गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 पीड़ितों के अनन्य सेवक माणिक्यलाल वर्मा

🔵 राजस्थान के लब्ध प्रतिष्ठ समाजसेवी श्री माणिक्यलाल वर्मा की जीवन कहानी अनोखी है। बैलगाडी पर अपनी सारी गृहस्थी सहित सपेरे नगर-नगर और ग्राम-ग्राम भटकने वाले गाडिया लुहार उनको खूब जानते थे। रेलवे स्टेशन से सैकडों मील दूर घने जंगलों में पहाडी की टेकरियों पर झोपड़ी बनाकर रहने वाले अधनंगे भील भी उनसे अपरिचित नहीं थे। कंजर और खारी, जिनके माथे पर समाज ने जन्म-जात अपराधी होने का टीका लगा दिया था, उन्हें अपना समझते थे। कालबेलिये जो साँपों को पालते हैं और बनजारे, जो बैलों की पीठ पर अनाज लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाते हैं, उन्हें अच्छी तरह पहचानते थे। राजस्थान और पाकिस्तान की सीमा पर रेत के टीलों के बीच रहने वाले हरिजनों और गोपालक मुसलमानों से उनकी मित्रता थी।

🔴 जो अभावग्रस्त हैं, भूख और गरीबी के शिकार है दलित और शोषित हैं, पिछडे हुए हैं, अझान और अंधविश्वास के पाश में जकड़े हुए है, ऐसे लाखों स्त्री पुरुषों और बच्चों का माणिक्यलाल जी ने प्यार और आदर पाया था। उनकी मृत्यु पर उन सबने यह महसूस कि उनकी सुध लेने वाला उनका आत्मीय और उनका सहारा उनसे छिन गया।

🔵 माणिक्यलाल वर्मा के निधन पर राजस्थान में सरकारी दफ्तरों पर झंडे झुका दिए गए और उनकी अत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ की गई। राष्ट्रपति ने उन्हें पद्ग भूषण की उपाधि से अलंकृत था। यह राजकीय सम्मान की बात विस्मृत हो जायेगी, किंतु गरीबों के लिए उनके दिल में जो तड़प थी, वह बिजली की तरह कौंधती रहेगी। राजस्थान में बिजोलिया ने हिंदुस्तान में सत्याग्रह का शंख सबसे पहले फूँका था और माणिक्यलाल जी राजस्थान को और देश को इसी बिजोलिया को देन थे।

🔴 उन्होंने सामंती अत्याचारों से मोर्चा लिया और अकथनीय कष्ट झेलै। उनका एक पाँव जेल के भीतर और दूसरा बाहर रहा। स्वराज्य आया, तब भी वे चैन से नहीं बैठे। पिछड़ी जातियों को ऊँचा उठाने के लिये रात-दिन भटकते रहे। गाड़िया लुहारों को वसाने का उन्होंने भगीरथ प्रयत्न किया। गाड़िया लुहार राणा प्रताप के लिए तोप-बंदूक बनाते थे। चित्तौड़ दुर्ग पर जब मुगलों ने अधिकार कर लिया तब वे यह प्रतिज्ञा करके निकल पडे कि जब तक यह दुर्ग पुन: स्वतंत्र न होगा वे कहीं घर बनाकर नहीं रहेंगे। माणिक्य लाल जी ने गाडिया लुहारों के वनवास को समाप्त कराया। वह नेहरू जी को खींचकर चित्तौड दुर्ग पर ले गए और हजारों गाडिया लुहारों की उपस्थिति में दुर्ग पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर उन्हें विश्वास दिलाया कि सैकडों वर्षों बाद उनकी प्रतिज्ञा पूरी हुई और वे अब घर बनाकर बस सकते है।

🔵 आज से कोई ३५ वर्ष पहले की बात है। रेलवे स्टेशन से करीब एक सौ मील दूर भूतपूर्व डुंगरपुर रियासत में भीलों की बस्ती के मध्य खड़लाई की पाल में एक पहाड़ी की टेकरी पर माणिक्य लाल जी ने अपना डेरा डाला था। ऊपर खुला आकाश, उसकी तलहटी में एक नाला बहता था। माणिक्य लाल जी में यह चमत्कारी गुण था कि बात ही बात में लोगों के घरों और उनके दिलों में प्रविष्ट हो जाते थे। आते-जाते भीलों ने जल्दी ही जंगल से लकडी़ काटकर उनके लिए झोंपडा खडा़ कर दिया और एकाएक दो-दो मील दूर से भी बालक और बालिकाऐं उनके विद्यालय में पढ़ने आने लगे। अंधेरी रात में शेर पहाड़ी नाले पर पानी पीने के लिए पास से गुजर जाता, परंतु माणिक्य लाल जी निर्भय होकर अपनी झोंपडी में सोते रहते।

🔴 वे अपने पीछे ऐसे समर्पित जीवन की मशाल जला गए, जो चिरकाल तक बराबर रोशनी देती रहेगी, उनका सेवाभावी जीवन तरुणों को अन्याय और अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष के लिये सदैव प्रेरणादायी सिद्ध होगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 123, 124

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