शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 29)

🌞  हिमालय में प्रवेश

अपने और पराये

🔵 आज भेरों घाटी पार की। तिब्बत से व्यापार करने के लिए नैलंग घाटी का रास्ता यहीं से है। हर्षिल के जाड़ और खापा व्यापारी इसी रास्ते तिब्बत के लिए माल बेचने ले जाते हैं और बदले में उधर से ऊन आदि लाते हैं। चढ़ाई बहुत कड़ी होने के कारण थोड़ी-थोड़ी दूर चलने पर ही सांस फूलने लगता था और बार-बार बैठने एवं सुस्ताने की आवश्यकता अनुभव होती थी।

🔴 पहाड़ की चट्टान के नीचे बैठा सुस्ता रहा था। नीचे गंगा इतने जोर से गर्जन कर रही थी जितनी रास्ते भर में अन्यत्र नहीं सुना। पानी के छींटे उछल कर तीस-चालीस फुट तक ऊंचे आ रहे थे। इतना गर्जन-तर्जन, इतना जोश, इतना तीव्र प्रवाह यहां क्यों है, यह जानने की उत्सुकता बढ़ी और ध्यान पूर्वक नीचे झांककर देखा तथा दूर-दूर तक दृष्टि दौड़ाई।

🔵 दिखाई दिया कि यहां गंगा दोनों ओर सटे पहाड़ों के बीच बहुत छोटी सी चौड़ाई में होकर गुजरती है। यह चौड़ाई मुश्किल से पन्द्रह-बीस फुट होगी। इतनी बड़ी जलराशि इतनी तंग जगह में होकर गुजरे तो वहां प्रवाह की तीव्रता होनी ही चाहिये। फिर उसी मार्ग में कई चट्टानें पड़ी थीं, जिनसे जलधारा तेजी से टकराती थी उस टकराहट से ही घोर शब्द हो रहा था और इतनी ऊंची उछालें छींटों के रूप में मार रहा था। गंगा के प्रचण्ड प्रवाह का दृश्य यहां देखते नहीं बनता था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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