शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 78)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 4— उपजातियों को बहुत महत्व न दिया जाय:- प्राचीन काल में चार वर्ण थे। प्रत्येक वर्ण के अन्तर्गत गोत्र बचाकर विवाह होते रहें। उपजातियों के कारण विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध शिथिल किये जांय।

🔵 5— विधवा या विधुरों से लिए समान सुविधा-असुविधा:- पुरुष और स्त्री के अधिकारों और कर्तव्यों में बहुत कुछ समानता है। इसलिए विधवा और विधुरों को भी समान सुविधा-असुविधा उपलब्ध हों।

🔴 साथी के मरने के बाद शेष जीवन एकाकी व्यतीत करना दोनों के लिए प्रशंसनीय है। पर यदि वे पुनः विवाह करना चाहें तो उन्हें समान रूप से सुविधा रहे। विधुरों के लिए यही उचित है कि वे विधवा से विवाह करें। विधवाओं का विवाह उतना ही अच्छा या बुरा माना जाय जितना विधुरों का।

🔵 6—आर्थिक आदान प्रदान न हो:- न तो कन्या के मूल्य के रूप में लड़की वाले वर पक्ष से कुछ धन मांगें और न लड़के वाले वर की कीमत लड़की वाले से पाने की आशा करें।

🔴 आदिवासियों, वन्य-जातियों, पिछड़े लोगों और पहाड़ी लोगों में वह रिवाज है कि वे लड़की का मूल्य लड़के से वसूल करते हैं। ऊंचे वर्ण वालों में ऐसा तभी होता है जब बूढ़े या अयोग्य लड़के को कोई लोभी बाप अपनी कन्या देता है, पर पिछड़े लोगों में कन्या का मूल्य लेना आम रिवाज है। इसी प्रकार सर्वत्र लोगों में लड़के की कीमत लड़की वालों से दहेज के रूप में तय की जाती है और उसमें कमी रह जाय तो अवांछनीय उपायों से उसे वसूल किया जाता है।

🔵 यह दोनों ही रिवाज समान रूप से घृणित और गर्हित हैं। इन्हें अनैतिक एवं मानवीय आदर्शों के विपरीत भी कहा जा सकता है। इन दोनों ही जंगली रिवाजों को सभ्य समाज में पूर्णतया बहिष्कृत किया जाना चाहिए। विवाह जैसे दो आत्माओं के एकीकरण संस्कार को आर्थिक सौदे-बाजी से सर्वथा दूर रखा जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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