बुधवार, 12 जुलाई 2017

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 2)

🔴 नारी घर की नियन्त्री है। वह सब तरह से घर का नियंत्रण करती है। घर के सब कामों की देख−रेख संचालन, व्यवस्था, उत्तरदायित्व उसी पर है। “गृहणी गृह मुच्यते” कहकर हमारे पूर्वजों ने इसीलिए उसका सम्मान किया है।

🔵 नारी अन्नपूर्णा है। घर में वह सभी को आवश्यक खाद्य पदार्थों से तृप्त करती है। पति से लेकर सास-ससुर, घर के अन्य सभी सदस्यों को समान रूप से तृप्त करती है। इतना ही नहीं अतिथि, गृह-पालित पशु से लेकर पड़ौस के कुत्ते तक को भी समान स्नेह, प्रेम, वात्सल्य के साथ भोजन देकर तृप्त करती है। इसीलिए उसे अन्नपूर्णा कहा गया है।

🔴 नारी निर्मात्री है। गृहकार्य, गृह व्यवस्था के साथ-साथ सत्सन्तति का निर्माण भी नारी ही करती है। बालक को जन्म देने से लेकर उसका विधिवत पालन-पोषण, शिक्षा, प्रेरणा द्वारा बच्चों को महान् बनाने का उत्तरदायित्व नारी पर ही हैं। इसीलिए उसे बालक की प्रथम आचार्य बताया गया है।

🔵 इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी का मानव समाज में बहुत बड़ा स्थान है, वैसे भी नारी जाति मानव समाज का आधा अंग है। जिसकी स्थिति से सम्पूर्ण समाज प्रभावित होता है। किसी मनुष्य के शरीर का अर्द्धांग असाध्य बीमारी से ग्रस्त हो या उसे लकवा मार जाय तो सम्पूर्ण शरीर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। इसी तरह नारी जाति की उत्कृष्टता अथवा निकृष्टता का प्रभाव मानव समाज पर पड़ता है। नारी की गति स्थिति पद-पद पर मानव जीवन को प्रभावित करती है।

🔴 आजकल हमारे गृहस्थ और सामाजिक जीवन में व्याप्त विषमता, कठिनाई, अशान्ति, क्लेश, दुराचार आदि का स्त्रियों पर भी कुछ कम उत्तरदायित्व नहीं है। पारिवारिक जीवन में फैली हुई बुराइयाँ, अशाँति, कलह, दाम्पत्य जीवन की शुष्कता और नीरसता तथा उलझनपूर्ण संघर्षों में नारी का भी बहुत बड़ा हाथ है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 36
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.36

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