मंगलवार, 5 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 60)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 मृतक भोज के नाम पर घृणित दावतें खाने की निष्ठुरता, पशुबलि की नृशंसता, ऊँच-नीच के नाम पर मानवीय अधिकारों का अपहरण, नारी को पद-दलित और उत्पीड़न करने की क्रूरता हमारे समाज पर लगे हुए ऐसे कलंक हैं, जिनका समर्थन कोई भी विवेकशील और सहृदय व्यक्ति कर ही नहीं सकता। मूढ़ परम्पराओं ने इन कुरीतियों को धार्मिकता के साथ जोड़ दिया है, इस स्थिति को कब तक सहन किया जाता रहेगा? इस मूढ़ता के विरुद्ध प्रचार मोर्चे से आगे बढ़कर हमें कई और ऐसे सक्रिय कदम उठाने पड़ेंगे, जिन्हें भले ही अशान्ति उत्पन्न करने वाले कहा जाए, परंतु रुकेंगे तभी, जब मानवता के मूलभूत आधारों को स्वीकार करने वाले और झगड़े का खतरा मोल लेकर भी अनीति से हर मोर्चे पर जूझने के लिए कमर कस लें, भले ही इस संदर्भ में हमें कोई भी खतरा क्यों न उठाना पड़े।

🔵 वैयक्तिक दोष-दुर्गुणों से लड़ने और जीवन को स्वच्छ, पवित्र निर्मल बनाने के लिए अगर कुसंस्कारों से लड़ना पड़ता है, तो वह लड़ाई लड़ी ही जानी चाहिए। परिवार में कुछ सदस्यों को दास-दासी की तरह और कुछ को राजा-रानी की तरह रहने को यदि परम्परा का पालन माना जाता है, तो उसे बदल कर ऐसी परम्पराएँ स्थापित करनी पड़ेंगी, जिनमें सबको न्यायानुकूल अधिकार, लाभ, श्रम तथा सहयोग करने की व्यवस्था करे। आर्थिक क्षेत्र में बेईमानी को प्रश्रय न मिले।
 
🔴 व्यक्तिगत व्यवहार में छल करने और धोखेबाजी की गुंजाइश न रहे। ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए प्रबल लोकमत तैयार करना पड़ेगा और अवांछनीय तत्त्वों के उस प्रतिरोध को इतना सक्रिय बनाना पड़ेगा कि अपराध, उद्दंडता और गुंडागर्दी करने की हिम्मत करना किसी के लिए भी संभव न रहे। हराम की कमाई खाने वाले, भ्रष्टाचारी, बेईमान लोगों के विरुद्ध इतनी तीव्र प्रतिक्रिया उठानी होगी, जिसके कारण उन्हें सड़क पर चलना और मुँह दिखाना कठिन हो जाए। जिधर से वे निकलें उधर से ही धिक्कार की आवाजें ही उन्हें सुननी पड़ें। समाज में उनका उठना-बैठना बंद हो जाए और नाई, धोबी, दर्जी कोई उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग करने के लिए तैयार न हों।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.83

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.15

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 8)

🔵 ज्ञान और विज्ञान की सुविस्तृत सम्पदा ही मनुष्य को समर्थ, सम्पन्न कुशल बना सकी है। यह उपलब्धियाँ बादलों से नहीं बरसतीं, वरन् अनवरत अध्यावसाय के द्वारा ही एक-एक मंजिल पार करते हुए इन्हें खोज निकालना सम्भव हुआ है।यदि शोध प्रयासों को मानवी प्रवृत्ति में स्थान न मिला हो तो आग जैसी क्रान्तिकारी उपलब्धियाँ करतल गत न होतीं और आदिम मनुष्य की पीढ़ियाँ अभी भी अपने वानर वर्ग के अन्य साथियों के साथ गुजर कर रही होतीं। कोलम्बस ने अमेरिका खोज निकाला और संसार के विकास, विस्तार में एक नये अध्याय का समावेश हुआ।

🔴 खोजियों ने अन्तरिक्ष खोजा है और उसमें से उतना पाया है जितना कि रत्नाकर कहे जाने वाले समुद्र से भी न मिल सका। कहते हैं कि खोजने वालों ने ही भगवान को ढूँढ़ निकाला अन्यथा वह क्षीर सागर में शेष नाग के ऊपर चादर ताने गहरी नींद में सो रहा था। मनुष्योत्तर प्राणियों के लिए वह अभी भी उसी तरह अविज्ञात स्थिति में पड़ा हुआ है। आत्मा का अस्तित्व मनुष्य ने ही खोजा है। अन्यथा अन्य जीवधारी अपनी सत्ता शरीर तक ही सीमाबद्ध किये रहते। धर्म और अध्यात्म मनुष्य की अपनी खोज है।

🔵 अपने समय में एक बहुत बड़ा काम युग मानवों को खोज निकालना है। बड़े काम के किए बड़ी हस्तियाँ ही चाहिए। उन्हें एक सीमा तक ही शिक्षा और परिस्थितियाँ विकसित कर सकती है। नैपोलियन और सिकन्दर किसी सैनिक संस्था द्वारा विनिर्मित नहीं किये जा सके। वशिष्ठ औरन विश्वामित्र किस आश्रम में किस साधन के सहारे विनिर्मित किये जा सके। इसका पता लग नहीं पा रहा है। अंगद और हनुमान, भीम और अर्जुन, चाणक्य और कुमार जीव, बुद्ध और महावीर, गाँधी और पटैल, शिवाजी और प्रताप किस प्रकार तैयार किये जाय उसका कोई उपाय अभी भी सूझा नहीं पड़ रहा है।
 
🔴 ईसा जटाथुस्त-अरस्तू और सुकरात, लिंकन और वाशिंगटन-विवेकानन्द और गोविन्दसिंह, नानक और कबीर किस प्रकार तैयार किये जाँय, इसका कोई मार्ग मिल नहीं रहा है, शतरुपा, कौशल्या, सीता, सावित्री, मदालसा, शकुन्तला उपलब्ध करने के लिए क्या किया जा सकता है इसके लिए भारी माथा पच्ची के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता। अरविन्द और रमण, रामकृष्ण परमहंस और विरजानन्द जैसी हस्तियाँ ही युग निर्माण जैसे महा-प्रयोजन को पूरा करने में अग्रिम भूमिका निभा सकती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.50

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Sep 2017

🔵 इस भूमण्डल पर जितने लोग दीर्घजीवी और चिरस्मरणीय हो गये हैं वे सभी ब्राह्ममुहूर्त में उठने के लिये प्रसिद्ध थे। भोर में नहीं उठने से प्रातः-काल के कार्य-कलाप यथोचित ढंग से सम्पन्न नहीं हो सकते। देर करके उठने से प्रातः कृत्यों में ही दिन का बहुत सा समय व्यतीत हो जाता है और अन्योन्य कार्य समूह यथासमय सम्पन्न नहीं हो सकते। सुप्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक महात्मा अरस्तू का कथन है, “ भोर होने के पहिले ही शय्या त्याग करने का अभ्यास करना उचित है। ऐसा करने से धन, स्वास्थ्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है। “अफ्रीका देश के नीग्रो लोगों में एक कहावत प्रचलित है कि जो भोर में उठता है उसके भ्रमण का पथ संक्षेप होता है।”

🔴 यदि आप दीर्घजीवी बनना चाहते हो, अपने हृदय को वसन्त कालीन वायु प्रवाह की तरह आनन्दोल्लास पूर्ण करना चाहते हों, अपनी धमनियों में झरझर शब्द करती हुई प्रवाहित होनेवाली छोटी नदी की धारा की भाँति स्वच्छ रक्त की धारा प्रवाहित करने की अभिलाषा रखते हों, आयु को बढ़ाने वाली पुष्प-फलादि के सौरभ से पूर्ण प्रातः समीरण का सेवन करके अपने जीवन की तेजस्विता बढ़ाने की इच्छा रखते हों, तो खूब तड़के शय्या त्याग करने का अभ्यास करें।

🔵 यदि आप इस जीवन में कोई महत्व का कार्य करके अपने मानव जन्म को सार्थक बनाना चाहते हों, यदि अकाल मृत्यु से बचने की अभिलाषा रखते हों तो प्रतिज्ञा पूर्वक नियमित रूप से भोर में उठा करें तथा प्रातः कालीन वायु का सेवन करें और ईश्वर का नाम लेकर उत्साह पूर्वक अपने कार्य में प्रवृत्त हों।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 5 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Sep 2017


👉 मेहनत से ही छुआ जाता है बुलंदियों को

 🔴 एक बहुत ही गरीब लड़का था | उसे खाना खाने के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता था। दो वक्त की रोटी भी उसे सही से नसीब नहीं हो रही थी। वो लड़का बहुत ही मेहनती था। बिना किसी की सहायता लिए वह अपने स्कूल की फीस जमा किया करता था। वह भले ही एक समय खाना न खाता पर अपनी किताबें भी वह स्वयं ही खरीदता था।

🔵 उसके सारे साथी उससे बहुत ही ज्यादा जलते थे। एक दिन उसके मित्रों ने उस लड़के पर एक लांछन लगाना चाहा और उसे झूठे आरोप में फँसाने का फैसला किया। एक दिन स्कूल के प्राचार्य अपने कक्ष में बैठे हुए थे तभी वे सब बच्चे उस लड़के की शिकायत लेकर वहाँ पहुँचे और प्राचार्य जी से बोले – यह लड़का रोज कहीं से पैसे चुराता है और चुराए पैसों से अपने स्कूल की फीस जमा करता है। कृपया आप इसे सजा दें।

🔴 प्राचार्य ने उस लड़के से पूछा – क्या जो ये सब बच्चे बोल रहे हैं वो सच है बेटे?

🔵 लड़का बोला – प्राचार्य महोदय, मैं बहुत निर्धन परिवार से हूँ, एक गरीब हूँ लेकिन मैंने आज तक कभी चोरी नहीं की.. मैं चोर नहीं हूँ।

🔴 प्राचार्य ने उस लड़के की बात सुनी और उसे जाने के लिए कहा।

🔵 लेकिन सारे बच्चों ने, प्राचार्य से निवेदन किया कि इस लड़के के पास इतने पैसे कहाँ से आते हैं इसका पता लगाने के लिए कृपया जाँच की जाये।

🔴 प्राचार्य ने जब जाँच की तो उन्हें पता चला कि वह स्कूल के खाली समय में एक माली के यहाँ सिंचाई का काम करता है और उसी से वह कुछ पैसे कमा लेता है जो उसकी फीस भरने के काम आ जाते हैं।

🔵 अगले ही दिन प्राचार्य ने उस लड़के को और अन्य सभी बच्चों को अपने कक्ष में बुलाया और उस लड़के की तरफ देखकर उन्होंने उससे प्यार से पुछा – “बेटा! तुम इतने निर्धन हो, अपने स्कूल की फीस माफ क्यों नहीं करा लेते?”

🔴 उस निर्धन बालक ने स्वाभिमान से उत्तर दिया – “श्रीमान, जब मैं अपनी मेहनत से स्वयं को सहायता पहुँचा सकता हूँ, तो मैं अपनी गिनती असमर्थों में क्यों कराऊँ? कर्म से बढ़कर और कोई पूजा नहीं होती, ये मैंने आपसे ही सीखा है!

🔵 छात्र की बात से प्राचार्य महोदय का सिर गर्व से ऊँचा हो गया, और बाकि बच्चे जो उस लड़के को गलत साबित करने में लगे थे उनको भी बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने उससे मांगी।

🔴 मेहनत करके अपने दम पर कमाने में विश्वास रखने वाला वह निर्धन बालक था – सदानंद चट्टोपाध्याय..

🔵 बड़ा होने पर ठीक बीस वर्षों बाद इन्हें बंगाल के शिक्षा संगठन के डायरेक्टर का पद सौंपा गया था। उन्होंने एक बहुत अच्छी बात हम सबको सिखाई कि “मेहनती और सच्चे ईमानदार व्यक्ति हमेशा ही सफलता के ऊँचे शिखर पर चढ़ जाते हैं, और एक दिन अपने कठिन परिश्रम के बदौलत संसार भर में अपने नाम की छाप छोड़ जाते हैं”।

🔴 मित्रों, वास्तव में कर्म से बढ़कर कोई पूजा नहीं होती। मेहनत और ईमानदारी से कर्म करते हुए हम तमाम मुसीबतो, विपत्तियों और  बाधाओं से निकलकर, संघर्ष करते हुए ही हम सफलता को प्राप्त करेंगे और आकाश की बुलंदियों को छुएंगे।

सोमवार, 4 सितंबर 2017

👉 तप-तेज के नाश का कारण

🔵 सतयुग के आदि में जंभ नामक एक बड़ा प्रबल दैत्य था। उसने प्रचण्ड तप करके ऐसी शक्ति प्राप्त की थी जिसके बल से उसने सभी देवताओं को परास्त किया।

🔴 एक दिन बालखिल्य ऋषियों के आश्रम में लक्ष्मी जी बैठी हुई थीं। संयोगवश जंभ दैत्य भी उधर से आ निकला। वह लक्ष्मी की सुन्दरता पर मुग्ध हो गया और उन्हें जबरदस्ती अपने रथ में बिठाकर हरण कर ले चला।

🔵 देव गुरु बृहस्पति यह सब देख रहे थे। उनने देवताओं से कहा-बस अब प्रयोजन सिद्ध हो गया। अब इस पर आक्रमण करो, यह अवश्य मारा जायेगा। देवताओं ने पूछा-इसका क्या कारण है? देव गुरू ने कहा- पर नारी की ओर कुदृष्टि से देखने के कारण अब इसका पूर्व संचित तप नष्ट हो गया। अब इसे हरा देना कुछ कठिन नहीं है। देवताओं ने उस पर आक्रमण किया और प्रतापी जंभ दैत्य को आसानी से मार गिराया।

🔴 पर नारी के प्रति कुदृष्टी रखने वाले का तप –तेज नष्ट हो जाता है

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 59)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 इन दिनों नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र में अवांछनीय तत्त्वों का इतना अधिक बाहुल्य हो गया है कि शांति और सुव्यवस्था के लिए एक प्रकार से संकट ही उत्पन्न हो गया है। छल, असत्य, बनावट और विश्वासघात का ऐसा प्रचलन हो गया है कि किसी व्यक्ति पर सहज ही विश्वास करना खतरे से खाली नहीं रहा। विचारों की दृष्टि से मनुष्य बहुत ही संकीर्ण, स्वार्थी, ओछा और कमीना होता चला जा रहा है। पेट और प्रजनन के अतिरिक्त कोई लक्ष्य नहीं, आदर्शवादिता और उत्कृष्टता अब कहने-सुनने भर की बात रह गई है। व्यवहार में कोई बिरला ही उसे काम में लाता हो। सामाजिक कुरीतियों का तो कहना ही क्या? विवाहोन्माद, मृत्यु-भोज ऊँच-नीच नारी तिरस्कार, बाल-विवाह वृद्ध-विवाह आदि न जाने कितनी प्रकार की कुरीतियाँ अपने समाज में घुसी बैठी हैं। यदि उन्हें ज्यों का त्यों ही बना रहने दिया गया, तो हम संसार के सभ्य देशों में पिछड़े हुए और उपहासास्पद ही न माने जाएँगे, वरन् अपनी दुर्बलताओं के शिकार होकर अपना अस्तित्व ही खो बैठेंगे।

🔵 अगले दिनों इस बात की आवश्यकता पड़ेगी कि व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरंभ किया जाए। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरंभ किए गए धर्म-युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगों को योद्धा कहा जाता था, अब मापदण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुद्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके, उसे उतना ही बड़ा बहादुर माना जाएगा। उस बहादुरी के ऊपर शोषण-विहीन समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। दुर्बुद्धि और कुत्सा से लड़ सकने में जो लोग समर्थ होंगे, उन्हीं का पुरुषार्थ पीड़ित मानवता को त्राण दे सकने का यश संचित कर सकेगा।
 
🔴 भारतीय समाज को बेईमान और गरीब बनने के लिए विवश करने वाले सत्यानाशी विवाहोन्माद नामक असुर से पूरी शक्ति के साथ जूझना पड़ेगा। अभी प्रचार, विरोध, प्रतिज्ञापत्र आदि के हल्के कदम उठाए गए हैं, आगे चलकर असहयोग, सत्याग्रह और घिराव जैसे बड़े कदम उठाकर इस कुप्रथा को गर्हित और वर्जित बनने के लिए घृणित और दुष्ट समझे जाने के लिए विवश करेंगे। अगले दिनों ऐसा प्रबल लोकमत तैयार करेंगे, जिसमें विवाहों के नाम पर प्रचलित उद्धतपन को जीवित रह सकना असंभव हो जाए। पूर्ण सादगी और स्वल्प खर्च के विवाहों का प्रचलन होने तक अपना संघर्ष चलता रहेगा। हम तब तक न चैन लेंगे और न लेने देंगे, जब तक कि इस अनैतिक एवं अवांछनीय प्रथा का देश से काला मुँह न हो जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.82

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.15

👉 Be like a Swan. (Part 3)

🔵 I was requesting you the same. If you have acknowledged the importance of GAYATRI, start becoming its carrier. Her carrier has only two specifications; one is that it can separate water from milk. Whatever is available in this world is messed. All is mixed. If somewhere is seen an element of truth then soon starts being seen a deep touch of falseness and dishonesty associated with that truth. How then will you separate these two? It is possible only through your discriminative capacity that you separate it. It is said about RAJHANS that ‘YA HANSA MOTI CHUNAI YA LANGHAN MAR JAYE’. It is desirable to die of hunger in place of eating anything you find, for survival. 
 
🔴 If you cannot earn honestly and live a proper life, then what is the use of that life? Do not live. By ‘do not live’ I mean to suggest that you must live hand to mouth, you may live with difficulties also. Majority of persons are compelled to live in poverty. Someone dies of a disease. Someone is lodged in jail. Someone faces premature death of his/her children/wife/ husband/relative. Someone faces another kind of trouble. Majority of people are there in this world who face some or the other kind of trouble. What is the harm if you face troubles of living a true & honest yet in poverty? A pill of dishonesty with coating of honesty—very this way, we can see public around behaving. Very this is called the world. You kindly disassociate yourself with it to try to proceed to become a SWAN. Finished, today’s session.

====== OM SHANTI======

🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 हमारे गुरुदेव

🔵 एक दिन हम लोग उनके पास बैठे थे, तो वे बोले, ‘‘मैं शरीर छोड़ने पर कुछ ऐसा करूँगा जैसे कोई कुर्ता उतारता है, पर फिर मैं तीन स्थानों पर रहूँगा एक माताजी के पास, दूसरा सजल-श्रद्धा प्रखर-प्रज्ञा तीसरा #अखंड_दीपक।’’ हमारे साथ #अमेरिका के एक परिजन भी बैठे थे। उन्होंने कहा, ‘‘गुरुजी, ये तीनों स्थान तो #शान्तिकुञ्ज में हैं और हम लोग तो बहुत दूर हैं।’’ इस पर गुरुजी बोले, ‘‘बेटा! मेरा चौथा स्थान उगता हुआ #सूर्य होगा।’’

🔴 जब #गुरुजी ने शरीर छोड़ने का मन बना लिया था, तो उसकी तैयारी वे बहुत पहले से ही करने लगे थे। उन्होंने संकेत देना प्रारंभ कर दिया था। जहाँ आज सजल-श्रद्धा प्रखर-प्रज्ञा है, वहाँ पहले गुलाब की क्यारियाँ थीं। गुरुजी ने एक दिन सोनी जी, महेंद्र जी, कपिल जी, उपाध्याय जी आदि सभी को बुलाया। माताजी भी बैठी थीं और गुरुजी कहने लगे, ‘‘माताजी, हमने अपने लिये स्थान पसंद कर लिया है। वह जो गुलाब की क्यारियाँ हैं, वह हमें बहुत पसंद आईं। हमने सोचा है, वही स्थान हमारे लिये ठीक है।’’

🔵 माताजी ने कहा, ‘‘आप क्या कह रहे हैं?’’ तो गुरुजी बोले, ‘‘शरीर तो हम छोड़ेंगे ही। अमर तो हैं नहीं।’’ फिर अन्य लोगों के उदाहरण देने लगे कि फलाने बाबाजी की समाधी वहाँ बन गई, फलाने की वहाँ। और हम लोगों से कहने लगे कि देखो! हमें बाहर मत ले जाना। हमारा मन है कि हम और माताजी यहीं रहेंगे। हमारी समाधी यहीं बनाना। ’’हम सभी उदास हो गये, माताजी भी रोने लगीं। तब गुरुजी बोले, ‘‘भावुक क्यों होती हो, क्या यह सच नहीं है?’’ माताजी बोलीं, ‘‘पर बच्चों के सामने क्यों...?’’ गुरुजी बोले, ‘‘आज नहीं तो कल, हमको जाना तो है ही।’’ फिर उस दिन गोष्ठी आगे नहीं बढ़ी।

🔴 कुछ दिन बाद गुरुजी ने गोष्ठी में कहा कि हमने अपने दोनों के लिये जगह चुन ली है। हम दोनों के लिये दो घोंसले बनाओ। फिर एक दिन बोले, ‘‘ऋषिकेश जाओ, वहाँ जो गुरुद्वारे में दो छतरियाँ बनी हैं, उन्हें देखकर आओ और हमारे लिये वैसी ही बना दो। एक का नाम होगा, सजल-श्रद्धा और दूसरी का प्रखर-प्रज्ञा इसी दौरान जयपुर से वीरेन्द्र अग्रवाल जी आये, उनके सामने भी चर्चा हुई, तो उन्होंने कहा, ‘‘गुरुजी, संगमरमर की छतरी बना दें?’’ गुरुजी बोले, ‘‘ठीक है, संगमरमर की बना दो।’’ इस प्रकार गुरुजी ने अपने रहते ही सजल-श्रद्धा और प्रखर-प्रज्ञा का निर्माण करवा दिया था।

🔵 संगमरमर का चबूतरा बना, सामने का फर्श कच्चा रखा गया और गुरुजी ने घोषणा कर दी कि हमारा संस्कार यहीं होगा, हम कहीं बाहर नहीं जायेंगे। हम प्रखर-प्रज्ञा में रहेंगे और माताजी सजल-श्रद्धा में रहेंगी। हमारी #चेतना यहाँ आगामी #सौ वर्षों तक रहेगी और पूरे #विश्व का यह #शक्ति_केंद्र होगा। यहाँ से हम सबको सजल-श्रद्धा और प्रखर-प्रज्ञा का अंश देते रहेंगे। यहाँ हर कोई हमसे मिल सकेगा, अपनी बात कह सकेगा। हम सबकी उसी प्रकार सेवा करते रहेंगे, जैसे जीवित अवस्था में कर रहे हैं। आज सजल-श्रद्धा प्रखर-प्रज्ञा संपूर्ण #गायत्री#परिवार की श्रद्धा का केन्द्र है और परिजन यहाँ पर गुरुजी-माताजी की चेतना को अनुभव भी करते हैं और उनके दर्शन भी।

🔴 जीवन के अंतिम क्षणों में गुरुजी, माताजी को निर्देश दे गये थे कि उनके शरीर छोड़ने पर भी उनके किसी भी कार्य में कोई व्यवधान नहीं आना चाहिये। उस समय माताजी के उस स्वरूप को देखकर हमें आज भी आश्चर्य होता है, और साथ ही विश्वास भी कि वे साक्षात् पार्वती ही थीं, जिन्हें अपने शिव की अनश्वरता का पूर्ण अहसास था, अन्यथा साधारण माटी की महिला तो ऐसा नहीं कर सकती कि मालूम है, गुरुजी शरीर छोड़ चुके हैं, फिर भी प्रवचन दिया, सबसे मिलीं। जितनी भीड़ आई थी, सबको भोजन करने का निर्देश दिया। सबके भोजन कर चुकने के बाद ही गुरुजी के शरीर छोड़ने के विषय में बताया।

🔵 शाम को गुरुजी के पार्थिव शरीर को अग्नि के सुपुर्द कर दिया गया। उस समय हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, जब माताजी ने नादयोग की घंटी बजाने का निर्देश दिया। हम उनकी ओर देखते रह गये। वे बोलीं, ‘‘गुरुजी का निर्देश है, सब कार्य यथावत् चलेंगे, कोई कार्य रुकेगा नहीं। मैं यहीं हूँ, कहीं नहीं जा रहा, बस स्थूल देह त्यागी है।’’ शाम को माताजी ने सबके लिये खिचड़ी बनाने का निर्देश दिया और कहा, ‘‘कोई भूखा नहीं सोयेगा।’’ अगले दिन सुबह के भी सभी क्रम यथावत् चले, माता जी सबसे मिलीं भी।

🔴 गुरुजी के अंतिम समय के शब्दों को सुनने के लिए हम लोग लालायित थे। बड़ी तड़प थी। सो माताजी से जब अनुनय-विनय किया तो उन्होंने कहा, ‘‘वे बहुत पहले से ही कहने लगे थे कि मैं गायत्री जयंती के दिन यह शरीर छोड़ दूँगा। उस दिन साढ़े चार बजे मैं गुरुजी को प्रणाम करके 6:30 बजे स्टेज पर पहुँच गई। मैंने भाषण भी दिया। चार शादियाँ थीं, बच्चों को आशीर्वाद भी दिया, तिलक किया, माला पहनाई, बच्चों को खाना भी खिलाया। प्रणाम में केवल पाँच व्यक्तियों को मैंने फूल दिये और आगे मैं फूल न दे सकी। कारण, मेरा शरीर प्रणाम करा रहा था, पर मुझे मालूम था कि गुरुजी ने अपने शरीर से विदाई ले ली है। चलते समय गुरुजी ने हाथ पकड़कर अंतिम बार मुझे बस इतना ही कहा था कि मैं गायत्री परिवार के बच्चों की जिम्मेदारी तुम पर और केवल तुम पर छोड़े जा रहा हूँ। मैंने भी वायदा निभाने की सौगंध खाई।’’

🔵 गुरुजी का लिखा यह गीत, जिसे माताजी ने हम सबके लिए गाया है-

तुम न घबराओ, न आँसू ही बहाओ अब,
और कोई हो न हो, पर मैं तुम्हारा हूँ।
मैं तुम्हारे घाव धो, मरहम लगाऊँगा,
मैं खुशी के गीत गा-गाकर सुनाऊँगा।
यह उनके न केवल भाव थे, बल्कि उनका जीवन था, जो हमने देखा।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 Sep 2017

🔵 मन की चंचलता से बड़ी कठिनाई यह होती है कि विकास नहीं हो पाता। विकास का नियम है-निरन्तर मन से एक ही दशा में काम लेना, पुनःपुनः अभ्यास करना। चंचल व्यक्ति दस पन्द्रह मिनट भी चित्त को एक स्थान पर एकाग्र नहीं कर पाता। विद्यार्थी, सिनेमा प्रिय, शौकीन, कवि, व्यापारी, यात्री, क्लर्क इत्यादि चंचलता के कारण सदैव यही शिकायत करते हैं कि अमुक पुस्तक या विषय समझ में नहीं आता, आध्यात्म कठिन विषय है इत्यादि। बालक सर्वदा अति चंचल रहते हैं। उनका मनोबल तथा एकाग्रता की शक्तियाँ अति अविकसित रहती है।

🔴 टिड्डी वृत्ति वाला व्यक्ति कभी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता, क्योंकि वह एक सुनिश्चित, सुकल्पित उद्देश्य पर तीव्रता से नहीं चल पाता। मध्य में आने वाले प्रलोभन, आलस्य, प्रमोद, अशान्ति इत्यादि उसे एकनिष्ठ नहीं रहने देते। उसकी इच्छाएं, वासनाएं और स्मृतियाँ निरन्तर कमजोर होती जाती हैं। मनुष्य के चित्त को विचलित करने वाले दुर्व्यसनों में फँसने वाले अनगिनत मानसिक विकार और भाव हैं। बड़े-बड़े विद्वान मनोवेग और निकृष्ट विकारों से उत्तेजित हो कर बड़े-बड़े अनर्थ कर डालते है, वर्षों का किया कराया क्षण भर में नष्ट कर देते हैं। तनिक से आलस्य या प्रमाद से इतनी भारी गलती हो जाती है कि आयु पर्यन्त वह ठीक नहीं हो पाती विकारमय स्वार्थी विचारों मुक्ति।

🔴 आपका मन दो प्रकार के विचारों में भटकता है। प्रथम तो बाह्य विषयों में दिलचस्पी लेता है। विषय नाना प्रकार के हैं। इनका सम्बन्ध हमारी पाँच इन्द्रियों से है। कामेच्छा, क्षुधा, पिपासा, सुन्दर वस्त्र, गृह सामाजिक प्रतिष्ठा, मान, सौंदर्य, शृंगार, यौवन इत्यादि में मन भटकता है। वह इनका गुलाम बनता है और उद्वेगों का शिकार बनता है।
दूसरे पदार्थ आन्तरिक हैं। आप शान्ति चाहते हैं। मन के अन्दर ईर्ष्या, द्वेष, भय, स्वार्थ, क्रोध, लोभ, इत्यादि वृत्तियाँ सदैव संघर्ष मचाती हैं। वृत्तियाँ चंचल रहती है। आप दिन प्रतिदिन तुच्छ प्रसंग, पुरानी कटु स्मृतियों के कूड़े करकट में फँसे रहते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 4 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Sep 2017


👉 क्रोध पर नियंत्रण

🔴 एक बार एक राजा घने जंगल में भटक जाता है जहाँ उसको बहुत ही प्यास लगती है। इधर उधर हर जगह तलाश करने पर भी उसे कहीं पानी नही मिलता, प्यास से उसका गला सुखा जा रहा था तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी जहाँ एक डाली से टप टप करती थोड़ी -थोड़ी पानी की बून्द गिर रही थी।

🔵 वह राजा उस वृक्ष के पास जाकर नीचे पड़े पत्तों का दोना बनाकर उन बूंदों से दोने को भरने लगा जैसे तैसे लगभग बहुत समय लगने पर वह दोना भर गया और राजा प्रसन्न होते हुए जैसे ही उस पानी को पीने के लिए दोने को मुँह के पास ऊचा करता है तब ही वहाँ सामने बैठा हुआ एक तोता टेटे की आवाज करता हुआ आया उस दोने को झपट्टा मार के वापस सामने की और बैठ गया उस दोने का पूरा पानी नीचे गिर गया।

🔴 राजा निराश हुआ कि बड़ी मुश्किल से पानी नसीब हुआ और वो भी इस पक्षी ने गिरा दिया लेकिन अब क्या हो सकता है। ऐसा सोचकर वह वापस उस खाली दोने को भरने लगता है। काफी मशक्कत के बाद वह दोना फिर भर गया और राजा पुनः हर्षचित्त होकर जैसे ही उस पानी को पीने दोने को उठाया तो वही सामने बैठा तोता टे टे करता हुआ आया और दोने को झपट्टा मार के गिरा के वापस सामने बैठ गया ।

🔵 अब राजा हताशा के वशीभूत हो क्रोधित हो उठा कि मुझे जोर से प्यास लगी है, मैं इतनी मेहनत से पानी इकट्ठा कर रहा हूँ और ये दुष्ट पक्षी मेरी सारी मेहनत को आकर गिरा देता है अब मैं इसे नही छोड़ूंगा अब ये जब वापस आएगा तो में इसे खत्म कर दूंगा। इस प्रकार वह राजा अपने हाथ में चाबुक लेकर वापस उस दोने को भरने लगता है।

🔴 काफी समय बाद उस दोने में पानी भर जाता है तब राजा पीने के लिए उस दोने को ऊँचा करता है और वह तोता पुनः टे टे करता हुआ जैसे ही उस दोने को झपट्टा मारने पास आता है वैसे ही राजा उस चाबुक को तोते के ऊपर दे मारता है और उस तोते के वहीं प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।

🔵 तब राजा सोचता है कि इस तोते से तो पीछा छूंट गया लेकिन ऐसे बून्द-बून्द से कब वापस दोना भरूँगा और कब अपनी प्यास बुझा पाउँगा इसलिए जहाँ से ये पानी टपक रहा है वहीं जाकर झट से पानी भर लूँ ऐसा सोचकर वह राजा उस डाली के पास जाता है जहां से पानी टपक रहा था वहाँ जाकर जब राजा देखता है तो उसके पाँवो के नीचे की जमीन खिसक जाती है।

🔴 क्योकि उस डाली पर एक भयानक अजगर सोया हुआ था और उस अजगर के मुँह से लार टपक रही थी राजा जिसको पानी समझ रहा था वह अजगर की जहरीली लार थी।

🔵 राजा के मन में पश्चॉत्ताप का समन्दर उठने लगता है की हे प्रभु ! यह मैंने क्या कर दिया, जो पक्षी बार बार मुझे जहर पीने से बचा रहा था क्रोध के वशीभूत होकर मैने उसे ही मार दिया। काश मैने सन्तों के बताये उत्तम क्षमा मार्ग को धारण किया होता, अपने क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो ये मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नही जाती।

🔴 हे भगवान मैने अज्ञानता में कितना बड़ा पाप कर दिया?? हाय ये मेरे द्वारा क्या हो गया ऐसे घोर पाश्चाताप से प्रेरित हो वह राजा दुखी हो उठता है। मित्रो इसीलिये कहा गया हैं कि क्षमा औऱ दया धारण करने वाला ही सच्चा वीर होता है क्रोध में व्यक्ति दुसरो के साथ-साथ अपने खुद का ही अधिक नुकसान कर देता है।

🔵 क्रोध वो जहर है जिसकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है और अंत पाश्चाताप से होता है। इसलिए हमें हमेशा अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिये।


शनिवार, 2 सितंबर 2017

👉 त्याग और प्रेम

🔵 एक दिन नारद जी भगवान के लोक को जा रहे थे। रास्ते में एक संतानहीन दुखी मनुष्य मिला। उसने कहा- नारद जी मुझे आशीर्वाद दे दो तो मेरे सन्तान हो जाय। नारद जी ने कहा- भगवान के पास जा रहा हूँ। उनकी जैसी इच्छा होगी लौटते हुए बताऊँगा।

🔴 नारद ने भगवान से उस संतानहीन व्यक्ति की बात पूछी तो उनने उत्तर दिया कि उसके पूर्व कर्म ऐसे हैं कि अभी सात जन्म उसके सन्तान और भी नहीं होगी। नारद जी चुप हो गये।

🔵 इतने में एक दूसरे महात्मा उधर से निकले, उस व्यक्ति ने उनसे भी प्रार्थना की। उनने आशीर्वाद दिया और दसवें महीने उसके पुत्र उत्पन्न हो गया।

🔴 एक दो साल बाद जब नारद जी उधर से लौटे तो उनने कहा-भगवान ने कहा है-तुम्हारे अभी सात जन्म संतान होने का योग नहीं है।

🔵 इस पर वह व्यक्ति हँस पड़ा। उसने अपने पुत्र को बुलाकर नारद जी के चरणों में डाला और कहा-एक महात्मा के आशीर्वाद से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है।

🔴 नारद को भगवान पर बड़ा क्रोध आया कि व्यर्थ ही वे झूठ बोले। मुझे आशीर्वाद देने की आज्ञा कर देते तो मेरी प्रशंसा हो जाती सो तो किया नहीं, उलटे मुझे झूठा और उस दूसरे महात्मा से भी तुच्छ सिद्ध कराया। नारद कुपित होते हुए विष्णु लोक में पहुँचे और कटु शब्दों में भगवान की भर्त्सना की।

🔵 भगवान ने नारद को सान्त्वना दी और इसका उत्तर कुछ दिन में देने का वायदा किया। नारद वहीं ठहर गये। एक दिन भगवान ने कहा- नारद लक्ष्मी बीमार हैं- उसकी दवा के लिए किसी भक्त का कलेजा चाहिए। तुम जाकर माँग लाओ। नारद कटोरा लिये जगह-जगह घूमते फिरे पर किसी ने न दिया।

🔴 अन्त में उस महात्मा के पास पहुँचे जिसके आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न हुआ था। उसने भगवान की आवश्यकता सुनते ही तुरन्त अपना कलेजा निकालकर दे किया। नारद ने उसे ले जाकर भगवान के सामने रख दिया।

🔵 भगवान ने उत्तर दिया- नारद ! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। जो भक्त मेरे लिए कलेजा दे सकता है उसके लिए मैं भी अपना विधान बदल सकता हूँ। तुम्हारी अपेक्षा उसे श्रेय देने का भी क्या कारण है सो तुम समझो। जब कलेजे की जरूरत पड़ी तब तुमसे यह न बन पड़ा कि अपना ही कलेजा निकाल कर दे देते। तुम भी तो भक्त थे। तुम दूसरों से माँगते फिरे और उसने बिना आगा पीछे सोचे तुरन्त अपना कलेजा दे दिया।

🔴 त्याग और प्रेम के आधार पर ही मैं अपने भक्तों पर कृपा करता हूँ और उसी अनुपात से उन्हें श्रेय देता हूँ।” नारद चुपचाप सुनते रहे। उनका क्रोध शान्त हो गया और लज्जा से सिर झुका लिया।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961

👉 आज का सद्चिंतन 2 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Sep 2017


👉 संघर्ष से ही हमारी जड़ें मजबूत होती हैं।

🔴 एक बार एक युवक को संघर्ष करते – करते कई वर्ष हो गए लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। वह काफी निराश हो गया, और नकारात्मक विचारो ने उसे घेर लिया। उसने इस कदर उम्मीद खो दी कि उसने आत्महत्या करने का मन बना लिया। वह जंगल में गया और वह आत्महत्या करने ही जा रहा था कि अचानक एक सन्त ने उसे देख लिया।

🔵 सन्त ने उससे कहा – बच्चे क्या बात है , तुम इस घनघोर जंगल में क्या कर रहे हो?

🔴 उस युवक ने जवाब दिया – मैं जीवन में संघर्ष करते -करते थक गया हूँ और मैं आत्महत्या करके अपने बेकार जीवन को नष्ट करने आया हूँ। सन्त ने पूछा तुम कितने दिनों से संघर्ष कर रहे हों?

🔵 युवक ने कहा मुझे दो वर्ष के लगभग हो गए, मुझे ना तो कहीं नौकरी मिली है, और ना ही किसी परीक्षा में सफल हो सकां हूँ।

🔴 सन्त ने कहा– तुम्हे नौकरी भी मिल जाएगी और तुम सफल भी हो जायोगे। निराश न हो , कुछ दिन और प्रयास करो।

🔵 युवक ने कहा– मैं किसी भी काम के योग्य नहीं हूँ, अब मुझसे कुछ नहीं होगा।

🔴 जब सन्त ने देखा कि युवक बिलकुल हिम्मत हार चुका है तो उन्होंने उसे एक कहानी सुनाई।

🔵 “एक बार ईश्वर ने दो पौधे लगाये , एक बांस का, और एक फर्न (पत्तियों वाला) का।

🔴 फर्न वाले पौधे में तो कुछ ही दिनों में पत्तियाँ निकल आई। और फर्न का पौधा एक साल में काफी बढ़ गया पर बाँस के पौधे में साल भर में कुछ नहीं हुआ।

🔵 लेकिन ईश्वर निराश नहीं हुआ।

🔴 दूसरे वर्ष में भी बाँस के पौधे में कुछ नहीं हुआ। लेकिन फर्न का पौधा और बढ़ गया।

🔵 ईश्वर ने फिर भी निराशा नहीं दिखाई।

🔴 तीसरे वर्ष और चौथे वर्ष भी बाँस का पौधा वैसा ही रहा, लेकिन फर्न का पौधा और बड़ा हो गया।

🔵 ईश्वर फिर भी निराश नहीं हुआ।

🔴 फिर कुछ दिनों बाद बाँस के पौधे में अंकुर फूटे और देखते – देखते कुछ ही दिनों में बाँस का पेड़ काफी ऊँचा हो गया।

🔵 बाँस के पेड़ को अपनी जड़ों को मजबूत करने में चार पाँच साल लग गए।

🔴 सन्त ने युवक से कहा – कि यह आपका संघर्ष का समय, अपनी जड़ें मजबूत करने का समय है। आप इस समय को व्यर्थ नहीं समझे एवं निराश न हो। जैसे ही आपकी जड़ें मजबूत ,परिपक्व हो जाएँगी, आपकी सारी समस्याओं का निदान हो जायेगा। आप खूब फलेंगे, फूलेंगे, सफल होंगें और आकाश की ऊँचाइयों को छूएंगें।

🔵 आप स्वंय की तुलना अन्य लोगों से न करें।

🔴 आत्मविश्वास नहीं खोएं। समय आने पर आप बाँस के पेड़ की तरह बहुत ऊँचे हो जाओगे। सफलता की बुलंदियों पर पहुंचोगे।
बात युवक के समझ में आ गई और वह पुन : संघर्ष के पथ पर चल दिया।

🔵 दोस्तों, फर्न के पौधे की जड़ें बहुत कमज़ोर होती हैं जो जरा सी तेज़ हवा से ही जड़ से उखड जाता है। और बाँस के पेड़ की जड़ें इतनी मजबूत होती हैं कि बड़ा सा बड़ा तूफ़ान भी उसे नहीं हिला सकता।

🔴 इसलिए दोस्तों संघर्ष से घबराये नहीं। मेहनत करते रहें और अपनी जड़ों को इतनी मजबूत बना लें कि बड़े से बड़ी मुसीबत, मुश्किल से मुश्किल हालात आपके इरादो को कमजोर ना कर सके और आपको आगे बढ़ने से रोक ना सके।

🔵 किसी से भी अपनी तुलना ना करे , सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास के साथ अपने लक्षय की और बढ़ते रहे। आप जरूर सफल होंगे और आसमान की बुलंदियों को छुयेंगें।


गुरुवार, 31 अगस्त 2017

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (अंतिम भाग)

🔵 यदि सचमुच ही विचारशीलता का युग आ रहा है तो नर और नारी दोनों को ही सीधे सादे सौम्य और लगभग एक जैसे कपड़े पहनने चाहिए। इससे दोनों ही वर्गों में समानता का भाव पैदा होगा। नारी सजधज कर जब गुड़िया बनकर निकलती है, अपनी शील अंगों को रंगों से, आकर्षक वस्त्रों तथा उपकरणों से सजाकर निकलती है तो इसका अर्थ यह होता है कि उसने अपने को रमणी-कामिनी के रूप में प्रस्तुत किया। यह नारी का हेय एवं लगभग अश्लील स्वरूप है। प्रगतिशीलता के इस युग में नारी को लगभग नर जैसी सज्जा पर सन्तोष करना होगा। अश्लीलता के विरुद्ध आवाज बुलन्द करते हुए हमें आकर्षक एवं कामुकता भड़काने वाले वस्त्र शृंगार का समापन ही करना चाहिए ताकि नारी के प्रति सहज श्रद्धाभाव बढ़े।

🔴 इरेशम नाइलोन की ऐसी साड़ियां या वस्त्र जिनमें नग्नता ढकने के लिए नीचे दुहरा वस्त्र पहनना पड़े, शालीनता के विपरीत है। वर्षा होने लगे और कपड़े भीग जायें अथवा नदी तालाब आदि में खुला स्नान करना पड़े तो ऐसे वस्त्र लज्जा जनक स्थिति पैदा कर देते हैं, सारा शरीर नंगा दिखने लगता है। कई बार तो वर्षा न होने पर भी महीन वस्त्र पहनने वाले की बेइज्जती करते हैं। वक्षस्थल और कमर भी ऐसे स्थान हैं जिन्हें शील परम्परा के अनुसार ढका रहना चाहिए। जिन वस्त्रों के पहनते ही कटि प्रदेश खुला दीखे उन्हें अश्लीलता की श्रेणी में गिना जा सकता है। वक्षस्थल और उभार ढके रहने के लिए चुनरी ओढ़ने का रिवाज रहा है अब उसके स्थान पर कृत्रिम उभार प्रदर्शित करने वाले झीनी चुनरी पहनना ऐसा है जिन पर दर्शकों की अनायास दृष्टि जाती है और उन अंगों को गोपनीय रखने की परम्परा का उल्लंघन होता है।

🔵 आभूषणों में सभी ऐसे हैं जिन्हें नारी को गुड़िया बनाने की लज्जित स्थिति में ले जाने वाला कहा जा सकता है। विशेषतया नाक कान के बड़े आकार के आभूषण चेहरे को घूर-घूर कर देखने का निमंत्रण देते हैं। होठों का रंगना भी ऐसा ही निमंत्रण है जो मनचले दर्शकों को कामुक दृष्टि से देखने का निमंत्रण देते हैं।

🔵 सादगी सबसे बड़ी शोभा है। विशेषतया जबकि कामुकता की धूम है, लोगों की कुदृष्टि बढ़ रही है। ऐसी सज्जा वाली महिलाओं के सम्बन्ध में अनुपयुक्त मान्यता बनाई जाती है और छेड़खानी की जाती है। शालीनता की माँग यही है कि सादे वस्त्र पहने जाएँ। इसके पहनने वाले का पैसा बचता है। आदर्शवादी पहनाव को देखकर यह अनुमान लगता है कि यहाँ ऐसा मानस तथा निर्धारण है जिसे सौम्य कहा जाय। नर और नारी एक समान का सिद्धान्त जब भी जहाँ भी प्रकट करना होगा तो सजावट वाले कपड़ों और आभूषणों का मोह छोड़ना ही होगा। सौम्य शालीनता एवं आदर्शवादिता के विस्तार के अतिरिक्त यौन संपर्क सम्बन्धी भ्रान्ति निवारण हेतु भी यह अनिवार्य है कि परिधान-मुद्रादि की पवित्रता पर अधिक ध्यान दिया जाए। यह प्रयोजन अनावश्यक प्रतिबन्धों से सम्भव नहीं। इसके लिए तो नर एवं नारी दोनों को स्वेच्छा से सद्भाव की महत्ता समझनी होगी, ताकि वे सौजन्य से साथ रह जीवन शकट चलाते रह सकें एवं प्रगति की दिशा में एक दूसरे के पूरक बन सकें।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 46

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/October/v1.46

👉 आज का सद्चिंतन 31 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Aug 2017


👉 दूसरे का अहित


🔵 एक मुर्गा और एक कुत्ता एक दूसरे के बहुत अच्छे मित्र थे। एक दिन वे दोनों किसी जंगल से होकर यात्रा कर रहे थे। चलते-चलते अंधेरा छाने लगा। एक बड़ा सा पेड़ देखकर दोनों मित्रों ने आराम से रात काटने की सोची।

🔴 मुर्गे ने कहा- ”भाई कुत्ते! अब मुनासिब सी जगह देखकर आराम करें। ऐसा करते हैं, मैं इस पेड़ पर चढ़कर किसी डाल पर जम जाता हूं। तुम आस-पास ही कहीं मुनासिब जगह देखकर आराम करो।“

🔵 ”ठीक है भाई! तुम पहुंचो अपने ठिकाने पर, मैं तो यहीं कहीं डेरा जमा लेता हूं।“

🔴 मुर्गे ने अपने पंख फड़फड़ाए और पेड़ की एक ऊंची डाल पर जा बैठा और कुत्ता पेड़ के नीचे आराम करने लगा।

🔵 दोनों मित्र रात भर खर्राटे भर कर सोते रहे। जब भोर हो गई तो मुर्गे ने उठकर बांग दी।

🔴 एक लोमड़ी वहीं आस-पास कहीं रहती थी। मुर्गे की बांग की आवाज सुनकर उसकी नींद भी खुल गई। कुछ ही देर बाद लोमड़ी उस ओर चली गई। उसने अपनी नजरें घुमाकर चारों तरफ देखा। तभी उसे पेड़ पर बैठा मुर्गा दिखाई दिया। मुर्गे को देखकर उसके मुंह में पानी भर आया।

🔵 मुर्गा उसकी पहुंच से बाहर था, इसलिए वह बहुत होशियारी से पेड़ के चारों और चक्कर काटने लगी। वह सोच रही थी कि अपने शिकार को पाने के लिए वह कौन सा उपाय करे।

🔴 उसने मुर्गे से कहा- ”मित्र, मैंने भोर में तुम्हारी मीठी बांग सुनी। मैं तुम्हारी मधुर वाणी से इतनी प्रभावित हूं कि मेरे जी चाहता है कि तुम्हारी पीठ ठोकूं।“

🔵 ”क्यों नही!“ मुर्गे ने चालाकी से काम लेते हुए कहा- ”नीचे जो चौकीदारी सो रहा है, उसे जगा कर कहो सीढ़ी लगाए ताकि मैं नीचे आ सकूं।“

🔴 लोमड़ी ने मुर्गे को खाने की जल्दी में पेड़ के नीचे लेटे कुत्ते का जगा दिया। कुत्ते ने अपने सामने एक लोमड़ी को देखा तो उस पर झपट पड़ा और उसे मार डाला।

🔵 निष्कर्ष- दूसरे को अहित करने वाले का पहले अहित होता है।

बुधवार, 30 अगस्त 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 30 Aug 2017


👉 अतृप्ति

🔵 अतृप्ति की पीड़ा से परेशान एक मनुष्य एक फकीर के पास गया और उसने उससे पूछा कि मेरी यह अतृप्ति कैेेसे मिट सकती है? मैं तृप्ति का अनुभव कैेेसे कर सकता हूँ? उस फकीर ने कहा- अरे ! इसमें क्या? तुम चलो मेरे साथ। मैं कुएँ पर जा रहा हूँ पानी भरने, लगे हाथ तुम्हें अपने सवाल का जवाब भी मिल जाएगा, कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। तुम देख कर ही समझ जाओगे।

🔴 अचरज तो उसे तब भारी हुआ जब फकीर ने एक बाल्टी कुएं में डाली जिसमें पेन्दी थी ही नहीं। फकीर ने खूब बाल्टी को डुबोया कुएं के भीतर, खूब अावाज अाइ, बाल्टी पानी में डूबी भी। उस बाल्टी को डूबने में देर भी न लगी क्योंकि उसमें पेन्दा तो था ही नहीं, जितनी बार भी उसे खीचा,, बाल्टी खाली ही ऊपर अाई। एक बार, दो बार, दस बार यह खेल चलता रहा। अन्त में उस व्यक्ति से रहा न गया। वह बोल पड़ा- तुम यह क्या कर रहे हो? यह तो कभी भी नहीं भरेगी।

🔵 फकीर हंस पड़ा और कहने लगा- यह बाल्टी मैं तुम्हारे लिए कुएं में डाल रहा हूँ। यह वासना भी बाल्टी है, कभी भी नहीं भरेगी। अाज तक किसी की नहीं भरी है। वासना से तृप्ति पाने के फेर में विषाद ही होता है। तुमने जितनी बार वासनाओं से तृप्त होने की कोशिश की, अतृप्ति ही मिली। कितनी बार लगा कि खूब बाल्टी भरी है कुएं के भीतर लेकिन जब तक हाथ में अाई, खाली हो गई। बार बार एेसा हुआ फिर भी तुम जागे नहीं,, फिर भी तुम चौंके नहीं। चलो अाज तुम चौंके तो सही। तुम्हें होश तो अाया कि वासनाओं की अतृप्ति कभी मिटती ही नहीं। तृप्ति तो सम्वेदनाओं की डगर पर चलने औेर सेवा करने पर मिलती है। जो इस पर चल सका उसे तृप्ति, तुष्टि औेर शान्ति तीनों अनायास ही मिल जाती है।

🍣 अखन्ड ज्योति नवम्बर 2006 पेज-3

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (भाग 3)

🔵 प्रसंग यहाँ नारी मात्र की सुरुचिपूर्ण सज्जा का है। कुछ समय से प्रचलन ऐसा चला है जिसमें हम अपने घरों की नारियों को ऐसे वस्त्रों से सजाते हैं जो आम पहनावे में नहीं आते। जो स्वाभाविक नहीं हैं। जो अपनी विचित्रता के कारण दर्शकों की आंखें अपनी ओर खींचती हैं। नवयौवन की आयु में तो ऐसी वेष-भूषा विशेष रूप से आँखें अपनी ओर खींचती हैं और वह खिंचाव उत्तेजक होता है। इस आकर्षण को मात्र उनके पति ही देखें ऐसा अनुबन्ध नहीं है। रास्ता चलते लोग भी देखते हैं और उस प्रदर्शन में कामुक-ललचायेपन का आकर्षण भी होता है। यह विशुद्धतः अश्लीलता हुई। नग्न अथवा अर्द्धनग्न चित्रों को इसलिए अश्लील कहा गया है कि इससे कामुकता की दृष्टि उत्पन्न होती है। इस कसौटी पर ऐसे वस्त्र, शृंगार, उपकरण भी आते हैं जिससे किसी नारी के सम्बन्ध में कुत्सित कल्पना उठती हो।

🔴 इन दिनों फैशन के नाम पर ऐसे वस्त्र, उपकरण एवं शृंगार साधनों का प्रचलन चल पड़ा है जो हमारे घरों की बहू-बेटियों का ऐसा स्वरूप सर्वसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत करता है जिसे अर्ध अश्लील कहा जा सके। इससे घटिया दृष्टिकोण वाले पुरुषों की कामुक दृष्टि उभरती है और वे कभी-कभी उस उत्तेजना में ऐसे प्रदर्शन या व्यवहार करने लगते हैं जिन्हें अवाँछनीय कहा जाय। इसमें पूरा दोष लफंगे पुरुषों का नहीं उन महिलाओं का या उनके घर वालों का भी है जो अपने घरों की बहू-बेटियों को गुड़िया की तरह सजाकर निकालते हैं। उत्तेजक वेश-भूषा पहनाने में अपना बड़प्पन मानते हैं।

🔵 इन दिनों प्रगतिशीलता का समय बताया जाता है। नर और नारी की समानता का नारा लगाया जाता है। यदि यह सही है तो महिलाओं को वैसे ही सादे वस्त्र पहनने और उपकरण सजाने चाहिए जैसे कि पुरुष पहनते हैं। लफंगों या छिछोरों की बदमाशी का विरोध करने के लिए अन्यान्य उपायों में एक यह भी अपनाया जाना चाहिए कि सयानी बहू-बेटियों के वस्त्र सादगी वाले हों। नर और नारी की समानता का नारा यदि सच्चे मन से लगाया गया है तो पुरुषों के नाक, कान छेदकर उनमें आभूषण पहनाये जायें। अथवा नारियों को भी उनसे मुक्त किया जाए।

🌹 क्रमश जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 46

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Aug 2017

🔵 धर्म की आवश्यकता मनुष्य जीवन की शुद्धता के लिये है। अशुद्ध आचरण मनुष्य तब करता है जब वह अपने आप को मनुष्य की दृष्टि से देखता है। पर वस्तुतः मनुष्य का यथार्थ रूप उसकी सूक्ष्मतम आत्म-सत्ता है। अतः उसके जीवन के विविध अंगों का निर्माण भी इसी दृष्टि से होना चाहिये। धर्म यह बताता है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को न भूलें उसे प्राप्त करें और जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये हमारा जन्म हुआ है उसे सदैव अपने सामने बनाये रहें। यह दार्शनिक विशेषता किसी अन्य संस्कृति में नहीं है। लोग यह भूल जाते हैं कि वे मनुष्य से भी कुछ अधिक हैं इसी से वे लक्ष्य से भटकते हैं। शुद्ध रूप में भारतीय संस्कृति में यह भूल कहीं भी नहीं है।

🔴 आन्तरिक जीवन में सत्य, प्रेम, न्याय, तप, त्याग, सहिष्णुता, आत्मीयता, क्रियाशीलता, शक्ति, सामर्थ्य, विवेक और विज्ञान ओत-प्रोत रहता है जिसके कारण अज्ञान, अशक्ति और अभाव से उत्पन्न होने वाले दुःखों का अन्त हो जाता है और यहाँ के जीवन में सुख, संतोष, शाँति, उल्लास, सरसता और आनन्द छाया रहता है।

🔴 मनुष्यों के स्वभाव को मलिन करने वाले राग, ईर्ष्या, अत्याचार, चिकीर्षा, द्वेष और असूया ये छः प्रबल बुराइयाँ शास्त्रों में बताई गई हैं, इनको शुद्ध किये बिना आन्तरिक सौंदर्य के दर्शन नहीं होते। बाह्य पवित्रता के लिये भी उसी तरह स्नान, शौच, वस्त्र, आहार, आवास आदि की शुद्धता चाहियें। पहली आवश्यकतायें आत्मा के लिये हैं दूसरी शरीर के लिये। आत्मा और शरीर दोनों जब स्वच्छ, पवित्र और रसयुक्त बनते हैं तभी वास्तविक शृंगार के दर्शन होते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 58)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 कोमल और सौम्य तत्त्वों को इशारे में समझाकर विवेक एवं तर्क द्वारा औचित्य सुझाकर सन्मार्गगामी बनाया जा सकता है, पर कठोर और दुष्ट तत्त्वों को बदलने के लिए, लोहे को आग में तपाकर पिटाई करने वाली लुहार की नीति ही अपनानी पड़ती है। दुर्योधन को समझाने-बुझाने में जब श्रीकृष्ण सफल न हो सके, तब उसे अर्जुन के बाणों द्वारा सीधे रास्ते पर लाने का प्रबंध करना पड़ा। हिंसक पशु नम्रता और औचित्य की भाषा नहीं समझते, उन्हें तो शस्त्र ही काबू में ला सकते हैं। भगवान् को बार-बार धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेना पड़ता है, साथ ही वे असुरता के उन्मूलन का रुद्र कृत्य भी करते हैं।

🔵 व्यक्तिगत जीवन में देव शक्ति का अवतरण निस्संदेह एक सृजनात्मक कृत्य है। उसके लिए सद्गुणों के अभिवर्द्धन की साधना निरंतर करनी पड़ती है, पर साथ ही अंतरंग में छिपे हुए दोष-दुर्गुणों से जूझना भी पड़ता है। यदि कुसंस्कारों का उन्मूलन न किया जाए, तो सद्गुण पनप ही न सकेंगे और सारी शक्ति इन कषाय-कल्मषों में ही नष्ट होती रहेगी। आलस्य, प्रमाद, आवेश, असंयम आदि दुर्गुणों के विरुद्ध कड़ा मोर्चा खड़ा करना पड़ता है और पग-पग पर उनसे जूझने के लिए तत्पर रहना पड़ता है। गीता का रहस्यवाद अंतरंग के इन्हीं शत्रुओं को कौरव मानकर अर्जुन रूपी जीव को इनसे लड़ मरने के लिए प्रोत्साहित करता है। जिसने अपने से लड़कर विजय पाई, वस्तुतः उसे ही सच्चा विजेता कहा जाएगा।
 
🔴 सामूहिक जीवन में समय-समय पर अनेक अनाचार उत्पन्न होते रहते हैं और उन्हें रोकने के लिए सरकारी तथा गैर सरकारी स्तर पर प्रबल प्रयत्न करने पड़ते हैं। पुलिस, जेल, अदालत, कानून, सेना आदि के माध्यम से सरकारी दंड संहिता अनाचार को रोकने का यथासंभव प्रयत्न करती है। जन स्तर पर भी अवांछनीय और असामाजिक तत्त्वों का प्रतिरोध अवश्य होता है। यदि वह रोकथाम न हो, उद्दंडता और दुष्टता का प्रतिरोध न किया जाए तो वह देखते-देखते आकाश-पाताल तक चढ़ दौड़े और अपने सर्वभक्षी मुख में शालीनता और शांति को देखते-देखते निगल जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 7)

🔵 युग परिवर्तन की इस ऐतिहासिक बेला, में ऐसी देवआत्माओं की विशिष्ट आवश्यकता अनुभव की जा रही है जिनमें मौलिक प्रतिभा विद्यमान है। सामान्य स्तर की श्रेष्ठता हर मनुष्य में मौजूद है। उसे सीमित समय में सीमित मात्रा में उभार सकना ही सम्भव हो सकता है। कम समय में, कम परिश्रम से जिन्हें महान उत्तरदायित्वों का वहन कर सकने के लिए उपयुक्त बनाया जा सके ऐसी प्रतिभाएँ सर्वत्र उपलब्धि नहीं हो सकती और न उनसे उतने बड़े पुरुषार्थ की आशा की जा सकती है जैसी कि इस विषम वेला में आवश्यकता पड़ रही है। इसके लिए विशेष रुप से खोज’बीन करने की आवश्यकता पड़ेगी।

🔴 मोती पाये तो समुद्र में ही जाते हैं पर उन्हें निकालने के लिए पनडुब्बी को गहरी डुबकी लगाने की और सुविस्तृत क्षेत्र की खोज बीन करनी होती है। मोती न तो इकट्ठे मिलते और न तो किसी किनारे पर जमा रहते हैं। बहुमूल्य वस्तुएँ सदा से इसी प्रकार खोजी जाती रही हैं। प्रकृति के अन्तराल में बिजली, ईथर आदि तत्व अनादि काल से भरे पड़े थे, पर उनसे लाभान्वित हो सकना तभी सम्भव हुआ जब उन्हें खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने असाधारण श्रम किया। जंगलों में बहुमूल्य जड़ी बूटियाँ पुरातन काल में भी उगती थीं और अब भी उनकी संजीवनी क्षमता यथावत् मौजूद है। पर उन्हें हर कोई, हर जगह नहीं पा सकता चरक ने दुर्गम स्थानों की यात्रा की और उस परिभ्रमण में वनस्पतियों के गुण धर्म खोजे। इस शोध का परिणाम ही चिकित्सा विज्ञान के रुप में सामने आया और उसका लाभ समूची मानव जाति से उठाया। चरक यदि वह प्रयास न करते तो बूटियाँ अपने स्थानों पर बनी रहतीं, और रोगी अपनी जगह। उनका आपस में संबंध ही न बनता तो दोनों ही घाटे में रहते। न जड़ी बूटियाँ यश पातीं और मनुष्यों को रोग निवृत्त का अवसर मिलता।
 
🔵 भूगर्भ में खनिज सम्पदा के अजस्र भंडार अनादि काल से भरे पड़े हैं।पर उनका उत्खलन और दोहन जिस लगन के आधार पर सम्भव हो सका उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती रहेगी। धातुएँ गैंसे, तेल, जैसी अनेकों बहुमूल्य वस्तुएँ भूगर्म की गहरी खोज बीन करने से ही सम्भव हुई। पौराणिक गाथा के अनुसार समुद्र मन्थन से चौदह रत्न निकाले गये और उन से देवताओं तथा मनुष्यों ने सौभाग्यशाली बनने का अवसर पाया। यदि मंथन प्रयास न किया जाता तो समुद्र की सम्पदा उसके गहन अन्तराल में ही धँसी रहती। लाभ उठाना तो दूर उनका किसी को पता तक नहीं चलता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 49
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.49

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 136)

🌹  स्थूल का सूक्ष्म शरीर में परिवर्तन सूक्ष्मीकरण

🔵 युग परिवर्तन की यह एक ऐतिहासिक वेला है। इन बीस वर्षों में हमें जमकर काम करने की ड्यूटी सौंपी गई थी। सन् १९८० से लेकर अब तक के पाँच वर्षों में जो काम हुआ है, पिछले तीस वर्षों की तुलना में कहीं अधिक है। समय की आवश्यकता के अनुरूप तत्परता बरती गई और खपत को ध्यान में रखते हुए तदनुरूप शक्ति अर्जित की गई। यह वर्ष कितनी जागरूकता, तन्मयता, एकाग्रता और पुरुषार्थ की चरम सीमा तक पहुँच कर व्यतीत करने पड़े हैं, उनका उल्लेख उचित न होगा। क्योंकि इस तत्परता का प्रतिफल २४०० प्रज्ञा पीठों और १५००० प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण के अतिरिक्त और कुछ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। एक कड़ी हर दिन एक फोल्डर लिखने की इसमें और जोड़ी जा सकती है, शेष सब कुछ परोक्ष है। परोक्ष का प्रत्यक्ष लेखा-जोखा किस प्रकार सम्भव हो?

🔴 युग संधि की वेला में अभी पंद्रह वर्ष और रह जाते है। इस अवधि में गतिचक्र और भी तेजी से भ्रमण करेगा। एक ओर उसकी गति बढ़ानी होगी, दूसरी ओर रोकनी। विनाश को रोकने और विकास को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ेगी। दोनों ही गतियाँ इन दिनों मंथर हैं। इस हिसाब से सन् २००० तक उस लक्ष्य की उपलब्धि न हो सकेगी जो अभीष्ट है। इसलिए सृष्टि के प्रयास चक्र निश्चित रूप से तीव्र होंगे। उसमें हमारी भी गीध-गिलहरी जैसी भूमिका है। काम कौन, कब-कब, किस प्रकार करें, यह बात आगे की है। प्रश्न जिम्मेदारी का है। युद्ध काल में जो जिम्मेदारी सेनापति की होती है, वही खाना पकाने वाले की भी है। आपत्तिकाल में उपेक्षा कोई नहीं बरत सकता।

🔵 इस अवधि में एक साथ कई मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़नी होगी। समय ऐसे भी आते हैं, जब खेत की फसल काटना, जानवरों को चारा लाना, बीमार लड़के का इलाज कराना, मुकदमें की तारीख पर हाजिर होना, घर आए मेहमान का स्वागत करना जैसे कई काम एक ही आदमी को एक ही समय पर करने होते हैं। युद्ध काल में तो बहुमुखी चिंतन और उत्तरदायित्व और भी अधिक सघन तथा विरल हो जाता है। किस मोर्चे पर कितने सैनिक भेजना हैं, जो लड़ रहे हैं, उनके लिए गोला-बारूद कम न पड़ने देना, रसद का प्रबंध रखना, अस्पताल का दुरुस्त होना, मरे हुए सैनिकों को ठिकाने लगाना, अगले मोर्चे के लिए खाइयाँ खोदना जैसे काम बहुमुखी होते हैं। सभी पर समान ध्यान देना होता है। एक में भी चूक होने पर बात बिगड़ जाती है। करा-धरा चौपट हो जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.153

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.20

👉 Be like a Swan. (Part 2)

🔵 Have you listened about BHAGWAN BUDDH? What peculiarity he had, what did he get from BHAGWAN, which special thing did he get from BHAGWAN? You must read his life. Beneath a tree called BODHI-VRIKSH, where he completed his austerity, he got a very special thing. The name of that thing was-‘Discrimination’, after spending some time beneath that tree in solitude, where he would have performed mental-exercise like CHINTAN, MANAN, DHYAN (Auto-Suggestion), he attained (capacity to discriminate) discriminative thinking leading him to see repercussions of his any action and then he came to know that there was no need to be influenced by the whole world rather he had to influence the whole world and he did that.

🔴 He opined that ‘‘only proper sayings of others must be listened and adopted as most of the ways regarding life and life-style as also values of life defined by people happen to be usually unjustified and improper’’. What then BHAGWAN BUDDH did firstly was to stand out of mob and shut his eyes towards the world, because only then he could see what was going on inside him. Inside him, he saw the real nature/structure of duties and his future leading him to take such decisions that transformed an ordinary prince into AVTAR of BHAGWAN.

🔵 He did not care even a bit about what was going on in that age, rather he emphasized on what was suitable and proper. He told people only what was proper. Violence that time was part of YAGYAs. He said to remove that part. When he was told that there was written about it in ‘VED’, he opined to reject VED. When he was told that VED was written by BHAGWAN, he favored that such BHAGWAN must be dislodged, in whose writings moral values had been ignored.

🔴 So he dared to reject even BHAGWAN. All that means he preferred ‘VIVEK’ (every action must be discriminative one). ‘VIVEK’ also means Reality before and Reality after. An ordinary prince incorporated this specification in his personality to become BUDDHA & decided to do only what the reality was, what the truth was. Very this is also known as-‘ATMGYAN’ (self-knowledge). Very this is also called- ‘BRAMHVIDYA’; Very this is also called-‘PRAGYA’; Very this also called-RITAMBHARA.

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 Mahatma Gandhi and Harishchandra Play

🔴 Mohandas saw the play of the truthful king Harishchandra, and truth sunk deep into his inner self. Many people would have seen it for entertainment and the players also would have performed it so many times but when these teachings seep into the heart then only they guide a person in the right direction. It’s well known how Mohandas took the shelter of truth and became Mahatma Gandhi.

🌹 From Pragya Puran

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

👉 साधना उपासना

🔴 स्वामी विवेकानंद ने अपनी साधना उपासना छोड़ दी और कलकत्ता में फैले प्लेग के प्रकोप से लोगों को बचाने में जुए गए। एक भाई ने पूछा-महाराज आपकी उपासना साधना का क्या हुआ? स्वामीजी ने कहा- भगवान् के पुत्र दुःखी हों और मैं उनका नाम जप रहा होऊँ, क्या तुम इसे ही उपासना समझते हो?

🔵 पैसे की कमी के कारण जब वे रामकृष्ण आश्रम की जमीन बेचने को तैयार हो गए तो एक शिष्य ने पूछा-महाराज आप गुरु स्मारक बेचेंगे क्या? विवेकानंद ने उत्तर दिया-मठ-मंदिरों की स्थापना संसार की भलाई के लिए होती है। यदि उसका उपयोग भले काम में होता है, तो इसमें हानि क्या है?

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Aug 2017

🔵 श्रद्धा, क्षणिक भावुकता या आवेश का नाम नहीं है वरन् यह साधना की कठिनाइयों को झेलने की कसौटी है। आवेशपूर्ण श्रद्धा से जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं होता किन्तु जो लोग दृढ़तापूर्वक साधन की कठिनाइयों को सहन करते रहते हैं उनकी श्रद्धा और भी तेजस्वी बनती है और मन पर तथा इन्द्रियों पर संयम करना आसान हो जाता है।

🔴 भोगवादी व्यक्ति जिस तरह भोग की लालसा में अनुचित-उचित का विचार नहीं करता और उसी में सुख का अनुभव करता है उस तरह सदाचारी व्यक्ति भी अपने चारों ओर प्रसन्नता देखना चाहता है। अपनी प्रसन्नता का निश्चय श्रद्धा द्वारा ही होता है, क्योंकि अपनी यथार्थ शक्ति और सामर्थ्य का बोध श्रद्धा द्वारा ही होता है। भले ही उन अभूतपूर्व परिणामों की तत्काल उपलब्धि न हो किंतु श्रद्धा के साथ जो आशा का अविचल सम्बन्ध है, उससे मनोभूमि की निराशा तथा दुःखों का अन्त हो जाता है। ऊपर से देखने में दूसरे लोग भले ही यह अनुमान करें कि उसका जीवन शुष्क, रसहीन है किंतु उसके अन्तर में जो आनन्द का स्रोत उमड़ता रहता है उसे दूसरा समझ नहीं पाता, पर वह व्यक्ति अपनी आन्तरिक आनन्द की स्थिति से ही अपने चारों ओर प्रसन्नता का अनुभव कर लेता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔴 मनुष्य को परमात्मा ने एक स्वतंत्र बुद्धि वाला चेतन प्राणी बनाया है। उसे हाथ-पाँव काम करने के लिए और विवेक काम के औचित्य-अनौचित्य समझने के लिए दिया है। उसकी इच्छा है कि मनुष्य अधिक से अधिक परिश्रमी, कर्मठ और धैर्यवान बनें, इसीलिए उसके सभी काम निर्विघ्नतापूर्वक नहीं होते चलते। यदि सारे काम बिना बाधा के सहज रूप में होते चलें तो कर्म-कौशल का महत्व ही समाप्त हो जाये। मेरा विश्वास है कि जिस काम को करने में मनुष्य को बाधायें नहीं आतीं, उसे अपनी कार्य-कुशलता का परिचय देने का अवसर नहीं रहता, वह काम मनुष्य के करने योग्य नहीं होता।

🌹 महामना मदनमोहन मालवीय

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 6)

🔵 ऐसे जागरुकों को युग प्रयोजनों के सही रुप में कर सकने की क्षमता एवं कुशलता विकसित करने की आवश्यकता अनुभव की गई। इसके लिए प्रशिक्षण आवश्यकता थी। बिना ट्रेनिंग पाये कोई महत्वपूर्ण कार्य किसी से भी नहीं बन पड़ता। रेल, मोटर आदि वाहन कल कारखाने के संयंत्र यहाँ तक कि टाइप राइटर जैसे छोटे उपकरणों को चलाने के लिए ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। अध्यापक, सैनिक, शिल्पी, कलाकार बिना प्रशिक्षण पाये शक्ति सामर्थ्य होते हुए भी अपना कार्य सफलता पूर्वक नहीं कर सकते। फिर युग सृजन जैसा काम ही हर कोई कैसे कर लेता? युग शिक्षण के लिए आवश्यकता तंत्र खड़ा किया गया है। गायत्री तपोभूमि से युग साहित्य का सृजन हो रहा है और शान्ति कुँज में युगान्तरीय चेतना को क्रियात्मिक करने का समग्र शिक्षण विधिवत् चल रहा है। रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम सन्तोषजनक ढंग से चल रहे हैं और उनका गति चक्र निरन्तर दु्रतगामी बन रहा है।

🔴 इतने पर भी एक आवश्यकता यथावत् बनी हुई है देव आत्माओं में पायी जाने वाली विशिष्टता का अवतरण विशिष्ट समय पर ऐसी ही विशिष्ट आत्माओं का अवतरण होता है। वे जन्म जात रुप से ऐसी धातु से बने होते हैं कि उनका उपयोग विशेष प्रयोजनों के लिए संभव हो सके। अणु शक्ति उत्पन्न करने के लिए यूरेनियम जैसे रासायनिक पदाथों की जरुरत पड़ती है। सोने की अपनी मौलिक विशेषता है। र्स्वणकार उसे आभूषणों में गढ़ तो सकता है पर कृत्रिम सोना अभी तक बनाया नहीं जा सका। यों नकली नग ही जेवरों में प्रयुक्त होते हैं, पर उनका निर्माण भी बहुत होता है फिर भी असली मणि-मणिक अभी भी विशेषता के कारण अपना मूल्य और महत्व यथा स्थान बनाये हुए हैं। महामानवों की ढलाई, गढ़ाई के लिए शान्ति कुँज की फैक्टरी अनवरत तत्परता के साथ लगी हुई है। उसके उत्पादन का स्तर भी बढ़ रहा है और परिमाण भी। इस प्रगति को सन्तोषजनक रहते हुए भी उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता। उस विशिष्टता की मात्रा अभी भी कम ही दृष्टिगोचर हो रही है जिसे देव स्तर की प्रतिभा कहा जाय। जो महामानवों की भूमिका निभा सकने के लिए अभीष्ट सुसंस्कारिता की पूँजी अपने साथ लेकर जन्मी हो।
 
🔵 कृषि कार्य में किसान का पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं है, उपयुक्त भूमि और सही बीज का भी उसकी सफलता में कम योगदान नहीं होता। शिल्पियों की कुशलता कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हों उन्हें भी उपयुक्त उपकरण चाहिए। कच्चा माल सही न हो तो कारखाने में बढ़िया चीज कैसे बनायें ? बालू से कोई कुम्हार टिकाउ बर्तन नहीं बना सकता। चिकित्सकों के उपचार रोगी की जीवनी शक्ति के आधार पर सफल होते हैं। कच्चे लोहे की तलवार से मोर्चा जीतना बलिष्ठ योद्धा के लिए सम्भव नहीं होता। मौलिक विशिष्टता की अपनी आवश्यकता है। खरादा तो उसी को जा सकता है जिसमें अपनी कड़क हो। तेल तिली में से निकलता है, आग ईंधन के सहारे जलती है। तिली का प्रबन्ध न हो तो बालू से तेल निकालने में कोल्हू कैसे सफल हो ? पानी मथने के लिए कितना ही श्रम क्यों न किया जाय मक्खन निकालने में सफलता न मिलेगी। ईंधन के बिना आग की लपटों का दर्शन होने और अभीष्ट गर्मी उत्पन्न करने का प्रयोजन नहीं ही सध सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 49
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.49

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 57)

🌹  परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे

🔴 सीधी- सादी विचारधारा को अपनाकर मनुष्य अपनी सर्वतोमुखी सुख- शांति को सुरक्षित रख सकता था और इस पृथ्वी पर स्वर्ग का आनंद प्राप्त कर सकता था, पर आँधी, टेढ़ी, अनुचित, अनुपयुक्त इच्छा, आकांक्षाएँ वह तो रखता ही है, उसके समीपवर्ती लोग भी चंदन के वृक्ष के समीप रहने वालों की तरह सुवासित होते रहते हैं। अपने मन का, अपने दृष्टिकोण का परिवर्तन भी क्या हमारे लिए कठिन है? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपने को क्यों नहीं सुधारा जा सकेगा? विचारों की पूँजी का अभाव ही सारी मानसिक कठिनाइयों का कारण है। विवेक का अंतःकरण में प्रादुर्भाव होते ही कुविचार कहाँ टिकेंगे और कुविचारों के हटते ही अपना पशु जीवन, देव जीवन में परिवर्तित क्यों न हो जाएगा?

🔵 कुछ मूढ़ताएँ, अंध परम्पराएँ, अनैतिकताएँ, संकीर्णताएँ हमारे सामूहिक जीवन में प्रवेश पा गई हैं। दुर्बल मन से सोचने पर वे बड़ी कठिन, बड़ी दुष्कर, बड़ी गहरी जमी हुई दीखती हैं, पर वस्तुतः वे कागज के बने रावण की तरह डरावनी होते हुए भी भीतर से खोखली हैं। हर विचारशील उनसे घृणा करता है, पर अपने को एकाकी अनुभव करके आस- पास घिरे लोगों की भावुकता को डरकर कुछ कर नहीं पाता। कठिनाई इतनी सी है। कुछ ही थोड़े से विवेकशील लोग यदि संगठित होकर उठ खड़े हों और जमकर विरोध करने लगें, तो इन कुरीतियों को मामूली से संघर्ष के बाद चकनाचूर कर सकते हैं। गोवा की जनता ने जिस प्रकार भारतीय फौजों का स्वागत किया, वैसा ही स्वागत इन कुरीतियों से सताई हुई जनता उनका करेगी, जो इन अंध- परम्पराओं को तोड़- मरोड़ कर रख देने के लिए कटिबद्ध सैनिकों की तरह मार्च करते हुए आगे बढ़ेंगे।
 
🔴 हत्यारा दहेज कागज के रावण की तरह बड़ा वीभत्स, नृशंस एवं डरावना लगता है। हर कोई भीतर ही भीतर उससे घृणा करता है, पर पास जाने से डरता है। कुछ साहसी लोग उसमें पलीता लगाने को दौड़ पड़ें तो उसका जड़ मूल से उन्मूलन होने में देर न लगेगी। दास- प्रथा देव- दासी प्रथा, बहु- विवाह जन्मते ही कन्या- वध भूत- पूजा पशु बलि आदि अनेक सामाजिक कुरीतियाँ किसी समय बड़ी प्रबल लगती थीं, अब देखते ही कुरीतियाँ, अनैतिकताएँ एवं संकीर्णताएँ मजबूती से जड़ जमाए दीखती हैं, विवेकशीलों के संगठित प्रतिरोध के सामने देर तक न ठहर सकेंगी। बालू की दीवार की तरह वे एक ही धक्के में भरभराकर गिर पड़ेंगी। विचारों की क्रांति का एक ही तूफान इस तिनकों के ढेर को उड़ाकर बात की बात में छितरा देगा। जिस नए समाज की रचना आज स्वप्न सी लगती है, विचारशीलता के जाग्रत होते ही यह मूर्तिमान होकर सामने खड़ी दीखेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.79

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 134)

🌹  तपश्चर्या आत्म-शक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य

🔵 रामकृष्ण परमहंस के सामने यही स्थिति आई थी। उन्हें व्यापक काम करने के लिए बुलाया गया। योजना के अनुसार उनने अपनी क्षमता विवेकानन्द को सौंप दी थी तथा उनने कार्यक्षेत्र को सरल और सफल बनाने के लिए आवश्यक ताना-बाना बुन देने का कार्य संभाला। इतना बड़ा काम वे मात्र स्थूल शरीर के सहारे नहीं कर पा रहे थे। सो उनने उसे निःसंकोच छोड़ भी दिया। बैलेंस से अधिक वरदान देने के कारण उन पर ऋण भी चढ़ गया था। उनकी पूर्ति के बिना गाड़ी रुकती। इसलिए स्वेच्छापूर्वक कैंसर का रोग भी ओढ़ लिया। इस प्रकार ऋण मुक्त होकर विवेकानन्द के माध्यम से उस कार्य में जुट गए जिसे करने के लिए उनकी निर्देशक सत्ता ने उन्हें संकेत किया था।

🔴 प्रत्यक्षतः रामकृष्ण तिरोहित हो गए। उनका अभाव खटका, शोक भी बना, पर हुआ वह जो श्रेयस्कर था। दिवंगत होने के उपरांत उनकी सामर्थ्य हजार गुनी अधिक बढ़ गई। इसके सहारे उनने देश एवं विश्व में अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन किया। जीवन काल में वे भक्तजनों को थोड़ा बहुत आशीर्वाद देते रहे और एक विवेकानन्द को अपना संग्रह सौंपने में समर्थ हुए, पर जब उन्हें सूक्ष्म और कारण शरीर से काम करने का अवसर मिल गया, तो उनसे पूरे विश्व में इतना काम किया जा सका जिसका लेखा-जोखा ले सकना, सामान्य स्तर की जाँच पड़ताल से समझ सकना सम्भव नहीं।

🔵 ईसा की जीवनचर्या भी ऐसी ही थी। वे जीवन भर में बहुत दौड़-धूप के उपरांत मात्र १३ शिष्य बना सके। देखा कि स्थूल शरीर की क्षमता से उतना बड़ा काम न हो सकेगा, जितना कि वे चाहते हैं, ऐसी दशा में यही उपयुक्त समझा कि सूक्ष्म शरीर का अवलंबन ले कर संसार भर में ईसाई मिशन फैला दिया जाए। ऐसे परिवर्तनों के समय महापुरुष पिछला हिसाब-किताब साफ करने के लिए कष्ट साध्य मृत्यु का वरण करते हैं। ईसा का क्रूस पर चढ़ना, सुकरात का विष पीना, कृष्ण को तीर लगना, पाण्डवों का हिमालय में गलना, गाँधी का गोली खाना, आद्य शंकराचार्य को भगंदर होना यह बताता है कि अगले महान प्रयोजनों के लिए उन्हें स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करना होता है, वे उपलब्ध शरीर का इस प्रकार अंत करते हैं, जिसे बलिदान स्तर का प्रेरणा प्रदान करने वाला और अपने चलते समय का पवित्रता, प्रखरता प्रदान करने वाला कहा जा सके। हमारे साथ भी यही हुआ है व आगे होना है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.151

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 Dacoit changes after hearing story

🔴 A saint was explaining with intense feelings, the results of taking the shelter of God and consequences of performing bad karma. Among the audience was a decoit who had planned to rob the saint and other prosperous listeners after the lecture was over. But he got shaken from inside when he heard the life transforming stories of Ajamil, Ganika, Tulsidas and Bilva mangal.

🔵 The way the stories were narrated forced him to think over his own deeds and do self-introspection. After the lecture ended, the decoit fell into the feet of the saint and told him all his previous sins and asked how to correct his behavior and follow the right path. Those instructions changed his life. From then he started living a life centered on God, and the hole he had dug up with his sins, he started covering it with selfless social service.

🌹 From Pragya Puran

👉 Be like a Swan. (Part 1)

🔵 Here is given, different kinds of training associated with GAYATRI MATA. We are also engaged in intercession with GAYATRI. But you just forget on whose shoulder, GAYATRI rides and who makes GAYATRI dances to his tunes. You daily concentrate on photo of GAYATRI MATA. Have you seen her conveyance in the photo? The name of her conveyance is swan. GAYATRI MATA rides over swan. You may not get this point. Because a lady equal to the weight of a man, can sit on an animal but not on a bird. You can ride over a horse, donkey, elephant and camel and buffalo, but just tell me how a man will sit on a bird whose weight is also negligible?

🔴 Actually GAYATRI MATA, the supreme power has been metaphorically designed to make it easy for anyone to understand what GAYATRI basically means.  The metaphorically designed photo suggests that swan is the name of that person who knows how to distinguish between justified and unjustified. You too must differentiate between proper and improper. In spite of following blindly people’s path, you must stand by a side to observe what the proper way is, people may commit mistake, will you too? Today is the world of mistakes.  Is it any way that, you go along the water-flow like a straw? Is it any intelligence? You go on flying in the air like a weightless straw, is it any intelligence? You must be a man of gravity. You must take decisions on your life yourself. Your braveness must be your companion in deciding your own way.

🔵 Integrity and BHAGWAN both are such things, which help you can take even big decisions. Usually in the world, undesirable things are being done. People usually treat themselves as bodies and this leads them to go to any extent even committing wrongs to make their bodies happy. People are so senseless that they can see only today’s benefits but not tomorrow’s problems and in so hurry that they cannot wait for good results. What is there in social evils, you just tell me, today’s benefit, tomorrow’s loss? Will you do the same? No, then get out of the way of people’s path and with this, begin thinking in a new style as what is proper and what is not. I will call you a knowledgeable person once you begin to decide on your own what makes up your future and what does not.  You must have studied the chronicle of knowledgeable persons.

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (भाग 2)

🔵 यौनाचार की पृष्ठभूमि उन अंगों के नग्न प्रदर्शन से बनती है। जिन्हें देखने या छूने का अधिकार परस्पर पति-पत्नि को ही है। छूने के साथ ही देखने की भी गणना होती है। यह आधार चित्रों तक चला गया है। निर्वस्त्र चित्र, जिनमें कामुकता भड़काने वाले अवयव दिखते हैं अश्लीलता की परिधि में आते हैं और उनका देखना, दिखाना, बेचना, खरीदना दण्डनीय अपराध माना जाता है। यह इसलिए कि इससे ऐसी कामुकता भड़कती है जो नर-नारी के पवित्र एवं वैध सम्बन्धों का उल्लंघन करने के लिए उत्तेजित करती है। यह उत्तेजन दृश्य साधनों से भी हो सकता है एवं श्रव्य साधनों से भी। इन दिनों दोनों ही समाज में खूब प्रचलित हैं। इनका खुला विरोध तो बहुत कम देखा जाता है, किन्तु मौन रूप में उन्हें सुनते-देखते अपनी कामुकता की वृत्ति को पोषण देते अनेकों देखे जा सकते हैं। पतनोन्मुख प्रवाह स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बढ़ता है और इस झोंके में बहुसंख्य व्यक्ति आ जाते हैं। सच्चे साहसी वे होते हैं जो इनसे अप्रभावित हो इनका खुला विरोध करते हैं। औरों को भी आदर्शों के प्रति सहमत करते व स्वयं आगे बढ़ते देखे जाते हैं।

🔴 सामान्यतया फिल्मी गीतों, शादी-ब्याह में गाये जाने वाले गानों, लोक गीतों में प्रयुक्त शब्दों की अनदेखी कर दी जाती है। इसी प्रकार कैलेंडरों में देवी-देवताओं के चित्रों में भाव-भंगिमाओं, वस्त्र परिधान आदि भी उत्तेजक बनाये जाते हैं। यह भी अनुचित है। यही कारण है कि अश्लीलता की व्यापक परिभाषा में उत्तेजना प्रदान करने वाले दृश्य एवं श्रव्य उपकरणों की भी गणना होती है।

🔵 इस संदर्भ में कई कदम आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसी साज सज्जा अथवा आकृति मुद्रा को क्या कहा जाय जो कामुकता की दृष्टि उत्पन्न करती है। इसका निरूपण करना हो तो किसी ऐसी सज्जा या मुद्रा में करनी चाहिए जो हमारी बहिन या पुत्री की हो। स्वभावतः हम चाहते हैं कि वे सौम्य हों। उनके वस्त्र अथवा अंगशील मर्यादा का पालन करते हों। उन पर अश्लीलता की उँगली न उठती हो। इस मर्यादा के टूटने पर हमारी आँखें नीची हो जाती हैं। जिसने वह चित्र मुद्रा अथवा सज्जा बनाई हो, उस पर क्रोध आता है। ऐसे निर्माण में यदि अपनी बहिन या पुत्री ने सहयोग दिया हो, उत्साह दिखाया हो, आग्रह किया हो तो उस पर भी क्रोध आता है। निकटवर्ती सगे सम्बन्ध होते हुए भी इसे चरित्रहीन कहने की मान्यता पनपती है और इच्छा होती है कि वह दृश्य जल्दी ही आँखों के सामने से हटा दिया जाये।

🌹 क्रमश जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 45
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/October/v1.45

👉 आज का सद्चिंतन 29 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Aug 2017


सोमवार, 28 अगस्त 2017

👉 Heard the Bhagwat four times

🔴 Parikshit Maharaj heard Bhagwat Puran from Shukdeo and attained salvation. A rich man on hearing this, developed great respect for the Bhagwat, and got eager to listen to it from a Brahmin to get liberated.

🔵 He searched and found a profound priest of Bhagwat. He told him his intention of hearing the Bhagwat. The priest told him that this is Kaliyug, all the pious activities in this age is reduced four times, thus he had to listen to it for four times. The reason behind the priest’s proposition was to get enough money out of the deal. He gave the fees to the priest and heard four Bhagwat lectures but it was of no use. The man then met a higher level of saint. He asked him, how Parikshit could get and he didn’t after listening to the Bhagwat.

🔴 The saint told him, that Parikshit Maharaj had known the death to be imminent and was completely detached from the world while hearing and Shukdeo Muni was narrating without the feeling of any kind of greed.

🔵 Whoever has got the knowledge in the form of an advice, free of any kind of self vested interests, that has produced desired results.

🌹 From Pragya Puran

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...