शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 24) 21 Jan

🌹 आत्मविश्वास क्या नहीं कर सकता?

🔵 दूसरे दिन सेना ने कूच कर दिया, सेना का नेतृत्व युद्ध अनुभवों से सर्वथा अपरिचित फकीर कर रहा था। थोड़ी ही दूर वे चले होंगे कि फकीर ने रुकने का संकेत किया, इस नये सेनापति के आदेश पर सेना रुक गई। सेनापति चाहे जो निर्णय ले, सभी सैनिक उसका अनुकरण करने पर मजबूर थे। युद्ध क्षेत्र अभी दूर था। बीच में अकारण रुककर समय बर्बाद करने का कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा था। सैनिक असमंजस में पड़ गये। इसी बीच सामने के मन्दिर की ओर इशारा करते हुए कहा— ‘‘युद्ध से पूर्व इस मन्दिर के देवता से पूछ लेते हैं कि जीत होगी या हार। यदि देवता जीत के लिए कह देते हैं तो फिर किसी का डर नहीं। दुश्मन की सेना कितनी ही विकट क्यों न हो जीत निश्चित ही हमारी होगी। यदि नहीं तो फिर चलने से क्या लाभ!’’

🔴 सैनिकों ने कहा कि आप तो एकान्त में देवता से पूछेंगे। देवता क्या उत्तर देते हैं यह हमें कैसे पता चलेगा?’’ ‘‘नहीं! अकेले में नहीं पूछूंगा। तुम सबके सामने ही देवता के सामने मैं प्रश्न करूंगा।’’ यह कहते हुए फकीर ने झोली से एक चमकता हुआ सिक्का निकाला और बताया कि अगर यह सिक्का चित्त गिरता है तो जीत हमारी ही होगी, यदि पट गिरेगा तो हम वापिस लौट जायेंगे। फकीर ने सिक्का ऊपर उछाला— सिक्के के गिरने के साथ ही उनके भाग्य का निर्णय होना था। सब विस्फारित नेत्रों से एक टक सिक्के को देख रहे थे। सिक्के के गिरते ही सबकी आंखें चमक गयीं। सिक्का चित्त गिरा था—जीत सुनिश्चित थी फकीर ने सबको उत्साहित करते हुए कहा— ‘‘अब डरने की कोई बात नहीं, देवता का आश्वासन हमें मिल गया है।’’

🔵 दोनों पक्षों की भयंकर लड़ाई के बाद जीत जापान के पक्ष में हुई। युद्धोपरान्त सैनिकों ने मन्दिर के पास पहुंचकर कहा कि देवता को धन्यवाद दे दें जिसने हमें जिताया, फकीर ने कहा देवता को धन्यवाद देने की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने आपको धन्यवाद दो। तुम स्वयं ही अपनी जीत के आधार हो।’

🔴 ‘‘जीत का देवता से कोई सम्बन्ध नहीं।’’ यह कहते हुए फकीर ने सिक्का पुनः झोली से निकालकर सैनिकों के हाथ पर रख दिया। सैनिकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि सिक्के के दोनों और चित्त के निशान थे। यह और कुछ नहीं सैनिकों के सोये आत्मविश्वास को जगाने की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भर थी जो अन्ततः जीत का कारण बनी।

🔵 संसार की महत्वपूर्ण सफलताओं का इतिहास आत्मविश्वास की गौरव गाथा से भरा पड़ा है। उत्कर्ष व्यक्ति का करना हो— समाज का अथवा राष्ट्र का, सर्वप्रथम आवश्यकता है अपने अन्दर सोये आत्मविश्वास रूपी देवता को जगाया जाये। अनुदान-वरदान सहज ही बरसते चले आयेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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