बुधवार, 25 दिसंबर 2019

👉 शांति की तलाश Looking For Peace

एक बार भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कही जा रहे थे। उनके प्रिय शिष्य आनंद ने मार्ग में उनसे एक प्रश्न पूछा -‘भगवान! जीवन में पूर्ण रूप से कभी शांति नहीं मिलती, कोई ऐसा मार्ग बताइए कि जीवन में सदा शांति का अहसास हो।

बुद्ध आनंद का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए बोले, तुम्हे इसका जबाब अवश्य देगे किन्तु अभी हमे प्यास लगी है, पहले थोडा जल पी ले। क्या हमारे लिए थोडा जल लेकर आओगे?

बुद्ध का आदेश पाकर आनंद जल की खोज में निकला तो थोड़ी ही दूरी पर एक झरना नजर आया। वह जैसे ही करीब पंहुचा तब तक कुछ बैलगाड़िया वहां आ पहुची और झरने को पार करने लगी। उनके गुजरने के बाद आनंद ने पाया कि झील का पानी बहुत ही गन्दा हो गया था इसलिए उसने कही और से जल लेने का निश्चय किया। बहुत देर तक जब अन्य स्थानों पर जल तलाशने पर जल नहीं मिला तो निराश होकर उसने लौटने का निश्चय किया।

उसके खाली हाथ लौटने पर जब बुद्ध ने पूछा तो उसने सारी बाते बताई और यह भी बोला कि एक बार फिर से मैं किसी दूसरी झील की तलाश करता हूँ जिसका पानी साफ़ हो। यह कहकर आनंद जाने लगा तभी भगवान बुद्ध की आवाज सुनकर वह रुक गया। बुद्ध बोले-‘दूसरी झील तलाश करने की जरुरत नहीं, उसी झील पर जाओ।

आनन्द दोबारा उस झील पर गया किन्तु अभी भी झील का पानी साफ़ नहीं हुआ था । कुछ पत्ते आदि उस पर तैर रहे थे। आनंद दोबारा वापिस आकर बोला इस झील का पानी अभी भी गन्दा है। बुद्ध ने कुछ देर बाद उसे वहाँ जाने को कहा। थोड़ी देर ठहर कर आनंद जब झील पर पहुंचा तो अब झील का पानी बिलकुल पहले जैसा ही साफ़ हो चुका था। काई सिमटकर दूर जा चुकी थी, सड़े- गले पदार्थ नीचे बैठ गए थे और पानी आईने की तरह चमक रहा था।

इस बार आनंद प्रसन्न होकर जल ले आया जिसे बुद्ध पीकर बोले कि आनंद जो क्रियाकलाप अभी तुमने किया, तुम्हारा जबाब इसी में छुपा हुआ है। बुद्ध बोले -हमारे जीवन के जल को भी विचारों की बैलगाड़ियां रोज गन्दा करती रहती है और हमारी शांति को भंग करती हैं। कई बार तो हम इनसे डर कर जीवन से ही भाग खड़े होते है, किन्तु हम भागे नहीं और मन की झील के शांत होने कि थोड़ी प्रतीक्षा कर लें तो सब कुछ स्वच्छ और शांत हो जाता है। ठीक उसी झरने की तरह जहाँ से तुम ये जल लाये हो। यदि हम ऐसा करने में सफल हो गए तो जीवन में सदा शान्ति के अहसास को पा लेगे।

👉 वृत्ति, बुद्धि, विवेक

विवेक, बुद्धि और वृत्ति-इन्हीं तीनों के इर्द-गिर्द मनुष्य की समग्र चेतना घूमती है। इन्हीं तीन से उसकी दशा और दिशा बदलती है, परिवर्तित होती है। विवेक मानव चेतना की श्रेष्ठतम भावदशा में अंकुरित एवं विकसित होता है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि विवेक के अंकुरण से मानव चेतना अपनी श्रेष्ठतम अवस्था में पहुँच जाती है। जबकि बुद्धि मानव चेतना की मध्यवर्ती दशा है। इन दोनों से अलग वृत्ति मानव चेतना की निम्नतम अवस्था का प्रमाण है।
  
निश्चित रूप से वृत्ति पाश्विक है, बुद्धि मानवीय है और विवेक दिव्य है। वृत्ति सहज और अंधी है, इसे चेतना की सुप्तावस्था भी कह सकते हैं। यह अचेतन का जगत् है, यहाँ न शुभ है न अशुभ, न तो यहाँ भेद है और न विकास के लिए कोई संघर्ष। यहाँ तो बस वासनाओं की अंधी अँधेरी आँधियाँ हैं।
  
जबकि बुद्धि में न निद्रा है और न जागरण है। यहाँ अर्धमूर्च्छा है। यहाँ वृत्ति और विवेक के बीच संक्रमण है। यह देहरी है। इसमें चैतन्यता का एक अंश है, लेकिन बाकी हिस्से में गहरी अचेतनता है। यहाँ शुभ और अशुभ का भेद है। वासना के साथ विचार भी विद्यमान है।
  
विवेक मानव चेतना की पूर्ण जाग्रत् अवस्था है। यहाँ शुद्ध चैतन्यता है, यहाँ केवल प्रकाश हैं, यहाँ भी कोई संघर्ष नहीं हैं। बस शुभ का, सत् का, सौन्दर्य का सहज प्रवाह है। यहाँ बड़ी ही सजग सहजता है।
  
सहज वृत्ति भी है और विवेक भी, परन्तु वृत्ति में अंधी सहजता है और विवेक में सजग सहजता। केवल बुद्धि भर असहज है। इसमें पीछे की ओर वृत्ति है और आगे की ओर विवेक है। उसके शिखर की लौ विवेक की ओर है। लेकिन आधार की जड़ें  वृत्ति में हैं। शिखर कुछ-तलहटी कुछ, यही खिंचाव है। पशु में डूबने का आकर्षण-परमात्मा में उठने की चुैनाती, उसमें दोनों एक साथ हैं।
  
उपाय एक ही है, बुद्धि का विवेक में परिवर्तन। वृत्ति का बुद्धि के संक्रमण पथ से गुजरते हुए विवेक में रूपान्तरण। इसके लिए अंधेरे में दिया जलाना होगा। मूर्च्छा छोड़नी होगी। तभी वृत्ति की पाश्विकता एवं बुद्धि की मानवीयता विवेक की दिव्यता में रूपान्तरित हो सकेगी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४५

👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (अन्तिम भाग)

दिन व्यतीत हो जाने पर रात्रि को जब बिस्तर पर जाया जाय तो दिन भर की मानसिक चिन्तन प्रणाली और शारीरिक गतिविधियों की निष्पक्ष समीक्षा करनी चाहिए। जहाँ-जहाँ सदाशयता भरे कदम उठाये गये हैं वहाँ उनकी आत्मिक दृढ़ता को सराहना चाहिए। जहाँ साधारण मनुष्यों की अपेक्षा असाधारण उत्कृष्ट कर्तृत्व का परिचय दिया गया हो, वहाँ अपने आत्मबल पर गर्व और सन्तोष अनुभव करना चाहिए और जहाँ चूक हुई तो उसके लिए पश्चाताप प्रायश्चित करते हुए अगले दिन वैसा न करने की अपने आपको कड़ी चेतावनी देनी चाहिए। जिस प्रकार व्यापारी अपने बही खाते से यह अनुमान लगाते रहते हैं कि कारोबार नफे में चल रहा है या नुकसान में, ठीक इसी तरह अपनी भावना और क्रिया के जीवन व्यापार की गतिविधियों की समीक्षा करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि हम ऊपर उठ रहे हैं या नीचे गिर रहे हैं। यदि उठ रहे हो, तो उस उत्कर्ष की गति और भी तीव्र करने का उत्साह पैदा करना चाहिए और यदि पतन बढ़ रहा हो तो उसे रोकने के लिए रुद्र रूप धारण करना चाहिए। गीता में भगवान ने अलंकारिक रूप से जिन कौरवों से लड़ने के लिए कहा था वस्तुतः वे मनोविकार ही हैं। यह महाभारत हर व्यक्ति के जीवन में लड़ा जाना चाहिए। अपने दोष दुर्गुणों को निरस्त करने के लिए हर व्यक्ति को तरकस तूरीण सम्भालकर रखना चाहिए।

भूलों के लिए पश्चाताप प्रार्थना भर पर्याप्त नहीं, वरन् उसके लिए प्रायश्चित भी किया जाना चाहिए। छोटी भूलों के लिए छोटे शारीरिक दण्ड दिये जा सकते हैं, भोजन में कटौती, कान पकड़कर बैठक लगाना, कुछ समय खड़े रहना, देर तक जागना, चपत लगाना आदि दण्ड हो सकते हैं। यदि दूसरों को क्षति पहुँचाई गई है तो उसकी पूर्ति समाज को किसी सत्प्रवृत्ति के अभिवर्धन के लिए अनुदान देकर पूरी कर देनी चाहिए। दुष्कर्मों का प्रायश्चित यही है कि व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति की पूर्ति समाज की सुविधा बढ़ाने के लिए लगा दी जाय। दुष्कर्मों का फल इसी तरह शमन होता है। मात्र छुट-पुट पूजा पाठ कर लेने से उनकी निवृत्ति नहीं हो सकती।

आत्मबोध की अग्रिम प्रगति सत्कर्मों में अनुरक्ति है। संसार में जो अन्धेर, अविवेक और अनाचार चल रहा है, उसके प्रति आकर्षण नहीं घृणा ही होनी चाहिए। उसे अपनाने के लिए नहीं प्रतिरोध के लिए ही अपनी चेष्टा होनी चाहिए। व्यक्तित्व का निर्माण इसी प्रकार होगा। हमें अपने व्यक्तित्व का आदर्शवादी निर्माण करके समाज निर्माण की महत्त्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करनी चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 3)

Q.3. Why is Gayatri represented as a female deity?  

Ans. Several people say that when masculine words have been used in Gayatri how can it be said Gayatri Mata? It should be understood that the Absolute Divinity it represents, is all pervasive and formless. It is beyond gender. In scriptures both masculine and feminine words are used for fire, air etc. The famous Sanskrit couplet which is a prayer to God says, ‘Oh God, you are mother, you are father (Twameva Mata-cha Pita Twameva).’ Literally,  Savita may be called masculine, but its power, Savitri is feminine. These allegorical descriptions in the scriptures should be taken as such, and not used to score declamatory points. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 38


👉 विचार करें

हमारे व्यक्तित्व के श्रेष्ठतर विकास की जरूरत समझने के लिए नीचे लिखे बिन्दुओं पर विचार करना होगा

1.    हम पत्रिकाओं के ग्राहक बना लेते हैं, किन्तु उन्हें क्रमशः पाठक, साधक और सैनिक के रूप में विकसित करने की जिम्मेदारी चाहकर भी उठा नहीं पा रहे हैं।

2.    हम बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को दीक्षा दिलवा देते हैं, किन्तु उन्हें क्रमशः उपासना, साधना और आराधना में कुशल बनाने, समयदान और अंशदान में निष्ठापूर्वक आगे बढ़ाने के प्रयास ठीक से नहीं कर पा रहे हैं।

3.    हम युग साहित्य के मेले लगाते हैं, उसका विक्रय बढ़ाते हैं, लेकिन युगविचार से युगरोगों के उपचार की प्रेरणा जन- जन तक नहीं पहुँचा पा रहे हैं।

4.    हम साधना से सिद्धि की बातें दुहराते हैं, किन्तु स्वयं को उस साधना में आगे नहीं बढ़ाते जिससे हम सच्चे अग्रदूत सिद्ध हो सकें।

5.    हम अपने आयोजनों और प्रबुद्ध वर्ग की गोष्ठियों में विभिन्न वर्गों और संगठनों के प्रतिभावानों को शामिल तो कर लेते हैं, किन्तु उन्हें युग निर्माण के सूत्रों को अपने प्रभाव क्षेत्र में लागू करने के लिए प्रेरित नहीं कर पा रहे हैं।

6.    हम सभी सम्प्रदायों और संगठनों को युग सृजन में भागीदार बनाना चाहते हैं, लेकिन उन्हीं के विश्वास के अनुसार उनमें प्रेरणा भरने योग्य स्वयं को ढाल नहीं पा रहे हैं।
उक्त सब तथ्यों पर विचार करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अगले कार्यों को सम्पन्न करने के लिए अपने व्यक्तित्वों को ऊँचा बनाने में हम कहीं पिछड़ रहे हैं।

सम्पादकीय प्रज्ञा आभियान 16 जनवरी 2014 Page 2

Aaj Ki Sabse Badi Samasya | आज की सबसे बड़ी समस्या | Dr Chinmay Pandya



Title

सोमवार, 23 दिसंबर 2019

👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (भाग ५)

हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत की अनुभूति यदि की जा सके तो उससे उत्कृष्ट जीवन जीने की बहुत ही सुव्यवस्थित योजना बन जाती है। हर दिन एक जीवन मानकर चला जाय और उसे श्रेष्ठतम तरीके से जीकर दिखाने का प्रातःकाल ही प्रण कर लिया जाय तो यह ध्यान दिन भर प्रायः हर घड़ी बना रहता है कि आज कोई निकृष्ट विचार मन में नहीं आने देना है, निकृष्ट कर्म नहीं करना है, जो कुछ सोचा जायेगा वैसा ही होगा और जितने भी कार्य किये जायेंगे उनमें नैतिकता और कर्तव्य निष्ठा का पूरा ध्यान रखा जायेगा। प्रातःकाल पूरे दिन की दिनचर्या निर्धारित कर लेनी चाहिये और सोच लेना चाहिए कि उस दिन भर की क्रिया पद्धति में कहाँ कब कैसे अवांछनीय चिन्तन का अवांछनीय कृति का अवसर आ सकता है? उस आशंका के स्थल का पहले ही उपाय सोच लिया जाय, रास्ता निकाल लिया जाय तो समय पर उस निर्णय की याद आ जाती है और सम्भावित बुराई से बचना सरल हो जाता है।

बुराई से बचना ही काफी नहीं आवश्यकता इस बात की भी है कि अपनी विचारणा भावना, चिन्तन प्रक्रिया सामान्य मनुष्यों जैसी न रहकर उच्च स्तर के सहृदय सज्जनों जैसी रहे और सारे काम पेट परिवार के लिए ही न होते रहें, वरन् लोक सेवा के लिए भी समय, श्रम, चिन्तन तथा धन का जितना अधिक समय हो सके उतना लगाया जाय। शरीर तथा शरीर से सम्बन्ध, सुविधाओं तथा सम्बन्धियों के लिए ही हमारा प्रयास सीमित नहीं हो जाना चाहिए, वरन् देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के लिए विश्व मानव की शान्ति एवं समृद्धि के लिए भी हमें बहुत कुछ करना चाहिए। आत्मा की भूख और हृदय की प्यास इस श्रेष्ठ कर्तृत्व से ही पूरी होती है। जीवनोद्देश्य की पूर्ति, ईश्वर की प्रसन्नता एवं आत्म कल्याण की बात को ध्यान में रखते हुए हमें कुछ ऐसा विशिष्ट भी करना चाहिए जिसे शरीर की परिधि से ऊपर आत्मा की श्रेय साधना में गिना जा सके।

इस प्रकार एक दिन के जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की याद यदि हर घड़ी ध्यान में बनी रहे तो वह दिन आदर्श ही व्यतीत होगा। ठीक इसी प्रक्रिया की हर दिन पुनरावृत्ति की जाती रहे तो एक के बाद एक दिन, एक से एक बढ़कर बनेगा और यह क्रम बनाकर चलते रहने से अपने गुण, कर्म, स्वभाव में श्रेष्ठता ओत-प्रोत हो जायेगी। उसे ओछे दृष्टिकोण और हेय कर्मों को यदि निरन्तर अपनी गतिविधियों में से पृथक किया जाता रहे तो थोड़े दिनों में स्वभाव ही ऐसा बन जायेगा कि बुराई को देखते ही घृणा होने लगे और उसे अपनाने के लिये अन्तःकरण किसी भी सूरत में तैयार न हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 श्रद्धा, सिद्धान्तों के प्रति हो (अंतिम भाग)

तो क्या करना चाहिए। बेटे, मैं नहीं बताता हूँ। कैसे कहूँ आपको, देख लीजिए और हमको पढ़ लीजिए। हमारी श्रद्धा को पढ़ लीजिए। जिस दिन से हमने साधना के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, अध्यात्म के क्षेत्र में कदम बढ़ाया, उस दिन से लेकर आज तक हमारी निष्ठा ज्यों की त्यों बनी हुई है। इसमें कहीं एक राई-रत्ती, सुई के नोंक के बराबर फर्क नहीं आएगा। जिस दिन तक हमारी लाश उठेगी उस दिन तक आप कभी यह नहीं सुनेंगे कि इन्होंने अपनी श्रद्धा डगमगा दी। इन्होंने अपने विश्वास में कमी कर दी।

आप हमारी वंश-परम्परा को जानिए और हम मरने के बाद में जहाँ कहीं भी रहेंगे, भूत बनकर देखेंगे। हम देखेंगे कि जिन लोगों को हम पीछे छोड़कर आए थे, उन्होंने हमारी परम्परा को निबाहा है और अगर हमको यह मालूम पड़ा कि इन्होंने हमारी परम्परा नहीं निबाही और इन्होंने व्यक्तिगत ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया और अपना व्यक्तिगत अहंकार, अपनी व्यक्तिगत यश−कामना और व्यक्तिगत धन-संग्रह करने का सिलसिला शुरू कर दिया। व्यक्तिगत रूप से बड़ा आदमी बनना शुरू कर दिया, तो हमारी आँखों से आँसू टपकेंगे और जहाँ कहीं भी हम भूत होकर के पीपल के पेड़ पर बैठेंगे, वहाँ जाकर के हमारी आँखों से जो आँसू टपकेंगे-आपको चैन से नहीं बैठने देंगे और मैं कुछ कहता नहीं हूँ। आपको हैरान कर देंगे हैरान। दुर्वासा ऋषि के पीछे विष्णु भगवान का चक्र लगा था तो दुर्वासा जी तीनों लोकों में घूम आए थे, पर उनको चैन नहीं मिला था। आपको भी चैन नहीं मिलेगा। अगर हमको विश्वास देकर के विश्वासघात करेंगे तो मेरा शाप है आपको चैन नहीं पड़ेगा कभी भी और न आपको यश मिलेगा, न आपको ख्याति मिलेगी, न उन्नति होगी। आपका अधःपतन होगा। आपका अपयश होगा और आपकी जीवात्मा आपको मारकर डाल देगी। आप यह मत करना, अच्छा!

मुझे अपने मन की बात कहनी थी, सो मैंने कह दी। अब करना आपका काम है कि इन बताई हुई बातों को किस हद तक कार्य में लें और और कहाँ तक चलें? बस ये ही मोटी-मोटी बातें थीं जो मैंने आपसे कहीं। बस मेरा मन हल्का हो गया। अब आप इन्हें सोचना। मालूम नहीं आप इन्हें कार्यरूप में लाएँगे या नहीं लाएँगे। यदि लाएँगे तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी और मैं समझूँगा कि आज मैंने जी खोलकर आपके सामने जो रखा था आपने उसे ठीक तरीके से पढ़ा, समझा और जीवन में उतार करके उसी तरह का लाभ उठाने की सम्भावना शुरू कर दी जैसे कि मैंने अपने जीवन में की।

यह रास्ता आपके लिए भी खुला है, भले आप पीछे-पीछे आइए, साथ आइए। हमको देखिए और अपने आपको ठीक करिए।

.... बस हमारी बात समाप्त।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

ॐ शान्ति।

रविवार, 22 दिसंबर 2019

👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (भाग ५)

हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत की अनुभूति यदि की जा सके तो उससे उत्कृष्ट जीवन जीने की बहुत ही सुव्यवस्थित योजना बन जाती है। हर दिन एक जीवन मानकर चला जाय और उसे श्रेष्ठतम तरीके से जीकर दिखाने का प्रातःकाल ही प्रण कर लिया जाय तो यह ध्यान दिन भर प्रायः हर घड़ी बना रहता है कि आज कोई निकृष्ट विचार मन में नहीं आने देना है, निकृष्ट कर्म नहीं करना है, जो कुछ सोचा जायेगा वैसा ही होगा और जितने भी कार्य किये जायेंगे उनमें नैतिकता और कर्तव्य निष्ठा का पूरा ध्यान रखा जायेगा। प्रातःकाल पूरे दिन की दिनचर्या निर्धारित कर लेनी चाहिये और सोच लेना चाहिए कि उस दिन भर की क्रिया पद्धति में कहाँ कब कैसे अवांछनीय चिन्तन का अवांछनीय कृति का अवसर आ सकता है? उस आशंका के स्थल का पहले ही उपाय सोच लिया जाय, रास्ता निकाल लिया जाय तो समय पर उस निर्णय की याद आ जाती है और सम्भावित बुराई से बचना सरल हो जाता है।

बुराई से बचना ही काफी नहीं आवश्यकता इस बात की भी है कि अपनी विचारणा भावना, चिन्तन प्रक्रिया सामान्य मनुष्यों जैसी न रहकर उच्च स्तर के सहृदय सज्जनों जैसी रहे और सारे काम पेट परिवार के लिए ही न होते रहें, वरन् लोक सेवा के लिए भी समय, श्रम, चिन्तन तथा धन का जितना अधिक समय हो सके उतना लगाया जाय। शरीर तथा शरीर से सम्बन्ध, सुविधाओं तथा सम्बन्धियों के लिए ही हमारा प्रयास सीमित नहीं हो जाना चाहिए, वरन् देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के लिए विश्व मानव की शान्ति एवं समृद्धि के लिए भी हमें बहुत कुछ करना चाहिए। आत्मा की भूख और हृदय की प्यास इस श्रेष्ठ कर्तृत्व से ही पूरी होती है। जीवनोद्देश्य की पूर्ति, ईश्वर की प्रसन्नता एवं आत्म कल्याण की बात को ध्यान में रखते हुए हमें कुछ ऐसा विशिष्ट भी करना चाहिए जिसे शरीर की परिधि से ऊपर आत्मा की श्रेय साधना में गिना जा सके।

इस प्रकार एक दिन के जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की याद यदि हर घड़ी ध्यान में बनी रहे तो वह दिन आदर्श ही व्यतीत होगा। ठीक इसी प्रक्रिया की हर दिन पुनरावृत्ति की जाती रहे तो एक के बाद एक दिन, एक से एक बढ़कर बनेगा और यह क्रम बनाकर चलते रहने से अपने गुण, कर्म, स्वभाव में श्रेष्ठता ओत-प्रोत हो जायेगी। उसे ओछे दृष्टिकोण और हेय कर्मों को यदि निरन्तर अपनी गतिविधियों में से पृथक किया जाता रहे तो थोड़े दिनों में स्वभाव ही ऐसा बन जायेगा कि बुराई को देखते ही घृणा होने लगे और उसे अपनाने के लिये अन्तःकरण किसी भी सूरत में तैयार न हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

Karm Ya Pakhand_Akhand Jyoti | कर्म या पाखंड | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

Ishwariya Jagran Ka Mantra | ईश्वरीय जागरण का मंत्र | Dr Chinmay Pandya



Title

👉 श्रद्धा, सिद्धान्तों के प्रति हो (भाग ४)

अब एक और नई बात शुरू करते हैं। नई बात यह है कि यह मिशन हमने कितने परिश्रम से बनाया? कितना विस्तार इसका हो गया, कितना फैल गया, कितना खुल गया? कितना विस्तार होता जाता है? आप सुनते रहते है न, हजार कुण्ड के यज्ञीय समाचार आपको मिलते हैं। आपको २४०० शक्तिपीठों की स्थापना की बात मिलती है। इस साल जो युग-निर्माण सम्मेलन हुए है उन सम्मेलनों की बात याद है। यहाँ तक कि शिविर चलते हैं उनकी बात याद है। गवर्नमेण्ट के कितने शिविरों को हम चलाते हैं, इसकी बात याद है। यहाँ की फिल्म स्टूडियो, टी वी स्टूडियो, फिल्म चलाने वाले हैं—यह सब बातें आपको याद हैं। बहुत बड़ा काम है। बहुत बड़ी योजना है। इस काम को हमने आरम्भ किया, लेकिन अब यह जिम्मेदारी हम आपके सुपुर्द करते हैं। आपमें से हर आदमी को हम यह काम सौंपते हैं कि आप हमारे बच्चे के तरीके से हमारी दुकान चलाइए, बंद मत होने दीजिए। हम तो अपनी विदाई ले जाएँगे, लेकिन जिम्मेदारी आपके पास आएगी। आप कपूत निकलेंगे तो, फिर आदमी आपकी बहुत निंदा करेगा और हमारी बहुत निंदा करेगा।

कबीर का बच्चा ऐसा हुआ था जो कबीर के रास्ते पर चलता नहीं था, तो सारी दुनिया ने उससे यह कहा—'बूढ़ा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल।' आपको कमाल कहा जाएगा और कहा जाएगा कि कबीर तो अच्छे आदमी थे, लेकिन उनकी संतानें दो कौड़ी की भी नहीं हैं। आपको दो कौड़ी की संतानें पैदा नहीं करना है। आपको इस कार्य का विस्तार करना है। जो काम हम करते रहे हैं, वह अकेले हमने नहीं किया। मिल-जुल करके ढेरों आदमियों के सहयोग से किया है और यह सहयोग हमने प्यार से खींचे हैं, समझा करके खींचे हैं, आत्मीयता के आधार पर खींचे हैं। ये गुण आपके भीतर पैदा हो जाएँ तो जो आदमी आपके साथ-साथ काम करते रहते हैं, उनको भी मजबूत बनाए रहेंगे और नए आदमी जिनकी कि इससे आगे भी आवश्यकता पड़ेगी। अभी ढेरों आदमियों की आवश्यकता पड़ेगी। आपको संकल्प का नाम याद है न—'नया युग लाने का संकल्प।' नया युग लाने का संकल्प दो आदमियों का काम है, चार आदमियों का काम है, हजारों आदमियों का काम है। जो काम हमने अपने जीवन में किया है, वही काम आपको करना है।

नए आदमियों को बुलाने का भी आपका काम है। कैसे बुलाना? यहीं शान्तिकुञ्ज में कितने आदमी काम करते है? यहाँ २४० के करीब आदमी काम करते हैं। एक कुटुम्ब बनाकर बैठे हैं और उस कुटुम्ब को हम कौन-सी रस्सी से बाँधे बैठे हैं? प्यार की रस्सी से बाँधे हुए हैं, आत्मीयता की रस्सी से बाँधे हुए हैं, भावना की रस्सी से बाँधे हुए हैं। ये रस्सियाँ आपको तैयार करनी चाहिए, ताकि आप नए आदमियों को बाँध करके अपने पास रख सकें और जो आदमी वर्तमान में हैं आपके पास उनको मजबूती से जकड़े रह सकें। नहीं तो आप इनको भी मजबूती से जकड़े नहीं रह सकेंगे, यह भी नहीं रहेंगे। इनकी सफाई भी आपको करनी है। आत्मीयता अगर न होगी और आपका व्यक्तित्व न होगा तो आपके लिए इनकी सफाई करना भी मुश्किल हो जाएगा।

इसलिए क्या करना चाहिए? आपके पास एक ऐसी प्रेम की रस्सी होनी चाहिए, आपके पास ऐसी मिठास की रस्सी होनी चाहिए, आपके पास अपने व्यक्तिगत जीवन का उदाहरण पेश करने की ऐसी रस्सी होनी चाहिए, जिससे प्रभावित करके आप आदमी के हाथ जकड़ सकें, पैर जकड़ सकें, काम जकड़ सकें। सारे के सारे को जकड़ करके जिंदगी भर अपने साथ बनाए रख सकें। यह काम आपको भी विशेषता के रूप में पैदा करना पड़ेगा। संस्थाएँ इसी आधार पर चलती हैं। संस्थाओं की प्रगति इसी आधार पर टिकी है। संस्थाएँ जो नष्ट हुई हैं, संगठन जो नष्ट हुए हैं, इसी कारण नष्ट हुए हैं। चलिए मैं आपको एक-दो उदाहरण सुना देता हूँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

👉 ईमानदारी ही सर्वश्रेष्ठ नीति Imandari Hi Sarvashreshth Niti

काम की तलाश में इधर-उधर धक्के खाने के बाद निराश होकर जब वह घर वापस लौटने लगा तो पीछे से आवाज आयी, ऐ भाई! यहाँ कोई मजदूर मिलेगा क्या?

उसने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि एक झुकी हुई कमर वाला बूढ़ा तीन गठरियाँ उठाए हुए खड़ा है। उसने कहा, हाँ बोलो क्या काम है? मैं ही मजदूरी कर लूँगा।

मुझे रामगढ़ जाना है.........। दो गठरियाँ में उठा लूँगा, पर....मेरी तीसरी गठरी भारी है, इस गठरी को तुम रामगढ़ पहुँचा दो, मैं तुम्हें दो रुपये दूँगा। बोलो काम मंजूर है।

ठीक है। चलो ....आप बुजुर्ग हैं। आपकी इतनी मदद करना तो यूँ भी मैं अपना फर्ज समझता हूँ। इतना कहते हुए गठरी उठाकर अपने सिर पर रख ली। किन्तु गठरी रखते ही उसे इसके भारीपन का अहसास हुआ। उसने बूढ़े से कहा- ये गठरी तो काफी भारी लगती है।

हाँ..... इसमें एक-एक रुपये के सिक्के हैं। बूढ़े ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा।

उसने सुना तो सोचा, होंगे मुझे क्या? मुझे तो अपनी मजदूरी से मतलब है। ये सिक्के भला कितने दिन चलेंगे? तभी उसने देखा कि बूढ़ा उस पर नजर रखे हुए है। उसने सोचा कि ये बूढ़ा जरूर ये सोच रहा होगा, कहीं ये भाग तो नहीं जाएगा। पर मैं तो ऐसी बेईमानी और चोरी करने में विश्वास नहीं करता। मैं सिक्कों के लालच में फँसकर किसी के साथ बेईमानी नहीं करूँगा।

चलते-चलते आगे एक नदी आ गयी। वह तो नदी पार करने के लिए झट से पानी में उतर गया, पर बूढ़ा नदी के किनारे खड़ा रहा। उसने बूढ़े की ओर देखते हुए पूछा- क्या हुआ? आखिर रुक क्यों गए?

बूढ़ा आदमी हूँ। मेरी कमर ऊपर से झुकी हुई है। दो-दो गठरियों का बोझ नहीं उठा सकता.... कहीं मैं नदी में डूब ही न जाऊँ। तुम एक गठरी और उठा लो। मजदूरी की चिन्ता न करना, मैं तुम्हें एक रुपया और दे दूँगा।

ठीक है लाओ।

पर इसे लेकर कहीं तुम भाग तो नहीं जाओगे?

क्यों, भला मैं क्यों भागने लगा?

भाई आजकल किसी का क्या भरोसा? फिर इसमें चाँदी के सिक्के जो हैं।

मैं आपको ऐसा चोर-बेईमान दीखता हूँ क्या? बेफिक्र रहें मैं चाँदी के सिक्कों के लालच में किसी को धोखा देने वालों में नहीं हूँ। लाइए, ये गठरी मुझे दे दीजिए।

दूसरी गठरी उठाकर उसने नदी पार कर ली। चाँदी के सिक्कों का लालच भी उसे डिगा नहीं पाया। थोड़ी दूर आगे चलने के बाद सामने पहाड़ी आ गयी।

वह धीरे - धीरे पहाड़ी पर चढ़ने लगा। पर बूढ़ा अभी तक नीचे ही रुका हुआ था। उसने कहा-आइए ना, फिर से रुक क्यों गए? बूढ़ा आदमी हूँ। ठीक से चल तो पाता नहीं हूँ। ऊपर से कमर पर एक गठरी का बोझ और, उसके भी ऊपर पहाड़ की दुर्गम चढ़ाई।

तो लाइए ये गठरी भी मुझे दे दीजिए बेशक और मजदूरी भी मत देना।

पर कैसे दे दूँ? इसमें तो सोने के सिक्के हैं और अगर तुम इन्हें लेकर भाग गए तो मैं बूढ़ा तुम्हारे पीछे भाग भी नहीं पाऊँगा।

कहा न मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ। ईमानदारी के चक्कर में ही तो मुझे मजदूरी करनी पड़ रही है, वरना पहले मैं एक सेठजी के यहाँ मुनीम की नौकरी करता था। सेठजी मुझसे हिसाब में गड़बड़ करके लोगों को ठगने के लिए दबाव डालते थे। तब मैंने ऐसा करने से मना कर दिया और नौकरी छोड़कर चला आया। उसने यूँ अपना बड़प्पन जताने के लिए गप्प हाँकी।

पता नहीं तुम सच कह रहे हो या.....। खैर उठा लो ये सोने के सिक्कों वाली तीसरी गठरी भी। मैं धीरे-धीरे आता हूँ। तुम मुझसे पहले पहाड़ी पार कर लो, तो दूसरी तरफ नीचे रुककर मेरा इंतजार करना।

वह सोने के सिक्कों वाली गठरी उठाकर चल पड़ा। बूढ़ा बहुत पीछे रह गया था। उसके दिमाग में आया, अगर मैं भाग जाऊँ, तो ये बूढ़ा तो मुझे पकड़ नहीं सकता और मैं एक ही झटके में मालामाल हो जाऊँगा। मेरी पत्नी जो मुझे रोज कोसती रहती है, कितना खुश हो जाएगी? इतनी आसानी से मिलने वाली दौलत ठुकराना भी बेवकूफी है.........। एक ही झटके में धनवान हो जाऊँगा। पैसा होगा, तो इज्जत-ऐश-आराम सब कुछ मिलेगा मुझे........।

उसके दिल में लालच आ गया और बिना पीछे देखे भाग खड़ा हुआ। तीन-तीन भारी गठरियों का बोझ उठाए भागते-भागते उसकी साँस फूल गयी।

घर पहुँचकर उसने गठरियाँ खोल कर देखीं, तो अपना सिर पीटकर रह गया। गठरियों में सिक्कों जैसे बने हुए मिट्टी के ढेले ही थे। वह सोच में पड़ गया कि बूढ़े को इस तरह का नाटक करने की जरूरत ही क्या थी? तभी उसकी पत्नी को मिट्टी के सिक्कों के ढेर में से एक कागज मिला, जिस पर लिखा था, “यह नाटक इस राज्य के खजाने की सुरक्षा के लिए ईमानदार सुरक्षामंत्री खोजने के लिए किया गया। परीक्षा लेने वाला बूढ़ा और कोई नहीं स्वयं महाराजा ही थे। अगर तुम भाग न निकलते तो तुम्हें मंत्रीपद और मान-सम्मान सभी कुछ मिलता। पर............... “

हम सभी को सचेत रहना चाहिए, न जाने जीवन देवता कब हममें से किसकी परीक्षा ले ले। प्रलोभनों में न डिगकर सिद्धान्तों को पकड़े रखने में ही दूरदर्शिता है।

~अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1998

👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (भाग ४)

स्वाध्याय की जोड़ी सत्संग से मिलती है। इसे नियमित रूप से जारी रखने के लिये मनन और चिन्तन को भी अपनी दैनिक क्रम व्यवस्था में सम्मिलित करना चाहिए। जीवन की विभिन्न समस्याओं को सुलझाने के लिये अपनी मान्यता और चेष्टा क्या है इसका गम्भीरता पूर्वक विश्लेषण करते रहना चाहिये और भूलों को सुधारने तक तथा प्रगति में प्रोत्साहित करने के लिये इसी चिन्तन में भविष्य की रूप रेखा निर्धारित करते रहना चाहिये। प्रस्तुत समस्याओं का क्रमशः समग्र चिन्तन और उनके आदर्शवादी समाधानों का निष्कर्ष यही मनन चिन्तन का मूलभूत प्रयोजन है। सत्संग की दैनिक आवश्यकता को यह क्रम अपनाकर पूरा किया जा सकता है।

मनन और चिन्तन का क्रम प्रातःकाल आँख खुलते ही और रात को सोने के लिये बिस्तर पर जाते ही आरम्भ किया जाना चाहिये। आँख खुलने और बिस्तर छोड़ने के बीच प्रातःकाल कुछ तो समय रहता है। आँख खुलते ही कोई तुरन्त नहीं उठ बैठता। कुछ समय ऐसे ही सब लोग पड़े रहते हैं। इस समय को मनन में लगाना चाहिये। अपने आपसे अपने और अपने शरीर के बीच का अन्तर, अपना स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, परमेश्वर की मनुष्य से आकांक्षा, इस सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात पर प्रत्येक पहलू से विचार किया जाना चाहिये और समीक्षा की जानी चाहिये कि अपनी वर्तमान गतिविधियाँ आदर्श जीवन पद्धति से तालमेल खाती हैं या नहीं? यदि अन्तर है तो वह कहाँ है कितना है? इस अन्तर को दूर रखने के लिये जो किया जाना चाहिए वह किया जा रहा है या नहीं? यदि नहीं तो क्यों?

यह प्रश्न ऐसे है जिन्हें अपने आप से गम्भीरता पूर्वक पूछा जाना चाहिए और जहाँ सुधार की आवश्यकता हो उसके लिए क्या कदम किस प्रकार उठाया जाय, इसका निर्णय करना चाहिए। छोटे व्यापारी कारखानेदार प्रायः बराबर अपने कारीगर में रह रही खामी और प्रगति के लिए क्या किया जाना चाहिये, इन पर विचार करते हैं। फिर जीवन व्यवसाय जिसकी तुलना संसार की और किसी उपलब्धि के साथ नहीं की जा सकती, उसे अँधेरे में क्यों रखा जाय? उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूपरेखा क्यों न बने?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 श्रद्धा, सिद्धान्तों के प्रति हो (भाग ३)

यह नहीं करेंगे तो क्या हो जाएगा? यदि आपकी श्रद्धा कायम रही तो फिर एक नई चीज पैदा होगी। तो उसमें से अंकुर जरूर पैदा होगा। फिर क्या पैदा होगा—आपको काम करने की लगन पैदा होगी। काम करने की ऐसी लगन कि आपने जो काम शुरू किया है उसको पूरा करने के लिए कितने मजबूत कदम उठाए जाएँ, कितने तेज कदम उठाए जाएँ, यह आपसे करते ही बनेगा। आप फिर यह नहीं कहेंगे कि हमने छह घण्टे काम कर लिया, चार घण्टे काम कर लिया। यहाँ बैठे हैं, वहाँ बैठे हैं। ओवरटाइम लाइए और ज्यादा काम हम क्यों करेंगे? नहीं, फिर आप काम किए बिना रह नहीं सकेंगे।

हमारा भी यही हुआ। श्रद्धा जब उत्पन्न हुई तो हमने यह सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि प्रलोभन हमको खींचने लगे। तो वहाँ से घर की सम्पत्ति को त्याग करने से लेकर के स्त्री के जेवरों से लेकर के और जो कुछ भी था, सबको त्याग करते चले आए कि कहीं प्रलोभन खींचने नहीं लगें। प्रलोभन खींचने नहीं पाएँ और वह श्रद्धा हमको निरन्तर बढ़ाती हुई चली आई। फिर उसने लगन को कम नहीं होने दिया। घीयामण्डी के मकान में १७ वर्ष तक बिना बिजली के हमने काम किया। न उसमें पंखा था, न उसमें बल्ब। मकान मालिक से झगड़ा हो गया था, सो मकान मालिक कहता था कि मकान खाली करो तो उसने बिजली के सेंक्शन पर साइन नहीं किये थे और बिजली हमको नहीं मिली। १७ वर्षों तक हम केवल मिट्टी के तेल की बत्ती जलाकर रात के दो बजे से लेकर सबेरे तक अपना पूजा-पाठ से लेकर के और अपना लेखन-कार्य तक बराबर करते रहे। पंखा था नहीं, घोर गर्मियों के दिनों में लू में भी काम करते रहे। १८ घण्टे काम करते रहे। यह काम हमने किया।

अब क्या बात रह गईं— दो बातों के अलावा। दो बातों में से आप में से हर आदमी को देखना चाहिए कि हमारी श्रद्धा कमजोर तो नहीं हुई। एक ओर हमारी लगन कमजोर तो नहीं हुई अर्थात् परिश्रम करने के प्रति जो हमारी उमंग और तरंग होनी चाहिए, उसमें कमी तो नहीं आ रही। किसान अपने घर के काम समझता है तो सबेरे से उठता है और रात के नौ-दस बजे तक बराबर घर के कामों में लगा रहता है। वह १८ घण्टे काम करता है। किसी से शिकायत नहीं करता कि हमको १८ घण्टे रोज काम करना पड़ता है। हमें अवकाश नहीं मिला या हमको इतवार की छुट्टी नहीं मिली और हमको यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ, इसकी कोई शिकायत नहीं करता क्योंकि वह समझता है कि हमारा काम है। यह हमारी जिम्मेदारी हे। खेत को रखना, जानवरों को रखना और बाल-बच्चों की देख−भाल करना यह हमारा काम है। जिम्मेदारी हर आदमी को दिन-रात काम करने के लिए लगन लगाती है और वह आपके प्रति भी है। आपको भी व्यक्तिगत जीवन में अपनी श्रद्धा को कायम रखना—एक और अपनी लगन को जीवंत रखना—दो काम तो आपके व्यक्तिगत जीवन के है, वह आपको करने चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरुवर की वाणी

गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को आपसी खींचतान में अनावश्यक समय नष्ट नहीं करना चाहिए।

जन्म-जन्मांतर से संग्रहीत उनकी उच्च आत्मिक स्थिति आज अग्नि परीक्षा की कसौटी पर कसी जा रही है। महाकाल अपने संकेतों पर चलने के लिए बार-बार हमें पुकार रहा है।

रीछ-वानरों की तरह हमें उनके पथ पर चलना ही चाहिए। आत्मा की पुकार अनसुनी करके वे लोभ-मोह के पुराने ढर्रे पर चलते रहे, तो आत्म-धिक्कार की इतनी विकट मार पड़ेगी कि झंझट से बच निकलने और लोभ-मोह को न छोड़ने की चतुरता बहुत मँहगी पड़ेगी।

अंतर्द्वन्द्व उन्हें किसी काम का न छोड़ेगा। मौज-मजा का आनन्द आत्म-प्रताड़ना न उठाने देगी और साहस की कमी से ईश्वरीय निर्देश पालन करते हुए जीवन को धन्य बनाने का अवसर भी हाथ से निकल जाएगा।

हमारी युग निर्माण योजना जनवरी 1978

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 2)

Q.2. Is it permissible to chant other Mantras or worship other deities along with Gayatri?      
  
Ans. Central theme of any form of worship is meditation. The exclusive objective of Jap and meditation in Upasana is to establish an intimate emotional bond between the devotee and God. Spirituality in India permits a free choice amongst a multitude of symbols (as deities) for meditating on attributes of the Creator. Once a particular deity is chosen as one’s Ishtadeo (Exclusive representative deity for worship), it is considered mandatory to follow the rituals and Mantras of Upasana pertaining to the Ishtadeo only and pursue Upasana - Sadhana - Aradhna strictly according to the procedure laid down by the Guru. During Sadhana, the Ishtadeo is treated like a living person, as one’s most intimate relative, as father - mother - brother - helper - master - friend, all  rolled into one (Twameva Mata, cha, Pita Twameva....). Only after cultivating such an intimate relationship with God, can one expect His / Her grace.

Because of ignorance, many devotees decorate their place of worship with assorted forms, (photographs etc.) of deities, chant many Mantras and say prayers to please them. Disregarding the Oneness of God (Brahma), they try to establish some relationship with many deities in expectation of multifarious benefits from each of them. In the field of spirituality such a practice becomes counterproductive. The deities represent streams of that ‘One fountainhead’ of God. Interaction with some particular attributes of God (deity) may be necessary for a particular purpose, but for an allround spiritual progress one should choose Gayatri as Ishtadeo. (Ref. Upasana Ke Do Charan Jap or Dhyan).

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 37

गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

Gayatri Upasana | गायत्री उपासना | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 भगवान का अस्तित्व

एक दिन कोई व्यक्ति नाई की दुकान में अपने सिर के बाल कटवाने गया। नाई और उस व्यक्ति के बीच में ऐसे ही बातें शुरु हो गईं और वे लोग बातें करते करते 'भगवान' के विषय पर बातें करने लगे।

तभी नाई ने कहा - "मैं भगवान के अस्तित्व को नहीं मानता और इसीलिए तुम मुझे नास्तिक भी कह सकते हो?"

"तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?" उस व्यक्ति ने पूछा।

नाई ने कहा - "बाहर जब तुम सड़क पर जाओगे तो तुम समझ जाओगे कि भगवान का अस्तित्व नहीं है। अगर भगवान होते तो क्या इतने सारे लोग भूखे मरते ? क्या इतने सारे लोग बीमार होते ? क्या दुनिया में इतनी हिंसा होती? क्या कष्ट या पीड़ा होती? मैं ऐसे निर्दयी ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता, जो इन सबकी अनुमति दे।"

उस व्यक्ति ने थोड़ा सोचा, लेकिन वह कोई वाद-विवाद नहीं करना चाहता था। इसलिए चुप रहा और नाई की बातें सुनता रहा। नाई ने अपना काम खत्म किया और वह व्यक्ति नाई को पैसे देकर दुकान से बाहर आ गया। वह जैसे ही नाई की दुकान से बाहर निकला तो उसने सड़क पर एक लम्बे घने बालों वाले एक व्यक्ति को देखा, जिसकी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी और ऐसा लगता था शायद उसने कई महीनों तक अपने बाल नहीं कटवाए हों।

अब वह व्यक्ति वापिस मुड़कर दोबारा नाई की दुकान में गया और उसने नाई से कहा - "क्या तुम्हें पता है? नाइयों का अस्तित्व नहीं होता?"

नाई ने कहा - "तुम कैसी बेकार की बातें कर रहे हो? क्या तुम्हें मैं दिखाई नहीं दे रहा हूँ ? मैं यहाँ हूँ और मैं एक नाई हूँ और मैंने अभी अभी तुम्हारे सिर के बाल काटे हैं।"

उस व्यक्ति ने कहा - "नहीं, नाई होते ही नहीं हैं, अगर होते तो क्या बाहर उस व्यक्ति के जैसे कोई भी लम्बे बाल व बढ़ी हुई दाढ़ी वाला होता क्या?"

नाई ने कहा - "अगर वह व्यक्ति किसी नाई के पास बाल कटवाने जाएगा ही नहीं तो नाई कैसे उसके बाल काटेगा?"

उस व्यक्ति ने कहा - "तुम बिल्कुल सही कह रहे हो, यही बात है। भगवान भी होते हैं, लेकिन कुछ लोग भगवान पर विश्वास ही नहीं करते तो भगवान उनकी सहायता करेंगे कैसे? विश्वास ही सत्य है, जो लोग भगवान पर विश्वास करते हैं, उन्हें उसकी अनिभूति हर पल होती है और जो विश्वास नहीं करते उनके लिए वो कहीं भी नहीं हैं।"

भगवान दूध में मक्खन की तरह विराजमान हैं, जो दिखाई नहीं देते। दूध में मक्खन होते हुए भी दिखाई नहीं देता, पर मक्खन दिखाई भी दे सकता है, जब हम दूध बिलोयेंगे, तब। इसी तरह भगवान भी हैं, पर वे होते हुए भी दिखाई नहीं देते । लेकिन भगवान दिखाई दे सकते हैं, जब हम अपनी आत्मा का मंथन करेंगे, तब। इसके लिए हमें आत्म मंथन करने की आवश्यकता है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 19 Dec 2019



👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...