गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 उपासना के तत्व दर्शन को भली भान्ति हृदयंगम किया जाय (भाग 4)

🔵 शरीर को नित्य स्नान कराया जाता है, वस्त्र हम नित्य धोते हैं, कमरा नित्य बुहारी लगा कर साफ करते हैं। कारण यह कि एक बार की सफाई रोज काम नहीं दे सकती। मन को एक बार चिंतन−मनन− स्वाध्याय द्वारा साफ कर लिया तो सदा वह वैसा ही बना रहेगा, ऐसी आशा निरर्थक है। अभी आकाश साफ है। उस पर कब आँधी, कुहासा धूलि−बादल छा जायेंगे प्रकृति कब कुपिता हो जाएगी कहा नहीं जा सकता। अन्तरात्मा पर निरन्तर छाते रहने वाले इन मलिन आवरणों की सफाई के लिये उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?

🔴 अपने आपे को साधने, अनगढ़ से सुगढ़ बनाने हेतु सुसंस्कारिता की साधना की जाती है। यह तो पूर्वार्ध हुआ। इसका उत्तरार्ध है उपासना जिसमें ईश्वरीय गुणों से स्वयं को अनुप्राणित किया जाता है। यह आत्मिक पुरुषार्थ हर साधक के लिये अनिवार्य है।

🌹 -समाप्त
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 -अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 4

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👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 7)

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