शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 28)

🌞  हिमालय में प्रवेश

अपने और पराये

🔵 जितनी यात्रा करके हम थक जाते हैं उससे कहीं अधिक चढ़ने उतरने और चलने का काम इन्हें करना पड़ता है। कोई मनोरंजन के साधन भी नहीं। कहीं हाथ से कती ऊन के बने कहीं सूती फटे टूटे कपड़ों में ढके थे फिर भी वे सब बहुत प्रसन्न दीखते थे। खेतों पर काम करती हुई स्त्रियां मिलकर गीत गाती थीं। उनकी भाषा न समझने के कारण उन गीतों का अर्थ तो समझ में न आता था पर उल्लास और सन्तोष जो उनमें से टपका पड़ता है उसे समझने में कुछ भी कठिनाई नहीं हुई।

🔴 सोचता हूं अपने नीचे के प्रान्तों के लोगों के पास यहां के निवासियों की तुलना में धन, सम्पत्ति, शिक्षा, साधन, सुविधा, भोजन मकान सभी कुछ अनेक गुना अधिक है। उन्हें श्रम भी काफी कम करना पड़ता है फिर भी लोग अपने को दुःखी और असन्तुष्ट ही अनुभव करते हैं, हर घड़ी रोना ही रोते रहते हैं। दूसरी ओर यह लोग हैं कि अत्यधिक कठिन जीवन बिता के जो निर्वाह योग्य सामग्री प्राप्त हो जाती है उसी से काम चला लेते हैं और सन्तुष्ट रहकर शान्ति का जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसा यह अन्तर क्यों है?

🔵 लगता है—असन्तोष एक प्रवृत्ति है जो साधनों से नहीं तृष्णा से सम्बन्धित है। साधनों से तृष्णा तृप्त नहीं होती वरन् सुरसा के मुंह की तरह और अधिक बढ़ती है। यदि ऐसा न होता तो इसे पहाड़ी जनता की अपेक्षा अनेक गुने सुख साधन रखने वाले असन्तोष क्यों रहते? और स्वल्प साधनों के होते हुए भी यह पहाड़ी लोग गाते बजाते हर्षोल्लास से जीवन क्यों बिताते?

🔴 अधिक साधन हों तो ठीक है। उनकी जरूरत भी है, पर वे जितने मिल सकें उतने से प्रसन्न रहने और परिस्थिति के अनुसार अधिक प्राप्ति करने का प्रयत्न करने की नीति को क्यों त्यागा जाय? और क्यों अशांत और असन्तुष्ट रहकर उपलब्ध ईश्वरीय उपहार का तिरष्कार किया जाय?

🔵 सभ्यता की अन्धी दौड़ में अधिक खर्च और अधिक असन्तुष्ट रहने का जो रास्ता हमने अपनाया है, वह सही नहीं है। इस तथ्य का प्रतिपादन यह पहाड़ी जनता करती है भले वह इस विषय पर भाषण न दे सके, भले ही वह इस आदर्श पर निबन्ध न लिख सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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