 7 अक्टूबर 2017
👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 3)
🔴 सफलता साहसिकता के आधार पर मिलती है। यह एक आध्यात्मिक गुण है। इसी आधार पर योगी को भी सफलता मिलती है, तांत्रिक को भी और महापुरुष को भी। हर एक को इसी साहसिकता के आधार पर सफलता मिलती है। वह डाकू क्यों न हो। आप योगी हैं तो अपनी हिम्मत के सहारे फायदा उठायेंगे। नेता हैं, महापुरुष हैं तो भी इसी आधार पर सफलता पायेंगे। यह एक दैवी गुण है। इसे आप अपनी इच्छा के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं, यह आप पर निर्भर है। इनसान के भीतर जो विशेषता है, वह गुणों की विशेषता है।
🔵 देवता अगर किसी आदमी को देंगे तो गुणों की विशेषता देंगे, गुणों की सम्पदा देंगे। गायत्री माता, जिसकी आप उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं, अगर कभी कुछ देंगी तो गुणों की विशेषता देंगी। गुणों से क्या हो जाएगा? गुणों से ही होता है सब कुछ। भौतिक अथवा आध्यात्मिक जहाँ कहीं भी आदमी को उन्नति मिली है, केवल गुणों के आधार पर मिली है। श्रेष्ठ गुण न हों तो, न भौतिक उन्नति मिलने वाली है, न आध्यात्मिक उन्नति मिलने वाली है।
🔴 आदमी जितना समझदार है, नासमझ उससे भी ज्यादा है। यह भ्रान्ति न जाने क्यों आध्यात्मिक क्षेत्र में घुस पड़ी है कि देवता मनोकामना पूरी करते हैं, पैसा देते हैं, दौलत देते हैं, बेटा देते हैं, नौकरी देते हैं। इस एक भ्रान्ति ने इतना ज्यादा व्यापक नुकसान पहुँचाया है कि आध्यात्मिकता का जितना बड़ा लाभ, जितना बड़ा उपयोग था, सम्भावनाएँ थीं, उससे जो सुख होना सम्भव था, उस सारी की सारी सम्भावना को इसने तबाह कर दिया।
🔵 देवता आदमी को एक ही चीज देंगे और उनने एक ही चीज दी है, प्राचीनकाल के इतिहास में और भविष्य में भी। देवता अगर जिन्दा रहेंगे, भक्ति अगर जिन्दा रहेगी, उपासना-क्रम यदि जिन्दा रहेगा, तो एक ही चीज मिलेगी और वह है देवत्व के गुण। देवत्व के गुण अगर आएँ तब आप जितनी सफलताएँ चाहते हैं, उससे हजारों-लाखों गुनी सफलताएँ आपके पास आ जाएँगी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 देवता अगर किसी आदमी को देंगे तो गुणों की विशेषता देंगे, गुणों की सम्पदा देंगे। गायत्री माता, जिसकी आप उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं, अगर कभी कुछ देंगी तो गुणों की विशेषता देंगी। गुणों से क्या हो जाएगा? गुणों से ही होता है सब कुछ। भौतिक अथवा आध्यात्मिक जहाँ कहीं भी आदमी को उन्नति मिली है, केवल गुणों के आधार पर मिली है। श्रेष्ठ गुण न हों तो, न भौतिक उन्नति मिलने वाली है, न आध्यात्मिक उन्नति मिलने वाली है।
🔴 आदमी जितना समझदार है, नासमझ उससे भी ज्यादा है। यह भ्रान्ति न जाने क्यों आध्यात्मिक क्षेत्र में घुस पड़ी है कि देवता मनोकामना पूरी करते हैं, पैसा देते हैं, दौलत देते हैं, बेटा देते हैं, नौकरी देते हैं। इस एक भ्रान्ति ने इतना ज्यादा व्यापक नुकसान पहुँचाया है कि आध्यात्मिकता का जितना बड़ा लाभ, जितना बड़ा उपयोग था, सम्भावनाएँ थीं, उससे जो सुख होना सम्भव था, उस सारी की सारी सम्भावना को इसने तबाह कर दिया।
🔵 देवता आदमी को एक ही चीज देंगे और उनने एक ही चीज दी है, प्राचीनकाल के इतिहास में और भविष्य में भी। देवता अगर जिन्दा रहेंगे, भक्ति अगर जिन्दा रहेगी, उपासना-क्रम यदि जिन्दा रहेगा, तो एक ही चीज मिलेगी और वह है देवत्व के गुण। देवत्व के गुण अगर आएँ तब आप जितनी सफलताएँ चाहते हैं, उससे हजारों-लाखों गुनी सफलताएँ आपके पास आ जाएँगी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Story of Kalidas
🔴 Kalidas was a big zero in terms of mental ability and was unattractive physically too. Once he was cutting the very branch he was sitting on.
🔵 Seeing him in this position, the pundits (priests) from the palace thought him to be the right candidate for marrying him off to Vidyotama, who had insulted them. They projected Kalidas as a silent wise person and made him participate in a debate with her over the scriptures. Cunningly they somehow explained his reactions as replies to all her questions in such a manner that she accepted him as husband.
🔴 But on the very first day, truth came out and she threw him out of the house. The sentences she spoke while pushing him out of the house, hurt Kalidas deep within. With great determination he started acquiring knowledge. In the end, that fool with his efforts became the great poet Kalidas and got reunited with Vidyotama.
🌹 From Pragya Puran
🔵 Seeing him in this position, the pundits (priests) from the palace thought him to be the right candidate for marrying him off to Vidyotama, who had insulted them. They projected Kalidas as a silent wise person and made him participate in a debate with her over the scriptures. Cunningly they somehow explained his reactions as replies to all her questions in such a manner that she accepted him as husband.
🔴 But on the very first day, truth came out and she threw him out of the house. The sentences she spoke while pushing him out of the house, hurt Kalidas deep within. With great determination he started acquiring knowledge. In the end, that fool with his efforts became the great poet Kalidas and got reunited with Vidyotama.
🌹 From Pragya Puran
👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Oct 2017
🔵 जो स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जागरूक नहीं है, उसे देर या सबेर बीमारियाँ आ दबोचेगी। जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद,मत्सर सरीखे मानसिक शत्रुओं की गतिविधियों की तरफ से आँखें बन्द किये रहता है, वह कुविचारों और कुकर्मों के गर्त में गिरे बिना नहीं रहेगा। जो दुनिया के छल, प्रपंच, झूठ, ठगी, लूट, अन्याय, स्वार्थपरता, शैतानी आदि की ओर से सावधान नहीं रहता, उसे उल्लु बनाने वाले, ठगने वाले, सताने वाले अनेकों पैदा हो जाते हैं। जो जागरूक नहीं है, उसे दुनियाँ के शैतानी तत्त्व बुरी तरह नोंच खाते हैं।
🔴 जागृत तन्द्रा के तीन दर्जे हैं।
१. लापरवाही २. आलस्य ३. प्रमाद। ये तीनों ही क्रमशः अधिक भयंकर एवं घातक हैं। हम सबको इनसे बचना चाहिए। इसलिए गायत्री मंत्र हमें सावधान व जागृत रहने का संदेश देता है।
🔵 ‘‘वृद्ध जटायु रावण को परास्त करने में समर्थ न था,तो भी उसने अनीति होते देख कर चुप बैठना उचित न समझा, भिड़ गया। इसमें उसे प्राण त्यागने पड़े पर हारने पर भी वह विजयी से भी अधिक श्रेयाधिकारी बन गया।’’
🔴 वृक्ष धूप, शीत सहते रहते हैं, पर दूसरो को छाया, लकडी और फल-फूल बिना किसी प्रतिफल की आशा के मनुष्यो से लेकर पशु पक्षियों तक को बाँटते रहते हैं। क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते बुद्धिमानी की निशानी उपलब्ध साधन और समय का श्रेष्ठतम उपयोग करना है।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 जागृत तन्द्रा के तीन दर्जे हैं।
१. लापरवाही २. आलस्य ३. प्रमाद। ये तीनों ही क्रमशः अधिक भयंकर एवं घातक हैं। हम सबको इनसे बचना चाहिए। इसलिए गायत्री मंत्र हमें सावधान व जागृत रहने का संदेश देता है।
🔵 ‘‘वृद्ध जटायु रावण को परास्त करने में समर्थ न था,तो भी उसने अनीति होते देख कर चुप बैठना उचित न समझा, भिड़ गया। इसमें उसे प्राण त्यागने पड़े पर हारने पर भी वह विजयी से भी अधिक श्रेयाधिकारी बन गया।’’
🔴 वृक्ष धूप, शीत सहते रहते हैं, पर दूसरो को छाया, लकडी और फल-फूल बिना किसी प्रतिफल की आशा के मनुष्यो से लेकर पशु पक्षियों तक को बाँटते रहते हैं। क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते बुद्धिमानी की निशानी उपलब्ध साधन और समय का श्रेष्ठतम उपयोग करना है।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 जीवन की सफलता का रहस्य (अन्तिम भाग)
🔴 दूसरी बात यह है कि हम लोगों की यह एक विचित्र आदत-सी पड़ गयी है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने हैं, जो भी कठिनाईयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिये हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरों के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। हमारा यह दृढ़ विश्वास होता है कि इसका कारण हमारे दुष्कृत्य नहीं है। दूसरों को हम दोष देते समय न जाने क्या क्या कह डालते हैं, “अन्धा अपनी नेत्रविहीनता की ओर ध्यान न देकर काने को दोष देता है, कैसी विडम्बना है। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यही हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं।
🔵 यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायगा कि यदि आप स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आपका वास असम्भव था। किसी हरिश्चन्द्र के सामने झूठ बोलने का साहस कोई नहीं कर सकता हमें तो जो कुछ भी मिलता है वह हमारे कर्मों के अनुसार। दूसरों को इसके लिये दोष देना व्यर्थ है। हम अच्छे हो और संसार जिसमें हम रहते हैं, बुरा हो यह हो नहीं नहीं सकता। इससे बढ़ कर असत्य कथन नहीं हो सकता।
🔴 अतः सबसे पहली बात यह है कि हमें दूसरों को किसी प्रकार भी दोषी नहीं ठहराना चाहिये। क्योंकि यदि हमारे कर्म वैसे न होते तो वह दुष्परिणाम हमको न भोगना पड़ता। इसलिये ऐसे समय आत्मनिरीक्षण करना चाहिये और अपने अन्दर जो दोष हों उनको दूर करना चाहिये।
🔵 ऐसा करने से, अनासक्त रहने से, निर्लिप्त रहने से ही हम सुधर सकते हैं। दूसरों की चिन्ता छोड़ कर हमें अपनी चिन्ता करनी चाहिये। संसार के प्राणी ही हमारा अभिप्राय यहाँ मनुष्य से है, संसार को बनाते हैं। यदि मनुष्य का सुधार हो जाये तो संसार में सुख प्राप्त कर सकता है, जीवन में सफल हो सकता है एवं अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
🌹 समाप्त
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.9
🔵 यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायगा कि यदि आप स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आपका वास असम्भव था। किसी हरिश्चन्द्र के सामने झूठ बोलने का साहस कोई नहीं कर सकता हमें तो जो कुछ भी मिलता है वह हमारे कर्मों के अनुसार। दूसरों को इसके लिये दोष देना व्यर्थ है। हम अच्छे हो और संसार जिसमें हम रहते हैं, बुरा हो यह हो नहीं नहीं सकता। इससे बढ़ कर असत्य कथन नहीं हो सकता।
🔴 अतः सबसे पहली बात यह है कि हमें दूसरों को किसी प्रकार भी दोषी नहीं ठहराना चाहिये। क्योंकि यदि हमारे कर्म वैसे न होते तो वह दुष्परिणाम हमको न भोगना पड़ता। इसलिये ऐसे समय आत्मनिरीक्षण करना चाहिये और अपने अन्दर जो दोष हों उनको दूर करना चाहिये।
🔵 ऐसा करने से, अनासक्त रहने से, निर्लिप्त रहने से ही हम सुधर सकते हैं। दूसरों की चिन्ता छोड़ कर हमें अपनी चिन्ता करनी चाहिये। संसार के प्राणी ही हमारा अभिप्राय यहाँ मनुष्य से है, संसार को बनाते हैं। यदि मनुष्य का सुधार हो जाये तो संसार में सुख प्राप्त कर सकता है, जीवन में सफल हो सकता है एवं अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
🌹 समाप्त
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.9
👉 कर्म फल:-
🔴 इन्सान जैसा कर्म करता है कुदरत या परमात्मा उसे वैसा ही उसे लौटा देता है।
🔵 एक बार द्रोपदी सुबह तडके स्नान करने यमुना घाट पर गयी भोर का समय था तभी उसका ध्यान सहज ही एक साधु की ओर गया जिसके शरीर पर मात्र एक लँगोटी थी। साधु स्नान के पश्चात अपनी दुसरी लँगोटी लेने गया तो वो लँगोटी अचानक हवा के झोके से उड पानी मे चली गयी ओर बह गयी।
🔴 सँयोगवस साधु ने जो लँगोटी पहनी वो भी फटी हुई थी। साधु सोच मे पड़ गया कि अब वह अपनी लाज कैसे बचाए थोडी देर मे सुर्योदय हो जाएगा और घाट पर भीड बढ जाएगी।
🔵 साधु तेजी से पानी के बाहर आया और झाडी मे छिप गया। द्रोपदी यह सारा दृश्य देख अपनी साडी जो पहन रखी थी, उसमे आधी फाड कर उस साधु के पास गयी ओर उसे आधी साडी देते हुए बोली-तात मै आपकी परेशानी समझ गयी। इस वस्त्र से अपनी लाज ढँक लीजिए।
🔴 साधु ने सकुचाते हुए साडी का टुकडा ले लिया और आशीष दिया। जिस तरह आज तुमने मेरी लाज बचायी उसी तरह एक दिन भगवान तुम्हारी लाज बचाएगे। और जब भरी सभा मे चीरहरण के समय द्रोपदी की करुण पुकार नारद ने भगवान तक पहुचायी तो भगवान ने कहा-कर्मो के बदले मेरी कृपा बरसती है क्या कोई पुण्य है द्रोपदी के खाते मे।
🔵 जाँचा परखा गया तो उस दिन साधु को दिया वस्त्र दान हिसाब मे मिला जिसका ब्याज भी कई गुणा बढ गया था।
🔴 जिसको चुकता करने भगवान पहुच गये द्रोपदी की मदद करने, दुस्सासन चीर खीचता गया और हजारो गज कपडा बढता गया।
🔵 इंसान यदि सुकर्म करे तो उसका फल सूद सहित मिलता है और दुस्कर्म करे तो सूद सहित भोगना पडता है।
🔵 एक बार द्रोपदी सुबह तडके स्नान करने यमुना घाट पर गयी भोर का समय था तभी उसका ध्यान सहज ही एक साधु की ओर गया जिसके शरीर पर मात्र एक लँगोटी थी। साधु स्नान के पश्चात अपनी दुसरी लँगोटी लेने गया तो वो लँगोटी अचानक हवा के झोके से उड पानी मे चली गयी ओर बह गयी।
🔴 सँयोगवस साधु ने जो लँगोटी पहनी वो भी फटी हुई थी। साधु सोच मे पड़ गया कि अब वह अपनी लाज कैसे बचाए थोडी देर मे सुर्योदय हो जाएगा और घाट पर भीड बढ जाएगी।
🔵 साधु तेजी से पानी के बाहर आया और झाडी मे छिप गया। द्रोपदी यह सारा दृश्य देख अपनी साडी जो पहन रखी थी, उसमे आधी फाड कर उस साधु के पास गयी ओर उसे आधी साडी देते हुए बोली-तात मै आपकी परेशानी समझ गयी। इस वस्त्र से अपनी लाज ढँक लीजिए।
🔴 साधु ने सकुचाते हुए साडी का टुकडा ले लिया और आशीष दिया। जिस तरह आज तुमने मेरी लाज बचायी उसी तरह एक दिन भगवान तुम्हारी लाज बचाएगे। और जब भरी सभा मे चीरहरण के समय द्रोपदी की करुण पुकार नारद ने भगवान तक पहुचायी तो भगवान ने कहा-कर्मो के बदले मेरी कृपा बरसती है क्या कोई पुण्य है द्रोपदी के खाते मे।
🔵 जाँचा परखा गया तो उस दिन साधु को दिया वस्त्र दान हिसाब मे मिला जिसका ब्याज भी कई गुणा बढ गया था।
🔴 जिसको चुकता करने भगवान पहुच गये द्रोपदी की मदद करने, दुस्सासन चीर खीचता गया और हजारो गज कपडा बढता गया।
🔵 इंसान यदि सुकर्म करे तो उसका फल सूद सहित मिलता है और दुस्कर्म करे तो सूद सहित भोगना पडता है।
शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017
👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 2)
🔴 देवता क्या देते हैं? देवता हजम करने की ताकत देते हैं। जो दुनियाबी दौलत या जिन चीजों को आप माँगते हैं जो आपको खुशी का बायस मालूम पड़ती हैं, उन सारी चीजों को हजम करने के लिए विशेषता होनी चाहिए। इसी का नाम है—देवत्व। देवत्व अगर प्राप्त हो जाता है, तो फिर आप दुनिया की हर चीज से, थोड़ी-से थोड़ी चीजों से लेकर फायदा उठा सकते हैं। अगर वे न भी हो तो काम चल सकता है। ज्यादा चीजें हो जाएँ तो भी अच्छा है, यदि न हो जाएँ तो भी कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अगर आप इस बात के लिए उतावले हैं कि जैसे भी पिछड़े हैं वैसे ही बने रहें, तो फिर कुछ कहना सम्भव नहीं है।
🔵 मनुष्य के शरीर में ताकत होनी चाहिए लेकिन समझदारी का नियन्त्रण न होने से आग में घी डालने, ईंधन डालने के तरीके से वह सिर्फ दुनिया में मुसीबतें पैदा करेगी। देवता किसी को दौलत देने की गलती नहीं कर सकते। अगर देते हैं तो इसका मतलब है कि तबाही कर रहे हैं। इनसानियत उस चीज का नाम है, जिसमें आदमी का चिन्तन, दृष्टिकोण, महत्त्वाकांक्षाएँ और गतिविधियाँ ऊँचे स्तर की हो जाती है। इनसानियत एक बड़ी चीज है।
🔴 मनोकामनाएँ पूरी करना खराब बात नहीं है, पर शर्त एक ही है कि यह किस काम के लिए, किस चीज के लिए माँगी गई हैं? अगर सांसारिकता के लिए माँगी गई हैं तो उससे पहले यह जानना जरूरी है कि उस दौलत को हजम कैसे कर सकते हैं? उसे खर्च कैसे कर सकते हैं? मनुष्य भूल कर सकता है, पर देवता भूल नहीं कर सकते। देवता आपको चीजें नहीं दे सकते जैसा कि मेरा अपना ख्याल है। देवताओं के सम्पर्क में आने वाले को भौतिक वस्तुएँ नहीं मिलीं। क्या मिला है? आदमी को गुण मिले हैं, देवत्व मिला है।
🔵 सद्गुणों के आधार पर आदमी को विकास करने का मौका मिला है। गुणों के विकसित होने के पश्चात् उन्होंने वह काम किए हैं, जिन्हें सामान्य मनुष्य सामान्य बुद्धि से काम करते हुए नहीं कर सकता। देवत्व के विकसित होने पर कोई भी उन्नति के शिखर पर जा पहुँचा सकता है, चाहे वह सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक। संसार और अध्यात्म में कोई फर्क नहीं पड़ता। गुणों के इस्तेमाल करने का तरीका भर है। गुण अपने आप में शक्ति के पुंज हैं, कर्म अपने आप में शक्ति के पुंज हैं और स्वभाव अपने आप में शक्ति के पुंज हैं। इन्हें कहाँ इस्तेमाल करना चाहते हैं, यह आपकी इच्छा की बात है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 मनुष्य के शरीर में ताकत होनी चाहिए लेकिन समझदारी का नियन्त्रण न होने से आग में घी डालने, ईंधन डालने के तरीके से वह सिर्फ दुनिया में मुसीबतें पैदा करेगी। देवता किसी को दौलत देने की गलती नहीं कर सकते। अगर देते हैं तो इसका मतलब है कि तबाही कर रहे हैं। इनसानियत उस चीज का नाम है, जिसमें आदमी का चिन्तन, दृष्टिकोण, महत्त्वाकांक्षाएँ और गतिविधियाँ ऊँचे स्तर की हो जाती है। इनसानियत एक बड़ी चीज है।
🔴 मनोकामनाएँ पूरी करना खराब बात नहीं है, पर शर्त एक ही है कि यह किस काम के लिए, किस चीज के लिए माँगी गई हैं? अगर सांसारिकता के लिए माँगी गई हैं तो उससे पहले यह जानना जरूरी है कि उस दौलत को हजम कैसे कर सकते हैं? उसे खर्च कैसे कर सकते हैं? मनुष्य भूल कर सकता है, पर देवता भूल नहीं कर सकते। देवता आपको चीजें नहीं दे सकते जैसा कि मेरा अपना ख्याल है। देवताओं के सम्पर्क में आने वाले को भौतिक वस्तुएँ नहीं मिलीं। क्या मिला है? आदमी को गुण मिले हैं, देवत्व मिला है।
🔵 सद्गुणों के आधार पर आदमी को विकास करने का मौका मिला है। गुणों के विकसित होने के पश्चात् उन्होंने वह काम किए हैं, जिन्हें सामान्य मनुष्य सामान्य बुद्धि से काम करते हुए नहीं कर सकता। देवत्व के विकसित होने पर कोई भी उन्नति के शिखर पर जा पहुँचा सकता है, चाहे वह सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक। संसार और अध्यात्म में कोई फर्क नहीं पड़ता। गुणों के इस्तेमाल करने का तरीका भर है। गुण अपने आप में शक्ति के पुंज हैं, कर्म अपने आप में शक्ति के पुंज हैं और स्वभाव अपने आप में शक्ति के पुंज हैं। इन्हें कहाँ इस्तेमाल करना चाहते हैं, यह आपकी इच्छा की बात है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Oct 2017
🔵 आत्मदर्शन का अर्थ है अन्तःकरण में पवित्रता और प्रखरता का समुचित सम्वर्धन। दर्पण पर धूलि जमी हो या उसके भीतर का रंग उतर गया हो तो फिर उसमें मुख दीख पड़ने का सुयोग न बनेगा। जिसने अपने अन्तःक्षेत्र को टटोला नहीं है, उसे धोया संजोया नहीं है, उसके लिये यह कठिन है कि उस गॅदले क्षेत्र में ईश्वर का आगमन अवतरण या दिव्य-दर्शन की आशा करे। वस्तुतः आत्मशोधन ही प्रभुदर्शन का एक मात्र उपाय है।
🔴 सिंह जब शिकार पर आक्रमण करता है, तो एक क्षण ठहरकर हमला करता है। धनुष पर बाण को चढ़ाकर जब छोड़ा जाता है तो यत्किंचित् रुककर तब बाण छोड़ा जाता है। बन्दूक का घोड़ा दबाने से पहले जरा-सी देर शरीर को साध कर स्थिर कर लिया जाता है, ताकि निशाना ठीक बैठे। इसी प्रकार अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिये पर्याप्त मात्रा में आत्मिक बल एकत्रित करने के लिये कुछ समय आन्तरिक शक्तियों को फुलाया और विकसित किया जाता है, इसी प्रक्रिया का नाम ‘पुरश्चरण ’ है।
🔵 चोर, उचक्के, व्यसनी, जुआरी भी अपनी बिरादरी निरंतर बढ़ाते रहते हैं । इसका एक ही कारण है कि उनका चरित्र और चिंतन एक होता है। दोनों के मिलन पर ही प्रभावोत्पादक शक्ति का उद्भव होता है। किंतु आदर्शों के क्षेत्र में यही सबसे बड़ी कमी है।
🔴 जिस प्रकार कर्त्तव्यशील पुलिस, न्यायाधीश अथवा राजा को सामने खड़ा देखकर कोई पक्का चोर भी चेारी करने या कानून तोड़ने का साहस नहीं कर सकता। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के मन में यह भावना दृढ़तापूर्वक समाई हुई है कि परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है और हजार आँखों से उसके हर विचार और कार्य को देख रहा है तो उसकी यह हिम्मत नहीं हो सकती कि कोई पाप गुप्त या प्रकट रूप से करे।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 सिंह जब शिकार पर आक्रमण करता है, तो एक क्षण ठहरकर हमला करता है। धनुष पर बाण को चढ़ाकर जब छोड़ा जाता है तो यत्किंचित् रुककर तब बाण छोड़ा जाता है। बन्दूक का घोड़ा दबाने से पहले जरा-सी देर शरीर को साध कर स्थिर कर लिया जाता है, ताकि निशाना ठीक बैठे। इसी प्रकार अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिये पर्याप्त मात्रा में आत्मिक बल एकत्रित करने के लिये कुछ समय आन्तरिक शक्तियों को फुलाया और विकसित किया जाता है, इसी प्रक्रिया का नाम ‘पुरश्चरण ’ है।
🔵 चोर, उचक्के, व्यसनी, जुआरी भी अपनी बिरादरी निरंतर बढ़ाते रहते हैं । इसका एक ही कारण है कि उनका चरित्र और चिंतन एक होता है। दोनों के मिलन पर ही प्रभावोत्पादक शक्ति का उद्भव होता है। किंतु आदर्शों के क्षेत्र में यही सबसे बड़ी कमी है।
🔴 जिस प्रकार कर्त्तव्यशील पुलिस, न्यायाधीश अथवा राजा को सामने खड़ा देखकर कोई पक्का चोर भी चेारी करने या कानून तोड़ने का साहस नहीं कर सकता। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के मन में यह भावना दृढ़तापूर्वक समाई हुई है कि परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है और हजार आँखों से उसके हर विचार और कार्य को देख रहा है तो उसकी यह हिम्मत नहीं हो सकती कि कोई पाप गुप्त या प्रकट रूप से करे।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 जीवन की सफलता का रहस्य (भाग 4)
🔴 अतः, हमें ऐसा नियम बना लेना चाहिये कि हम जो कुछ भी दें उसको पुनः प्राप्त करने की आशा से न दें और न उसे माँगे ही। नदी जब तक बहती रहती है एवं अपना जल समुद्र में उड़ेलती रहती है तभी तक उसमें बाहर से जल आता रहता है किन्तु जिस क्षण वह समुद्र को जल देना बन्द कर देती है। उसी क्षण उसमें बाहर से जल का आगमन रुक जाता है। जब तक आप देते रहोगे, जब तक बाहर निकालते रहोगे तब तक आपके पास संचय होता रहेगा।
🔵 अतः भिक्षुक न बनो, देने में कृपणता न करो। इसी का लोग ख्याल नहीं करते। कठिनाइयों का पहिले से ही ध्यान रखना चाहिये। और हम रख भी सकते हैं। यह तो बहुत ही सरल कार्य है फिर भी अपनी ही भूल से हम गड्ढे में गिरते हैं। प्रकृति हमें घूँसे का जवाब घूँसे से, लात का लात से और थप्पड़ का थप्पड़ से देने के लिये प्रेरित करती है किन्तु बुद्धिमानी यही है कि हम मौन रहें, अनासक्त रहें, निर्विकार रहें। अपने पर नियन्त्रण रखें।
🔴 कठिनाइयाँ तो बहुत पड़ती हैं इसमें सन्देह नहीं। और इन्हीं के द्वारा हमारा साहस, उत्साह, भंग हो जाता है। किसी के कटु शब्द कह देने पर हमसे निर्विकार शान्त, मौन नहीं रहा जाता। असाधारण स्थिति में मनुष्य और भी भूल करता है, उद्विग्न हो जाता है, किन्तु उस असाधारण स्थिति के पार जाना ही वीरता है। इनसे पार जाने पर, इनसे छुटकारा पाने पर ही वास्तविक सुधार सम्भव है। इसके लिये अपेक्षा है आध्यात्मिक बल की, आध्यात्मिक शक्ति की। इन सब बन्धनों से, दुर्बलताओं से, मायाजाल से छुटकारा प्राप्त करने के लिये हमें, चाहे कितने ही कष्टों का सामना करना पड़े, अपने मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिये। वरन् विघ्न-बाधाओं के, कठिनाईयों के आने पर अविचल भाव से उनका सामना करना चाहिये और उसी समय अपनी तत्परता का, शान्ति का, अनासक्ति का परिचय देना चाहिये।
🔵 यह कार्य कठिन है तो अवश्य किन्तु अभ्यास से क्या नहीं हो सकता। हमें अपनी भावना ही ऐसी बना लेनी चाहिये कि चाहे कुछ भी हो हमारे ऊपर उसका प्रभाव नहीं पड़ सकता। यदि हम अपनी अहंमन्यता को मिटा सकें तो हमारे लिये सब कुछ सम्भव है। यदि हम अपने अन्दर यह विचार बैठा रखें कि दुःख और मुसीबतें अकस्मात् और असम्भावित रूप से नहीं आतीं वरन् वे अनिवार्य हैं, हमारे पूर्व कर्मों के फल अच्छे या बुरे हमें अवश्य मिलेंगे, तो फिर हम निश्चिन्त रहेंगे। हमें कोई परेशानी न होगी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 8
🔵 अतः भिक्षुक न बनो, देने में कृपणता न करो। इसी का लोग ख्याल नहीं करते। कठिनाइयों का पहिले से ही ध्यान रखना चाहिये। और हम रख भी सकते हैं। यह तो बहुत ही सरल कार्य है फिर भी अपनी ही भूल से हम गड्ढे में गिरते हैं। प्रकृति हमें घूँसे का जवाब घूँसे से, लात का लात से और थप्पड़ का थप्पड़ से देने के लिये प्रेरित करती है किन्तु बुद्धिमानी यही है कि हम मौन रहें, अनासक्त रहें, निर्विकार रहें। अपने पर नियन्त्रण रखें।
🔴 कठिनाइयाँ तो बहुत पड़ती हैं इसमें सन्देह नहीं। और इन्हीं के द्वारा हमारा साहस, उत्साह, भंग हो जाता है। किसी के कटु शब्द कह देने पर हमसे निर्विकार शान्त, मौन नहीं रहा जाता। असाधारण स्थिति में मनुष्य और भी भूल करता है, उद्विग्न हो जाता है, किन्तु उस असाधारण स्थिति के पार जाना ही वीरता है। इनसे पार जाने पर, इनसे छुटकारा पाने पर ही वास्तविक सुधार सम्भव है। इसके लिये अपेक्षा है आध्यात्मिक बल की, आध्यात्मिक शक्ति की। इन सब बन्धनों से, दुर्बलताओं से, मायाजाल से छुटकारा प्राप्त करने के लिये हमें, चाहे कितने ही कष्टों का सामना करना पड़े, अपने मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिये। वरन् विघ्न-बाधाओं के, कठिनाईयों के आने पर अविचल भाव से उनका सामना करना चाहिये और उसी समय अपनी तत्परता का, शान्ति का, अनासक्ति का परिचय देना चाहिये।
🔵 यह कार्य कठिन है तो अवश्य किन्तु अभ्यास से क्या नहीं हो सकता। हमें अपनी भावना ही ऐसी बना लेनी चाहिये कि चाहे कुछ भी हो हमारे ऊपर उसका प्रभाव नहीं पड़ सकता। यदि हम अपनी अहंमन्यता को मिटा सकें तो हमारे लिये सब कुछ सम्भव है। यदि हम अपने अन्दर यह विचार बैठा रखें कि दुःख और मुसीबतें अकस्मात् और असम्भावित रूप से नहीं आतीं वरन् वे अनिवार्य हैं, हमारे पूर्व कर्मों के फल अच्छे या बुरे हमें अवश्य मिलेंगे, तो फिर हम निश्चिन्त रहेंगे। हमें कोई परेशानी न होगी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 8
गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017
👉 जीवन की सफलता का रहस्य (भाग 3)
🔴 भिक्षुक क्या कभी सुखी रह सकता है? यदि उसको कोई कुछ देता है तो वह घृणा के भाव से। और इसीलिये भिक्षुक को जो कुछ मिलता है उसका आनन्द वह नहीं उठा सकता। उसी प्रकार हम सभी भिक्षुक हैं। हम जो कुछ भी करते हैं उसका बदला पाने की आशा करते हैं। हम लोगों की बुद्धि व्यापारिक हो गयी है। जीवन में, सुकृति में प्रेम में सब में हम लोग व्यापारी बन गये, तो जब हमारे अन्दर व्यापारिक बुद्धि का प्रवेश होगा तो फिर व्यापार की सभी अवस्थाओं का सामना भी करना पड़ेगा। व्यापार में आदान-प्रदान, क्रय-विक्रय, मन्दी-तेजी, हानि-लाभ सभी होते हैं और हमें उन सबको भोगना पड़ेगा। बस यहीं मनुष्य फंसता है, इसी जगह उसकी कठिनाई आरम्भ होती है। स्पृहा, अभिलाषा और आशा जहाँ शुरू हुई कि दुःख स्रोत उमड़ पड़ा।
🔵 अतः जो निस्वार्थ कर्म करेगा, जो पुनः वापस पाने कि इच्छा रखकर कार्य नहीं करेगा वही सफल होगा, वही दुःखों से मुक्त रहेगा। कितने ही लोग कहेंगे, “यह तो विचित्र बात है, असम्भव है, गलत है। रोज ही हम देखते हैं कि सीधा सादा, सरल निस्वार्थ कर्मी ठगा जाता है, हानि उठाता रहता है। भगवान ईसा ने सेवा की भावना रख कर कर्म किया, उनका कर्म केवल कर्म के लिये था। फल के लिये उनके अन्दर तनिक भी आसक्ति न थी फिर भी उनको प्राण गंवाना पड़ा। किन्तु साथ ही साथ यह भी हम जानते हैं कि ईसा के आत्मबलिदान ने जगत को वह अमूल्य निधि दी जिसका ठिकाना नहीं। ईसा का उद्देश्य सफल हुआ, अपने लक्ष्य को उन्होंने प्राप्त कर लिया।
🔴 आप जो कुछ भी करो, जो कुछ भी दो उसका बदला न चाहो। जो कुछ भी दे सको दो, जहाँ तक हो सके करो, इसका फल आपको हजार गुना मिलेगा किन्तु आप आशा न करो, अभिलाषा न करो, माँगो नहीं। जीवन देना ही तो है और क्या है? यदि आप देना बन्द कर दोगे या नहीं देना चाहोगे तो प्रकृति आपका गला दबा कर आपसे ले लेगी। आप सोचते हो कि जीवन संग्रह करने के लिये है, हाथ बन्द करने के लिये हैं किन्तु जब प्रकृति आपका गला दबा कर आपका हाथ खोल देती, तब आपको इस बात का ज्ञान होता कि वास्तव में जीवन देने के लिये बना था। मरने के बाद सिकन्दर के दोनों हाथ खुले हुए बाहर निकल कर लटक रहे थे। उसने इस ध्रुव सत्य को समझ लिया था कि जीवन में कुछ संचय नहीं किया जा सकता, यह तो देने के ही लिये बना था। इसी को प्रारम्भ में लोग नहीं समझते किन्तु एक समय ऐसा आता है जब विवश होकर उन्हें समझना पड़ता है। लेकिन यदि हममें इतनी बुद्धि होती कि हम प्रकृति के इस रहस्य को समझते, भगवान के उपदेशों के अनुसार चलते तो दुःख किस बात का था।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.7
🔵 अतः जो निस्वार्थ कर्म करेगा, जो पुनः वापस पाने कि इच्छा रखकर कार्य नहीं करेगा वही सफल होगा, वही दुःखों से मुक्त रहेगा। कितने ही लोग कहेंगे, “यह तो विचित्र बात है, असम्भव है, गलत है। रोज ही हम देखते हैं कि सीधा सादा, सरल निस्वार्थ कर्मी ठगा जाता है, हानि उठाता रहता है। भगवान ईसा ने सेवा की भावना रख कर कर्म किया, उनका कर्म केवल कर्म के लिये था। फल के लिये उनके अन्दर तनिक भी आसक्ति न थी फिर भी उनको प्राण गंवाना पड़ा। किन्तु साथ ही साथ यह भी हम जानते हैं कि ईसा के आत्मबलिदान ने जगत को वह अमूल्य निधि दी जिसका ठिकाना नहीं। ईसा का उद्देश्य सफल हुआ, अपने लक्ष्य को उन्होंने प्राप्त कर लिया।
🔴 आप जो कुछ भी करो, जो कुछ भी दो उसका बदला न चाहो। जो कुछ भी दे सको दो, जहाँ तक हो सके करो, इसका फल आपको हजार गुना मिलेगा किन्तु आप आशा न करो, अभिलाषा न करो, माँगो नहीं। जीवन देना ही तो है और क्या है? यदि आप देना बन्द कर दोगे या नहीं देना चाहोगे तो प्रकृति आपका गला दबा कर आपसे ले लेगी। आप सोचते हो कि जीवन संग्रह करने के लिये है, हाथ बन्द करने के लिये हैं किन्तु जब प्रकृति आपका गला दबा कर आपका हाथ खोल देती, तब आपको इस बात का ज्ञान होता कि वास्तव में जीवन देने के लिये बना था। मरने के बाद सिकन्दर के दोनों हाथ खुले हुए बाहर निकल कर लटक रहे थे। उसने इस ध्रुव सत्य को समझ लिया था कि जीवन में कुछ संचय नहीं किया जा सकता, यह तो देने के ही लिये बना था। इसी को प्रारम्भ में लोग नहीं समझते किन्तु एक समय ऐसा आता है जब विवश होकर उन्हें समझना पड़ता है। लेकिन यदि हममें इतनी बुद्धि होती कि हम प्रकृति के इस रहस्य को समझते, भगवान के उपदेशों के अनुसार चलते तो दुःख किस बात का था।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.7
बुधवार, 4 अक्टूबर 2017
👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 1)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!
🔴 देवताओं के अनुग्रह की बात आप सबने सुनी होगी। देवता नाम ही इसलिए रखा गया है कि, वे दिया करते हैं। प्राप्त करने की इच्छा से कितने ही लोग उनकी पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं, आइए—इस पर विचार करें।
🔵 देवता देते तो हैं, इसमें कोई शक नहीं है। अगर वे देते न होते तो उनका नाम देवता न रखा गया होता। देवता का अर्थ ही होता है—देने वाला। देने वाले से अगर माँगने वाला कुछ माँगता है तो कोई बेजा बात नहीं है। पर विचार करना पड़ेगा कि, आखिर देवता देते क्या चीज हैं? देवता वही चीज देते हैं जो उनके पास है। जिसके पास जो चीज होगी, वही तो दे पाएगा। देवता के पास सिर्फ एक चीज है और उसका नाम है—देवत्व। देवत्व कहते हैं—गुण, कर्म और स्वभाव-तीनों की अच्छाई को, श्रेष्ठता को। इतना देने के बाद में देवता निश्चिन्त हो जाते हैं, निवृत्त हो जाते हैं और कहते हैं कि, जो हम आपको दे सकते थे हमने वह दे दिया। अब आपका काम है कि, जो चीज हमने दी है, उसको जहाँ भी आप मुनासिब समझें, वहाँ इस्तेमाल करें और उसी किस्म की सफलता पाएँ।
🔴 दुनिया में सफलता एक चीज के बदले में मिलती है और वह है—आदमी का उत्कृष्ट व्यक्तित्व। इससे कम में कोई चीज नहीं मिल सकती। अगर कहीं से किसी ने घटिया व्यक्तित्व की कीमत पर किसी तरीके से अपने सिक्के को भुनाए बिना, अपनी योग्यता का सबूत दिए बिना, परिश्रम के बिना, गुणों के अभाव में, कोई चीज प्राप्त कर ली है तो वह उसके पास ठहरेगी नहीं। शरीर में हजम करने की ताकत न हो तो जो खुराक आपने खाई है, वह आपको हैरान करेगी, परेशान करेगी। इसी तरह सम्पत्तियों को, सुविधाओं को हजम करने के लिए गुणों का माद्दा नहीं होगा तो वे आपको तंग करेंगी, परेशान करेंगी। अगर गुण नहीं है तो जैसे-जैसे दौलत बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे आपके अन्दर दोष-दुर्गुण बढ़ते जाएँगे, व्यसन बढ़ते जाएँगे, अहंकार बढ़ता जाएगा और आपकी जिन्दगी को तबाह कर देगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!
🔴 देवताओं के अनुग्रह की बात आप सबने सुनी होगी। देवता नाम ही इसलिए रखा गया है कि, वे दिया करते हैं। प्राप्त करने की इच्छा से कितने ही लोग उनकी पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं, आइए—इस पर विचार करें।
🔵 देवता देते तो हैं, इसमें कोई शक नहीं है। अगर वे देते न होते तो उनका नाम देवता न रखा गया होता। देवता का अर्थ ही होता है—देने वाला। देने वाले से अगर माँगने वाला कुछ माँगता है तो कोई बेजा बात नहीं है। पर विचार करना पड़ेगा कि, आखिर देवता देते क्या चीज हैं? देवता वही चीज देते हैं जो उनके पास है। जिसके पास जो चीज होगी, वही तो दे पाएगा। देवता के पास सिर्फ एक चीज है और उसका नाम है—देवत्व। देवत्व कहते हैं—गुण, कर्म और स्वभाव-तीनों की अच्छाई को, श्रेष्ठता को। इतना देने के बाद में देवता निश्चिन्त हो जाते हैं, निवृत्त हो जाते हैं और कहते हैं कि, जो हम आपको दे सकते थे हमने वह दे दिया। अब आपका काम है कि, जो चीज हमने दी है, उसको जहाँ भी आप मुनासिब समझें, वहाँ इस्तेमाल करें और उसी किस्म की सफलता पाएँ।
🔴 दुनिया में सफलता एक चीज के बदले में मिलती है और वह है—आदमी का उत्कृष्ट व्यक्तित्व। इससे कम में कोई चीज नहीं मिल सकती। अगर कहीं से किसी ने घटिया व्यक्तित्व की कीमत पर किसी तरीके से अपने सिक्के को भुनाए बिना, अपनी योग्यता का सबूत दिए बिना, परिश्रम के बिना, गुणों के अभाव में, कोई चीज प्राप्त कर ली है तो वह उसके पास ठहरेगी नहीं। शरीर में हजम करने की ताकत न हो तो जो खुराक आपने खाई है, वह आपको हैरान करेगी, परेशान करेगी। इसी तरह सम्पत्तियों को, सुविधाओं को हजम करने के लिए गुणों का माद्दा नहीं होगा तो वे आपको तंग करेंगी, परेशान करेंगी। अगर गुण नहीं है तो जैसे-जैसे दौलत बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे आपके अन्दर दोष-दुर्गुण बढ़ते जाएँगे, व्यसन बढ़ते जाएँगे, अहंकार बढ़ता जाएगा और आपकी जिन्दगी को तबाह कर देगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 स्वास्थ्य का रहस्य
🔴 तब बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थीं। उन दिनों की बात है, एक किसान को जमीन की कमी महसूस हुई। अतः उसने पहाड़ काटना शुरु कर दिया। पहाड़ बड़ा घबराया, उसने बीमारियों को आज्ञा दी-बेटियो! टूट पड़ो इस किसान पर और इसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालो। बीमारियाँ डंड-बैठक लगाकर आगे बढ़ी और किसान पर चढ़ बैठी। किसान ने किसी की परवाह नहीं की और डटा रहा अपने काम में। शरीर से पसीने की धार निकली और उसी में लिपटी हुई बीमारियाँ भी बह गई। पहाड़ ने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया-मेरी बेटी होकर तुमने मेरा इतना काम भी नहीं किया, अब जहाँ हो वहीं पड़ी रहो। तब से बीमारियाँ परिश्रमी लोगों पर असर नहीं कर पातीं। गंदे और आलसी लोग ही उनके शिकार होते हैं।
👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 142)
🌹 इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है
🔵 हमारी जिज्ञासाओं एवं उत्सुकताओं का समाधान गुरुदेव प्रायः हमारे अंतराल में बैठकर ही किया करते हैं। उनकी आत्मा हमें अपने समीप ही दृष्टिगोचर होती रहती है। आर्षग्रंथों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा पुराण की संरचना तक जिस प्रकार लेखन प्रयोजन में उनका मार्गदर्शन अध्यापक और विद्यार्थी जैसा रहा है, हमारी वाणी भी उन्हीं की सिखावन को दुहराती रही है। घोड़ा जिस प्रकार सवार के संकेतों पर दिशा और चाल बदलता रहता है, वही प्रक्रिया हमारे साथ भी कार्यान्वित होती रही है।
🔴 बैटरी चार्ज करने के लिए जब हिमालय बुलाते हैं, तब भी वे कुछ विशेष कहते नहीं। सेनीटोरियम में जिस प्रकार किसी दुर्बल का स्वास्थ्य सुधर जाता है, वही उपलब्धियाँ हमें हिमालय जाने पर हस्तगत होती हैं। वार्तालाप का प्रयोग अनेक प्रसंगों में होता रहता है।
🔵 इस बार सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया और साधना विधि तो ठीक तरह समझ में आ गई और जिस प्रकार कुन्ती ने अपने शरीर में से देव संतानें जन्मीं थीं, ठीक उसी प्रकार अपनी काया में विद्यमान पाँच कोशों, अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोषों को पाँच वीरभद्रों के रूप में विकसित करना पड़ेगा, इसकी साधना विधि भी समझ में आ गई। जब तक वे पाँचों पूर्ण समर्थ न हो जाएँ तब तक वर्तमान स्थूल शरीर को उनके घोंसले की तरह बनाए रहने का भी आदेश है और अपनी दृश्य स्थूल जिम्मेदारियाँ दूसरों को हस्तांतरित करने की दृष्टि से अभी शान्तिकुञ्ज ही रहने का निर्देश है।
🔴 यह सब स्पष्ट हो गया। सावित्री साधना का विधान भी उनका निर्देश मिलते ही इस निमित्त आरम्भ कर दिया।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 हमारी जिज्ञासाओं एवं उत्सुकताओं का समाधान गुरुदेव प्रायः हमारे अंतराल में बैठकर ही किया करते हैं। उनकी आत्मा हमें अपने समीप ही दृष्टिगोचर होती रहती है। आर्षग्रंथों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा पुराण की संरचना तक जिस प्रकार लेखन प्रयोजन में उनका मार्गदर्शन अध्यापक और विद्यार्थी जैसा रहा है, हमारी वाणी भी उन्हीं की सिखावन को दुहराती रही है। घोड़ा जिस प्रकार सवार के संकेतों पर दिशा और चाल बदलता रहता है, वही प्रक्रिया हमारे साथ भी कार्यान्वित होती रही है।
🔴 बैटरी चार्ज करने के लिए जब हिमालय बुलाते हैं, तब भी वे कुछ विशेष कहते नहीं। सेनीटोरियम में जिस प्रकार किसी दुर्बल का स्वास्थ्य सुधर जाता है, वही उपलब्धियाँ हमें हिमालय जाने पर हस्तगत होती हैं। वार्तालाप का प्रयोग अनेक प्रसंगों में होता रहता है।
🔵 इस बार सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया और साधना विधि तो ठीक तरह समझ में आ गई और जिस प्रकार कुन्ती ने अपने शरीर में से देव संतानें जन्मीं थीं, ठीक उसी प्रकार अपनी काया में विद्यमान पाँच कोशों, अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोषों को पाँच वीरभद्रों के रूप में विकसित करना पड़ेगा, इसकी साधना विधि भी समझ में आ गई। जब तक वे पाँचों पूर्ण समर्थ न हो जाएँ तब तक वर्तमान स्थूल शरीर को उनके घोंसले की तरह बनाए रहने का भी आदेश है और अपनी दृश्य स्थूल जिम्मेदारियाँ दूसरों को हस्तांतरित करने की दृष्टि से अभी शान्तिकुञ्ज ही रहने का निर्देश है।
🔴 यह सब स्पष्ट हो गया। सावित्री साधना का विधान भी उनका निर्देश मिलते ही इस निमित्त आरम्भ कर दिया।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 King in Dreams
🔴 A young man dreamt that he was the king of a big empire. His joy knew no bounds after getting such a prized position instantaneously in the dream. In the morning father told him to go to work, mother asked him to go and bring the wood after cutting. Wife asked to bring something from the market but the man didn’t do any work and told that,” I am the king, how can I do any work?”.
🔵 Everyone at home was bewildered at his behavior. Then her little sister took charge of situation. She fed everyone in the house except her brother. When he couldn’t bear the hunger, he asked his sister, “Wont she serve him the food? “, to which she replied, “O king, let the night come, angels will descend here and server you food according to your status. You won’t get satisfaction from our simple food.”
🔴 He finally accepted the truth and stopped wandering in useless thoughts and got food only after he promised that he would work towards attaining the real and eternal truth and will from now on work industriously.
🌹 From Pragya Puran
🔵 Everyone at home was bewildered at his behavior. Then her little sister took charge of situation. She fed everyone in the house except her brother. When he couldn’t bear the hunger, he asked his sister, “Wont she serve him the food? “, to which she replied, “O king, let the night come, angels will descend here and server you food according to your status. You won’t get satisfaction from our simple food.”
🔴 He finally accepted the truth and stopped wandering in useless thoughts and got food only after he promised that he would work towards attaining the real and eternal truth and will from now on work industriously.
🌹 From Pragya Puran
👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Oct 2017
🔵 दूसरों की अच्छाइयों को ढूंढ़ने, उन्हें देख-देखकर प्रसन्न होने एवं उनकी प्रशंसा करते रहने का स्वभाव यदि हम अपना बना लें तो यह सारी दुनिया हमें एक सुरम्य सुगंधित बगीचे की तरह मनोरम दिखाई देगी। हर व्यक्ति और हर वस्तु में कुछ न कुछ अच्छाई मौजूद है। हमारे लिये इतना ही पर्याप्त है। शहद की मक्खी के लिए, इतना ही पर्याप्त है कि फूल में मिठास के तनिक से कण मौजूद हों, जब एक नन्हीं-सी विद्या और बुद्धि से हीन मक्खी इतना कर सकती है कि फूल में से अपने काम की जरा सी चीज को निकालने मात्र का ध्यान रखे और अपना छत्ता मीठे शहद से भर ले तो क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि लोगों के अंदर उपस्थित अच्छाइयों को ही तलाश करें भले ही वे थोड़ी-सी ही मात्रा में क्यों न हों। यदि हमारी दृष्टि ऐसी रहे तो हमें अपने चारों और सज्जन एवं स्नेही ही दिखाई देंगे। हमारा मन घड़ी प्रसन्नता और संतोष से ही भरा रहेगा।
🔴 ताली एक हाथ से नहीं बजती। अन्य व्यक्ति दुर्जन भी हो तो हमारी सज्जनता उनके हथियारों को व्यर्थ बना देगी। सड़क टूट हुई हो, जगह-जगह गड्ढे हों तो मोटर में बैठने वाले को दचके लगने स्वाभाविक हैं, पर बहुत बढ़िया किस्म की मोटर जिसमें लचकदार कामनी या स्प्रिंगदार सीटें हों-उस टूटी सड़क पर भी किसी यात्री को सुविधा पूर्वक यात्रा करा सकती है। दुनिया में बुरे लोग हैं- ठीक है- पर यदि हम अपनी मनोभूमि को सहनशील, धैर्यवान, उदार और गुदगुदी बना लें तो बढ़िया मोटर में बैठने वाले यात्री की तरह इस टूटी सड़क वाली दुनिया में भी आनंद पूर्वक यात्रा कर सकते हैं।
🔵 जो उपलब्ध है उसे कम या घटिया मानकर अनेक लोग दुःखी रहते हैं और अपने भाग्य को कोसते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि अधिक ऊंची किस्म के सुख-साधन, सामग्री प्राप्त करने के लिए उतावले होकर लोग अनुचित रीति से भी उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं और अन्याय और अत्याचार करने में भी नहीं चूकते। यह मार्ग समाज में अशान्ति और अपने लिये दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाला ही है। ऐसे अनुचित कदम उठने में वह असन्तोष ही मुख्य कारण है जिससे, और अधिक मात्रा में, और अधिक बढ़िया किस्म की वस्तुएं प्राप्त करने की लालसा लगी रहती है। यदि हम इन लालसाओं पर नियंत्रण कर लें, अपना स्वभाव सन्तोषी बना लें, तो मामूली वस्तुओं से भी काम चलाते हुए प्रसन्न रह सकते हैं। अपने से भी कहीं अधिक गिरी स्थिति में, गरीबी में दिन गुजारने वाले लाखों करोड़ों व्यक्ति मौजूद है। उनकी तुलना में हम कहीं अधिक अच्छी स्थिति में माने जा सकते हैं।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 ताली एक हाथ से नहीं बजती। अन्य व्यक्ति दुर्जन भी हो तो हमारी सज्जनता उनके हथियारों को व्यर्थ बना देगी। सड़क टूट हुई हो, जगह-जगह गड्ढे हों तो मोटर में बैठने वाले को दचके लगने स्वाभाविक हैं, पर बहुत बढ़िया किस्म की मोटर जिसमें लचकदार कामनी या स्प्रिंगदार सीटें हों-उस टूटी सड़क पर भी किसी यात्री को सुविधा पूर्वक यात्रा करा सकती है। दुनिया में बुरे लोग हैं- ठीक है- पर यदि हम अपनी मनोभूमि को सहनशील, धैर्यवान, उदार और गुदगुदी बना लें तो बढ़िया मोटर में बैठने वाले यात्री की तरह इस टूटी सड़क वाली दुनिया में भी आनंद पूर्वक यात्रा कर सकते हैं।
🔵 जो उपलब्ध है उसे कम या घटिया मानकर अनेक लोग दुःखी रहते हैं और अपने भाग्य को कोसते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि अधिक ऊंची किस्म के सुख-साधन, सामग्री प्राप्त करने के लिए उतावले होकर लोग अनुचित रीति से भी उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं और अन्याय और अत्याचार करने में भी नहीं चूकते। यह मार्ग समाज में अशान्ति और अपने लिये दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाला ही है। ऐसे अनुचित कदम उठने में वह असन्तोष ही मुख्य कारण है जिससे, और अधिक मात्रा में, और अधिक बढ़िया किस्म की वस्तुएं प्राप्त करने की लालसा लगी रहती है। यदि हम इन लालसाओं पर नियंत्रण कर लें, अपना स्वभाव सन्तोषी बना लें, तो मामूली वस्तुओं से भी काम चलाते हुए प्रसन्न रह सकते हैं। अपने से भी कहीं अधिक गिरी स्थिति में, गरीबी में दिन गुजारने वाले लाखों करोड़ों व्यक्ति मौजूद है। उनकी तुलना में हम कहीं अधिक अच्छी स्थिति में माने जा सकते हैं।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 जीवन की सफलता का रहस्य (भाग 2)
🔴 अतः हमारे दुःखों का, कष्टों का सबसे बड़ा कारण आसक्ति है। इसीलिये, भगवान कृष्ण ने कहा है कि अनासक्त होकर कर्म करो। कर्म करो। कर्म करो। किन्तु उसके फल के प्रलोभन में न पड़ो जब चाहे उस कर्म-चक्र से अलग हो जाने की क्षमता अपने अन्दर रखो। चाहे कोई हो उससे अपने को अलग कर लेना होगा। जीवन का नाम ही संघर्ष है अशक्तों, अपाहिजों और दुर्बलों के लिये यह जीवन या कर्म-क्षेत्र संसार नहीं बना है। दुर्बलता से ही सब प्रकार की तकलीफें, चाहे वे शारीरिक हों या मानसिक, उत्पन्न होती हैं। दुर्बलता मृत्यु है, शक्ति समृद्धि है, जीवन है, अमरत्व है।
🔵 साँसारिक आनन्द आसक्ति से ही हमको प्राप्त होते हैं हम अपने सम्बन्धियों के प्रति, अपने सत्कार्यों के प्रति एवं संसार के प्रति आसक्त हो जाते हैं और फिर अन्त में यही सुख, यही आनन्द दुःख में करुणा में परिणत हो जाता है। सुख भोगने के लिये आसक्ति हीन होना अत्यावश्यक है। यदि कोई अनासक्त हो तो वह कभी दुःखी हो ही नहीं सकता। संसार में वही व्यक्ति अत्यधिक सुखी और सम्पन्न है जिसके अन्दर साँसारिक पदार्थों से अपने को आसक्त रखते हुए भी अनासक्त कर लेने की सामर्थ्य हो। जो संसार में रहते हुए भी, संसार के पदार्थों का उपयोग करते हुए भी, जब चाहे अपने को उनसे विरक्त करले और उसके मनमें उनके प्रति तनिक भी अनुराग न रखे उसी का जीवन सफल है।
🔴 कितने ऐसे मनुष्य होते हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी लौकिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्मम, निष्ठुर होते हैं। निस्सन्देह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों, मुसीबतों से बच जाते हैं। किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती। लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर की चट्टान से कर सकते हैं? ऐसा कभी नहीं हो सकता। मनुष्य मनुष्य ही है पत्थर पत्थर ही है। जो कुलिषवत् कठोर होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का भी उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा भी जीवन क्या कोई जीवन है? कुशल चतुर व्यक्ति तो वही है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम पूरा कर, सब की सेवा कर, सब से प्रेम कर फिर भी सब से अलग रहता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.7
🔵 साँसारिक आनन्द आसक्ति से ही हमको प्राप्त होते हैं हम अपने सम्बन्धियों के प्रति, अपने सत्कार्यों के प्रति एवं संसार के प्रति आसक्त हो जाते हैं और फिर अन्त में यही सुख, यही आनन्द दुःख में करुणा में परिणत हो जाता है। सुख भोगने के लिये आसक्ति हीन होना अत्यावश्यक है। यदि कोई अनासक्त हो तो वह कभी दुःखी हो ही नहीं सकता। संसार में वही व्यक्ति अत्यधिक सुखी और सम्पन्न है जिसके अन्दर साँसारिक पदार्थों से अपने को आसक्त रखते हुए भी अनासक्त कर लेने की सामर्थ्य हो। जो संसार में रहते हुए भी, संसार के पदार्थों का उपयोग करते हुए भी, जब चाहे अपने को उनसे विरक्त करले और उसके मनमें उनके प्रति तनिक भी अनुराग न रखे उसी का जीवन सफल है।
🔴 कितने ऐसे मनुष्य होते हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी लौकिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्मम, निष्ठुर होते हैं। निस्सन्देह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों, मुसीबतों से बच जाते हैं। किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती। लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर की चट्टान से कर सकते हैं? ऐसा कभी नहीं हो सकता। मनुष्य मनुष्य ही है पत्थर पत्थर ही है। जो कुलिषवत् कठोर होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का भी उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा भी जीवन क्या कोई जीवन है? कुशल चतुर व्यक्ति तो वही है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम पूरा कर, सब की सेवा कर, सब से प्रेम कर फिर भी सब से अलग रहता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.7
मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017
👉 सहज़ जीवन साधना के सूत्र :-
🔴 एक निःसन्तान सेठ अपने लिए उत्तराधिकारी की तलाश में था उसने नगर के इक्छुक युवकों को बुलाया और प्रत्येक को एक बिल्ली और एक गाय दी कहा एक माह में बिल्ली को इतना दूध पिला के तृप्त कर दो क़ि जब मैं एक माह बाद उसके समक्ष दूध रखूँ वो न पिए। जिसकी बिल्ली तृप्त होगी उसे मैं अपना उत्तराधिकारी बनाऊंगा।
🔵 सबने बिल्ली की खूब खातिरदारी की और उसे खिला पिला के मोटा तन्दरूस्त कर दिया और गाय की उपेक्षा कर दी।
🔴 लेकिन एक युवक ने सोचा सेठ कितना मूर्ख है गाय की सेवा न बोल के बिल्ली की सेवा करवाता है। उसने उल्टा काम किया गाय की खूब सेवा कर उसे खिला पिला के मोटा तन्द्तुस्त किया गाय ने खूब दूध दिया सारे परिवार ने आनंद से खाया और सारा परिवार तन्दरूस्त हुआ। बिल्ली को उसने सिर्फ आवश्यक भोजन करवाया और उसके सामने गर्म दूध रख देता। जैसे ही बिल्ली पीती उसके मुँह में बहुत मारता। मार खाने की वज़ह से बिल्ली दूध से डर गयी।
🔵 प्रतियोगिता के दिन सबकी तन्दरूस्त बिल्लियाँ दूध पर टूट पड़ी, गाय की उपेक्षा हुई। लेकिन उस युवक की पतली दुबली बिल्ली ने दूध को मुँह भी न लगाया और वह युवक विजयी हुआ और सेठ का उत्तराधिकारी बना। उसकी गाय भी सबसे ज़्यादा स्वस्थ थी।
🔴 सेठ ने युवक से पूंछा तुमने बिल्ली के बजाय गाय की सेवा की और तुम्हारी बिल्ली तुम्हारे नियंत्रण में कैसे?
🔵 युवक ने कहा इस संसार में बिल्ली को अनावशयक खिला के सन्तुष्ट नहीँ किया जा सकता उसे सिर्फ दण्ड से नियंत्रित किया जा सकता है। गाय की सेवा से उसने ज्यादा दूध दिया जिसे खा के और दूध बेच के मेरी आर्थिक स्थिति ठीक हुई।
🔴 मित्रों यही बात हमारे जीवन पर लागू होती है कामना-वासना रुपी बिल्ली अनावश्यक-अत्यधिक पूर्ती से कभी तृप्त न होगी। उस पर कठोरता से संयम करना होगा।
🔵 सबने बिल्ली की खूब खातिरदारी की और उसे खिला पिला के मोटा तन्दरूस्त कर दिया और गाय की उपेक्षा कर दी।
🔴 लेकिन एक युवक ने सोचा सेठ कितना मूर्ख है गाय की सेवा न बोल के बिल्ली की सेवा करवाता है। उसने उल्टा काम किया गाय की खूब सेवा कर उसे खिला पिला के मोटा तन्द्तुस्त किया गाय ने खूब दूध दिया सारे परिवार ने आनंद से खाया और सारा परिवार तन्दरूस्त हुआ। बिल्ली को उसने सिर्फ आवश्यक भोजन करवाया और उसके सामने गर्म दूध रख देता। जैसे ही बिल्ली पीती उसके मुँह में बहुत मारता। मार खाने की वज़ह से बिल्ली दूध से डर गयी।
🔵 प्रतियोगिता के दिन सबकी तन्दरूस्त बिल्लियाँ दूध पर टूट पड़ी, गाय की उपेक्षा हुई। लेकिन उस युवक की पतली दुबली बिल्ली ने दूध को मुँह भी न लगाया और वह युवक विजयी हुआ और सेठ का उत्तराधिकारी बना। उसकी गाय भी सबसे ज़्यादा स्वस्थ थी।
🔴 सेठ ने युवक से पूंछा तुमने बिल्ली के बजाय गाय की सेवा की और तुम्हारी बिल्ली तुम्हारे नियंत्रण में कैसे?
🔵 युवक ने कहा इस संसार में बिल्ली को अनावशयक खिला के सन्तुष्ट नहीँ किया जा सकता उसे सिर्फ दण्ड से नियंत्रित किया जा सकता है। गाय की सेवा से उसने ज्यादा दूध दिया जिसे खा के और दूध बेच के मेरी आर्थिक स्थिति ठीक हुई।
🔴 मित्रों यही बात हमारे जीवन पर लागू होती है कामना-वासना रुपी बिल्ली अनावश्यक-अत्यधिक पूर्ती से कभी तृप्त न होगी। उस पर कठोरता से संयम करना होगा।
👉 परोपकारी विसाोबा
🔴 महाराष्ट्र के ओढिया नागनाथ नामक ग्राम में विसोवा नामक एक सज्जन रहते थे। वे सोने चाँदी का काम करते थे। धनी भी थे और भगवान के भक्त भी। उस क्षेत्र में दुर्भिक्ष पड़ता है। विसोबा के पास जो कुछ था उसे वे अकाल पीड़ितों को खिला देते हैं। फिर भी लोग भूख से प्राण त्यागते ही जाते है। विसोबा सोचते है मेरी साख है, क्यों न ऋण लेकर भूखों का पेट भरूँ? जब दुर्भिक्ष समाप्त हो जाएगा तब मैं ऋण चुका दूँगा। अपनी पत्नी से सलाह करते है उसे भी यह बात पसंद आ जाती है। और सब तो निर्धन हो चुके थे, एक निर्दय पठान ही धनी था उसी के यहाँ अन्न भी था। विसोबा उसे ऋण लेकर भूखे भरती को अन्न बाँटने लगे। चुगलखोरों ने पठान से विसोबा के दिवालिया होने की बात कह दी। पठान ने अपना ऋण तुरन्त लौटाने का तकाजा किया, मुसलमानी राज्य में पठानों की तूती बोलती थी। कुछ न्याय भाव था नहीं, वे चाहे जिसका जो कर डाल सकते थे, उसने मुश्किल से सात दिन की मोहलत दी। विसोबा ऋण कहाँ से चुकाते उनके पास कुछ भी न था।
🔵 जब ऋण चुकाने का कोई प्रबन्ध न हो सका तो पठान बिसोवा को अत्यन्त क्रूरता पूर्वक यातनाऐं देने लगे और अपमानित करने लगे फिर भी बिसोवा क्षुब्ध न हुए बराबर यही कहते रहे मैंने आपका ऋण अवश्य लिया है और जिस दिन भी मेरे पास व्यवस्था हो जाएगी आपको अवश्य चुका दूँगा। आप चाहे तो मुझे और मेरे परिवार को ऋण के बदले में पशु की तरह खरीद कर अपने यहाँ जन्म भर के लिए गुलाम भी रख सकते है।
🔴 बिसोबा का मुनीम अपने स्वामी को इस दुर्दशा को न देख सका उसने अपनी सारी संचित पूँजी पठान को देकर अपने परोपकारी स्वामी का उद्धष्ट कराया। इसके बद वह मुनीम भी विसोबा के साथ पूर्ण श्रद्धा के साथ ईश्वर भक्ति एवं परोपकार में लग गया।
🔵 ईश्वर भक्ति जिसके हृदय में आती है उसके साथ ही करुणा दिया और परोपकार की भावना भी अवश्य उपजती है। जो भक्त तो बने, पर निष्ठुर और कंजूस हो उसकी भक्ति ढोंग मात्र है।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961
🔵 जब ऋण चुकाने का कोई प्रबन्ध न हो सका तो पठान बिसोवा को अत्यन्त क्रूरता पूर्वक यातनाऐं देने लगे और अपमानित करने लगे फिर भी बिसोवा क्षुब्ध न हुए बराबर यही कहते रहे मैंने आपका ऋण अवश्य लिया है और जिस दिन भी मेरे पास व्यवस्था हो जाएगी आपको अवश्य चुका दूँगा। आप चाहे तो मुझे और मेरे परिवार को ऋण के बदले में पशु की तरह खरीद कर अपने यहाँ जन्म भर के लिए गुलाम भी रख सकते है।
🔴 बिसोबा का मुनीम अपने स्वामी को इस दुर्दशा को न देख सका उसने अपनी सारी संचित पूँजी पठान को देकर अपने परोपकारी स्वामी का उद्धष्ट कराया। इसके बद वह मुनीम भी विसोबा के साथ पूर्ण श्रद्धा के साथ ईश्वर भक्ति एवं परोपकार में लग गया।
🔵 ईश्वर भक्ति जिसके हृदय में आती है उसके साथ ही करुणा दिया और परोपकार की भावना भी अवश्य उपजती है। जो भक्त तो बने, पर निष्ठुर और कंजूस हो उसकी भक्ति ढोंग मात्र है।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961
👉 जीवन की सफलता का रहस्य (भाग 1)
🔴 अपने जीवन में सबसे बड़ी और मूल्यवान बात जो मैंने सीखी है वह है-साध्य से अधिक साधना की ओर ध्यान देना। यही सफलता का रहस्य है। हम लोगों में सबसे बड़ा दोष यही है कि हम लोग लक्ष्य की ही ओर ध्यान देते हैं और साधन की, कार्यप्रणाली की, ब्यौरे की बातों को भूल जाते हैं। और इसीलिये इसका परिणाम यह होता है कि यदि हम अपने लक्ष्य पर एक बार पहुँच भी गये, यदि हमको एक बार सफलता मिल भी गयी तो भी हमारी वह सफलता स्थायी नहीं होती और हम शीघ्र ही फिसल जाते हैं। हमें सबसे पहले यह बात ध्यान में बैठा लेनी चाहिये कि हमारी कार्यप्रणाली की शुद्धता और अशुद्धता पर ही कार्य का फलाफल निर्भर करता है। यदि हमारी प्रणाली ठीक न रही तो फल कभी ठीक नहीं हो सकता। पद्धति पर ध्यान देने से परिणाम आशा और अभिलाषा के अनुरूप ही होगा इसमें तनिक भी संशय नहीं। प्रणाली की विशुद्धता ही फल है।
🔵 अतः हमें चाहिये कि अपना सारा ध्यान कर्म और उसकी प्रणाली पर ही रखें, उसकी पूर्ति के प्रलोभन में तनिक भी न फंसें। गीता का भी यही उपदेश है कि हमें निरन्तर अपने कर्म में लगे रहना चाहिये, फल की स्पृहा करना उसके पीछे अन्धा होना पतन की जड़ है। इसीलिये गीता का कथन है कि सब कर्मों को करते हुए भी उनसे अनासक्त रहें। आसक्ति होना ही बुरा है। संसार में हम कर्म करने के लिये आते हैं। किन्तु कर्मफल के लिये हमारे अन्दर जो स्पृहा, जो लोभ होता है वह हमारा सत्यानाश कर देता है।
🔴 हम नित्य देखते हैं कि मधुमक्षिका फूलों का रस चूसने के लिये आती है किन्तु चलते समय उन फूलों के रस में उसके पर फंस जाते हैं और वह विवश हो जाती है इसका कारण उसके अन्दर मधु के प्रति आसक्ति है। उसी प्रकार हम भी इस विश्व में केवल कर्म करने के लिये आते हैं किन्तु अपनी मूर्खता से उसके फल के प्रति आसक्ति रखने के कारण संसार में ही फंस जाते हैं। फल इसका बड़ा घातक होता है। हमारी स्वतंत्रता छिन जाती है, हम गुलाम हो जाते हैं। प्रकृति से हम सब चीजें प्राप्त करना चाहते हैं, किन्तु अन्त में प्रकृति हमसे सभी चीजें छीन लेती है और हमको ठुकरा देती है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.6
🔵 अतः हमें चाहिये कि अपना सारा ध्यान कर्म और उसकी प्रणाली पर ही रखें, उसकी पूर्ति के प्रलोभन में तनिक भी न फंसें। गीता का भी यही उपदेश है कि हमें निरन्तर अपने कर्म में लगे रहना चाहिये, फल की स्पृहा करना उसके पीछे अन्धा होना पतन की जड़ है। इसीलिये गीता का कथन है कि सब कर्मों को करते हुए भी उनसे अनासक्त रहें। आसक्ति होना ही बुरा है। संसार में हम कर्म करने के लिये आते हैं। किन्तु कर्मफल के लिये हमारे अन्दर जो स्पृहा, जो लोभ होता है वह हमारा सत्यानाश कर देता है।
🔴 हम नित्य देखते हैं कि मधुमक्षिका फूलों का रस चूसने के लिये आती है किन्तु चलते समय उन फूलों के रस में उसके पर फंस जाते हैं और वह विवश हो जाती है इसका कारण उसके अन्दर मधु के प्रति आसक्ति है। उसी प्रकार हम भी इस विश्व में केवल कर्म करने के लिये आते हैं किन्तु अपनी मूर्खता से उसके फल के प्रति आसक्ति रखने के कारण संसार में ही फंस जाते हैं। फल इसका बड़ा घातक होता है। हमारी स्वतंत्रता छिन जाती है, हम गुलाम हो जाते हैं। प्रकृति से हम सब चीजें प्राप्त करना चाहते हैं, किन्तु अन्त में प्रकृति हमसे सभी चीजें छीन लेती है और हमको ठुकरा देती है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.6
सोमवार, 2 अक्टूबर 2017
👉 कर्मकाण्ड ही सब कुछ नहीं है
🔴 एक धनी व्यक्ति ने सुन रखा था कि भागवत पुराण सुनने से मुक्ति हो जाती है। राजा परीक्षित को इसी से मुक्ति हुई थी। उसने एक पंडित जी को भगवान की कथा सुनाने को कहा। कथा पूरी हो गई पर उस व्यक्ति के मुक्ति के कोई लक्षण नजर न आये। उसने पंडित जी से इसका कारण पूछा- पंडित जी ने लालच वश उत्तर दिया। यह कलियुग है इसमें चौथाई पुण्य होता है। चार बार कथा सुनो तो एक कथा की बराबर पुण्य होगा। धनी ने तीन कथा की दक्षिणा पेशगी दे दी और कथाऐं आरम्भ करने को कहा। वे तीनों भी पूरी हो गई पर मुक्ति का कोई लक्षण तो भी प्रतीत न हुआ। इस पर कथा कहने और सुनने वाले में कहासुनी होने लगी।
🔵 विवाद एक उच्च कोटि के महात्मा के पास पहुँचा। उसने दोनों को समझाया कि केवल बाह्य क्रिया से नहीं आन्तरिक स्थिति के आधार पर पुण्य फल मिलता है। राजा परीक्षित मृत्यु को निश्चित जान संसार से वैराग्य लेकर आत्म कल्याण में मन लगाकर कथा सुन रहा था। वीतराग शुकदेव जी भी पूर्ण निर्लोभ होकर परमार्थ की दृष्टि से कथा सुना रहे थे। दोनों की अन्तःस्थिति ऊँची थी इसलिए उन्हें वैसा ही फल मिला। तुम दोनों लोभ मोह में डूबे हो। जैसे कथा कहने वाले वैसे सुनने वाले, इसलिए तुम लोगों को पुण्य तो मिलेगा पर वह थोड़ा ही होगा। परीक्षित जैसी स्थिति न होने के कारण वैसे फल की भी तुम्हें आशा नहीं करनी चाहिए।
🔴 आत्म कल्याण के लिए बाह्य कर्मकाण्ड से ही काम नहीं चलता। उसके लिए उच्च भावनायें होना भी आवश्यक है।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961
🔵 विवाद एक उच्च कोटि के महात्मा के पास पहुँचा। उसने दोनों को समझाया कि केवल बाह्य क्रिया से नहीं आन्तरिक स्थिति के आधार पर पुण्य फल मिलता है। राजा परीक्षित मृत्यु को निश्चित जान संसार से वैराग्य लेकर आत्म कल्याण में मन लगाकर कथा सुन रहा था। वीतराग शुकदेव जी भी पूर्ण निर्लोभ होकर परमार्थ की दृष्टि से कथा सुना रहे थे। दोनों की अन्तःस्थिति ऊँची थी इसलिए उन्हें वैसा ही फल मिला। तुम दोनों लोभ मोह में डूबे हो। जैसे कथा कहने वाले वैसे सुनने वाले, इसलिए तुम लोगों को पुण्य तो मिलेगा पर वह थोड़ा ही होगा। परीक्षित जैसी स्थिति न होने के कारण वैसे फल की भी तुम्हें आशा नहीं करनी चाहिए।
🔴 आत्म कल्याण के लिए बाह्य कर्मकाण्ड से ही काम नहीं चलता। उसके लिए उच्च भावनायें होना भी आवश्यक है।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961
👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Oct 2017
🔵 यदि हम अपने आपसे सच्चे और सज्जन हों तो हमें सदा दूसरों की भलाइयाँ और अच्छाइयाँ दृष्टिगोचर होंगी। जिस प्रकार हम किसी के सुन्दर चेहरे को ही बार-बार देखते हैं उसी से प्रभावित होते हैं और प्रशंसा करते हैं। यद्यपि उसी मनुष्य के शरीर से मलमूत्र के दुर्गन्धपूर्ण कुरूप और कुरुचिपूर्ण स्थान भी हैं पर उनकी ओर न तो ध्यान देते हैं और न चर्चा करते हैं। इसी प्रकार सुरुचिपूर्ण मनो-भावना के व्यक्ति आमतौर से दूसरों के सद्गुणों को ही निरखते-परखते रहते हैं। उसके द्वारा जो अच्छे काम बन पड़े हैं उन्हीं की चर्चा करते हैं। उसके प्रशंसक और मित्र बनकर रहते हैं। आलोचकों और निन्दकों की अपेक्षा आत्मीयता, सद्भाव रखने वाला व्यक्ति किसी की बुराई को अधिक जल्दी और अधिक सरलता पूर्वक दूर कर सकता है।
🔴 कोई व्यक्ति जो अपने को सज्जन और समझदार मानता है उस पर यह जिम्मेदारी अधिक मात्रा में आती है कि वह सामान्य लोगों की अपेक्षा अपने में कुछ असामान्य गुण सिद्ध करे। सामने वाले से मतभेद होने पर उसे बुरा भला कहना निन्दा या अपमान भरे शब्द कहना, लड़-झगड़ पड़ना इतना तो निम्नकोटि के लोग भी करते रहते हैं। कुँजड़े और कंजड़ भी इस नीति से परिचित हैं? यदि इसी नीति को वे लोग भी अपनावें जो अपने को समझदार कहते हैं तो वे उनका यह दवा करना निस्सार है कि हम उस मानसिक स्तर के हैं। कुँजड़े-कंजड़ जैसे फूहड़ शब्द इस्तेमाल करते हैं इसे भले ही उनने न किए हों, शिक्षित होने के कारण वे साहित्यिक शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं पर नीति तो वही रही, भावना तो वही रही, क्रिया तो वही रही। वे अपने आपको शिक्षित कुँजड़ा या कंजड़ कह सकते हैं, इतनी ही उनकी विशेषता मानी जा सकती है।
🔵 हर समझदार आदमी पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह जिनकी निन्दा करना चाहता है उनकी अपेक्षा अपने आपको अधिक ऊंचा, अधिक सभ्य और अधिक सुसंस्कृत सिद्ध करे। यह भी तभी हो सकता है जब वह अपने में अधिक सहिष्णुता, अधिक प्यार, अधिक आत्मीयता, अधिक सज्जनता, अधिक उदारता और अधिक क्षमाशीलता धारण किये होना प्रमाणित करे। इन्हीं गुणों के आधार उसके बड़प्पन की तौल की जायेगी। यदि कभी भी दो व्यक्तियों में से एक को चुनना पड़े, एक को महत्व देना पड़े तो बाहर के विवेकशील आदमी इसी आधार पर महत्व देंगे कि किसने अधिक उदारता और सज्जनता का परिचय दिया। जिसमें यह अधिकता पाई जायेगी उसी की ओर लोगों की सहज सहानुभूति आकर्षित होगी। पर यदि ऐसा नहीं है तो दोनों एक ही स्तर पर रखे जायेंगे। दोनों की निन्दा की जायेगी और लोग उनके बीच में पड़ने की अपेक्षा उनसे दूर रहना ही पसंद करेंगे।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 कोई व्यक्ति जो अपने को सज्जन और समझदार मानता है उस पर यह जिम्मेदारी अधिक मात्रा में आती है कि वह सामान्य लोगों की अपेक्षा अपने में कुछ असामान्य गुण सिद्ध करे। सामने वाले से मतभेद होने पर उसे बुरा भला कहना निन्दा या अपमान भरे शब्द कहना, लड़-झगड़ पड़ना इतना तो निम्नकोटि के लोग भी करते रहते हैं। कुँजड़े और कंजड़ भी इस नीति से परिचित हैं? यदि इसी नीति को वे लोग भी अपनावें जो अपने को समझदार कहते हैं तो वे उनका यह दवा करना निस्सार है कि हम उस मानसिक स्तर के हैं। कुँजड़े-कंजड़ जैसे फूहड़ शब्द इस्तेमाल करते हैं इसे भले ही उनने न किए हों, शिक्षित होने के कारण वे साहित्यिक शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं पर नीति तो वही रही, भावना तो वही रही, क्रिया तो वही रही। वे अपने आपको शिक्षित कुँजड़ा या कंजड़ कह सकते हैं, इतनी ही उनकी विशेषता मानी जा सकती है।
🔵 हर समझदार आदमी पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह जिनकी निन्दा करना चाहता है उनकी अपेक्षा अपने आपको अधिक ऊंचा, अधिक सभ्य और अधिक सुसंस्कृत सिद्ध करे। यह भी तभी हो सकता है जब वह अपने में अधिक सहिष्णुता, अधिक प्यार, अधिक आत्मीयता, अधिक सज्जनता, अधिक उदारता और अधिक क्षमाशीलता धारण किये होना प्रमाणित करे। इन्हीं गुणों के आधार उसके बड़प्पन की तौल की जायेगी। यदि कभी भी दो व्यक्तियों में से एक को चुनना पड़े, एक को महत्व देना पड़े तो बाहर के विवेकशील आदमी इसी आधार पर महत्व देंगे कि किसने अधिक उदारता और सज्जनता का परिचय दिया। जिसमें यह अधिकता पाई जायेगी उसी की ओर लोगों की सहज सहानुभूति आकर्षित होगी। पर यदि ऐसा नहीं है तो दोनों एक ही स्तर पर रखे जायेंगे। दोनों की निन्दा की जायेगी और लोग उनके बीच में पड़ने की अपेक्षा उनसे दूर रहना ही पसंद करेंगे।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 राजा बड़ा या संत
एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...

















































