बुधवार, 12 जुलाई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 July

🔴 विचार व्यर्थ के मनोरंजन समझे जाते हैं। पर वस्तुतः उनकी सृजनात्मक शक्ति अनन्त है। वे एक प्रकार के चुम्बक हैं जो अपने अनुरूप परिस्थितियों को कहीं से भी खींच बुलाते हैं। साधन किसी को उपहार में नहीं मिले और यदि मिले हों तो टिके नहीं। अपना पेट ही आहार पचाता और जीवित रहने योग्य रस रक्त का उत्पादन करता है। ठीक इसी प्रकार विचार प्रवाह ही व्यक्ति का स्तर विनिर्मित करता है। क्षमताएं उसी के आधार पर उत्पन्न होती हैं। पराक्रम के प्रवाह को दिशाधारा उसी से मिलती है।

🔵 सज्जनता का माहात्म्य बताना और धर्म की दुहाई देना सरल है। उसने वक्ता को धर्मोपदेश कहलाने का अवसर मिलता है और श्रोता भक्त जन समझे जाते हैं। यह सब सरल है। वाचाल और मूढ़मति इन दोनों कार्यों को सरलतापूर्वक करते और सस्ती वाहवाही लूटते रहते हैं। कठिन कार्य है अनीति का विरोध करना और अवाँछनीयता से जूझना। ऐसे जुझारू शूरवीर यदि उत्पन्न न हों तो समझना चाहिए अधर्म और अनाचार अपने स्थान पर यथावत बना रहेगा। उसे हटाने और मिटाने का कोई सुयोग न बनेगा। प्रतिरोध के अभाव में अनाचार के हौसले बढ़ते हैं और वह चौगुनी सौगुनी गति से बढ़कर उन लोगों को भी चपेट में लेता है जो मुँह न खोलने के कारण अपने को सुरक्षित समझते थे और सोचते थे कि हम किसी को नहीं छेड़ते तो हमें कोई क्यों छेड़ेगा?
                                               
🔴 अनाचारों का आक्रमण उन्हीं पर होता है जो सज्जनता की आड़ में अपनी कायरता को छिपाये बैठे रहते हैं। बहेलिये चिड़ियों और मछलियों को ही जाल में समेटते हैं। जलाशयों में रहने वाले घड़ियालों और जंगलों में घूमते चीतों से उन्हें भी डर लगता है। कीड़े-मकोड़ों को लोग पैरों तले कुचलते हैं पर साँप बिच्छुओं से उन्हें भी बच कर चलना पड़ता है। बर्र के छत्ते में हाथ कौन डालता है? अनीति करना बुरी बात है पर उसे सहन करते रहना उससे भी बुरा। जीत की सम्भावना न हो तो पिसते रहने की अपेक्षा विद्रोह पर उतारू होकर मर मिटना कहीं श्रेष्ठ है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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