गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 29)

🌹 युग परिवर्तन प्रतिभा ही करेगी

🔵 प्रयोजन बड़ा होते हुए भी उसका समाधान सरल है। यदि प्रतिभाओं के परिष्कार का क्रम चल पड़े, उनके आविर्भाव का उपचार बन पड़े तो समझना चाहिये कि इन अनुदानों के सहारे विश्वव्यापी कार्य सध जाता है-सामाजिक और क्षेत्रीय समस्याओं को संभालते रहना और भी अधिक सरल पड़ता जाएगा।                  

🔴 हर महत्त्वपूर्ण कार्य में तद्नुरूप ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। उसके बिना तो छोटे-छोटे कार्य भी पूरे नहीं होते। हर महत्त्वपूर्ण कार्य के लिये ऊर्जा चाहिये; फिर युगनिर्माण जैसा विश्वव्यापी और अत्यधिक भारी-भरकम काम तो वरिष्ठ प्रतिभासम्पन्नों के कंधा लगाये बिना पूरा हो सकने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

🔵 नवनिर्माण की विश्वव्यापी संरचना जिसने सोची और खड़ी की है, उसने इस पुण्यप्रयोजन की पूर्ति के लिये प्राणवान् जीवट के धनी व्यक्तित्वों की अच्छी-खासी सेना खड़ी करने की आवश्यकता अनुभव की है और उसे समय रहते जुटा लेने की तैयारी की है। यह उल्लेख-उद्बोधन उन्हीं के लिये है। प्रतिभा-परिष्कार का सुयोग उपयुक्त मात्रा में बन पड़ा तो फिर अपनी दुनिया का स्वरूप और परिवेश बदल डालने में नियंता के सामने और कोई बड़ी कठिनाई शेष न रहेगी।

🔴 भूतकाल में भी मनस्वी लोगों ने एक-से-एक आश्चर्यजनक कार्य किये हैं। इनमें अगस्त्य का समुद्र सोखना, हनुमान का पर्वत उठाना एवं विश्वामित्र के तत्त्वावधान में रामराज्य की स्थापना होना जैसी घटनाएँ ऐसी हैं, जो बताती है कि करने-मरने पर उतारू व्यक्ति के लिये क्या कुछ ऐसा है, जिसे संभव करके नहीं दिखाया जा सकता। स्वर्ग से धरती पर गंगा उतारने वाले भगीरथ अपने कार्य में सफल हुए थे तो फिर कोई कारण नहीं कि नवनिर्माण में जुटे भगीरथों की अपनी मण्डली भ्रम-जंजाल से निकलकर सीधे और सरल काम कर सकने के लिये समर्थ नहीं बन सकती।      
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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