मंगलवार, 22 मार्च 2016

दुष्ट  लड़का
 

एक लड़का बड़ा दुष्ट था। वह चाहे जिसे गाली देकर भाग खड़ा होता।

एक दिन एक साधु बाबा एक बरगद के नीचे बैठे थे। लड़का आया और गाली देकर भागा। उसने सोचा कि गाली देने से साधुचिढ़ेगा और मारने दौड़ेगा, तब बड़ा मजा आयेगा लेकिन साधु चुपचाप बैठे रहे। उन्होंने उसकी ओर देखा तक नहीं।
लड़का और निकट आ गया और खूब जोर- जोर से गाली बकने लगा।

साधु अपने भजन में लगे थे। उन्होंने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया। तभी एक दूसरे लड़के ने आकर कहा- ‘बाबा जी! यह आपको गालियाँ देता है?’ बाबा जी ने कहा- ‘हाँ भैया, देता तो है, पर मैं लेता कहाँ हुँ। जब मैं लेता नहीं तो सब वापस लौटकर इसी के पास रह जाती हैं।’

लड़का बोला- लेकिन यह बहुत खराब गालियाँ देता है। साधु- यह तो और खराब बात है। पर मुझे तो वे कहीं नहीं चिपकीं, सब की सब इसी के मुख में भरी हैं। इससे इसका ही मुख गंदा हो रहा है।

गाली देने वाला लड़का सब सुन रहा था। उसने सोचा, साधु ठीक ही तो कह रहा है। मैं दूसरों को गाली देता हूँ तो वे ले लेते हैं। इसी से वे तिलमिलाते हैं, मारने दौड़ते हैं और दुःखी होते हैं। यह गाली नहीं लेता तो सब मेरे पास ही तो रह गयीं।

लड़का मन ही मन बहुत शर्मिंदा हुआ और सोचने लगा छिःमेरे पास कितनी गंदी गालियाँ हैं। वह साधु के पास गया, क्षमा माँगी और बोला- बाबाजी! मेरी यह गंदी आदत कैसे छूटे और मुख कैसे शुद्ध हो?

साधु ने समझाया -‘पश्चात्ताप करने तथा फिर ऐसा न करने की प्रतिज्ञा करने से बुरी आदत दूर हो जायेगी।

मधुर वचन बोलने और भगवान् का नाम लेने से मुख शुद्ध हो जायेगा।’

सोमवार, 21 मार्च 2016


कुछ लोग धनी बनने की वासना रूपी अग्नि में अपनी समस्त शक्ति, समय, बुद्धि, शरीर यहाँ तक कि अपना सर्वस्व स्वाहा कर देते हैं। यह तुमने भी देखा होगा। उन्हें खाने- पीने तक की भी फुरसत नहीं मिलती। प्रातःकाल पक्षी चहकते और मुक्त जीवन का आनन्द लेते हैं तब वे काम में लग जाते हैं। इसी प्रकार उनमें से नब्बे प्रतिशत लोग काल के कराल गाल में प्रविष्ट हो जाते हैं। शेष को पैसा मिलता है पर वे उसका उपभोग नहीं कर पाते। कैसी विलक्षणता। धनवान् बनने के लिए प्रयत्न करना बुरा नहीं। इससे ज्ञात होता है कि हम मुक्ति के लिए उतना ही प्रयत्न कर सकते हैं, उतनी ही शक्ति लगा सकते हैं, जितना एक व्यक्ति धनोपार्जन के लिये।

मरने के बाद हमें सभी कुछ छोड़ जाना पड़ेगा, तिस पर भी देखो हम इनके लिए कितनी शक्ति व्यय कर देते हैं। अतः उन्हीं व्यक्तियों को, उस वस्तु की प्राप्ति के लिये जिसका कभी नाश नहीं होता, जो चिरकाल तक हमारे साथ रहती है, क्या सहस्त्रगुनी अधिक शक्ति नहीं लगानी चाहिए? क्योंकि हमारे अपने शुभ कर्म, अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ- यही सब हमारे साथी हैं, जो हमारी देह नाश के बाद भी साथ जाते हैं। शेष सब कुछ तो यही पड़ा रह जाता है।

यह आत्म- बोध ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। जब उस अवस्था की उपलब्धि हो जाती है, तब यही मानव- देव- मानव बन जाता है और तब हम जन्म और मृत्यु की इस घाटी से उस ‘एक’ की ओर प्रयाण करते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु- किसी का आस्तित्व नहीं है। तब हम सत्य को जान लेते हैं और सत्यस्वरूप बन जाते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द
अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1968/July
धर्म अप्रभावित हैं

वास्तव में धर्म तो एक ही हैं। धर्म के लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए जो अलग-अलग पद्धतियाँ प्रचलित हैं, वे धर्म नहीं वरन सम्प्रदाय हैं। धर्म मनो महासागर हैं और सम्प्रदाय नदियाँ हैं, जो विभिन्न स्थानों और दिशाओं से आकार इस महासागर में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विलिन हो जाती हैं। यदि इन नदियों को ही भ्रमवश कोई सागर समझ लें व अपने सागर होने की महत्ता का ही ढिंढोरा पीटने लगे तो पीटने पर नदी सागर तो बन नहीं सकती। धर्मं का तो एक ही लक्ष्य हैं सत्यं, शिवं, और सुन्दरं अर्थात ऐसे आचरण जो सत्य हों, शुभ हों, और कल्याणकारी हों। धर्म के इस लक्ष्य की उपलब्धि के लिए विभिन्न मार्ग जैसे पूजा, उपासना, अनुष्ठान, अदि की व्यवस्था विभिन्न सम्प्रदायों में प्रचलित रहती हैं। इनमें से किसी सम्प्रदाय में कोई पद्धति विशेष अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती हैं, किसी में कम। इसी से हम इन पद्धतियों के प्रभावी होने न होने को यह मैं लेते हैं मनो अमुक धर्म अमुक से श्रेष्ठ अथवा निम्नतर हैं। वास्तव में धर्म तो अपने स्थान पर स्थिर, अटल, शाश्वत हैं, उस तक पहुँचने के मार्ग अपेक्षाकृत सुविधाजनक अथवा कष्टप्रद हो सकते हैं, परन्तु उनके कारण धर्म प्रभावित नहीं होता।

- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्मं तत्त्व का दर्शन और मर्म (वांग्मय 53) पृष्ठ 1.4


Dharma is eternal, immutable

In reality there is just one. One Dharma, one true faith, one true religion, one truth. Though there are different prevalent ways to attain the goals of Dharma, these are not different Dharmas (Faiths) themselves, but different groups or sects. Dharma is akin to a vast ocean and the different sects are the rivers which come to it from different directions and different places. Whether seen or unseen all of them eventually lead into the ocean and become one with it. Even after mistaking a stream to be an ocean, and creating a huge hype around it, in reality the situation still remains the same. In-spite of the hype a stream cannot become an ocean. Faith has one goal that is  to be Satyam (true), Shivam (virtuous), and Sundaram (divine). A conduct which is true, virtuous and divine. To achieve this goal of Dharma, various methods have been popular in various sects, like ritualistic worship, prayer, rendering service to a particular idol or symbol. Amongst these various ways, some appear to be more effective than others. These generalized assumptions force us to assign gradation to various religions (sects). We falsely assume one to be greater than the other. In reality Dharma was, is and will be eternally steady, strong, immutable, immovable, and perpetual. The paths to reach that goal may be easy or difficult than presumed but because of the difference in paths, the destination which is Dharma is not affected.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
-Dharma ka Tattava Darshan aur Marm Vangmay 53 page 1.4

रविवार, 20 मार्च 2016

 

हमें यह ध्यान में रखकर चलना चाहिए कि मन की मलीनता  हटाने के लिए कुछ बड़े और लगातार प्रयत्न करने पड़ते हैं तब कही वह काबू में आता है। घोड़े को सही रास्ते पर चलाने के लिए उसके मुँह में लगाम लगानी पड़ती है और हाथ में चाबुक रखना पड़ता है ऐसा ही प्रबन्ध मन के लिए किया जा सके तो ही वह रास्ते पर चलेगा।

नित्य स्वाध्याय की नियमित व्यवस्था रखनी चाहिए। स्वाध्याय का विशय केवल एक होना चाहिए- आत्म निरीक्षण एवं आत्म परिशोधन का मार्गदर्शन जो पुस्तकें इस प्रयोजन को पूरा करती है, आन्तरिक समस्याओं के समाधान में योगदान करती है केवल उन्हें ही इस प्रयोजन के लिए चुनना चाहिए। कथा पुराणों का उपयोग इस प्रसंग में निरर्थक है। आज की गुत्थियों को- आज की परिस्थितियों में- आज के ढंग में किस तरह सुलझाया जा सकता है- सो उसका दूरदर्शिता पूर्ण हल प्रस्तुत करे वही उपयुक्त स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।

स्वाध्याय के बाद आता है मनन- चिंतन। जो पड़ा है उस पर बार-बार कई दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उस प्रकाश को बढ़ाने का क्या उपाय है? आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में घुलाने के प्रसंग पर ऊहापोह करना, मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 43
संगत का प्रभाव:-   
                                
एक मादा शुक ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। मालिक उन दोनों को बेचने बाजार पहुंचा, जिनमें से एक को डाकू सरदार ने व दूसरे को एक महंत ने खरीदा।

एक बार उस राज्य का राजा शिकार के दौरान रास्ता भटकते हुए एक बस्ती के पास पहुंचा तो पिंजरे में बैठा एक तोता आवाज देने लगा- ‘कोई अमीर आ रहा है, लूटो-लूटो, पकड़ो-पकड़ो, मारो-मारो।’

यह सुनते ही राजा सावधान हो गया। उसने तुरंत अपना घोड़ा दूसरी दिशा में मोड़ लिया।

थोड़ी दूरी पर राजा दूसरी बस्ती में पहुंचा। घोड़े की टाप सुनकर दूसरा तोता पिंजरे में बोल उठा- ‘पधारिए अतिथि देवता, ऋषि आश्रम में आपका स्वागत है।’

राजा ने रात भर वहां विश्राम किया। सुबह राजा ने मंत्री से पूछा- ‘‘एक तोते ने लूटने, मारने की आवाज में पुकारा, दूसरे ने अतिथि देवो भव: के स्वर में स्वागत किया। दोनों में इतना अंतर कैसे आया होगा?’’

मंत्री ने तोते वाले से जानकारी ली और बताया- ‘‘राजन, ये दोनों तोते सगे भाई हैं। किंतु एक को डाकू सरदार ने खरीद लिया। उसे डाकुओं जैसे संस्कार मिले। दूसरे को एक महंत जी ने खरीद लिया। उसे ऋषि आश्रम में अतिथि सत्कार के संस्कार मिले, इसलिए आचरण में इतना अंतर आ गया।’’

अच्छी संगति मिलने पर पशु भी शिष्ट आचरण सीख जाता है। गलत संगति मिलने पर मनुष्य भी पशु जैसा आचरण करने लगता है।

मनुष्य बचपन में जो कुछ सीखता है, वह अपने घर-परिवार और आस-पड़ोस के माहौल से ही सीखता है। उसकी संगत जीवन निर्माण में नींव का पत्थर बन जाती है।      
                                           
शुभ प्रभात । आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो ।

शनिवार, 19 मार्च 2016

स्वाध्याय और मनन मानसिक परिष्कार के दो साधन
(भाग 1)


मन बैसाखी गधे की तरह है जिसे नहला धुला देने पर भी मलीनता प्रिय लगती है और दूसरे ही दिन धूलि में लौटकर फिर पहले जैसी गंदगी में लिपट जाता है। हाथी की आदत भी ऐसी ही होती है। नदी तालाब में बैठा स्वच्छ होता रहेगा पर जब बाहर निकलेगा तो सूँड़ में रेत भर कर सारे बदन पर डाल लेगा। न जाने गंदगी में इन्हें क्या मजा आता है?

मन की आदत भी ऐसी ही गंदी है। स्वाध्याय और सत्संग के सम्पर्क में आकर कुछ समय के लिए ऐसा सज्जन बन जाता है मानो सन्त हो। रामायण गीता सुनते समय आँखों में आँसू आते हैं। नरक की पीड़ायें जानकर पश्चाताप भी होता है और मृत्यु की जब याद दिलाई जाती है जब डर भी लगता है कि मौत के दिन समीप आ पहुँचे। जिंदगी बीत चली। अब बचे कूचे दिनों का तो सदुपयोग कर ले। पर यह ज्ञान देर तक नहीं ठहरता किसी मुर्दे की जलाने जाते हैं तब मरघट में श्मशान वैराग्य’ उठता है। काया नाशवान् होने की बात सूझती है और लगता है इस क्षणभंगुर जीवन के लिए क्या बुराइयाँ ओढ़नी क्या पाप करने। क्या अहंकार करना- किस बात पर इतराना। उस समय तो यही ज्ञान जंचता है पर घर आते आते वह वैराग्य न जाने कहाँ हवा में उड़ जाता है और उसी पुराने ढर्रे पर गाड़ी के पहिये लुढ़कने लगते हैं।

यही स्थिति सदा बनी रहे तो ज्ञान, परमार्थ की बात बेकार है। चिकने घड़े की तरह यदि श्रेष्ठता भीतर घुसे ही नहीं तो बाहर की लीपा-पोती से क्या काम चलेगा। ज्ञान की सार्थकता तो तब है जब उसका प्रभाव अन्तः करण पर पढ़े और जीवन की रीति- नीति बदले। ऐसा न हो सका तो पढ़ने सुनने के - पोथी के बेंगने भूख को कहाँ बुझाते हैं।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 43
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1973/January.43
 जानकारी न होना



एक राजा वन भ्रमण के लिए गया। रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोपड़ी पर जा पहुँचा। वहाँ से आतिथ्य मिला जो जान बची।

चलते समय राजा ने उस वनवासी से कहा- हम इस राज्य के शासक हैं। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर अमुख नगर का चन्दन बाग तुम्हें प्रदान करते हैं। उसके द्वारा जीवन आनन्दनमय बीतेगा।

वनवासी उस परवाने को लेकर नगर के अधिकारी के पास गया और बहुमूल्य चन्दन का उपवन उसे प्राप्त हो गया। चन्दन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, उसकी जानकारी न होने से वनवासी चन्दन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा। इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था चलने लगी।

धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गये। एक अन्तिम पेड़ बचा। वर्षा के कारण कोयला न बन सका तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गठ्ठा जब बाजार में पहुँचा तो सुगन्ध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया। आश्चर्यचकित वनवासी ने इसका कारण पूछा तो लोगों ने कहा- यह चन्दन काष्ठ है। बहुत मूल्यवान् है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो। वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चाताप करने लगा कि उसे इतना बड़ा बहुमूल्य चन्दन वन कौड़ी मोल कोयले बनाकर बेच दिया।

पछताते हुए नासमझ को सान्त्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा-मित्र, पछताओ मत, यह सारी दुनिया, तुम्हारी ही तरह नासमझ है।

जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदलें कौड़ी मोल में गँवाते रहते हैं। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है उसी का सदुपयोग कर लो तो कम नहीं। बहुत गँवाकर भी कोई मनुष्य अन्त में सँभल जाता है तो वह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।
मूर्ति पूजा का औचित्य
 

विदेशों में भारतीय संस्कृति की दिग्विजयी यात्रा से लौटने के बाद स्वामी विवेकानंद की कीर्ति भारत के कोने-कोने में फैल गई। उनको वक्तृत्व शैली और अध्यात्म के तर्क संगत प्रतिपादन से प्रभावित होकर काशी के तत्कालीन नरेश ने स्वागत के लिए आमंत्रित किया।

स्वामी जी अद्वैत-वेदांत के प्रकाण्ड पंडित थे। उनकी विचारधारा के संबंध में बात-चीत चली। नरेश मूर्तिपूजा के कट्टर विरोधी थे और स्वामी जी प्रबल समर्थक थे। अध्यात्म साधना की प्रथम कक्षा वे मूर्तिपूजा को ही मानते थे परंतु निर्गुणोंपासक और विभिन्न मतवादियों से भी उन्हें कोई विरोध नहीं था। अपने सिद्धांतों का वे प्रतिपादन अवश्य करते थे परन्तु दुराग्रह नहीं।

मूर्तिपूजा की चर्चा छेड़ते हुए काशी नरेश ने कहा- “अद्वैत वेदांत की विचारधारा से मूर्तिपूजा का मेल तो नहीं बैठता है फिर आप इसका समर्थन क्यों करते हैं।"

स्वामी जी ने कहा- परमात्मा शक्ति स्वरूप और शक्ति को कोई आकार नहीं दिया जा सकता है यह बात ठीक है परन्तु मैं खुदी मूर्तिपूजा को आत्म साधना का प्रथम सोपान समझता हूँ

‘आपके विचारों में ही विरोधाभास आपके अनुयायियों में कई भ्रान्तियाँ पैदा कर सकता है इसलिए किसी भी बात को केवल भावना के कारण ही स्वीकार नहीं करना चाहिए- काशी नरेश ने उपदेश दिया।

स्वामी जी बोले- मैंने मूर्ति पूजा में भावना नहीं तथ्य पाया है।’

‘भला इसमें क्या तथ्य। निर्गुण निराकार परमात्मा का कोई आकार कैसे निश्चित किया जा सकता है।’

‘ईश्वर का कोई आकार नहीं परन्तु साधना उपासना की सुगम पद्धति यही है कि मन को स्थिर करने के लिये ईश्वर की धारणा किसी मूर्ति रूप में की जाये।’

‘यह तो मिथ्या संतोष हुआ'- नरेश ने आशंका की-इसके माध्यम से आत्मोन्नति कैसे संभव होगी।

‘वस्तुतः मिथ्या संतोष नहीं है। ईश्वर सर्वव्यापी है तो मूर्ति में क्यों नहीं होगा-स्वामी जी ने समाधान दिया।

स्वामी जी उनके दुराग्रही प्रतिपादन को तोड़ गये थे। महल के भीतर की दीवारों पर अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित वीर पुरुषों के चित्र टाँगे थे। शायद वे उक्त नरेश के पूर्वजों के रहे होंगे।

स्वामी जी ने एक चित्र की इंगित करते हुए कहा- ‘यह चित्र किन का है। जरा इसे उतरवाकर मँगाइये।’

राजा के अनुचरों ने तत्काल वह चित्र उतारा ओर स्वामीजी को दिया। काशी नरेश ने बताया- ‘यह चित्र मेरे परदादा महाराज का है।’

क्या आपने अपने जीवन में इन्हें देखा है- स्वामीजी ने प्रश्न किया।

‘जी नहीं- नरेश ने उत्तर दिया।

‘तो फिर क्या आप इस चित्र पर थूक सकते हैं’- स्वामीजी ने कहा-आपको थूकना चाहिए। थूकिए।’

‘नहीं थूक सकता- नरेश ने कहा- ये हमारे पूजनीय हैं।

स्वामीजी ने कहा- आपने तो इन्हें देखा नहीं है। फिर इन्हें श्रद्धापात्र कैसे मानते हैं और फिर यह तो मात्र चित्र है इन पर थूकने में धृष्टता कैसी होगी।

बात काशी नरेश की भी समझ में आ रही थी परंतु फिर भी वे थूकना नहीं चाहते थे। स्वामी जी बोले-आप इस चित्र के प्रति पूज्यभाव रखते हैं। यद्यपि इस चित्र पर थूकने से आपके परदादा का कुछ नहीं बिगड़ेगा और यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि यह चित्र पूरी तरह आपके परदादा के शरीर की प्रतिकृति भी नहीं हैं इसी प्रकार प्रतिमा के प्रति अपना विश्वास और श्रद्धा भाव रखना आवश्यक है। ईश्वर शक्ति है, चेतना है पर सामान्य जन का मन ऐसे अमूर्त के प्रति एकाग्र हो पाना दुस्तर है, इसीलिए मैं मूर्तिपूजा में विश्वास रखता हूँ।

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 28)



शिष्य संजीवनी के सेवन से शिष्यों को नवप्राण मिलते हैं। उनकी साधना में नया निखार आता है। अन्तःकरण में श्रद्धा व भक्ति की तरंगे उठती हैं। अस्तित्त्व में गुरुकृपा की अजस्र वर्षा होती है। यह ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव है जिसे असंख्यों ने अनुभव किया है, और असंख्य जन अनुभव की राह पर चल रहे हैं। जिन्होंने निरन्तर अध्यात्म साधना के मान सरोवर में अवगाहन किया है, वे जानते हैं कि शिष्यत्व से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। शिष्यत्व के मंदराचल से ही अध्यात्म का महासागर मथा जाता है। प्रखरता और सजलता की बलिष्ठ भुजाएँ ही इसे संचालित करती हैं। शिष्य- साधक की जिन्दगी में यदि ऐसा सुयोग बन पाए तो फिर जैसे अध्यात्म के महारत्नों की बाढ़ आ जाती है। शक्तियाँ, सिद्धियाँ और विभूतियाँ ऐसे शिष्य- साधक की चरण- चेरी बनकर रहती हैं।

यह दिव्य अनुभव पाने के लिए प्रत्येक साधक को अपने अन्तःकरण में मार्ग की प्राप्ति करनी होगी। यह महाकर्म आसान नहीं है। जन्म- जन्मान्तर के अनगिनत संस्कारों, प्रवृत्तियों से भरे इस भीषण अरण्य में यह महाकठिन पुरुषार्थ है। यह महापराक्रम किस तरह से किया जाय इसके लिए शिष्य संजीवनी का यह आठवां सूत्र बड़ा ही लाभकारी है। इसमें शिष्यत्व की महासाधना के परम साधक कहते हैं- ‘भयंकर आँधी के बाद जो नीरव- निस्तब्धता छाती है, उसी में फूलों के खिलने का इन्तजार करो। उससे पहले यह शुभ क्षण नहीं आएगा। क्योंकि जब तक आँधी उठ रही है, बवंडर उठ रहे हैं, महाचक्रवातों का वेग तीव्र है, तब तक तो बस महायुद्ध के प्रचण्ड क्षण हैं। ऐसे में तो केवल साधना का अंकुर फूटेगा, बढ़ेगा। उसमें शाखाएँ और कलियाँ फूटेंगी।’

लेकिन जब तक शिष्य का सम्पूर्ण देहभाव विघटित होकर घुल न जाएगा, जब तक समूची अन्तःप्रकृति आत्म सत्ता से पूर्ण हार मानकर उसके अधिकार में न आ जाएगी तब तक महासिद्धि के फूल नहीं खिल सकते। यह पुण्य क्षण तो तब आता है जब एक ऐसी शान्ति का उदय होता है, जो गर्म प्रदेश में भारी वर्षा के पश्चात छाती है। इस गहन और नीरव शान्ति में ही यह रहस्यमय घटना घटित होती है। जो सिद्ध कर देती है कि मार्ग प्राप्ति हो गयी है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/jaivic
 

निःसंदेह कर्म की बड़ी गहन है। धर्मात्माओं को दुःख, पापियों को सुख, आलसियों को सफलता, उद्योगशीलों को असफलता, विवेकवानों पर विपत्ति, मूर्खों के यहाँ सम्पत्ति, दंभियों को प्रतिष्ठा, सत्यनिष्ठों को तिरस्कार प्राप्त होने के अनेक उदाहरण इस दुनियाँ में देखे जाते हैं। कोई जन्म से ही वैभव लेकर पैदा होते हैं, किन्हीं को जीवन भर दुःख ही दुःख भोगने पड़ते हैं। सुख और सफलता का जो नियम निर्धारित है, वे सर्वांश पूरे नहीं उतरते।

इन सब बातों को देखकर भाग्य, ईश्वर की मर्जी, कर्म की गति के सम्बन्ध में नाना प्रकार के प्रश्न और संदेहों की झड़ी लग जाती है। इन संदेहों और प्रश्नों का जो समाधान प्राचीन पुस्तकों में मिलता है, उससे आज के तर्कशील युग में ठीक प्रकार समाधान नहीं होता । फलस्वरूप नई पीढ़ी, उन पाश्चात्य सिध्दांतों की ओर झुकती जाती है, जिनके द्वारा ईश्वर और धर्म को ढोंग और मनुष्य को पंचतत्व निर्मित बताया जाता है एवं आत्मा के अस्तित्व से इंकार किया जाता है। कर्म फल देने की शक्ति राज्यशक्ति के अतिरिक्त और किसी में नहीं है। ईश्वर और भाग्य कोई वस्तु नहीं है आदि नास्तिक विचार हमारी नई पीढ़ी में घर करते जा रहे हैं।

इस पुस्तक में वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण से कर्म की गहन गति पर विचार किया गया है और बताया गया है कि जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, वह अपने कर्म के कारण ही है। हमारा विचार है कि पुस्तक कर्मफल सम्बन्धी जिज्ञासाओं का किसी हद तक समाधान अवश्य करेगी ।

प.श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Gahana_karmo_gati

इस पुस्तक में हम लोग पढेंगे

चित्रगुप्त का परिचय
आकस्मिक सुख-दुःख
तीन दुःख और उनका कारण
कर्मों की तीन श्रेणियाँ
अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता
दुःख का कारण पाप ही नहीं है



उत्साह और उल्लास बना रहने के लिए यह आवश्यक है कि अपने सामने कोई दूरगामी लक्ष्य रहे और यहाँ तक पहुँचने के लिए सोचने और करने के लिए बहुत कुछ काम सामने रहे। जीवन का आनन्द तभी तक है जब तक उसने सामने कुछ काम है। जिस दिन व्यक्ति पूर्णतया निश्चित होता है उस दिन या तो वह परमहंस होता है या जड़ मध्यवृत्ति के व्यक्ति के लिए यह स्थिति निरानन्द है और उसमें निराशा एवं निष्क्रियता मिश्रित थकान की ही अनुभूति होगी। उसे सोचना या करना भले ही कुछ न पड़े पर साथ ही आशा एवं तत्परता की ओर प्रेरित करने वाले उल्लास भरे प्रकाश से वंचित ही रहना पड़ेगा

जिम्मेदारियाँ दूसरों पर डालने की इच्छा इसलिए होती है कि उत्तरदायित्व का वजन उठाना कायर और कमजोरों को बहुत भारी प्रतीत होता है। वे पगडंडी ढूँढ़ते हैं और ऐसे सरल रास्ते बच निकलने की बात सोचते हैं जिसमें अपने ऊपर कुछ बोझ न पड़े पर वस्तुतः इसमें भटकाव के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। उत्थान और पतन का ही नहीं।, सुख और दुःख का उत्तरदायित्व भी हमें अपने ऊपर लेना चाहिए और सफलता असफलता की अपनी ही जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है। वर्तमान में जो परिस्थितियाँ सामने खड़ी है उनमें यत्किंचित् दूसरे भी निमित्त हो सकते हैं पर अधिकतर अपनी ही रीति-नीति और गतिविधियों की प्रतिक्रिया सामने रहती है। भविष्य में भी जो कुछ होना या बनना है उस में भी अपने ही क्रिया-कलापों के प्रतिफल सामने होगे। दूसरों का सहयोग अवरोध एक सीमा तक ही हमारा भला बुरा कर सकता है। तथ्य यह है कि अपना व्यक्तित्व ही हर दिशा में प्रतिध्वनि की तरह गूँजता है।

किन्हीं असफलताओं के लिए दूसरों को दोष देने की अपेक्षा यह अधिक लाभदायक है कि हम अपनी उन त्रुटियों को ढूँढ़े जिनके कारण सफलता से वंचित रहना पड़ा इसी तरह प्रगति की दिशा में जितने कदम बढ़ सके उनके पीछे उस सुव्यवस्थित रीति-नीति को समझे जिसे अपना कर हम स्वयं ही नहीं और भी कितने ही लोग आगे बढ़ सकने में समर्थ हुए हैं। सद्गुण ही किसी को ऊँचा उठा सकते ओर आगे बढ़ा सकते हैं। यह रहस्य जिन्हें विदित हो सका वे अपने को परिष्कृत करने में जुटते हैं ताकि एक के बाद दूसरी उत्कर्ष की परतें खुलती चलें।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 34
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1973/January.34

गुरुवार, 17 मार्च 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 27)



पर शिष्यत्व को अपने जीवन का सार मानने वाले वाले इस मूढ़ता पर मुस्कराते हैं। क्योंकि गुरुदेव के दर्शन भले ही चर्म चक्षुओं से मिलते हों पर उनका बताया मार्ग तो अन्तःकरण में प्रवेश करके अन्तश्चक्षुओं से खोजना पड़ता है। जो बाहर भटकते हैं- वे सदा ही गुमराह बने रहते हैं। बाहर प्रतीक तो है पर सत्य नहीं है। प्रतीक सत्य की ओर इंगित तो करते हैं, पर सत्य नहीं है। सत्य के लिए तो हृदय गुफा में बैठकर उपासना करनी पड़ती है। जीवन का परिष्कार करना पड़ता है। उसे पवित्र बनाना पड़ता है। यदि मन पूछे कि कैसे? तो जवाब होगा ठीक उसी तरह जिस तरह अपने गुरुदेव ने बनाया।

हालांकि यह बड़ा साहस का काम है। क्योंकि बाहरी जीवन में जो पवित्रता को साधते हैं, वे किसी भी हालत में महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर सकते। महत्त्वाकांक्षाओं को, अहंकार की प्रतिष्ठा को, वासना की सन्तुष्टि को त्यागकर ही पवित्रता की राह पर आगे बढ़ा जा सकता है। यह किसी भी तरह से आसान नहीं है, साहस का काम है। जो साहसी हैं वे ही इस राह पर आगे बढ़ सकते हैं। और जो बढ़ते हैं उन्हीं को जीवन का रहस्य उजागर होता है, वह भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति को समझ पाते हैं। उन्हीं को इस रहस्य का ज्ञान होता है कि सद्गुरु की ज्योति ही आत्म ज्योति है, यही ईश्वरीयता का अनन्त प्रकाश भी है।

इस सम्बन्ध में एक बड़ी ही प्यारी कथा है। यह कथा सन्त रज्जब के बारे में है। सन्त रज्जब को दादू जैसे सद्गुरु की शरण तो मिली थी पर अन्तस में उजियारा नहीं हुआ था। गुरु मिले पर मार्ग नहीं मिला था। क्या करें? किधर जाएँ? ऐसे सवाल उन्होंने दादू साहब से कई बार पूछे पर उन्होंने हँसकर टाल दिया। बहुत पूछने पर एक दिन बोले जो गुरु को देह जानता है, वह भटकता रहता है। पर जो गुरु को चेतना मानता है उसका पथ प्रकाशित हो जाता है। इससे ज्यादा उन्होंने कुछ कहा नहीं। रज्जब की भी आगे हिम्मत नहीं पड़ी। हार- थककर उन्होंने अपने गुरुदेव की छवि को अपने अन्तस में प्रतिष्ठित कर लिया। अपने अस्तित्त्व की सारी भक्ति, सारा प्यार, सारा अनुराग उन्होंने उस छवि में न्यौछावर कर दिया। यह छवि उनके मानस में विहंस उठी।

ध्यान ज्यों- ज्यों प्रगाढ़ हुआ त्यों ही यह छवि रज्जब की चेतना में आत्म ज्योति बनकर जल उठी। रज्जब यहाँ पर ठहरे नहीं वह अपनी साधना करते रहे और वह शुभ घड़ी भी आयी जब आत्म ज्योति ने अनन्त ईश्वरीय प्रकाश का रूप ले लिया। समाधि की इस परम भावदशा में उन्हें यह समाधान मिला कि सद्गुरु और ईष्ट एक ही हैं। गुरु ही गोविन्द है। गुरु से भिन्न और कुछ भी नहीं। रज्जब की साधना का यह मर्म वही जानेंगे जो अपने अन्तःकरण में प्रवेश करके मार्ग की शोध के लिए व्याकुल हैं। शिष्यों की इस व्याकुलता का समाधान शिष्य संजीवनी के अगले सूत्र में निहित है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/sadg
 

जो भी योजना बनाये उसमें आत्म निर्भरता का ही प्रधान भाग रहना चाहिए। दूसरों की सहायता के आधार पर जो क्रिया-कलाप खड़े किये जाते हैं वे आमतौर पर अधूरे और असफल ही रहते हैं। दूसरों का सहयोग भी मिलता ही है पर वह आगे तब आता है जब अपनी पात्रता और प्राथमिकता सिद्ध कर दी जाय। ऐसा स्वावलम्बी लोग ही कर सकते हैं वे ऐसी व्यावहारिक गतिविधियाँ अपनाते हैं जो आज की परिस्थितियों, आज के साधनों से अपने बलबूते खड़ी की जा सकती हो। भले ही इस प्रकार का शुभारम्भ छोटे रूप में हो पर उसमें यह संभावना भरी पड़ी है कि उस छोटे काम में बरती गई तत्परता और सावधानी के आधार पर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध की जा सके। यही से दूसरों का सहयोग द्वार खुलता है। भला कोई कैसे पसन्द करेगा कि किसी हवाई कल्पना की उड़ान में उड़ने वाले शेखचिल्ली के नीचे अपनी उँगली फँसा दे और अपनी कीमती सहायता को जोखिम में डालने का खतरा अंगीकार करे।

सहयोग देने की तरह सहयोग लेने की भी आवश्यकता रहती है। पर निर्भर अपने ही पक्षधर रहना चाहिए। इतनी बड़ी बात सोची ही क्यों जाय? इतना बड़ा स्वप्न देखा ही क्यों जाय जिसमें दूसरों का सहयोग न मिलने पर खीज़ या निराशा ही पल्ले बँधे?

कठिनाइयों से कोई बच नहीं सकता। जीवन इतना सरल नहीं है कि उसे गुप-चुप बिना किसी झंझट के जिया जा सके। हमें वह साहस एकत्रित करना ही होगा कि आये दिन नाम रूप बदल कर आने वाली कठिनाइयों का सामना और समाधान करने की सूझ-बूझ परिपक्व होती रहे। शान्ति की आकांक्षा अशान्ति को परास्त करके पाई गई विशय के रूप में की जानी चाहिए। बिना झंझट का सरल और सुख सुविधाओं से भरा पूरा जीवन क्रम एक मधुर कल्पना भर है व्यावहारिक वास्तविकता नहीं जीवन का निर्माण ही खुद इस तरह हुआ है कि उस्तरे की तरह उस पर बार-बार धार रखने की रगड़ से वास्ता पड़ता रहे। जो इस यथार्थता का सामना नहीं करना चाहता, सरलता को ही शान्ति मानता है उसे खाली हाथ ही रहना पड़ेगा अपना शरीर और मन भी क्या कम अशान्ति उत्पन्न करते हैं। नगर निवासियों की तरह ही वनवासी और सक्रियों की तरह ही निष्क्रिय भी क्षुब्ध रहते हैं। उलझनों का स्वरूप बदला जा सकता है पर उनसे न ता कोई गृही बच सकता है और न वैरागी। शान्ति तो उन्हें ही मिल सकती है जो अशान्ति से टकराने की कला के अभ्यस्त और पारंगत बन चुके  है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 34
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1973/January.34
बस थोड़ा सा सोचने की देर है……
 

शादी की बीसवीं वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर पति-पत्नी साथ में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। संसार की दृष्टि में वो एक आदर्श युगल था। प्रेम भी बहुत था दोनों में लेकिन कुछ समय से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि संबंधों पर समय की धूल जम रही है। शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं।

बातें करते-करते अचानक पत्नी ने एक प्रस्ताव रखा कि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना होता है लेकिन हमारे पास समय ही नहीं होता एक-दूसरे के लिए। इसलिए मैं दो डायरियाँ ले आती हूँ और हमारी जो भी शिकायत हो हम पूरा साल अपनी-अपनी डायरी में लिखेंगे।

अगले साल इसी दिन हम एक-दूसरे की डायरी पढ़ेंगे ताकि हमें पता चल सके कि हममें कौन सी कमियां हैं जिससे कि उसका पुनरावर्तन ना हो सके। पति भी सहमत हो गया कि विचार तो अच्छा है। डायरियाँ आ गईं और देखते ही देखते साल बीत गया।

अगले साल फिर विवाह की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर दोनों साथ बैठे। एक-दूसरे की डायरियाँ लीं। पहले आप, पहले आप की मनुहार हुई। आखिर में महिला प्रथम की परिपाटी के आधार पर पत्नी की लिखी डायरी पति ने पढ़नी शुरू की।

पहला पन्ना...... दूसरा पन्ना........ तीसरा पन्ना

..... आज शादी की वर्षगांठ पर मुझे ढंग का तोहफा नहीं दिया।
.......आज होटल में खाना खिलाने का वादा करके भी नहीं ले गए।
.......आज मेरे फेवरेट हीरो की पिक्चर दिखाने के लिए कहा तो जवाब मिला बहुत थक गया हूँ
........ आज मेरे मायके वाले आए तो उनसे ढंग से बात नहीं की
.......... आज बरसों बाद मेरे लिए साड़ी लाए भी तो पुराने डिजाइन की

ऐसी अनेक रोज़ की छोटी-छोटी फरियादें लिखी हुई थीं। पढ़कर पति की आँखों में आँसू आ गए। पूरा पढ़कर पति ने कहा कि मुझे पता ही नहीं था मेरी गल्तियों का। मैं ध्यान रखूँगा कि आगे से इनकी पुनरावृत्ति ना हो।

अब पत्नी ने पति की डायरी खोली
पहला पन्ना.......कोरा
दूसरा पन्ना.........कोरा
तीसरा पन्ना...........कोरा
अब दो-चार पन्ने साथ में पलटे वो भी कोरे फिर 50-100 पन्ने साथ में पलटे तो वो भी कोरे

पत्नी ने कहा कि मुझे पता था कि तुम मेरी इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकोगे। मैंने पूरा साल इतनी मेहनत से तुम्हारी सारी कमियां लिखीं ताकि तुम उन्हें सुधार सको। और तुमसे इतना भी नहीं हुआ। पति मुस्कुराया और कहा मैंने सब कुछ अंतिम पृष्ठ पर लिख दिया है। पत्नी ने उत्सुकता से अंतिम पृष्ठ खोला। उसमें लिखा था

मैं तुम्हारे मुँह पर तुम्हारी जितनी भी शिकायत कर लूँ लेकिन तुमने जो मेरे और मेरे परिवार के लिए त्याग किए हैं और इतने वर्षों में जो असीमित प्रेम दिया है उसके सामने मैं इस डायरी में लिख सकूँ ऐसी कोई कमी मुझे तुममें दिखाई ही नहीं दी। ऐसा नहीं है कि तुममें कोई कमी नहीं है लेकिन तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा समर्पण, तुम्हारा त्याग उन सब कमियों से ऊपर है। मेरी अनगिनत अक्षम्य भूलों के बाद भी तुमने जीवन के प्रत्येक चरण में छाया बनकर मेरा साथ निभाया है। अब अपनी ही छाया में कोई दोष कैसे दिखाई दे मुझे।

अब रोने की बारी पत्नी की थी। उसने पति के हाथ से अपनी डायरी लेकर दोनों डायरियाँ अग्नि में स्वाहा कर दीं और साथ में सारे गिले-शिकवे भी। फिर से उनका जीवन एक नवपरिणीत युगल की भाँति प्रेम से महक उठा।

दोस्तो, ये एक काल्पनिक कहानी हो सकती है। पति की जगह पत्नी भी हो सकती है और पत्नी की जगह पति भी। सीखना केवल ये है कि जब जवानी का सूर्य अस्ताचल की ओर प्रयाण शुरू कर दे तब हम एक-दूसरे की कमियां या गल्तियां ढूँढने की बजाए अगर ये याद करें हमारे साथी ने हमारे लिए कितना त्याग किया है, उसने हमें कितना प्रेम दिया है, कैसे पग-पग पर हमारा साथ दिया है तो निश्चित ही जीवन में प्रेम फिर से पल्लवित हो जाएगा।

बस थोड़ा सा सोचने की देर है ………

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है— हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्। (तत्वा. (...