गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 सच्चे जीवन की झलक

🔵 श्रीमती लस्सीचेस इंगलैंड की निवासी थीं। उनके पति भारतीय सेना में मेजर के पद पर थे। भौतिकवाद की समर्थक ब्रिटिश सभ्यता में पली नारी और फिर एक फौजी मेजर की पत्नी-लस्सीचेस, बडे़ ठाठ-बाट से रहतीं और सैर-सपाटा करती। जिंदगी उनके लिए एक उत्सव के समान थी और उसे उसी प्रकार जी भी रही थीं।

🔴 श्रीमती लस्सीचेस को दो खास शौक थे। एक फिल्म देखना और दूसरा मित्रों को दावत देना। उनके घर आए दिन मित्रों की दावत होती रहती थी और हर नयी फिल्म को वे देखे बिना नहीं रहती थी। पैसे के संबंध मे लस्सीचेस पति पर ही निर्भर न रहती थी। उन्हें अपने पिता से वसीयत में एक लबी रकम मिली हुई थी। पैसे की उन्हें जरा भी कमी नहीं थी।

🔵 एक लंबे अरसे तक यह जीवन चलता रहा, फिर सहसा बदल गया। यह परिवर्तन उनमें तब हुआ, जब वे कुछ दिन भारत मे पति के साथ रहकर लंदन वापिस आ गई। भारत प्रवास के बाद उन्होंने शराब पीना छोड दिया। रंगीन कीमती और तड़क भड़क वाले कपडों से उन्हें अरुचि हो गई। रहन-सहन और आचार, विचार में शालीनता आ गई। उनका प्रतिमास खर्च हजारों से घटकर सैकडों मे आ गया। भारत से आने के बाद श्रीमती लस्सीचेस में एक अप्रत्याशित संतत्व आ गया।

🔴 परिचितों, मित्रों और सखी-सहेलियों को श्रीमती चेस के इस आमूल एवं आकस्मिक परिवर्तन पर बडा आश्चर्य हुआ, वे अपने लिए इस आश्चर्य से व्यग्र होकर पूछ ही बैठे- ''श्रीमती चैस! आप जब से भारत प्रवास से वापस आई है, तब से आपका जीवन ही बदल गया है। आखिर ऐसा कौन-सा शोक आपके हृदय मे घुस बैठा है, जिससे आप जिंदगी से उदासीन हो गई हैं ?"

🔵 श्रीमती लस्सीचेस ने मित्रों को धैर्यपूर्वक सुना और उत्तर दिया- ''भारत-प्रवास के समय मैं उसके प्राचीन साहित्य को पढ़ चुकी हूँ और उसकी प्रेरणा से मुझे यह प्रकाश मिला है, जो शांति सादगी में है, उसका रंचमात्र प्रदर्शन में नहीं है। फिर भी अभी मेरा जीवन अपूर्ण है। कुछ ही समय में मैं उसकी पूर्ति करने का कार्यक्रम चलाने वाली हूँ।'

🔴 और वास्तव में कुछ ही समय बाद लोगों ने देखा कि श्रीमती लस्सीचेस ने समाज-सेवा का कार्यक्रम शुरू कर दिया। उन्होने लंदन की मजदूर तथा गरीब बस्तियों में जाना और स्वच्छता तथा शिक्षा का प्रचार करना प्रारंभ कर दिया। वे गरीब तथा महिला-मजदूरों और उनके बच्चों को स्वयं पढातीं और शराब य सिगरेट पीने से विरत करती। अपने जीवन का उदाहरण देकर उन्हें जीवन का सच्चा मार्ग बतलाती और अनुभव कराती कि गरीबी में भी सुंदरतापूर्वक रहा जा सकता है, यदि उसे दुर्व्यसनों से दूषित न किया जाए।

🔵 श्रीमती लस्सीचेस अपने शौक आदि पर जो रुपया खर्च करती थीं, वह अब अपने पर खर्च न करके समाज-सेवा व गरीबों की सेवा में खर्च करने लगीं जिससे उन्हें न केवल आत्म-शांति ही मिलती बल्कि वे अपने सेवा-क्षेत्र में देवी के रूप मे पूजी जाने लगीं।

🔴 कुछ समय बाद उनके पति का देहांत हो गया। उनके मित्रों तथा संबंधियो ने बहुत कुछ समझाया कि वे फिर विवाह कर लें और अपनी संपत्ति का जी भरकर उपभोग करें। श्रीमती चेस इसके लिए किसी प्रकार भी तैयार न हुई। उन्होंने बार-बार यही उत्तर दिया कि मै समाज की हूँ मेरी संपत्ति समाज की है, उसे फूँकने और बहाने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। अब इसका व्यक्तिगत जीवन में उपभोग करने का प्रश्न ही नही उठता। हाँ इसका सामाजिक हित में सदुपयोग अवश्य करूगी। श्रीमती चेस की इस दृढ़ता एवं उच्चता से प्रप्रगिवत होकर उनके संपर्क में अन्ने वाली कितनी ही महिलाओं का जीवन बदला तथा सुधर गया।

🔵 कुछ समय बाद जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी वसीयत के अनुसार उनकी लाखों की संपत्ति इंग्लैंड के गिरजाघरों को बाँट दी गई जिन्हें उस देश में सच्चे धर्म, गरीबों की सहायता तथा उन विधवाओं की मदद में खर्च करने के लिए निर्देश दिया गया था, जो पुन: विवाह न कर शेष जीवन उन्हीं की तरह समाज की सेवा में लगाने की इच्छूक हों।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 121, 122

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