बुधवार, 9 अगस्त 2017

👉 कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। (भाग 2)

🔵 यदि तुम व्यापारी या दुकानदार हो तो यह समझो कि मेरा यह व्यापार धन कमाने के लिये नहीं है श्री भगवान की पूजा करने के लिये है। लोभवृत्ति से जिन जिन के साथ तुम्हारा व्यवहार हो इन्हें लाभ पहुंचाते हुये अपनी आजीविका चलाने मात्र के लिये व्यापार करो। याद रखो- व्यापार में पाप लोभ से ही होता है। लोभ छोड़ दोगे तो किसी प्रकार से भी दूसरे का हक मारने की चेष्टा नहीं होगी।

🔴 वस्तुओं का तोल-नाप या गिनती कभी ज्यादा लेना और कम देना बढ़िया के बदले घटिया देना और घटिया के बदले बढ़िया लेना आढ़ती दलाली वगैरह हमें शर्त से ज्यादा लेना आदि व्यापारिक चोरियाँ लोभ से ही होती हैं। परन्तु केवल लोभ ही नहीं छोड़ना है, दूसरों के हित की भी चेष्टा करनी है। जैसे लोभी मनुष्य अपनी दुकान पर किसी ग्राहक के आने पर उसका बनावटी आदर सत्कार करके उससे ठगने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही तुम्हें कपट छोड़कर ग्राहक को प्रेम के साथ सरल भाषा में सच्ची बात समझा कर उसका हित देखना चाहिए।

🔵 यह समझना चाहिये कि इस ग्राहक के रूप में साक्षात् परमात्मा ही आ गये हैं। इनकी जो कुछ सेवा मुझसे बन पड़े वही थोड़ी है। यों समझ कर व्यापार करोगे तो तुम श्री भगवान के कृपा पात्र बन जाओगे और यह व्यापार ही तुम्हारे लिए भगवन् प्राप्ति का साधन बन जायेगा।

🔴 यदि तुम दलाल हो तो व्यापारियों को झूँठी सच्ची बातें समझाकर अपनी दलाली के लोभ से किसी को ठगाओ मत। दोनों के रूप में ईश्वर के दर्शन कर सत्य और सरल वाणी से दोनों की सेवा करने की चेष्टा करो। याद रखो! अभी नहीं तो आगे चलकर तुम्हारी इस वृत्ति का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा यदि न भी पड़े तो कोई हर्ज नहीं है, तुम्हारी मुक्ति का साधन तो हो ही जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1960 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/January/v1.10

👉 आज का सद्चिंतन 9 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Aug 2017


👉 साधु की संगति:-

🔵 एक चोर को कई दिनों तक चोरी करने का अवसर ही नहीं मिला उसके खाने के लाले पड़ गए मरता क्या न करता मध्य रात्रि गांव के बाहर बनी एक साधु की कुटिया में ही घुस गया।

🔴 वह जानता था कि साधु बड़े त्यागी हैं अपने पास कुछ संचय करते तो नहीं रखते फिर भी खाने पीने को तो कुछ मिल ही जायेगा आज का गुजारा हो जाएगा फिर आगे की सोची जाएगी।

🔵 चोर कुटिया में घुसा ही था कि संयोगवश साधु बाबा लघुशंका के निमित्त बाहर निकले चोर से उनका सामना हो गया साधु उसे देखकर पहचान गये क्योंकि पहले कई बार देखा था पर उन्हें यह नहीं पता था कि वह चोर है।

🔴 उन्हें आश्चर्य हुआ कि यह आधी रात को यहाँ क्यों आया ! साधु ने बड़े प्रेम से पूछा- कहो बालक ! आधी रात को कैसे कष्ट किया ? कुछ काम है क्या ? चोर बोला- महाराज ! मैं दिन भर का भूखा हूं।

🔵 साधु बोले- ठीक है, आओ बैठो मैंने शाम को धूनी में कुछ शकरकंद डाले थे वे भुन गये होंगे, निकाल देता हूं तुम्हारा पेट भर जायेगा शाम को आये होते तो जो था हम दोनों मिलकर खा लेते।

🔴 पेट का क्या है बेटा ! अगर मन में संतोष हो तो जितना मिले उसमें ही मनुष्य खुश रह सकता है यथा लाभ संतोष’ यही तो है साधु ने दीपक जलाया, चोर को बैठने के लिए आसन दिया, पानी दिया और एक पत्ते पर भुने हुए शकरकंद रख दिए।

🔵 साधु बाबा ने चोर को अपने पास में बैठा कर उसे इस तरह प्रेम से खिलाया, जैसे कोई माँ भूख से बिलखते अपने बच्चे को खिलाती है उनके व्यवहार से चोर निहाल हो गया।

🔴 सोचने लगा- एक मैं हूं और एक ये बाबा है मैं चोरी करने आया और ये प्यार से खिला रहे हैं ! मनुष्य ये भी हैं और मैं भी हूं यह भी सच कहा है- आदमी-आदमी में अंतर, कोई हीरा कोई कंकर मैं तो इनके सामने कंकर से भी बदतर हूं।

🔵 मनुष्य में बुरी के साथ भली वृत्तियाँ भी रहती हैं जो समय पाकर जाग उठती हैं जैसे उचित खाद-पानी पाकर बीज पनप जाता है, वैसे ही संत का संग पाकर मनुष्य की सदवृत्तियाँ लहलहा उठती हैं चोर के मन के सारे कुसंस्कार हवा हो गए।

🔴 उसे संत के दर्शन, सान्निध्य और अमृत वर्षा सी दृष्टि का लाभ मिला तुलसी दास जी ने कहा है:-

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।।

🔵 साधु की संगति पाकर आधे घंटे के संत समागम से चोर के कितने ही मलिन संस्कार नष्ट हो गये साधु के सामने अपना अपराध कबूल करने को उसका मन उतावला हो उठा

🔴 फिर उसे लगा कि ‘साधु बाबा को पता चलेगा कि मैं चोरी की नियत से आया था तो उनकी नजर में मेरी क्या इज्जत रह जायेगी ! क्या सोचेंगे बाबा कि कैसा पतित प्राणी है, जो मुझ संत के यहाँ चोरी करने आया!

🔵 लेकिन फिर सोचा, ‘साधु मन में चाहे जो समझें, मैं तो इनके सामने अपना अपराध स्वीकार करके प्रायश्चित करूँगा दयालु महापुरुष हैं, ये मेरा अपराध अवश्य क्षमा कर देंगे संत के सामने प्रायश्चित करने से सारे पाप जलकर राख हो जाते हैं।

🔴 भोजन पूरा होने के बाद साधु ने कहा- बेटा ! अब इतनी रात में तुम कहाँ जाओगे मेरे पास एक चटाई है इसे ले लो और आराम से यहीं कहीं डालकर सो जाओ सुबह चले जाना

🔵 नेकी की मार से चोर दबा जा रहा था वह साधु के पैरों पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा साधु समझ न सके कि यह क्या हुआ ! साधु ने उसे प्रेमपूर्वक उठाया, प्रेम से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- बेटा ! क्या हुआ?

🔴 रोते-रोते चोर का गला रूँध गया उसने बड़ी कठिनाई से अपने को संभालकर कहा-महाराज ! मैं बड़ा अपराधी हूं साधु बोले- भगवान सबके अपराध क्षमा करने वाले हैं शरण में आने से बड़े-से-बड़ा अपराध क्षमा कर देते हैं उन्हीं की शरण में जा।

🔵 चोर बोला-मैंने बड़ी चोरियां की हैं आज भी मैं भूख से व्याकुल आपके यहां चोरी करने आया था पर आपके प्रेम ने मेरा जीवन ही पलट दिया आज मैं कसम खाता हूँ कि आगे कभी चोरी नहीं करूँगा मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।

🔴 साधु के प्रेम के जादू ने चोर को साधु बना दिया उसने अपना पूरा जीवन उन साधु के चरणों में सदा के समर्पित करके जीवन को परमात्मा को पाने के रास्ते लगा दिया।

🔵 महापुरुषों की सीख है, सबसे आत्मवत व्यवहार करें क्योंकि सुखी जीवन के लिए निःस्वार्थ प्रेम ही असली खुराक है संसार इसी की भूख से मर रहा है अपने हृदय के आत्मिक प्रेम को हृदय में ही मत छिपा रखो।

🔴 प्रेम और स्नेह को उदारता से खर्च करो जगत का बहुत-सा दुःख दूर हो जाएगा भटके हुए व्यक्ति को अपनाकर ही मार्ग पर लाया जा सकता है, दुत्कार कर नहीं।

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 127)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 इसके लिए तुम्हें एक से पाँच बनकर मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा। कुन्ती के समान अपनी एकाकी सत्ता को निचोड़कर पाँच देवपुत्रों को जन्म देना होगा, जिन्हें भिन्न-भिन्न मोर्चों पर भिन्न-भिन्न भूमिका प्रस्तुत करनी पड़ेगी।

🔴 मैंने बात के बीच में विक्षेप करते हुए कहा- ‘‘यह तो आपने परिस्थितियों की बात कही। इतना सोचना और समस्या का समाधान खोजना आप बड़ों का काम है। मुझ बालक को तो काम बता दीजिए और सदा की तरह कठपुतली के तारों को अपनी उँगलियों में बाँधकर नाच नचाते रहिए। परामर्श मत कीजिए। समर्पित को तो केवल आदेश चाहिए। पहले भी आपने जब कोई मूल आदेश स्थूलतः या सूक्ष्म संदेश के रूप में भेजा है, उसमें हमने अपनी ओर से कोई ननुनच नहीं की।

🔵 गायत्री के चौबीस महापुरश्चरणों के सम्पादन से लेकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने तक, लेखनी पकड़ने से लेकर विराट यज्ञायोजन तक एवं विशाल संगठन खड़ा करने से लेकर करोड़ों की स्थापनाएँ करने तक आपकी आज्ञा, संरक्षण एवं मार्गदर्शन ने ही सारी भूमिका निभाई है। दृश्य रूप में हम भले ही सबके समक्ष रहे हों, हमारा अंतःकरण जानता है कि यह सब कराने वाली सत्ता कौन है? फिर इसमें हमारा सुझाव कैसा, सलाह कैसी। इस शरीर का एक-एक कण, रक्त की एक-एक बूँद, चिंतन-अंतःकरण आपको, विश्व मानवता को समर्पित है। उनने प्रसन्न बदन स्वीकारोक्ति प्रकट की एवं परावाणी से निर्देश व्यक्त करने का उन्होंने संकेत किया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 39)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।

🔴 सादगी, शालीनता और सज्जनता का सृजन करती है। उसके पीछे गंभीरता और प्रामाणिकता, विवेकशीलता और बौद्धिक परिपक्वता झाँकती है। वस्तुतः इसी में इज्जत के सूत्र सन्निहित हैं। सादगी घोषणा करती है कि यह व्यक्ति दूसरों को आकर्षित या प्रभावित करने की चालबाजी नहीं, अपनी वास्तविकता विदित कराने में संतुष्ट है। यही ईमानदारी और सच्चाई की राह है। यह आमदनी बढ़ाने का भी एक तरीका है। फिजूलखर्ची रोकना अर्थात् आमदनी बढ़ाना। समय आ गया है कि इस बाल बुद्धि को छोड़कर प्रौढ़ता का दृष्टिकोण अपनाया जाए। हम गरीब देश की निवासी हैं।

🔵 सर्वसाधारण को सामान्य सुसज्जा और परिमित खर्च में काम चलाना पड़ता है। अपनी वस्तु स्थिति यही है कि अपने करोड़ों भाई-बहनों की पंक्ति में ही हमें खड़े होना चाहिए और उन्हीं की तरह रहन-सहन का तरीका अपनाना चाहिए। इस समझदारी में ही इज्जत पाने के सूत्र सन्निहित हैं। फैशन परस्ती और अपव्यय की राह अपनाकर हम आर्थिक संकट को ही निमंत्रित करते हैं।
   
🔴 स्वच्छता के साथ जुड़ी हुई सादगी अपने आप में एक उत्कृष्ट स्तर का फैशन है। उसमें गरीबी का नहीं महानता का पुट है। सादा वेशभूषा और सुसज्जा वाला व्यक्ति अपनी स्वतंत्र प्रतिभा और स्वतंत्र चिंतन का परिचय देता है। भेड़-चाल को छोड़कर जो विवेकशीलता का रास्ता अपनाता है, वह बहादुर है। सादगी हमें फिजूलखर्ची से बचाकर आर्थिक स्थिरता में ही समर्थ नहीं करती वरन् हमारी चारित्रिक दृढ़ता भी प्रमाणित करती है। अकारण उत्पन्न होने वाले ईर्ष्या और लांछन से बचने का भी यही सरल मार्ग है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.53

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Aug 2017

🔴 जीवन में आए दिन दुरंगी घटनाएं घटित होती रहती हैं। आज लाभ है तो कल नुकसान, आज बलिष्ठता है तो कल बीमारी, आज सफलता है तो कल असफलता। दिन रात का चक्र जैसे निरंतर घूमता रहता है वैसे ही सुख-दुःख का, सम्पत्ति-विपत्ति का, उन्नति-अवनति का पहिया भी घूमता रहता है। यह हो नहीं सकता कि सदा एक सी स्थिति रही आवे। जो बना है वह बिगड़ेगा, जो बिगड़ा है वह बनेगा, श्वासों के आवागमन का नाम ही जीवन है।

🔵 साँस चलना बन्द हो जाय तो जीवन भी समाप्त हो जायेगा। सदा एक सी ही स्थिति बनी रहे परिवर्तन बन्द हो जाय तो संसार का खेल ही खत्म हो जायेगा। एक के लाभ में दूसरे की हानि है और एक की हानि में दूसरे का लाभ। एक शरीर की मृत्यु ही दूसरे शरीर का जन्म है। यह मीठे और नमकीन हानि और लाभ दोनों ही स्वाद भगवान ने मनुष्य के लिये इसलिए बनाये हैं कि वह दोनों के अन्तर और महत्व को समझ सके।

🔴 खिलाड़ी लोग जो गेंद, ताश, शतरंज, नाटक आदि खेलों को मनोरंजन के उद्देश्य से खेलते है और उसकी अनुकूल प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं के कारण अपने आपको उत्तेजित, उचित या अशाँत नहीं करते वैसा ही दृष्टिकोण जीवन की विविध समस्याओं के सम्बन्ध में रखा जाना चाहिए। किंतु हम देखते हैं कि लोग इन स्वाभाविक आवश्यक एवं साधारण से उतार चढ़ावों को देखकर असाधारण रूप से उत्तेजित हो जाते हैं और अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। (भाग 1)

🔵 संसार की उत्पत्ति भगवान से हुई है और भगवान ही सारे जगत में परिपूर्ण हैं। मनुष्य अपने कर्मों द्वारा इन भगवान की पूजा करके परम सिद्धि रूप भगवान को सहज ही प्राप्त कर सकता है। जो जिस कार्य को करता हो, जिसका जो स्वाभाविक कर्म हो उसी को करे, न तो सबके कर्म एक से हो सकते हैं और न एक सा बनाने की व्यर्थ चेष्टा ही करनी चाहिये। नाटक में सभी पात्र एक ही पात्र का पार्ट करना चाहें तो वह खेल बिगड़ जायेगा। इसलिये अपनी अपनी जगह सभी की जरूरत है और सभी का महत्व है। राजा और मजदूर दोनों की ही आवश्यकता है और दोनों ही अपना अपना महत्व रखते हैं। इसलिये कर्म न बदलो मन के भाव को बदल डालो। कर्म का छोटा बड़ा पन बाहरी है। महत्व तो हृदय के भाव का है। ऊँच नीच का भाव रखकर राग द्वेष पूर्वक पराये अहित के लिये लोक दृष्टि में शुभ कर्म करने वाला नरक गामी हो सकता है।

🔴 स्वार्थ को सर्वथा छोड़कर निष्काम भाव से श्री भगवान की प्रीति के लिये भगवद्ज्ञानसार साधारण स्वकर्म करता हुआ ही मनुष्य परम सिद्धि रूप परमात्मा को पा सकता है। मनुष्य इस प्रकार अपने प्रत्येक कर्म को मुक्ति या भगवत् प्राप्ति का साधन बना सकता है। जिस कर्म में काम, क्रोध, लोभ आदि नहीं हैं जिसमें भगवान को छोड़कर अन्य किसी भी फल की आकाँक्षा नहीं हैं जो कर्म की अथवा फल की आसक्ति से नहीं किन्तु भगवान के दिये हुये स्वाँग का खेल अच्छी तरह खेलने की इच्छा से निरन्तर भगवत्- स्मरण करते हुये भगवत् प्रीत्यर्थ सात्विक कर्म उत्साह पूर्वक किया जाता है, उसी विशुद्ध कर्म से भगवान की पूजा होती है।

🔵 यह पूजा अपने किसी भी उपर्युक्त दोषों से रहित विहित स्वकर्म के द्वारा प्रत्येक स्त्री पुरुष सहज ही अपने अपने स्थान में रहते हुये ही कर सकता है। केवल मन के भाव को बदल कर कर्म का प्रवाह भगवान की ओर मोड़ देने की जरूरत है। फिर प्रत्येक कर्म तुम्हारी मुक्ति का साधन बन जायेगा और अपने सहज कर्मों को करते हुये भी तुम भगवान को प्राप्त कर जीवन सफल कर सकोगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1960 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/January/v1.9

👉 आज का सद्चिंतन 8 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Aug 2017


👉 जैसा बीज वैसा फल

🔵 अफ्रीका के दयार नोवा नगर में जगत प्रसिद्ध हकीम लुकमान का जन्म हुआ था। हब्शी परिवार में जन्म होने के कारण उन्हें गुलामों की तरह जीवन बिताने के लिए बाध्य होना पड़ा। मिश्र देश के एक अमीर ने तीस रुपयों में अपनी गुलामी करने के लिए लुकमान को खरीद लिया ओर उनसे खेती बाड़ी का काम लेने लगा।

🔴 यह अमीर बड़ा क्रूर और निर्दयी था वह जरा सी बात पर अपने गुलामों को बहुत सताता था। किन्तु बाहर से उसने धर्म का बड़ा आडम्बर रच रखा था। दिखाने के लिए वह ईश्वर की रट लगाता और खूब धर्म शास्त्र सुनता ताकि लोग उसे बड़ा धर्मात्मा समझें। अमीर का ख्याल था कि धार्मिक कर्मकाण्डों को करके ही मैं स्वर्ग का अधिकारी हो जाऊंगा।

🔵 एक बार मालिक ने हुक्म किया कि अमुक खेत में जाकर जौ बो आओ लुकमान उस खेत में गये और चने बो आये जब खेत उगा और मालिक ने चने के पौधे खड़े देखे तो वह बहुत नाराज हुआ और लुकमान से पूछा कि मैंने तो तुझे जौ बोने के लिये कहा था। तूने चने क्यों बो दिये लुकमान ने शिर झुकाकर नम्रता से कहा मालिक मैंने यह समझ कर चने बोये थे कि इसके बदले जौ उपजेंगे।

🔴 मालिक का पारा बहुत गरम हो गया। उसने गरज कर कहा- ‘मूर्ख कहीं दुनिया भर में आज तक ऐसा हुआ है कि चने बोये जायं और जौ उपजें?

🔵 लुकमान और नम्र हो गये उन्होंने मन्द स्वर में कहा- ‘मालिक मेरा कसूर माफ हो। मैं देखता हूँ कि आप दया के खेत में हमेशा पाप के बीज बोते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर मुझे अच्छे फल देगा। इसलिए मैंने भी सोचा कि जब ईश्वर के खेतों में पाप बोने पर भी पुण्य फल मिल सकते हैं, तो मेरे चने बोने पर जौ भी पैदा हो सकते हैं।”

🔴 अमीर के दिल में लुकमान की बात तीर की तरह गई उसने निश्चय किया कि अब मैं अपना आचरण करूंगा और शुभ कर्म करने में दत्त चित्त रहूँगा, क्योंकि बिना पुण्य फल प्राप्त नहीं हो सकता। अमीर को धन के उपदेश से बहुत शिक्षा मिली उसने उन्हें पूर्वक गुलामी से मुक्त कर दिया।

🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1942 पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/July.29

सोमवार, 7 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 38)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।  

🔴 देहातों में तो और भी बुरी दशा का वातावरण, गंदगी, दुर्गंध और अस्वास्थ्यकर, घृणास्पद दृश्यों से भरा रहता है। कूड़े और गोबर के ढेर जहाँ-तहाँ लगे रहते हैं और उसकी सड़न सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न करती रहती है। इस दिशा में विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। सोखता पेशाब घर, सोखता नालियाँ तथा गड्ढे खोद कर लकड़ी के शौचालय बहुत सस्ते में तथा बड़ी आसानी से बनाए जा सकते हैं। गाँव में पानी का लोटा साथ ले जाने की तरह यदि खुरपी भी लोग साथ ले जाया करें और छोटा गड्ढा खोदकर उसमें शौच जाने के उपरांत गड्ढे को ढक दिया करें, तो जमीन को खाद भी मिले और गंदगी के कारण उत्पन्न होने वाली शारीरिक, मानसिक और सामाजिक अवांछनीयता भी उत्पन्न न हो।

🔵 स्वच्छता मानव जीवन की सुरुचि का प्रथम गुण है। हमें अपने शरीर, वस्त्र, उपकरण एवं निवास की स्वच्छता को ऐसा प्रबंध करना चाहिए जिससे अपने को संतोष और दूसरों को आनंद मिले। निर्मलता, निरोगिता, निश्चिंतता और निर्लिप्तता के आधार पर उत्पन्न की गई आत्मा की पवित्रता हमें ईश्वर से मिलाने का पथ प्रशस्त करती है। स्वच्छता को हम अनिवार्य मानें और अस्वच्छता का निष्कासन निरंतर करते रहें, यही हमारे लिए उचित है।
  
🔴 अच्छा हो हम समझदारी और सज्जनता से भरा हुआ, सादगी का जीवन जिएँ। अपनी बाह्य सुसज्जा वाले परिवार की तथा समाज की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करने में लगाने लगें। सादगी सज्जनता का प्रतिनिधित्व करती है। जिसका वेश-विन्यास सादगीपूर्ण है, उसे अधिक प्रामाणिक एवं विश्वस्त माना जा सकता है। जो जितना ही उद्धतपन दिखाएगा, समझदारों की दृष्टि में उतनी ही इज्जत गिरा लेगा। इसलिए उचित यही है कि हम अपने वस्त्र सादा रखें, उनकी सिलाई भले-मानसों जैसी कराएँ, जेवर न लटकाए नाखून और होठ न रंगे, बालों को इस तरह से न सजाए जिससे दूसरों को दिखाने का उपक्रम करना पड़े। नर-नारी के बीच मानसिक व्यभिचार का बहुत कुछ सृजन इस फैशन-परस्ती में होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.52

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.8

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 126)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 गुरुदेव ने कहा-‘‘अब तक जो बताया और कराया गया है, वह नितांत स्थानीय था और सामान्य भी। ऐसा वरिष्ठ मानव कर सकते हैं, भूतकाल में करते भी रहे हैं। तुम अगला काम सँभालोगे, तो यह सारे कार्य दूसरे तुम्हारे अनुवर्ती लोग आसानी से करते रहेंगे। जो प्रथम कदम बढ़ाता है, उसे अग्रणी होने का श्रेय मिलता है। पीछे तो ग्रह-नक्षत्र भी सौर मण्डल के सदस्य भी अपनी-अपनी कक्षा पर बिना किसी कठिनाई के ढर्रा चला ही रहे हैं। अगला काम इससे भी बड़ा है। स्थूल वायु मण्डल और सूक्ष्म वातावरण इन दिनों विषाक्त हो गए हैं, जिससे मानवी गरिमा ही नहीं, दैवीय सत्ता भी संकट में पड़ गई है। भविष्य बहुत भयानक दीखता है। इससे परोक्षतः लड़ने के लिए हमें-तुम्हें वह सब कुछ करना पड़ेगा, जिसे अद्भुत एवं अलौकिक कहा जा सके।’’

🔴 धरती का घेरा-वायु, जल और जमीन तीनों ही विषाक्त हो रहे हैं, वैज्ञानिक कुशलता के साथ अर्थ लोलुपता के मिल जाने से चल पड़े यंत्रीकरण ने सर्वत्र विष बिखेर दिया है और ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु का जोखिम हर किसी के सिर पर मँडराने लगा है। अणु आयुधों के अनाड़ियों के हाथों प्रयोगों का खतरा इतना बड़ा है कि उसके तनिक से व्यतिक्रम पर सब कुछ भस्मसात् हो सकता है। प्रजा की उत्पत्ति बरसाती घास-पत्ती की तरह हो रही है। यह खाएँगे क्या? रहेंगे कहाँ? इन दिनों सब विपत्तियों-विभीषिकाओं से विषाक्त वायुमण्डल धरती को नरक बना देगा।

🔵 जिस हवा में लोग साँस ले रहे हैं, उसमें जो भी साँस लेता है, वह अचिंत्य चिन्तन अपनाता और दुष्कर्म करता है। दुर्गति हाथों-हाथ सामने आती जाती है। यह अदृश्य लोक में भर गए विकृत वातावरण का प्रतिफल है। इस स्थिति में जो भी रहेगा, नर पशु और नर-पिशाच जैसे क्रिया-कृत्य करेगा। भगवान् की इस सर्वोत्तम कृति धरती और मानव सत्ता को इस प्रकार नरक बनते देखने में व्यथा होती है। महाविनाश की सम्भावना से कष्ट होता है। इस स्थिति को बदलने, इस समस्या का समाधान करने के लिए भारी गोवर्धन पर्वत उठाना पड़ेगा, लम्बा समुद्र लाँघना पड़ेगा। इसके लिए वामन जैसे बड़े कदम उठाने को ही तुम्हें बुलाया गया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 सबसे बड़ी भूल

🔴 सबसे बड़ी भूल ‘मैं’ का होना है। ‘मैं’ से बड़ी भूल और कोई भी नहीं। परमात्मा के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है। साधना पथ का यही महा अवरोध है। जो इस अवरोध को पार नहीं करते, सत्य के मार्ग पर उनकी कोई गति नहीं होती।

🔵 सूफी फकीर बायज़ीद एक गाँव से होकर गुजर रहे थे। उनके एक मित्र साधु भी उन दिनों उसी गाँव में रह रहे थे। उन्होंने सोचा जब यहाँ से गुजर रहा हूँ, तो अपने मित्र से भी मुलाकात करता चलूँ। चलते-चलते पथ की थकान भी हो आयी थी। रात भी आधी हो चली थी। थकान भी मिटेगी, रात्रि विश्राम भी हो जाएगा और साथ ही मित्र से मुलाकात भी।

🔴 इसी चाहत में उन्होंने एक बन्द खिड़की से प्रकाश को आते देख द्वार खटखटाया। भीतर से आवाज आयी-‘‘कौन है?’’ उन्होंने यह सोचा कि उन्हें तो अपनी आवाज से ही पहचान लिया जाएगा। कहा-‘मैं’। लेकिन भीतर से कोई भी उत्तर नहीं आया। फकीर बायज़ीद ने बार-बार द्वार पर दस्तक दी, पर कोई उत्तर न आया।

🔵 अब तो ऐसा लगने लगा कि जैसे यह घर बिलकुल निर्जन है। उन्होंने जोर से कहा-‘‘मित्र, तुम मेरे लिए द्वार क्यों नहीं खोल रहे हो और चुप क्यों हो गए?’’ भीतर से कहा गया-‘‘भला यह कौन नासमझ है, जो स्वयं को ‘मैं’ कहता है; क्योंकि ‘मैं’ कहने का अधिकार सिवाय परमात्मा के और किसी को भी नहीं है।’’

🔴 सूफी फकीर बायज़ीद को अपनी भूल का अहसास हो गया। उन्होंने तत्क्षण यह सत्य अन्तरतम की गहराइयों में अनुभव कर लिया कि जीवन की सबसे बड़ी भूल ‘मैं’ के सिवा और कुछ भी नहीं। प्रभु के द्वार पर हमारे ‘मैं’ का ही ताला है। जो उसे तोड़ देते हैं, वे ही पाते हैं, द्वार तो सदा से ही खुले थे। ‘मैं’ मिटा, कि प्रभु प्रकट हुए। ‘मैं’ की क्षुद्रता विलीन हुई कि परमात्मा की महानता आप ही अपनी सम्पदा बन गयी। इस सबसे बड़ी ‘मैं’ पन की भूल को जो सुधार लेता है, वह जीवन के सत्य को पा जाता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 96

👉 आज का सद्चिंतन 7 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Aug 2017


रविवार, 6 अगस्त 2017

👉ईश्वर को खोंजे नहीं, स्वयं में खोजे

🔴 ईश्वर को जो किसी वस्तु की भाँति खोजते हैं, वे नासमझ हैं। वह तो वस्तु है ही नहीं। वह तो आलोक, आनंद और अमृत के परम अनुभव का नाम है। ईश्वर न तो विषय है, न वस्तु और न ही व्यक्ति, कि जिसे कहीं बाहर खोजा या पाया जा सके। वह तो अपनी ही चेतना का आत्यंतिक परिष्कार है।

🔵 सूफी फकीर जुन्नैद से किसी ने पूछा, ‘‘ईश्वर है तो दिखाई क्यों नहीं देता?’’ जुन्नैद ने कहा, ‘‘ईश्वर कोई वस्तु तो है नहीं, वह तो अनुभूति है। उसे देखने का कोई उपाय नहीं। हाँ, अनुभव करने का अवश्य है।’’ फकीर जुन्नैद की ये बातें प्रश्नकर्त्ता को संतुष्ट न कर सकीं। तब उन्होंने पास में ही पड़ा एक पत्थर उठाया और अपने पाँव पर पटक लिया उनके पाँव को गहरी चोट आई और उससे खून की धारा बहने लगी। प्रश्नकर्त्ता व्यक्ति इसे देखकर हैरान हो गया और बोला, ‘‘यह क्या किया आपने? इससे क्या आपको पीड़ा नहीं होगी?’’ फकीर जुन्नैद हँसते हुए बोले, ‘‘पीड़ा दिखती नहीं, फिर भी है। ऐसे ही ईश्वर भी है।’’

🔴 वन में जो दिखाई पड़ता है, उसकी ही नहीं, उसकी भी सत्ता है, जो नहीं दिखाई पड़ता। दृश्य से उस अदृश्य की सत्ता बहुत गहरी है, क्योंकि उसे अनुभव करने के लिए स्वयं के अस्तित्व की गहराई में उतरना जरूरी होता है। तभी वह पात्रता उपलब्ध होती है, जो उसे छू सके, देख सके और जान सके। साधारण इंद्रियाँ नहीं, उसे पाने के लिए तो अनुभूति की गहरी संवेदनशीलता अर्जित करनी पड़ती है। तभी उसका साक्षात्कार होता है और तभी मालूम पड़ता है कि वह कहीं बाहर नहीं, जो उसे देखा जा सके, वह तो भीतर है, वह तो देखने वाले में ही छिपा है।

🔵 सच तो यह है कि ईश्वर को खोजना नहीं, खोदना होता है। जो स्वयं में ही उसे खोदते चले जाते हैं, अंत में वे अपने अस्तित्व के मूल स्रोत और चरम विकास के रूप में अनुभव करते हैं। तो बस सार यही है कि ईश्वर को बाहर नहीं खोजें, स्वयं में खोदें।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 95

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 6 Aug 2017


शनिवार, 5 अगस्त 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 5 Aug 2017


👉मानव की मौलिक स्वतंत्रता

    🔴मानव मौलिक रूप से स्वतंत्र है। प्रकृति ने तो उसे मात्र संभावनाएँ दी है। उसका स्वरूप निर्णीत नहीं है। वह स्वयं का स्वयं ही सृजन करता है। उसकी श्रेष्ठता अथवा निकृष्टता स्वयं उसी के हाथों में है। मानव की यह मौलिक स्वतंत्रता गरिमामय एवं महिमापूर्ण है, किन्तु वह चाहे तो इसे दुर्भाग्य भी बना सकता है और दुःख की बात यही है कि ज्यादातर लोगों के लिए यह मौलिक स्वतंत्रता दुर्भाग्य ही सिद्ध होती है, क्योंकि सृजन की क्षमता में विनाश की क्षमता और स्वतंत्रता भी तो छिपी है। ज्यादातर लोग इसी दूसरे विकल्प का ही उपयोग कर बैठते हैं।

    🔵निर्माण से विनाश हमेशा ही आसान होता है। भला स्वयं को मिटाने से आसान और क्या हो सकता है? स्व-विनाश के लिए आत्मसृजन में न लगना ही काफी है। उसके लिए अलग से और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। जो जीवन में ऊपर की ओर नहीं उठ रहा है, वह अनजाने और अनचाहे ही पीछे और नीचे गिरता चला जाता है।

    🔴एक बार ऐसी ही चर्चा महर्षि रमण की सत्संग सभा में चली थी। इस सत्संग सभा में कुछ लोग कह रहे थे कि मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है, किंतु कुछ का विचार था कि मनुष्य तो पशुओं से भी गया-गुजरा है, क्योंकि पशुओं का भी संयम एवं बर्ताव कई बार मनुष्य से अनेकों गुना श्रेष्ठ होता है। सत्संग सभा में महर्षि स्वयं भी उपस्थित थे। दोनों पक्ष वालों ने उनसे अपना निर्णायक मत देने को कहा। महर्षि कहने लगे, ‘‘देखो, सच यही है कि मनुष्य मृण्मय और चिन्मय का जोड़ है। जो देह का और उसकी वासनाओं का अनुकरण करता है, एवं नीचे-से-नीचे अँधेरे में उतरता जाता है और जो चिन्मय के अनुसंधान में रत होता है, वह अंततः सच्चिदानंद को पाता और स्वयं भी वही हो जाता है।’’


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 94

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

👉 आज का सद्चिंतन 4 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Aug 2017


👉क्षण में शाश्वत की पहचान

  🔴क्षण में शाश्वत छुपा है और अणु में विराट्। अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे, वह विराट् को ही खो देता है। इसी तरह जिसने क्षण का तिरस्कार किया, वह शाश्वत से अपना नाता तुड़ा लेता है। क्षुद्र को तुच्छ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही द्वार है परम का। इसी में गहरे-गहन अवगाहन करने से परम की उपलब्धि होती है।

  🔵जीवन का प्रत्येक क्षण महत्त्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य, किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम है। आनंद को पाने के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते हैं और जो विशेष समय की, किसी खास अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे समूचे जीवन के समय और अवसर को ही गँवा देते हैं।

  🔴जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती। उसे तो बिंदु-बिंदु और क्षण-क्षण में ही पाना होता है। प्रत्येक बिंदु सच्चिदानंद सागर का ही अमृत अंश है और प्रत्येक क्षण अपरिमेय शाश्वत का सनातन अंश। इन्हें जो गहराइयों से अपना सका, वही अमरत्व का स्वाद चख पाता है।

  🔵एक फकीर के महानिर्वाण पर जब उनके शिष्यों से पूछा गया कि आपके सद्गुरु अपने जीवन में सबसे श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण बात कौन-सी मानते थे? इसके उत्तर में उन्होंने कहा था, ‘‘वही जिसमें किसी भी क्षण वे संलग्न होते थे।’’

  🔴बूँद-बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता है। क्षण में शाश्वत की   पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।




🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 93

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

👉सत्य केवल एक है

  🔴सत्य केवल एक है, अनेक नहीं। हाँ, उस तक पहुँचने के द्वार जरूर अनेक हो सकते हैं। लेकिन जो द्वार के आकर्षण में उलझकर उसी के मोह में पड़ जाता है, वह द्वार पर ही ठहर जाता है। ऐसे में सत्य की समीपता उसके लिए कभी भी सुलभ नहीं होती है।

  🔵हालाँकि सत्य हर कहीं है। जो कुछ भी है सभी कुछ सत्य है। उसकी अभिव्यक्तियाँ अनंत हैं। वह तो सौंदर्य की ही भाँति है। सौंदर्य अगणित रूपों में प्रकट होता है, पर इससे क्या वह भिन्न-भिन्न हो जाता है। जो रात्रि में तारों में झलकता है, जो सूर्य में प्रकाश बन चमकता है, जो फूलों में सुगंध बनकर महकता है, जो हरे-भरे पहाड़ों से झरनों के रूप में झरता है, जो हृदय में भाव बन उमगता है और जो आँखों में प्रेम बनकर प्रकट होता है, वह भला क्या अलग-अलग है? हाँ, इनके रूप अलग-अलग हो सकते हैं। पर इन सभी में जो एकता स्थापित है, जो सबका सार है, वह तो एक ही है।

  🔴किंतु जो रूप पर मोहित हो जाता है, जो गंध और दृश्य की मादकता में स्वयं को भुला देता है वह तो बस रूप पर ही ठहर जाता है। वह उसके सारतत्त्व, उसकी आत्मा को नहीं जान पाता। ठीक भी है, भला जो सुंदर पर रुक गया हो, वह सौंदर्य तक पहुँचेगा भी कैसे?

  🔵ऐसे ही, जो शब्दों से बँध जाते हैं, उन्हें तो सत्य से वंचित रहना ही पड़ेगा। अब ये शब्द संस्कृत के हों या फिर अरबी के, हिब्रू के हों या फिर लैटिन के, शब्द तो शब्द ही हैं। सत्य उनकी लिखावट में नहीं, उनमें निहित भावों में है। जो भावों में पैठते हैं और गहराई से पैठते हैं, वे सत्य पा ही लेते हैं। वे जान लेते हैं कि अपने साररूप में हर कहीं एक ही सत्य विद्यमान है। जो इस सचाई को जानते हैं, वे राह के अवरोधों को भी सीढ़ियाँ बना लेते हैं और जो नहीं जानते, उनके लिए सीढ़ियाँ भी अवरोध बन जाती हैं।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 92

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 3 Aug 2017


बुधवार, 2 अगस्त 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 2 Aug 2017


👉महत्त्वाकांक्षा के ज्वर से मुक्ति

  🔴 महत्त्वाकांक्षा की धुरी पर घूमने वाला जीवनवृत्त ही नरक है। महत्त्वाकांक्षाओं का ज्वर जीवन को विषाक्त कर देता है, जो इस ज्वर की हवाओं से उद्वेलित हैं, शांति का संगीत और आत्मा का आनंद भला उनके भाग्य में कहाँ? वे तो स्वयं में ही नहीं होते हैं और शांति का संगीत एवं आत्मा का आनंद तो स्वयं में होने के ही फल हैं।

  🔵बड़ी सहज जिज्ञासा है, इस महत्त्वकांक्षा का मूल क्या है? इसका उत्तर भी उतना ही सहज है, ‘‘हीनता का भाव। अभाव का बोध।’’ हालाँकि ऊपर से दिखने में हीनता का भाव और महत्त्वाकांक्षी चेतना परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं, लेकिन वस्तुतः वे एक ही भावदशा के दो छोर हैं। एक छोर से जो हीनता है, वही दूसरे छोर से महत्त्वाकांक्षा। हीनता ही स्वयं को ढकने-छिपाने के प्रयास में महत्त्वाकांक्षा बन जाती है। अपनी इस कोशिश में वह स्वयं को ढक तो लेती है, पर मिटती नहीं और ध्यान रखने की बात तो यह है कि किसी भी रोग को ढकने भर से कभी भी कोई छुटकारा नहीं है। इस भाँति रोग मिटते नहीं, वरन् पुष्ट ही होते हैं।

   
  🔴 व्यक्ति जब स्वयं की वास्तविकता से दूर भागता है, तब तक वह किसी-न-किसी रूप में महत्त्वाकांक्षा के ज्वर में ग्रसित होता रहता है। स्वयं से दूर भागने की आकांक्षा में वह स्वयं जैसा है, उसे ढकता है और भूलता है, लेकिन क्या हीनता की विस्मृति और उसका विजर्सन एक ही बात है? नहीं। हीनता की विस्मृति हीनता से मुक्ति नहीं है। इससे मुक्ति तो स्वयं को जानकर ही है, क्योंकि स्वयं से भागना ही वह मूल और केन्द्रीय भाव है, जिससे सारी हीनताओं का निर्माण होता है।

  🔵आत्मज्ञान के अतिरिक्त इस आंतरिक अभाव से और महत्त्वाकांक्षा के ज्वर से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। जो अपने आप को जानने, उसमें जीने और जागने का साहस करते हैं, उनके लिए शून्य ही पूर्ण बन जाता है। फिर न हीन भाव रहता है और न उससे उपजने वाला महत्त्वाकांक्षा का ज्वर।
 

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 91

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

👉 आज का सद्चिंतन 1 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Aug 2017


👉स्वतंत्रता का अर्जन

  🔴 परतंत्रता जन्मजात है। वह तो प्रकृतिप्रदत्त है। हममें से किसी को उसे अर्जित नहीं करना होता। होश सँभालते ही मनुष्य पाता है कि वह परतंत्र है। वासना की जंजीरों के साथ ही उसका इस जगत् में आना हुआ है। अगणित सूक्ष्म बंधन उसे बाँधे हुए हैं, इन बंधनों की पीड़ा हर पल उसे सताती है। परतंत्रता में भला कोई सुखी भी कैसे हो सकता है।

  🔵 सुखी होने के लिए तो स्वतंत्रता चाहिए। यह स्वतंत्रता किसी को भी जन्म के साथ नहीं मिलती। इसे तो अर्जित करना होता है और यह उसे ही उपलब्ध होती है,जो उसके लिए श्रम एवं संघर्ष करता है। स्वतंत्रता के लिए मूल्य देना होता है। हो भी क्यों नहीं? जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, वह निर्मूल्य नहीं मिल सकता।

  🔴 ध्यान रहे, प्रकृति से मिली स्वतंत्रता दुर्भाग्य नहीं है। दुर्भाग्य तो है स्वतंत्रता को अर्जित न कर पाना। दासता में जन्म लेना बुरा नहीं है, पर दासता ढोते हुए, दास स्थिति में ही मर जाना अवश्य बुरा है। अंतस् की स्वतंत्रता को पाए बिना जीवन में कुछ भी सार्थकता और कृतार्थता तक नहीं पहुँचता है।

  🔵 वासनाओं की अँधेरी काल-कोठरियों की कैद में जो बंद हैं, जिन्होंने विवेक का निरभ्र व मुक्त आकाश नहीं जाना है, समझना यही चाहिए कि उन्होंने जीवन तो पाया, पर वे जीवन को जानने से वंचित रह गए। उन्होंने न तो खुली हवा में साँस लेने का सुख पाया, न ही अनंत आकाश में चाँद-सितारों की जगमगाहट देखी। सुबह के सूरज की उजास का भी वे अनुभव नहीं कर पाए, क्योंकि ये सारे अनुभव स्वतंत्रता के हैं।

  🔴 पिंजड़ों में कैद पक्षियों और वासनाओं की कैद में पड़ी आत्माओं के जीवन में कोई भेद नहीं, क्योंकि दोनों ही स्वतंत्रता एवं स्वामित्व का आनंद नहीं पा सकते।
प्रभु को जानना है, तो हर मनुष्य को चाहिए कि वह स्वतंत्रता का अर्जन करे। जो परतंत्र, पराजित और दास हैं, प्रभु का राज्य उनके लिए नहीं है।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 90

सोमवार, 31 जुलाई 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 31 July 2017


👉मैं कौन हूँ?

  
   🔴 ‘‘मैं कौन हूँ?’’ जो स्वयं से इस सवाल को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं। उस द्वार को खोलने की चाबी यही है कि स्वयं से पूछो, ‘‘मैं कौन हूँ?’’ और जो तीव्रता से, समग्रता से अपने से यह सवाल पूछता है, वह स्वयं ही उत्तर पा जाता है।
  
   🔵 महान् दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन् बूढ़े हो चले थे। उनकी देह जो कभी अति सुंदर और स्वस्थ थी, अब जर्जर और ढीली हो गई थी। जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे। ऐसे बुढ़ापे की सुबह की घटना है। वह स्नानगृह में थे। स्नान के बाद वह जैसे ही अपने शरीर को पोंछने लगे, तभी अचानक उन्होंने गहरी नजर से देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे अपनी माने बैठे थे। शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है। वह काया अब कहाँ है? जिसे उन्होंने प्रेम किया था, जिस पर उन्होंने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो बाकी बचा रह गया है।

    🔴 इस सोच के साथ उनके दार्शनिक मन में एक अत्यंत अभिनव बोध भी अंकुरित होने लगा, ‘शरीर तो वह नहीं है, लेकिन वह तो वही हैं। वह तो बिलकुल भी नहीं बदले हैं। अपने सारे कर्तृत्वों, उपलब्धियों के ढेर के बीच वह अपनी गहराई में जस-के-तस हैं।’ तब उन्होंने स्वयं से ही पूछा, ‘आह! तब फिर मैं कौन हूँ?’ अपनी गहराइयों में उन्हें उत्तर भी मिला और तत्त्ववेत्ता के रूप में वह संपूर्ण हुए।

   🔵 यही सवाल प्रत्येक को अपने से पूछना होता है। यही असली सवाल है। जो इसे नहीं पूछते, वे एक प्रकार से व्यर्थ जीवन जीते हैं। जो पूछते ही नहीं, वे भला उत्तर भी कैसे पा सकेंगे? इसलिए स्वयं से अभी और तत्काल यह सवाल पूछो कि ‘‘मैं कौन हूँ?’’ अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूँजने दो, ‘‘मैं कौन हूँ?’’ जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो उसे अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है और वह उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 89

रविवार, 30 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 30 July 2017


👉जीवन पथ के प्रदीप 30_July_2017

🌹पथ प्रभु प्रेम का


 🔴आखिर भयभीत क्यों हो? न तो इहलोक में, न परलोक में ही भय का कोई कारण है। सभी जीवों को आलोकित करता हुआ प्रेम का महाभाव विद्यमान है और उस प्रेम के लिए ईश्वर के अतिरिक्त और कोई दूसरा नाम नहीं है। ईश्वर तुमसे दूर नहीं है। वह देश की सीमा में बद्ध नहीं है, क्योंकि वह निराकार एवं अंतर्यामी है। स्वयं को पूर्णतः उसके प्रति समर्पित कर दो। शुभ तथा अशुभ तुम जो भी हो सर्वस्व उसको समर्पित कर दो। कुछ भी बचा न रखो। इस प्रकार के सर्वस्व समर्पण के द्वारा तुम्हारा संपूर्ण चरित्र बन जाएगा। विचार करो प्रेम कितना महान है। यह जीवन से भी बड़ा तथा मृत्यु से भी अधिक सशक्त है। ईश्वरप्राप्ति के सभी मार्गों में यह सर्वाधिक शीघ्रगामी है।

 🔵  ज्ञान का पथ कठिन है। प्रेम का पथ सहज है। शिशु के समान सरल-निश्छल बनो। विश्वास और प्रेम रखो, तब तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। धीर आशावान बनो, तभी तुम सहज रूप से जीवन की सभी परिस्थतियों का सामना करने में समर्थ हो सकोगे। उदार हृदय बनो। क्षुद्र अहं तथा अनुदारता के सभी विचारों को निर्मूल कर दो। पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दो। वे तुम्हारी सभी बातों को जानते हैं। उनके ज्ञान पर विश्वास करो। वे कितने पितृतुल्य हैं, सर्वोपरि वे कितने मातृतुल्य हैं। अनंत प्रभु अपनी अनंतता में तुम्हारे दुख के सहभागी हैं। उनकी कृपा असीम है। यदि तुम हजार भूलें करो तो भी प्रभु तुम्हें हजार बार क्षमा करेंगे। यदि दोष तुम पर आ पड़े, तो वह दोष नहीं रह जाएगा। यदि तुम प्रभु से प्रेम करते हो तो अत्यंत भयावह अनुभव भी तुम्हें तुम्हारे प्रेमास्पद प्रभु के सन्देशवाहक ही प्रतीत होंगे।

 🔴 निश्चित ही प्रेम के द्वारा तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे। क्या माँ सर्वदा प्रेममयी नहीं होती? वह, अपना ईश्वर, आत्मा का प्रेमी भी कुछ उसी प्रकार है, विश्वास करो! केवल प्रेमपूर्ण विश्वास करो!! फिर तुम्हारे लिए सब कुछ ठीक हो जाएगा। तुमसे जो भूलें हो गयी हैं, उनसे तनिक भी भयभीत न होओ। मनुष्य बनो-सच्चे अर्थों में मनुष्य-वह मनुष्य जिसके पास प्रेम से लबालब भरा हुआ हृदय है। जीवन का साहसपूर्वक सामना करो। जो भी हो, उसे होने दो। प्रभु प्रेम की शक्ति से ही तुम शक्तिशाली बन सकते हो। स्मरण रखो कि तुम्हारे पास अनंत शक्ति है। तुम्हारे परम प्रेमास्पद प्रभु स्वयं तुम्हारे साथ हैं। फिर तुम्हें क्या भय हो सकता है? प्रभु प्रेम के इस पथ पर निर्भीक हो बढ़े चलो, सब कुछ वह स्वतः होता चला जाएगा, जो तुम्हारे लिए परम कल्याणकारी एवं प्रीतिकर है।

🌹जीवन पथ के प्रदीप


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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