मंगलवार, 11 मई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १५)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

प्रगति वस्तुओं का बाहुल्य के, इन्द्रिय भोगों के अथवा प्रिय परिस्थितियों की उपलब्धि के साथ जुड़ी हुई नहीं है, वरन् ज्ञान के विस्तार से सम्बन्धित है। जिनका ज्ञान जितना सीमित है वह उतना ही पिछड़ा हुआ है। सम्भव है जिनकी ज्ञान सम्पदा बढ़ी-चढ़ी है, उसकी शक्ति और अशक्ति का लेखा जोखा भी ज्ञान सम्पदा की न्यूनाधिकता के साथ जुड़ा हुआ है।

मनुष्य का नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर उसकी सुसंस्कृत ज्ञान चेतना के साथ जुड़ा हुआ है। भौतिक शक्तियों के उपार्जन और उपभोग को भी मानसिक विकास से पृथक नहीं रखा जा सकता। आदिकाल में मनुष्य शारीरिक दृष्ट से अब की अपेक्षा अधिक बलिष्ठ रहा होगा, पर उसकी चेतना पशु स्तर से कुछ ही ऊंची होने के कारण सुविकसित लोगों की तुलना में गया गुजरा ही सिद्ध होता रहा है। अतीत के पिछड़ेपन पर जब एक दृष्टि डालते है तो प्रतीत होता है कि चिन्तन क्षेत्र में अज्ञान की स्थिति कितनी कष्टकर और कितनी लज्जास्पद परिस्थितियों में मनुष्य को डाले रही है।

अमेरिकन म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री के पक्षी विभाग ऐसोसियेट क्यूरेटर द्वारा प्रकाशित विवरणों से पता चलता है कि न्यूगिनी के आदिम और आदिवासी किस तरह अपने क्षेत्र में जा भटकने वाले लोगों को भून-भूनकर खा जाते थे। उस क्षेत्र में पक्षियों की खोज में एक खोजी दल जा पहुंचा। पापुआन क्षेत्र के मियाओं कबीले के बड़े निर्दय क्रूर कर्मों के लिये प्रसिद्ध हैं। इस क्षेत्र में किसी विशेष सुरक्षा व्यवस्था के बिना किसी को जाने देने की इजाजत नहीं है, पर वह खोजी दल किसी प्रकार उस क्षेत्र में जा ही पहुंचा और उसके सभी सदस्यों का रोमांचकारी वध हो गया।

पादरी आइवोस्केफर उस क्षेत्र में 45 वर्ष से इन नर भक्षियों के बीच प्रभु ईसा का सन्देश सुनाने के लिये रहते थे। उन्होंने इन नर भक्षियों को अपने प्रेम एवं सेवा कार्य से प्रभावित कर रखा था। शिक्षा चिकित्सा आदि उपायों से उन्होंने इस क्षेत्र के निवासियों का मन जीत लिया था। उन्हें वे पवित्र आत्मा समझते थे और किसी प्रकार की हानि पहुंचाने के स्थान पर सम्मान प्रदान करते थे।

आरम्भ में उस निष्ठावान, धर्मात्मा किन्तु क्रिया कुशल पादरी ने बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ इन लोगों के बीच अपना स्थान बनाया था स्केफर ने अपनी पुस्तिका में लिखा है कि—पहली बार जब वे इस इलाके में अपने एक साथी के साथ गये तो उन्हें नर भक्षियों के द्वारा घेर लिया गया। उन्हें देखने वालों ने शोर मचाकर 40-50 योद्धाओं को बुला लिया—वे भाले ले लेकर आ गये और हम लोगों को चारों ओर से घेरे में लेकर हर्ष नृत्य करने लगे। उन्हें दो मनुष्य का—उसमें भी गोरों का ताजा मांस खाने को मिलेगा। इस कार्य का श्रेय वे लेंगे इस खुशी में उन्मत्तों जैसी उछल कूद कर रहे थे। घेरे में आये शिकार अब भाग तो सकते नहीं थे।

इस सम्बन्ध में वे निश्चित होकर देवता के बलिदान के उद्देश्य से गीत गा रहे थे और हर्ष मना रहे थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २३
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

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