बुधवार, 12 जुलाई 2017

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (अंतिम भाग)

🔴 कैसे मित्र बनें? आप हमारा सहयोग कीजिए, हम आपका सहयोग करेंगे। अन्धे और पंगे का उदाहरण पेश कीजिए। अन्धे को आँख से दिखाई नहीं पड़ता था और पंगा चल नहीं सकता था। दोनों ने आपस में मित्रता बना ली और मित्रता बना करके एक नदी पार कर ली, आपने सुना होगा, हमारे और हमारे गुरुदेव के बारे में यही हुआ। हमारे गुरुदेव पंगे हैं; क्योंकि जिस सीमा में वह काम करते हैं, वहाँ से दौड़-धूप करना उनके लिए मुमकिन नहीं और हम अन्धे हैं। हमारे पास न ज्ञान है, न विचार है। हम दोनों ने आपस का तालमेल बिठा लिया है और तालमेल बिठा करके अन्धे और पंगे की तरह नदी पार करने का फैसला कर लिया है। आप भी ऐसा ही कर लीजिए। 

🔵 आप शान्तिकुञ्ज के साथ वही रिश्ता बना लीजिए, जो रिश्ता अन्धे और पंगे का है। आप ज्ञान के अभाव में, विचारों के अभाव में भटकने वाले हैं और हम पंगे हैं। हम सारे संसार में किस तरीके से काम करेंगे? हम और आप दोनों ही मिलें, तो मजा आ जाए। आप पीछे के लिए क्या छोड़ जाएँगे, मुझे मालूम नहीं। दौलत नहीं छोड़ पाये, तो हर्ज नहीं है; लेकिन आप ऐसी चीज छोड़कर चले जाएँ, जिससे आपकी औलाद यह कहती रहे कि हम ऐसे शानदार आदमी की सन्तान हैं। आप शानदार के लिए पीछे वालों के लिए ऐसा रास्ता छोड़कर जाइए, जिस पर चलने वाले दूसरे लोग सराहते रहें कि हमको कोई रास्ता बता गया था, किसी ने हमको रास्ता दिखाया था, जिस पर हम चले और चलने के बाद में अपनी नाव को पार कर लिया और दूसरों की नाव को पार लगा दिया। आप ऐसा रास्ता अपनाइए। नई जिन्दगी जीइए, नया चिन्तन ग्रहण कीजिए, नया दृष्टिकोण अपनाइए, नई हिम्मत से काम लीजिए और नया जीवन जीने की तैयारी करके यहाँ से विदा होइए। बस, हमारी बात समाप्त।

॥ॐ शान्ति:॥

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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