शनिवार, 14 मई 2022

👉 दहेज का असुर तो ऐसे मरेगा

भारतवर्ष में दहेज एक ऐसा असुर है, जिसकी क्रूरता से अगणित कन्याऐं अपना प्राण त्याग चुकीं, अनेकों वैधव्य का दुख भोग रही हैं, अनेकों परित्यक्ता बनकर त्रास पा रही हैं। कन्याओं के माता-पिता का तो यह असुर रक्त पान करके किसी योग्य ही नहीं रहने देता। कसाई और उसकी छुरी से बकरी जिस प्रकार डरती रहती है, उसी प्रकार दहेज कर भय कन्याओं के जीवन तथा उनके माता-पिताओं के साथ प्राणों पर बीतने वाली दिल्लगी किया करता है।

जिस साधारण आर्थिक स्थिति के व्यक्ति को कन्या का पिता बनने का दुर्भाग्य प्राप्त हो चुका है वह भुक्त-भोगी भली प्रकार जानता है कि किसी खाते-पीते घर का पढ़ा-लिखा लड़का पटाने में उसे कितनी दीनता, कितनी जलालत, कितनी गले न उतरने वाली कठोर शर्तें स्वीकार करने को विवश होना पड़ता है। इस कठिनाई ने कन्या और पुत्र के समान दर्जे की स्थिति ही बदल दी है, अब तो पुत्र का जन्म सौभाग्य का और कन्या का जन्म दुर्भाग्य का चिन्ह माना जाता है। पुत्र जन्म पर बाजे बजते हैं तो कन्या के जन्मते ही घर-घर में उदासी छा जाती है।

बालक-बालक के बीच माता-पिता की दृष्टि में भी ऐसे अन्तर उत्पन्न करने का हेतु प्रधानतया यह ‘दहेज’ का असुर ही है, जिसकी कल्पना जन्म के दिन ही कर ली जाती है और एक के साथ कुछ पाने की और दूसरे के साथ कुछ गवाने की दृष्टि उत्पन्न होने से स्नेह भाव में अन्तर आ जाता है। बच्चों के प्रति माँ-बाप की दृष्टि में ऐसी भेद बुद्धि उत्पन्न करा देना भी इस दहेज के असुर की ही माया है।

हर गृहस्थ में पुत्रों की भाँति कन्याऐं भी होती हैं, इसलिए कन्या की बारी आने पर उसे भी दहेज के बोझ से पिसना पड़ता है, इस प्रकार यह कटु अनुभव प्रायः सभी गृहस्थों को होता है, सभी दुखी और परेशान हैं और हर किसी को कन्या के अभिभावकों के रूप में दहेज की निन्दा करते देखा और सुना जा सकता है, किन्तु वही व्यक्ति जब पुत्र का पिता या वर पक्ष की स्थिति में आता है तो तुरन्त गिरगिट की तरह रंग बदल जाता है और दहेज को अपना अधिकार एवं प्रतिष्ठा का माध्यम और धन कमाने का एक स्वर्ण सुयोग मानकर उस अवसर से भरपूर लाभ उठाना चाहता है। मनुष्य का यह दोगला रूप देखकर आश्चर्य होता है कि थोड़ी सी देर में ही वह अपने अनुभव को भूल जाता है। यदि वर पक्ष के रूप में वह दहेज का समर्थक था तो अब कन्या पक्ष का बनने की स्थिति में अपना घर कुर्क कराने में क्यों झिझकता है। यदि कन्या पक्ष के रूप में दहेज को बुरा मानता है तो लड़के की शादी के अवसर पर बेचारे कन्या पक्ष वालों को अपनी जैसी कठिनाई में ग्रस्त मानकर उनके साथ सहानुभूति का बर्ताव क्यों नहीं करता। यह दुरंगी चाल दहेज के असुर को जीवित रहने में सहायक होती है और वचन तथा कार्य में भिन्नता बरतने वाले समाज-सुधारकों के लैक्चर तथा लेखों को एक कौतूहल मात्र समझे जाने की स्थिति से आगे नहीं बढ़ने देती।

हमें अपने विचार और कार्यों में एकता लानी होगी, यदि दहेज बुरा है तो लड़के के पिता के रूप में उसे समझाने को तैयार रहना होगा। यदि दहेज अच्छा है तो कन्या के पिता के रूप में भी उसे बिना शिकायत और रंज माने देना होगा। दुटप्पी चालें चलना हमारे नैतिक अधःपतन का चिन्ह है। पतित व्यक्ति चाहे वे धनी, विद्वान्, चौधरी, पंच कोई भी हों, कोई प्रभावशाली प्रेरणा देकर समाज का पथ-प्रदर्शन करने की क्षमता नहीं रखते। दहेज का विरोध जहाँ-तहाँ सुनाई पड़ता है पर उसके पीछे कोई बल नहीं होता क्योंकि वे विरोध करने वाले व्यक्ति ही कहनी और कथनी में अन्तर रखकर अपनी स्थिति उपहासास्पद बना लेते हैं। उनकी आवाज के पीछे कोई बल न होने के कारण यह सुधार आन्दोलन नपुँसक ही रहता है।

अब चौधरी, पंच और जातीय कर्णधारों द्वारा आयोजित सभा सम्मेलनों के प्रस्तावों पर निर्भर रहने से काम न चलेगा। इस विडम्बना की बहुत देर से परीक्षा होती चली आ रही है। अब कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। अन्यथा इस गिरती हुई आर्थिक स्थिति के जमाने में एक ऐसा सामाजिक संकट उत्पन्न हो जायगा जिसमें “जीवित रहते हुए आत्म-हत्या” करने जैसे कष्ट से कम त्रासदायक अनुभव न किया जायगा।

इस दिशा में लड़के और लड़कियाँ पहल कर सकते हैं। चालीस-पचास वर्ष से ऊपर की आयु के माता-पिता प्रायः अपना साहस खो बैठते हैं। लड़के का पिता लोभ नहीं छोड़ना चाहता और लड़की का पिता यह नहीं सोच सकता कि किसी निर्धन घर में कन्या को दे दूँ तथा जब तक सुयोग्य लड़का न मिले तब तक सयानी कन्या को अनिश्चित काल के लिए अविवाहित रहने दूँ। इन वयोवृद्धों को लाठी की तरह सहारा देकर लड़के और लड़कियाँ उन्हें रास्ता बता सकते हैं। भावनाशील लड़कों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि अपनी अपेक्षा निर्धन घर की कन्या से बिना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दहेज के शादी करूंगा। अभिभावकों से उन आदर्शवादी युवकों को स्पष्ट शब्दों में कहना पड़ेगा कि प्रत्यक्ष ही नहीं, अप्रत्यक्ष दहेज की बात चलाई जायगी तो वह उस विवाह को करने के लिए कदापि तैयार न होंगे।

इसी प्रकार मनस्वी कन्याएँ अपना साहस बटोर कर अपने घर वालों को बता दें कि वे दहेज माँगने वाले सामाजिक कोढ़ी अमीरों के यहाँ जाने की अपेक्षा निर्धन और घटिया स्थिति के घरों में जाने के लिए तैयार हैं पर दहेज के साथ सम्पन्न घरों में तथा कथित ‘सुशिक्षित’ लड़कों के साथ विवाह करना पसंद न करेंगी। अनुकूल स्थिति न आने पर कन्याओं को आजीवन कुमारी रहने का व्रत लेना चाहिए और अपने त्याग से एक दूषित वातावरण को तोड़ने का आदर्श उपस्थित करना चाहिए। माता-पिता को आर्थिक संकट में डालने से बचाने के लिए कई कन्याऐं आत्म हत्याएँ कर चुकीं हैं, पर उससे अच्छा मार्ग यह आत्म-त्याग का है। कन्याओं के ऐसे आत्म-त्याग भी दहेज के लोभी रक्त पिपासुओं की आँखें खोलने में कुछ कारगर हो सकते हैं।

अर्थ-लोलुप वर पक्ष वालों को दहेज की बुराई की जड़ माना जाता है। बहुत अंशों में यह ठीक भी है, पर कन्या पक्ष वालों को भी उस सम्बन्ध में सर्वथा निर्दोष नहीं माना जाता। वे आर्थिक सम्पन्नता की दृष्टि से लड़के ढूँढ़ते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है, उन्हीं पर सैकड़ों लड़की वाले टूटते हैं, फलस्वरूप उन लड़के वालों का दिमाग खराब हो जाता है और लड़के को नीलाम की बोली पर चढ़ा देते हैं। यदि लड़की वाले अपेक्षाकृत निर्धन घर के और कम “सुशिक्षित” लड़के ढूँढ़कर सामान्य स्थिति के सम्बन्ध से काम चलाते तो अधिक अमीर और खूबसूरत लड़कों पर जो भीड़ टूटती है वह न टूटे और दहेज का प्रश्न बहुत अंशों तक हल हो जाय। दहेज न देने के साथ-साथ लड़की वालों को इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि ऊँची कीमत जेवर कपड़े की न तो माँग की जाय और न उनका प्रदर्शन कराया जाय। अच्छा तो यह जो कि ‘भार्गव’ समाज में प्रचलित रिवाज की भाँति कन्या का पिता ही जो कुछ जेवर कपड़ा स्वेच्छापूर्वक दे सकता हो, वह देकर कन्या को विदा कर दे। विवाहोत्सव की भारी खर्चीली रिवाजें बन्द करके कम से कम व्यक्तियों की उपस्थिति में यह एक साधारण पारिवारिक आयोजन मात्र बना लिया जाय। दहेज का जितना धन इन प्रदर्शनों और तूमाल बाँधने की विडम्बना में खर्च हो जाता है, इसे बन्द करना भी दहेज बन्द करने के समान आवश्यक है।

अब स्थिति ऐसी आ गई है कि हमारे बच्चों को प्राण संकट में डालने वाले इस दहेज रूपी असुर का विनाश करने को किन्हीं ठोस आधारों पर कदम उठाया जाना चाहिए। यद्यपि व्यापक अर्थ लोलुपता से उत्पन्न अनेक अनैतिकताओं की भाँति यह भी एक सामाजिक अनैतिकता है, जिसके लिए केवल वर के पिता को ही दोषी मान लेना और केवल उसी के सुधरने से सब कुछ ठीक हो जाने की आशा नहीं की जा सकती। कन्या वाले भी अमीर घर इसलिए ढूँढ़ते हैं कि इनकी कन्या को उत्तराधिकार के विपुल धन की स्वामिनी तथा बहुमूल्य आभूषणों से सुशोभित बनने का अवसर मिले। उन्हें भी अपना यह दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा। विवाह योग्य लड़के और लड़की यदि साहस से कार्य लें तो भी इस सत्यानाशी प्रथा को बदलने तथा गलत तरीके से सोचने वाले माँ-बापों को सही तरीके से सोचने के लिए विवश करने में महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं।

समय की माँग है अब दहेज बन्द होना चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि हमारी ही भाँति अनेक बुद्धिमान व्यक्ति सोच रहे हैं और दहेज के विरुद्ध तगड़ा मोर्चा लगाने की तैयारी में संलग्न हैं। आगरा-नौबस्ता निवासी पं. मुकुटबिहारीलाल शुक्ल बी. ए. एल-एल. बी. अपनी कन्या का विवाह बिना दहेज दिये बड़े आदर्श के साथ करने में सफल हो चुके हैं। बरेली के सुप्रसिद्ध कथा वाचक तथा ‘राधेश्याम रामायण’ के निर्माता पं. राधेश्यामजी सुप्रसिद्ध धनीमानियों में हैं, उनने भी अपनी सुशिक्षित विवाह योग्य नाती-नातनियों का विवाह बिना दहेज के ही करने का निश्चय किया है। जिन्हें आवश्यकता है- “पं. राधेश्याम शर्मा कथावाचक बरेली” इस पते पर उनसे अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हम चाहते हैं कि अखंड-ज्योति तथा गायत्री परिवार के मनस्वी लड़के-लड़कियाँ तथा वर-कन्याओं के अभिभावक उपरोक्त भावनाओं के अनुसार दहेज के असुर का दमन करने के लिए कुछ वास्तविक एवं ठोस आदर्श उपस्थित करने के लिए कदम उठावें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1956 पृष्ठ 36

शुक्रवार, 13 मई 2022

👉 तीन गुरु

बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे । उन के पास शिक्षा लेने हेतु कई शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, स्वामीजी आपके गुरु कौन है? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है?” महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, मेरे हजारो गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा।

एक था चोर।
एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ ठहर सकते हो। मै एक चोर हु और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते है।

वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक महीने तक रह गया! वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे? तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, हमेशा मस्त रहता था।

जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी हो नहीं रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना-वाधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा।

और मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था।
एक बहुत गर्मी वाले दिन मै बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।

और मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है।
मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी गिरजाघर में मोमबत्ती रखने जा रहा था। मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है? वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई?

वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह? आप ही मुझे बताइए।

मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए।

मित्रो, शिष्य होने का अर्थ क्या है? शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना। जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए। यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है, यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं!

👉 स्वभाव को कैसे सुधारा जाय

सामाजिक संस्कारों के अनुशीलन के सिलसिले में अनेकों खोजियों ने आश्चर्य के साथ देखा होगा कि सुखी और सम्पन्न घराने के लोगों ने किसी संवेग से प्रेरित हो किसी के साधारण मूल्य की वस्तुयें चुरा लीं। यद्यपि उतने पैसे या उन वस्तुओं का अभाव उन्हें जरा भी नहीं होता, फिर भी चुराने में उसे मजा आता है। और ये आदतें मार-पीट, दबाव और शासन से नहीं छूटती। मनुष्य इन आदतों को छोड़ने की इच्छा करके भी नहीं छोड़ पाते। इन जटिल आदतों को कैसे छुड़ाया जाय, इनके मूल कहाँ हैं, इन सभी बातों के लिये मन का विश्लेषण करना आवश्यक है।

इन आदतों की उत्पत्ति कैसे होती है, इस सम्बंध में प्रथम विचार, इस प्रकार के हैं-बार बार किसी कार्य को करते रहने से, उसके संस्कार कर्त्ता के मन पर क्रमशः जमते जाते हैं और एक दिन वे संस्कार घनीभूत होकर आदत में परिणत हो जाते हैं। जिस प्रकार बारम्बार के संघर्ष से जड़ पदार्थों में एक निश्चित संस्कार उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी किसी काम को बारम्बार करते रहने से वह उसकी आदत ही बन जाती है। इसलिये कोमल शिशुओं को किसी काम में बारम्बार लगाने से उसकी आदत निर्मित करने के लिए पर्याप्त हैं और किसी आदत को बदलने के लिए उसके विपरित कार्यों को बारम्बार कराना भी पर्याप्त है।

नवीन मनोवैज्ञानिक विचारधारा कहती है कि प्रत्येक आदत की जड़ किसी संवेग में रहती है और इस संवेग के उत्तेजित होने पर आदत से होने वाले कात किए जाते हैं। संवेग की उत्तेजना, शिथिलता एवं विनाश ही, आदत की क्रिया शीलता, उसकी दिलाई एवं नाश का कारण बनता है। आदत मशीन है, संवेग उसकी चालक विद्युत शक्ति है। अभ्यास की बारम्बारता आदत निर्मित होने का कारण नहीं है। जटिल आदतें, मानसिक जटिलता, पेंचदार संवेगों के कारण ही उत्पन्न होती हैं।

यदि बुरी आदतें छुड़वाने और छोड़ने की जरूरत है तो इसके लिए आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार उन संवेगों के केन्द्र, मानसिक ग्रन्थियों के खोल देने ही से उन संवेगों के नष्ट हो जाने पर ही सम्भव है।

इस सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक चिकित्सा के अनुभवी श्री हेड फील्ड महाशय के कथन उल्लेख किये जाते हैं—

“मानसिक चिकित्सा में देखने में आता है कि जब किसी भावना ग्रन्थि को पूर्णतः नष्ट कर दिया जाता है, तो उससे सम्बन्धित बुरी आदत उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार बिजली के प्रवाह की धारा तोड़ देने से बिजली का प्रकाश समाप्त हो जाता है। कारण के हटा देने पर कार्य का अन्त अपने आप हो जाता है। यदि आदत मानसिक ग्रन्थि के हटाने पर भी बनो रहे, या हटाने में समय ले रही हो, तो समझना चाहिए कि मानसिक ग्रन्थि अभी तक विद्यमान है।

इसका सबसे सुन्दर प्रत्यक्ष प्रमाण धार्मिक परिवर्तनों में देखा जाता है। बड़े से बड़ा पापी भी एक ही दिन में किसी अपने विशेष अनुभव से पुण्यात्मा बन जाता है। और अकस्मात् अपनी ऐसी आदतों को छोड़ देता है, जो जन्म से ही बनी आ रही थी। मनुष्य के संवेगात्मक जीवन में परिवर्तन होने से, उसकी बुरी आदतें उसे सदा के लिए छोड़ देती हैं। बुरी आदतों को मिटाने के लिए सम्भव है कि मानसिक चिकित्सकों को, उस ग्रन्थि को खोज निकालने में अनेकों सप्ताह अथवा महीने भी लगे, किंतु एक बार उस मानसिक ग्रन्थि को ढूंढ़ लेने पर (जो ग्रन्थि, उस आदत की जड़ है) तथा उसके निराकरण होने पर बुरी आदत अचानक ही नष्ट हो जाती है यह नियम न केवल आचरण की कुछ आदतों के लिए लागू होता है, वरन् शारीरिक अभ्यासों, मानसिक अकारण भयों,दुःखानुभूतियों आदि के लिए भी पूर्ण रूपेण लागू होता है। नैतिक सुधार में ही यह मनोवैज्ञानिक नियम कार्य करता है।

उस सिद्धाँतों का समर्थन ऐसे अनेकों उदाहरणों से किया जाता है। वाल्मीकि,तुलसीदास,सूरदास आदि इसके उदाहरण हैं। संवेग परिवर्तित होते ही इनके विचार ही नहीं,आचरण तक बदल गये। मनोवैज्ञानिक चिकित्सक प्रमाण के लिए ऐसे ही उदाहरण पेश करते हैं, जिसके कुछ नमूने नीचे दिये जा रहे हैं—

एक महाशय को रात के तीन बजे जग जाने की आदत पड़ गयी थी। वह स्वयं इस समय सोना चाहते थे, पर लाख चाहने पर उसे नींद नहीं आ पाती थी। इस आदत की स्वभाव ग्रन्थि की खोज करने पर पता चला कि एक बड़े ही तीव्र वेदना भरे अनुभवों के कारण ही वह जटिल ग्रन्थि बन गयी थी जिसने इस आदत का रूप धारण कर रक्खा था। कई वर्ष पूर्व उन्हें पेचिश की बीमारी हुई थी। इस बीमारी के कारण एक रात के तीन बजे सहसा ही इनकी नींद टूट गयी और उस समय उनके पेट में इतनी दुस्सह पीड़ा हुई कि उन्होंने समझ लिया कि अब मेरे प्राण शरीर से निकलने ही वाले हैं। पश्चात् ये पीड़ा और पेचिश एवं मृत्यु भय की बात उसकी याद में से धुल गयी पर उस मानसिक ग्रन्थि के निर्मित हो जाने के कारण उसे अनचाहे भी तीन बजे जग जाना पड़ता था। संवेगात्मक-अनुभव का संबन्ध तीन बजे रात के जगने से हो गया था, अतः संवेग के उत्तेजित होते ही आदत क्रियामाण हो पड़ता था, और वे नींद से वंचित हो जाते थे।

कभी-कभी मानव के जीवन में यह आश्चर्य भी उपस्थित होता है कि जिस व्यक्ति से हम सद्भाव पूर्वक बरतने का विचार रखते हैं, प्रेम करना चाहते हैं, उसी व्यक्ति को देखते ही कुछ ऐसे भाव भी उद्वन्द्व हो पड़ते हैं जो उस विचार और भाव के बिल्कुल विपरीत पड़ते हैं। वैसा व्यवहार करना हमारे विचार को जरा भी पसन्द नहीं, और न वैसा करना ही चाहते हैं, फिर भी एक संवेग वैसा कर डालने के लिये अनुप्रेरित करता रहता है। इसके भी एक उदाहरण जो मनोवैज्ञानिक जनों की ओर से दिए गए हैं, उसे देखिये और इस मनोवैज्ञानिक जटिलताओं के कारणात्मक सत्य की परख कीजिए—

एक अस्पताल में एक पुरुष “नर्स’ का काम करता था। उसी अस्पताल में एक “नर्स” का काम करने वाली महिला से उसे प्रेम हो गया। उसके प्रति उस (पुरुष) के हृदय में स्नेह के बाढ़ आते, तो उसकी सुन्दर कल्पना में विभोर हो उठता, पर ज्यों ही वह महिला उसके सामने आती तो उसमें एक संवेग उठता कि उसके सुकोमल गालों में जोर से एक घूंसा लगा दूँ। घूंसा मारने से तो प्रेम और विवाह होने की सारी स्थितियाँ बिगड़ ही जाएंगी, यही सोच कर वह अपने को रोक लेता, पर अन्तर से उठते हुए संवेग को रोकने में वह सदा ही असमर्थ रहता। एक दिन वह इसी चिंता में तल्लीन था कि अपनी प्रेमिका के प्रति, प्रतिकूल आचरण करने का संवेग जो मुझे होता है, वह क्यों? सहसा ही उसे याद आयी कि एकबार अस्पताल में नर्स का काम करते हुए उसे एक महिला नर्स ने नौकरी से वञ्चित कर वह स्वयं उस स्थान पर अधिकृत हो गयी थी। उसकी उस गर्हित नीचता से पुरुष को बड़ा क्रोध आया और उसने उस महिला नर्स से कहा--आज यदि मैं भी एक नारी होता तो तुम्हारे सुकोमल से कपोलों को जोर के घूंसे मारकर मरम्मत कर देता, किंतु अफसोस! वह आवेश उसने रोक लिया था और कुछ दिनों के बाद उसे भूल भी गया, पर उसी ने उसके मन में-स्वभाव में एक ग्रन्थि उत्पन्न कर दी थी; जिससे वैसे चेहरे वाली नर्सों के गाल उसके सामने आते ही उसके संवेग उत्तेजित हो उठते और उसे वह बड़ी कठिनाई से संयत कर पाता था।

यह स्मृति में आने के उपरान्त उसकी मानसिक ग्रन्थि खुल गयी और उस अनिच्छित संवेग की भी परिसमाप्ति हो गयी।

अतः आज का मनोविज्ञान चाहता है कि मनुष्यों की बुरी आदतों को छुड़ाने के लिए उसके विरुद्ध अच्छी आदतों का बारम्बार अभ्यास करना असफल प्रयोग है। बुरी आदतें तो तभी छूट सकती हैं जब उसकी आदत की कारण स्वरूपा मान सके ग्रन्थियों को ढूंढ़ कर सुलझायी खोल डाली जाय।

📖 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1956 पृष्ठ 30

गुरुवार, 12 मई 2022

👉 देखा जब उस वृद्ध को तो जिन्दगी बदल गई

एक सेठ के एक इकलौता पुत्र था पर छोटी सी उम्र मे ही गलत संगत के कारण राह भटक गया! परेशान सेठ को कुछ नही सूझ रहा था तो वो ईश्वर के मन्दिर मे गया और ईश दर्शन के बाद पुजारी को अपनी समस्या बताई !

पुजारी जी ने कहा की आप कुछ दिन मन्दिर मे भेजना कोशिश पुरी करेंगे की आपकी समस्या का समाधान हो आगे जैसी सद्गुरु देव और श्री हरि की ईच्छा !

सेठ ने पुत्र से कहा की तुम्हे कुछ दिनो तक मन्दिर जाना है नही तो तुम्हे सम्पति से बेदखल कर दिया जायेगा, घर से मन्दिर की दूरी ज्यादा थी और सेठ उसे किराये के गिनती के पैसे देते थे! अब वो एक तरह से बंदिश मे आ गया!

मंदिर के वहाँ एक वृद्ध बैठा रहता था और एक अजीब सा दर्द उसके चेहरे पर था और रोज वो बालक उस वृद्ध को देखता और एक दिन मन्दिर के वहाँ बैठे उस वृद्ध को देखा तो उसे मस्ती सूझी और वो वृद्ध के पास जाकर हँसने लगा और उसने वृद्ध से पुछा हॆ वृद्ध पुरुष तुम यहाँ ऐसे क्यों बैठे रहते हो लगता है बहुत दर्द भरी दास्तान है तुम्हारी और व्यंग्यात्मक तरीके से कहा शायद बड़ी भूलें की है जिंदगी मे?

उस वृद्ध ने जो कहा उसके बाद उस बालक का पूरा जीवन बदल गया! उस वृद्ध ने कहा हाँ बेटा हँस लो आज तुम्हारा समय है पर याद रखना की जब समय बदलेगा तो एक दिन कोई ऐसे ही तुम पर हँसेगा! सुनो बेटा मैं भी खुब दौड़ा मेरे चार चार बेटे है और उन्हे जिंदगी मे इस लायक बनाया की आज वो बहुत ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर है वो की आज मैं उन्हे दिखाई नही देता हुं! और मेरी सबसे बड़ी भुल ये रही की मैंने अपने बारे मे कुछ भी न सोचा! अपने इन अंतिम दिनो के लिये कुछ धन अपने लिये बचाकर न रखा इसलिये आज मैं एक पराधीनता का जीवन जी रहा हुं! पर मुझे तो अब इस मुरलीधर ने सम्भाल लिया की यहाँ तो पराधीन हुआ हुं कही आगे जाकर पराधीन न हो जाऊँ!

बालक को उन शब्दो ने झकझोर कर रख दिया! बालक - मैंने जो अपराध किया है उसके लिये मुझे क्षमा करना हॆ देव! पर हॆ देव आपने कहा की आगे जाकर पराधीन न रहूँ ये मेरी कुछ समझ मे न आया?

वृद्ध - हॆ वत्स यदि तुम्हारी जानने की ईच्छा है तो बिल्कुल सावधान होकर सुनना अनन्त यात्रा का एक पड़ाव मात्र है ये मानवदेह और पराधीनता से बड़ा कोई अभिशाप नही है और आत्मनिर्भरता से बड़ा कोई वरदान नही है! अभिशाप की जिन्दगी से मुप्ति पाने के लिये कुछ न कुछ जरूर कुछ करते रहना! धन शरीर के लिये तो तपोधन आत्मा के लिये बहुत जरूरी है!

नियमित साधना से तपोधन जोडिये आगे की यात्रा मे बड़ा काम आयेगा! क्योंकि जब तुम्हारा अंतिम समय आयेगा यदि देह का अंतिम समय है तो धन बड़ा सहायक होगा और देह समाप्त हो जायेगी तो फिर आगे की यात्रा शुरू हो जायेगी और वहाँ तपोधन बड़ा काम आयेगा!

और हाँ एक बात अच्छी तरह से याद रखना की धन तो केवल यहाँ काम आयेगा पर तपोधन यहाँ भी काम आयेगा और वहाँ भी काम आयेगा! और यदि तुम पराधीन हो गये तो तुम्हारा साथ देने वाला कोई न होगा!

उसके बाद उस बालक का पुरा जीवन बदल गया!

इसलिये नियमित साधना से तपोधन इकठ्ठा करो!

बुधवार, 11 मई 2022

👉 गलतियाँ और उनके सुधार

तैरना सीखने वाला डूब जाने के सिवाय और सब गलतियाँ कर सकता है। तब वह अचानक किसी दिन देखता है कि उसे तैरना आ गया। इसलिए गलतियाँ होती है तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जिस तरह बिना गलतियाँ किये तैरना नहीं आता उसी तरह गलतियों के बिना जिन्दगी जीना भी नहीं सीखा जाता।

मनुष्य अपूर्ण है इसलिए उसके कार्यों में गलती हो सकती है। इसमें शर्म की कोई बात नहीं है शर्म की बात यह है कि गलती को सही साबित करने और उस पर अड़े रहने की कोशिश की जाय। गलती को ढूँढ़ना मानना और सुधारना किसी मनुष्य के बड़प्पन का कारण हो सकता है। जो सीखने और सुधारने में लगा हुआ है वही एक दिन उस स्थिति को पहुँचेगा जिसमें त्रुटियों और बुराइयों से छुटकारा मिलता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 चार आधार

मित्रो ! चार आधार भावी युग निर्माण के मूलभूत आधार, तथ्य एवं आदर्श होंगे। इन्हीं सिद्धांतों पर व्यक्ति के अधिकार एवं कर्तव्य निर्धारित किए जाएंगे। प्रथा-परंपरा, कानून एवं आवरण इन्हीं सिद्धांत पर खड़े किए जाएंगे। ये आधार हैं-
  
(१) धन पर समाज का स्वामित्व-व्यक्तिगत संपदा का अंत,

(२) जाति और लिंग के नाम पर बरती जाने वाली असमानता का अंत और मनुष्य मात्र के समान नागरिक अधिकारों की प्रतिष्ठपना,

(३) विश्व बंधुत्व की मान्यता, प्रत्येक क्रिया-पद्धति मेें सहकारिता का, कौटुंबिकता की प्रवृत्ति का प्राधान्य। विश्व राष्ट की स्थापना, समस्त संसार का एक शासन, एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा, एक आचार आदि एक्य सूत्रों का सार्वभौम प्रचलन,

(४) व्यक्तिवाद का अंत, समूहवाद का उदय, अधिकार की उपेक्षा और कर्तव्य की निष्ठा-तत्परता, उदारता और सज्जनता की मात्रानुसार मानवीय गरिमा का मूल्यांकन।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 10 मई 2022

👉 गहरे उतरें, विभूतियाँ हस्तगत करें

दृश्यमान व पदार्थ सम्पदा ही सब कुछ नहीें है। जो गहराई में विद्यमान है, उसका भी महत्व है। पेड़ की छाया ऊपर दीखती है, पर जड़ें जमीन की गहराई में ही पाई जा सकती हैं। समुद्र तट पर सीप और घोंघे बटोरे जा सकते हैं, पर मोती प्राप्त करने के लिए गहराई में उतरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। भूमि के ऊपर रेत और चट्टानें भी बिखरी पड़ी हैं, पर बहुमूल्य धातुओं के लिए जमीन खोदकर गहरी पर्तों तक प्रवेश करना पड़ता है।
 
पराक्रम के बलबूते वैभव हस्तगत किया जा सकता है, किन्तु मानवी गरिमा विकसित करने के लिए अन्तर्मुखी बनना और पैनी दृष्टि से दोष- दुर्गुणें को बुहारना पड़ता है। दैवी विभूतियाँ तो अन्तराल में विद्यमान हैं। गहन चिन्तन का समुद्र मन्थन करने पर ही वह हस्तगत हो सकती हैं। वैभव की तृष्णा एक लुभावनी चमक मात्र है। पर आन्तरिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण रत्नों को खोद निकालने के समान है।
 
सौन्दर्य बाहर दीखता है, पर वह वस्तुतः नेत्रों की ज्योति, अभिरुचि एवं आत्मीयता का समुच्चय मात्र है। अच्छा हो हम अपने अन्तर का खजाना खोंजें और उन विभूतियों को प्राप्त करें, जो अपने कल्याण तथा समष्टि के कल्याण के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 6 मई 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 06 May 2022

शुद्ध व्यवहार और सदाचार समाज की सुदृढ़ स्थिति के दो आधार स्तम्भ हैं। इनसे व्यक्ति का भाग्य और समाज का भविष्य विकसित होता है। शिक्षा, धन एवं भौतिक समुन्नति का सुख भी इसी बात पर निर्भर है कि लोग सद्गुणी और सदाचारी बनें। सामाजिक परिवर्तन का आधार व्यक्ति के अंतःकरण की शुद्धि है। यही समाज में स्वच्छ आचरण और सुन्दर व्यवहार के रूप में प्रस्फुटित होकर सुख और जनसंतोष के परिणाम प्रस्तुत करती है।

हमें मूक सेवा को महत्त्व देना चाहिए। नींव के अज्ञात पत्थरों की छाती पर ही विशाल इमारतें तैयार होती हैं। इतिहास के पन्नों पर लाखों परमार्थियों में से किसी एक का नाम संयोगवश आ पाता है। यदि सभी स्वजनों का नाम छापा जाने लगे तो दुनिया का सारा कागज इसी काम में समाप्त हो जाएगा। यह सोचकर हमें प्रशंसा की ओर से उदास ही नहीं रहना चाहिए, वरन् उसको तिलांजलि भी देनी चाहिए। नामवरी के लिए जो लोग आतुर हैं, वे निम्न स्तर के स्वार्थी ही माने जाने चाहिए।

जो बदले की नीयत से सत्कर्म कर रहा है, वह व्यापारी है। पुण्य और परमार्थ को वाहवाही के लिए बेच देने वाले व्यापारी हीरा बेंचकर काँच खरीदने वाले मूर्ख की तरह हैं। जिसने प्रशंसा प्राप्त कर ली उसे पुण्य फल नाम की और कोई चीज मिलने वाली नहीं है। दुहरी कीमत वसूल नहीं की जा सकती। अहंकार को तृप्त करने के लिए प्रशंसा प्राप्त कर लेने के बाद किसी को यह आशा नहीं करनी चाहिए कि इस कार्य में उसे परमार्थ का दुहरा लाभ भी मिल जाएगा।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 श्रद्धा का अर्थ


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 May 2022


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👉 आज का सद्चिंतन 06 May 2022

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👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २६

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

सोते हुए व्यक्ति को जगाना आवश्यक हो तो उसे हाथ पकड कर बिठाया जाता है और जब तक नींद खुल न जाए तब तक उसें सहारा देना पडता है। ठीक यही स्थिति आपको अपने सद्गुणों को जगाने में सामने आवेगी। कुछ दिनों तक ऐसा अभ्यास करना पड़ेगा कि इच्छा न रहते हुए भी मधुर, रुचिकर और प्रेम व्यवहार करें। यदि किसी को हानि ठगने, धोखा देने इच्छा से कोई बनावटी व्यवहार करते तब तो वह अधर्म है, 'किंतु निःस्वार्थ भाव से, हित कामना से, दूसरे की हृदय की कली खिलाने की इच्छा से, अपने संपूर्ण को उन्नत करने की आकांक्षा से बनावटी व्यवहार करते हैं वह निर्दोष है। लंगडा आदमी नकली टांग लगाकर अपना काम चलाता है तो इसमें किसी का कुछ भी अहित नहीं होता, बिना टांग के रहने की अपेक्षा नकली टांग लगवा लेना कोई बुरी बात नहीं है।

इस प्रतीक्षा में बैठे रहना ठीक नहीं है कि जब हमारा हृदय सात्विक प्रेम से परिपूर्ण हो जाएगा, प्राणिमात्र के प्रति आत्मभाव प्रवाहित होने लगेगा, हृदय में प्रसन्नता और उल्लास की तरंगें उठने लगेंगी तभी उनको प्रकट करना आरंभ करेंगे। यह तो ऐसी बात है जैसे कोई कहे कि पानी में पैर तब दूँगा जब तैरने की विद्या में निपुण हो जाऊँगा। तैरना तब आता है जब अनेक बार असफल प्रयत्न कर लिए जाते हैं, अभ्यास न होते हुए भी उलटे-सीधे हाथ- पैर फैंके जाते हैं, कुछ समय बाद अभ्यास परिपक्व हो जाता है और सफलता निकट आती है। विद्यार्थी पहले गलत-सलत लिखता है फिर ठीक-ठाक लिखने लगता है। अध्यापक की खींची हुई रेखाओं के ऊपर कलम फेर कर बालक अक्षरों को लिखता है पीछे बिना सहायता के स्वयं उन्हें बनाने लगता है। आपको अपने सद्गुणों की वृद्धि में भी इसी परिपाटी से काम लेना पड़ेगा। हृदय का सद्गुणों से परिपूर्ण हो जाना अंतिम सफलता है, यह एक दिन में प्राप्त नहीं होती वरन एक या एक से अधिक जन्मों का भी समय इसमें लग सकता है। साधना काल में बार-बार गिर पड़ने, फिर उठ कर चलने का क्रम जारी रहेगा। कई बार भूलें होंगी, कई बार संभलेंगे, प्रतिज्ञाएँ करें प्राचीन संस्कारों के प्रबल झकझोरों से वे टूटेंगी, फिर संभलेंगे, फिर गिरेंगे। हर एक साधक अनेक बार असफल होता है, गिरता पड़ता लगा रहता है तो .एक दिन लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है।
 
आप असली-नकली के वितंडाबाद में पड़ कर बेकार ही बहस मत कीजिए। हम कहते हैं कि आप ' को बनावटी रूप से ही सही पर प्रकट करने की आदत इससे हानि किसी की नहीं और लाभ सबका है। अपने को सद्गुणी घोषित करिए अपने को अच्छे काम करने वाला, अच्छे विचार रखने वाला प्रकट होने दीजिए। अपनी अच्छाइयों को प्रकाश में आने दीजिए। अत्यंत, सुगंधित नयनाभिराम पुष्प यदि अज्ञात वन में खिले तो उसकी शोभा 'सुगंधि का लाभ कोई न उठा सकेगा, वह स्वयं भी देवता के ' चरणों पर चढ़ने का सौभाग्य प्राप्त न कर सकेगा। आप में बहुत सी अच्छाइयां हों और लोग उससे परिचित न होने के कारण कुछ लाभ न उठा सकें तो उन अच्छाइयों का क्या महत्त्व रहा? अज्ञात स्थान में छिपकर पड़ा हुआ शीतल जल किसके काम का? जबकि अनेक जीव-जंतु पानी की खोज के लिए सूखे कंठ को लेकर इधर-उधर मारे-मारे फिर रहें हैं।
प्यासों की प्यास न बुझी, उधर बिना खींचे कुँए का पानी सड़ गया, यह अज्ञातवास किसके लिए क्या लाभदायक हुआ? आप दीपक के अनुयायी बनिए। छदाम के मिट्टी के सकोरे में एक पैसे का तेल भरा हुआ है, एक दमड़ी की रुई मिला कर सवा पैसे का सामान है। वह इस बात की लज्जा नहीं करता कि मैं सवा पैसे की पूँजी वाला होकर सिर उठाकर क्यों चमकूँ। वह टुच्चा नहीं है इसलिए टुच्चे विचार भी नहीं करता। सवा पैसे का दीपक सिर उठा कर अपना प्रकाश फैलाता है उसके उजाले में बड़े-बडे धनी, विद्वान अपना काम चलाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३८

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👉 भक्तिगाथा (भाग १२८)

भक्त के लिए जरूरी है दंभ का त्याग

‘‘सुशान्त तीव्रतर क्रम में जीवन के घने अंधेरे में घिरता-फँसता, उलझता जा रहा था। स्त्री, धन, वैरी व नास्तिक के विचारों व भावों में उसकी जीवनचेतना जकड़ गयी थी। इस जकड़न ने उसके व्यक्तित्व को बुरी तरह विषाक्त कर दिया था। अब वह पहले की तरह शान्त, शिष्ट, शालीन ब्राह्मणकुमार सुशान्त नहीं रहा। अब तो उसके व्यवहार में अभिमान व दम्भ की दुर्गन्ध फैलने लगी थी। उसे देखने वाले यकीन ही न कर पाते कि यही विप्रकुल शिरोमणि वेदाचार्य पंडित शशांक शर्मा का पुत्र सुशान्त शर्मा है। पंडित शशांक शर्मा का यश अभी भी आस-पास के क्षेत्र में चहुँ ओर व्याप्त था। जन-जन में उनकी चरित्रनिष्ठा, श्रद्धा-आस्था का विषय था। ऐसे विद्वान, तपस्वी ब्राह्मण के कुल में ऐसा पातक, ऐसा घना अंधियारा।

पर आज का सच यही था। जो पंडित शशांक शर्मा के हितैषी थे, उन्होंने उनके पुत्र सुशान्त को समझाने, सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें की। लेकिन उन्हें कोई कामयाबी न मिली। बल्कि उल्टे उन्हें सुशान्त के मित्रों के हाथों अपमानित व तिरस्कृत होना पड़ा। यद्यपि उन सबने इसका कोई बुरा नहीं माना। क्योंकि इन सब पर पंडित शशांक शर्मा ने अनेकों उपकार किए थे। उनका हार्दिक स्नेह व अपनत्व इन सबने पाया था। अभी तक इनमें से किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? बचपन से इतना अधिक सदाचरण में निरत रहने वाले सुशान्त में यह विषाक्तता आयी कैसे? लेकिन इसका उत्तर अभी तक किसी के पास न था।

रही बात सुशान्त की तो वह अभी भी नगरवधू लावण्या के रूपजाल में उलझा था। लावण्या और उसके सहयोगी मिलकर सुशान्त का धन-वैभव लूट रहे थे। वासना का विष, द्युत-क्रीड़ा का व्यसन, वैरियों के प्रति द्वेष उसकी चिन्तन चेतना में हावी हो चुका था। नास्तिकों के संग साथ के कारण नारायण का पावन नाम कब का विस्मृत-विलीन हो चुका था। जितने भी हितैषी थे, वे सभी परेशान-हैरान थे। जितने कुटिल कुचाली थे, उनकी खुशी का कोई ठिकाना न था।’’ ब्रह्मर्षि क्रतु सुशान्त शर्मा की स्थिति का वर्णन-विवरण दिए जा रहे थे। अन्य सभी शान्त भाव से उन्हें सुन रहे थे। लेकिन अचानक न जाने क्यों महर्षि क्रतु ने देवर्षि की ओर देखते हुए कहा- ‘‘हे भक्तश्रेष्ठ! आप भक्ति का अगला सूत्र कहें। मेरा विश्वास है कि आपका अगला सूत्र भक्ति के आचारशास्त्र को और भी अधिक प्रकट व प्रकाशित करेगा।’’

महर्षि के इस कथन पर देवर्षि गम्भीर हुए और बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! आप परम भागवत हैं। आपसे अधिक भक्त के आचरण का ज्ञान किसे होगा? फिर भी आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं कहता हूँ’’-
‘अभिमानदम्भादिकं त्याज्यं’॥ ६४॥
अभिमान दम्भ आदि का त्याग करना चाहिए।

देवर्षि के इस सूत्र ने प्रायः सभी के चिन्तन सरोवर में अनेको विचारउर्मियों को अठखेलियाँ करने पर विवश कर दिया, हालांकि बोला कोई कुछ भी नहीं- सबके सब मौन बने रहे। काफी देर तक यूं ही नीरवता वातावरण में व्याप्त रही। फिर इस चुप्पी को तोड़ते हुए ऋषि क्रतु बोले- ‘‘जिस तरह से यह सच है कि भक्त को अभिमान व दम्भ आदि का त्याग कर देना चाहिए। उसी तरह से इस सच का दूसरा पहलू यह भी है कि भक्ति के अभाव में व्यक्ति अभिमान-दम्भ आदि से घिर जाता है जैसा कि सुशान्त शर्मा के जीवन में घटित हुआ।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५२


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बुधवार, 4 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २५

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

कोरे कागज पर काली स्याही के अक्षर छपाकर इस माध्यम द्वारा हम अपने हृदयगत भावों को आपकी अंतःचेतना में उड़ेलने का प्रयत्न कर रहे हैं। हमारा लिखना और आपका पढना निःस्सार है यदि किसी कर्म प्रवृत्ति के लिए इससे प्रेरणा न मिले। आज इस पुस्तक को साक्षी बनाकर हम-आप हृदय से हृदय का वार्तालाप कर रहे हैं। आपके विचार इस समय एकांत की शांति में हैं इस अवसर पर हम अपनी समस्त सद्भावनाओं को एकत्रित करके, आपके सच्चे हित चिंतन से प्रेरित होकर, घुटने टेक कर विनयपूर्वक यह प्रार्थना कर रहे हैं कि बंधु जीवन की अमूल्य घडियो का महत्त्व समझो, सुर दुर्लभ मानव जीवन को यो ही बर्बाद मत करो, नरक की यातना में मत तपो, यह बिलकुल आपके हाथ की बात है कि आज के अव्यस्थित जीवन को स्वर्गीय आनंद से परिपूर्ण बना लें। पिछले दिनों आपसे गलतियाँ हो चुकी हैं इसके लिए न तो लज्जित होने की जरूरत है और न दु:खी, या निराश होने की। सच्चा पश्चाताप यह है कि गलती की पुनरावृत्ति न होने दी जाए। बुरे भूतकाल को यदि आप नापसंद करते और अच्छे भविष्य की आशा करते हैं तो वर्तमान काल का सुव्यवस्थित रीति से निर्माण करना आरंभ कर दीजिए। वह शुभ आज ही है, अब ही है, इसी क्षण ही है जबकि अपने चिर संचित सद्ज्ञान को कार्य रूप में लाना चाहिए। अब आप इसके लिए तत्पर हो जाइए कि उत्तम श्रेणी का, उच्चकोटि का, सद्गुणों से परिपूर्ण जीवन बिताते हुए इस लोक और परलोक में दिव्य आनंद का उपभोग करेंगे।

सात्विक जीवन में प्रवेश पाने के लिए आप अच्छे गुणों को अपने में धारण करने का प्रयत्न आरंभ कर दीजिए। विनय, नम्रता, मुस्कराहट, प्रसन्नता, मधुर भाषण, प्रेमभाव, आत्मीयता-यह सब प्रशंसनीय गुण हैं, यदि आपके भीतर पुराने दुर्भावों के संचित संस्कार भरे हैं और वे मन ही मन झुँझलाहट, क्रोध, स्वार्थ जैसी निम्नकोटि की आदतों को भड़काते रहते हैं तो हताश मत हूजिए ।
 
बाहरी मन से ही सही, बनावट से ही सही, इन गुणों को नकली तौर से प्रकट करना आरंभ कीजिए। मन में चिड़चिड़ाहट हो भीतर ही भीतर क्रोध आ रहा हो, इतने में कोई बाहर का आदमी आता है तो आप भीतर की वृत्तियों को बदल दीजिए और चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएँ प्रकट करिए मुस्कराइए और हँसते उसका अभिवादन कीजिए। किसी अन्य कारण से क्रोध आ रहा है तो भी  मधुर भाषण करिए नाराजी को दबा दीजिए। यदि किसी के प्रति प्रेम या आत्मीयता की न्यूनता है तो भी उसे कुछ बढा कर प्रकट करने का प्रयत्न करिए। मन में बसने वाले दुर्भावों को दबा कर उनके स्थान पर सद्भावों को जरा बढा-चढा कर प्रकट करने का अभ्यास आरंभ कीजिए। अभ्यास से किसी काम में सफलता मिलती है। जो गुण सोए हुए पड़े हैं, उन्हें जगाने के लिए बनावटी सहारा लगाने की आवश्यकता पड़े तो वैसा करना चाहिए। छोटे बालक को खड़ा होना और चलना सिखाने के लिए लकड़ी की गाडी का सहारा दिया जाता है या उँगली पकड़ कर चलाया जाता है। निस्संदेह यह बनावटी सहायता है, इसकी तुलना अपने आप दौड़ने वाले बालक की सफलता से नहीं हो सकती तो भी अपने समय पर वह भी आवश्यक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३७

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👉 भक्तिगाथा (भाग १२७)

भक्ति का आचारशास्त्र

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की यह बात सुनेकर ऋषि क्रतु ने कहा- ‘‘इस सन्दर्भ में मुझे ब्राह्मणपुत्र सुशान्त शर्मा के जीवन की घटनाओं का स्मरण हो रहा है।’’ सुशान्त शर्मा का जीवनक्रम सम्पूर्ण तो नहीं, परन्तु थोड़ा-बहुत ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को भी पता था। उन्होंने भी इसे सुनने में अपनी रूचि दिखायी। ऋषि क्रतु कह रहे थे- ‘‘सुशान्त शर्मा का जन्म संस्कारवान ब्राह्मण कुल में हुआ था। यह ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रिय ब्राह्मणों का पावन कुल था। वेद-शास्त्र का पठन-पाठन, नित्य यज्ञ, अग्निहोत्र, भगवान नारायण की भक्ति, इस परिवार के सभी सदस्यों के जीवन के अनिवार्य व अविभाज्य अंग थे। यहाँ इस परिवार की नारियाँ भी नित्य त्रैकालिक संन्ध्या वंदन करती थीं। परिवार के सभी सदस्य यहाँ तक कि पालतु-पशु भी एकादशी के दिन निराहार रहते थे।

सुशान्त शर्मा को इस कुल के पावन संस्कार मिले थे। उसका जीवन अपने परिवार के सदस्यों के साथ आव्याहत गति से चल रहा था। लेकिन बीच में दैव का दुर्विपाक आ गया। क्रूर काल ने अपने कठोर कर्म विधान का कुटिल कुचक्र चलाया। सुशान्त शर्मा के पिता असमय बीमार हुए और चल बसे। उसकी माता, पिता का वियोग न सहन कर सकी और उन्होंने देह का त्याग कर दिया। अब तक सुशान्त किशोरवय का हो चुका था। रिश्तेदारों की दृष्टि उसके धन की ओर थी, सो उन्होंने किशोर सुशान्त को सत्पथ से जीवन के कुपथ पर लाने की सोची।

उभरते युवक सुशान्त से सुसंस्कार कुसंग के प्रभाव से धूमिल होने लगे। रिश्तेदारों व उनके सहयोगी मिलकर उसे नगरवधू लावण्या के रूप व यौवन के चर्चे सुनाने लगे। उसे बार-बार उकसाते कि एक बार वह रूपवती लावण्या के रूप को निहार ले। बार-बार लावण्या के रूप की चर्चा ने युवक सुशान्त के मन को डिगा दिया। उन लोगों ने उसे यह भी समझाया कि यदि वह द्यूत क्रीड़ा सीख ले तो अपने धन को थोड़े समय में कई गुना कर सकता है। जो लोग उसे ये सारी बातें बता रहे थे वे सबके सब नास्तिक थे। प्रकारान्तर से स्त्री, धन व नास्तिक का चरित्र उसके जीवन में घुलने लगा।

जैसे विष शरीर के रक्त प्रवाह में घुल जाता है, वैसे ही स्त्री, धन व नास्तिकता का विष उसके चिन्तन व भावनाओं में घुलने लगा। दिन-पक्ष व मास बीतते गए। धीरे-धीरे सुशान्त के सुसंस्कारों पर उसके कुसंगी संगी-साथियों के कुसंस्कारों का लेप चढ़ने लगा। उसकी अन्तर्चेतना में प्रकाश घटने लगा और अन्धकार की तीव्रता बढ़ती गयी। घर-परिवार और उसके माता-पिता के वैरी भी इस कुचक्र में शामिल हो गए। अब तो उसके अन्तर्मन में दोष और द्वेष की भरमार हो गयी।

हालांकि इसका प्रारम्भ स्त्रीचरित्र के श्रवण से ही हुआ था। रूपवती नगरवधू लावण्या के रूप की चर्चा ने उसे सम्मोहित कर दिया। इन कुटिल कुचक्र रचने वालों की प्रेरणा और इनके कुसंग से वशीभूत होकर आखिरकार वह एक दिन लावण्या के यहाँ चला गया। बस फिर क्या, कुसंग का विष तीव्र से तीव्रतर होता गया। धन की लालसा ने उसे द्युत की ओर मोड़ दिया। नास्तिकों के संग में नारायण स्मरण तो पहले ही विलीन हो चुका था। अब तो पुराने वैरी, जिसे उसने कभी देखा भी न था, उनसे बदला लेने की आग उसे झुलसाने लगी।

इस महाकल्मष में भक्ति, भक्त व भगवान की पावनता विलीन होने लगी। उसका चिन्तन-चरित्र व व्यवहार जो पहले आस्तिकता, धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की त्रिवेणी में नित्य स्नात रहता था, अब उसकी स्थिति परिवर्तित हो गयी। अब तो बस वासना, तृष्णा व अहंता ही बची थी। यहाँ तक कि स्त्री, धन, वैरी व नास्तिक के चरित्र में आकण्ठ डूब जाने के कारण उसे अब कभी याद भी नहीं रहता था कि बीते दिन वह नित्य यज्ञ-अग्निहोत्र भी किया करता था। एकादशी व्रत व नारायण नाम स्मरण तो अब शायद उसकी स्मृतियों में भी न बचे थे। काल प्रवाह में उभरी कर्म की कुटिल रेखाओं ने उसकी मति, गति व नियति बदल दी। चिन्तन, भाव एवं कर्म, सभी क्षेत्रों में विकृति फैल गयी। अब उसे जो देखता वही हैरान हो जाता। किसी को विश्वास भी न होता कि यही ब्राह्मणश्रेष्ठ शशांक का संस्कारवान पुत्र सुशान्त है। पर कोई क्या करता, स्त्री, धन, नास्तिक एवं वैरी के चरित्र का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है। इस फेर में उसके भविष्य के पथ पर अंधेरा घना होता जा रहा था।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४९

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मंगलवार, 3 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २४

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

अपनी मनुष्यता को उत्तमोत्तम 'सद्गुणों से सुसज्जित करने के लिए यह आवश्यक है कि उन विशेषता' को अपने में क्रियात्मक रूप से धारण किया जाए। सद्ज्ञानमयी पुस्तकें पढने से, सदुपदेश सुनने से, सत्संग करने से विचारधारा परिमार्जित होती है, यह समझ मे आता है कि सन्मार्ग पर चलना चाहिए। परंतु यदि वे विचार, कार्य रूप में परिणत न हों, मनोभावों का आचरण के साथ समन्वय न हो तो उस जानकारी से लाभ नहीं। वैसे तो हर कोई जानता है कि अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह बहुत धर्म कार्य हैं,अनेक ग्रंथों में इनकी महिमा सविस्तार गाई गई है। आप उपरोक्त धर्म लक्षणों को जानते हैं या अमुक  पुस्तक को बार-बार पाठ करके इनकी उपयोगिता को दुहराते है परंतु इतने मात्र से कुछ लाभ नहीं हो सकता, जब तक कि उनको कार्य रूप में प्रयोग करना आरंभ न किया जाए। सत्संग, स्वाध्याय, कथा श्रवण का महात्म इसलिए है कि इनके द्वारा उत्तम आचरण की प्रेरणा मिलती है। यदि वह उद्देश्य सफल न हो, ज्ञान का कर्म के साथ मेल न हो पावे तो कागज के हाथी की तरह वह निरर्थक है। केवल जानकारी होने मात्र से कुछ विशेष लाभ नहीं होता।

अनेक 'सद्गुणों की रचना का प्रयोजन यह है कि लोग इनकी सहायता से आचरण को उत्तम बनावें। यदि आप अनेक शास्त्र पढ लेते हैं, असाधारण ज्ञान संपादन कर लेते हैं किंतु उसको काम में नहीं लाते तो सोने से लदे हुए गधे का उदाहरण उपस्थित करते हैं। गधे की पीठ पर सोना लदा है पर वह स्वयं उससे कोई अच्छा पदार्थ नहीं खरीद सकता,अपनी पद वृद्धि नहीं कर सकता, वह सोना उसके लिए भार रूप है, जब तक लदा है तब .तक बोझ से और अपने को दबाए हुए है:। आपका बढा-चढ़ा ज्ञान दूसरे लोगों को मनोरंजन का साधन हो सकता है पर यदि उस पर अमल नहीं करते तो आपके निजी लाभ का उससे कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। गणेशजी को पीठ पर लादे फिरने वाला चूहा आखिर चूहा ही रहेगा। ज्ञान की पयोनिधि को अपने अत्यंत समीप रखने पर भी उस बेचारे को विद्या से उत्पन्न होने वाला कोई सुख थोड़े ही प्राप्त होता है।
 
आपने अनेक उत्तम पुस्तकों का स्वाध्याय करके एवं अनेक सुयोग्य व्यक्तियों के समीप रहकर बहुत सारा ज्ञान एकत्रित कर लिया है। हम समझते हैं कि जितना आप जानते हैं उसका एक चौथाई भाग भी क्रिया रूप में ले आवें तो इस जीवन को सब दृष्टियों से सफल बना सकते हैं। इसके विपरीत आप ज्ञान का भण्डार जमा करते जावें और आचरण वैसे ही निम्न कोटि के रखें तो आप में और एक साधारण अशिक्षित व्यक्ति में क्या अंतर रहेगा?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३६

👉 भक्तिगाथा (भाग १२६)

भक्ति का आचारशास्त्र

श्रुतसेन की भक्तिकथा सभी के मन को भा गयी। सत्संग-सुसंग से भक्ति अंकुरित-पल्लवित-पुष्पित होती है। प्रह्लाद को देवर्षि का सुसंग मिला, जबकि श्रुतसेन ने भक्त प्रह्लाद का सत्संग पाया। इस सुसंग-सत्संग से दोनों के जीवन में भक्ति का प्रवाह प्रवाहित हो उठा। ऐसा पावन प्रवाह जिसमें जीवन के सभी कषाय-कल्मष, सांसारिक भावनाएँ व उनके संस्कार बह गए। बची रह गयीं तो केवल शुद्ध-भावनाएँ व भगवान का पावन नामस्मरण। भक्त प्रह्लाद की कथा तो प्रायः सभी पुराणाचार्यों ने अपने अनूठे अन्दाज में कही है। हाँ! श्रुतसेन की कथा अभी तक केवल देवर्षि नारद के स्मृतिकोष में सुरक्षित थी जिसे उन्होंने इन क्षणों में कहा और इसे सभी ने सुना।

सुनने के साथ सब ने सत्संग की महिमा गुनी और गायी। इसे सुनते-सुनते महर्षि पुलह तो पुलकित हो गए। वे भावविभोर हुए और बोल उठे- ‘‘भक्ति, भक्त और भगवान धन्य हैं और धन्य हैं उनकी कथा-गाथा।’’ इतना कह कर वे चुप हो गए। हालांकि उनके चेहरे के भावों से लग रहा था कि अभी वे और कुछ भी कहना चाहते हैं। इसे देखकर महर्षि क्रतु ने उनसे कहा- ‘‘आप कुछ और बोलें महर्षि! आपकी बातें आशीर्वचन की तरह हैं।’’ ऋषि क्रतु की ये बात सुनकर महर्षि पुलह पहले तो मुस्कराए, फिर कहने लगे- ‘‘सुसंग-सत्संग जितना भक्तिपथ के लिए सहायक हैं, वैसे ही कुसंग इसके लिए उतना ही घातक। भक्तिपथ के पथिक को कुसंग से, कुविचारों से दूर रहना चाहिए।’’

ऋषि क्रतु जब ये बातें कह रहे थे- तब देवर्षि उन्हें ध्यान से देख रहे थे। जब वह चुप हुए तो देवर्षि ने कहा- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! आपने तो अपनी बातों में भक्ति का आचारशास्त्र प्रकाशित कर दिया है। मैं अपने इस सूत्र में कुछ ऐसा ही कहना चाह रहा था।’’ ‘‘अवश्य कहें देवर्षि!’’ नारद के कथन के बीच में ही कई स्वर समवेत रूप से उभरे। इसे सुनकर देवर्षि ने कहा- ‘‘आप सब साधुजनों का मत शिरोधार्य है।’’ इतना कहते हुए उन्होंने वीणा के मधुर गुंजन के साथ कहा-

स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं न श्रवणीयम्॥ ६३॥
अर्थात् स्त्री, धन, नास्तिक और वैरी का चरित्र नहीं सुनना चाहिए।

देवर्षि का यह सूत्र सुनने के साथ कुछ देर तक नीरव मौन पसरा रहा। थोड़ी देर तक सब चुप बने रहे। फिर अन्ततः देवर्षि ने ही मौन तोड़ते हुए कहा- ‘‘मेरा निवेदन है कि ऋषिश्रेष्ठ क्रतु इस सूत्र पर कुछ कहें।’’ महर्षि क्रतु के मन में इस समय कहने लायक बहुत बातें थीं। देवर्षि के आग्रह ने उनके भावों को उद्वेलित कर दिया। उन्होंने साभिप्राय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की ओर देखा। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उनके अभ्रिपाय को समझते हुए कहा- ‘‘हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि आप सब भाँति से समर्थ व अनुभवी हैं। देवर्षि के इस सूत्र की व्याख्या आप अपने अनुभव के प्रकाश में करें।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४८

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

👉 अभिमान

एक राजा को यह अभिमान था मैं ही राजा हूँ और सब जगत् का पालक हूँ, मनु आदि शास्त्रकारों के व्यर्थ विष्णु को गत् पालक कहकर शास्त्रों में घुसेड़ दिया है। एकबार एक संन्यासी शहर के बाहर एक पेड़ के नीचे जा बैठे। लोग उनकी शान्तिप्रद मीठी-मीठी बातें सुनने के लिए वहाँ जाने लगे। एक दिन राजा भी वहाँ गया और कहने लगा कि मैं ही सब लोगों का पालक हूँ।

यह सुनकर सन्त ने पूछा- तेरे राज्य में कितने कौए, कुत्ते और कीड़े हैं? राजा चुप हो गया। सन्त ने कहा-’जब तू यही नहीं जानता तो उनको भोजन कैसे भेजता होगा ? राजा ने लज्जित होकर कहा-’तो क्या तेरे भगवान कीड़े-मकोड़े को भी भोजन देते हैं ? यदि ऐसा है तो मैं एक कीड़े को डिबिया में बंद करके रखता हूं, कल देखूँगा भगवान इसे कैसे भोजन देते हैं? 

दूसरे दिन राजा ने सन्त के पास आकर डिबिया खोली तो वह कीड़ा चावल का एक टुकड़ा बड़े प्रेम से खा रहा था। यह चावल डिबिया बन्द करते समय राजा के मस्तक से गिर पड़ा था। तब उस अभिमानी ने माना कि भगवान ही सबका पालक है।

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👉 आज का सद्चिंतन 30 April 2022


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 30 April 2020



 
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👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २३

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

यह मानी हुई बात है कि संसार के अन्य समस्त मनुष्यों की भाति न्यूनाधिक मात्रा में आप में भी कोई छोटे-बड़े दोष होंगे ही, पर वे एक दिन बिलकुल दूर होकर रहेंगे, पर जब तक फसल पकने की प्रतीक्षा है तब तक उन्हें इस प्रकार रखिए कि किसी के लिए हानिकर परिणाम उपस्थित न करें। शरीर में मल-मूत्र की गंदी इंद्रियाँ मौजूद हैं, इन्हें ढक कर रखने का नियम चला आता है। अपान वायु सभी कोई त्यागते हैं पर सभ्यता का तकाजा है कि जरा धीरे से उस वायु को निकलने देना चाहिए ताकि उसका शब्द दूसरों के चित्त मे घृणा उत्पन्न न करे। फोड़े पर पट्टी बँधी रहने देते हैं ताकि सडा हुआ मवाद और विकृत घाव देखने वालों को नाक-भौं सिकोडंने का अवसर न दे।
 
गंदी नालियाँ ढक कर रखी जाती हैं, शौचालय खुले हुए नहीं रखे जाते। जिधर भी डालिए इस सर्वमान्य नियम की प्रमुखता पावेंगे कि ' बुराई प्रकाशित मत करो वरन उसे ढक कर रखो। ' इस नियम का अपने चरित्र और विचारों का प्रकटीकरण करते हुए भी ध्यान रखा करें तो निःसंदेह जन समाज का एक बड़ा भारी उपकार करेंगे। इस प्रकार बुराई का प्रभाव कम होगा वह छूत की बीमारी की तरह उड-उड़कर चारों ओर न फैलने पावेगी। स्वस्थ स्थानों में अस्वस्थता उत्पन्न न करेगी।

गंदगी को ढक दो और दफना दो ' इस डॉक्टरी नियम का जीवन क्षेत्र में भी प्रयोग कीजिए और प्रसंगों को वीर्यपात की तरह गुप्त रखिए। दुनियाँ आपसे सौंदर्य की, सत की, प्रमोद की, प्रफुल्लता की, प्रोत्साहन की आशा करती है आप उसे वही दीजिए। अल्प बुद्धि के दुकानदार को देखि,ए वह अपना अच्छा- अच्छा माल कैसे सुदर ढंग से सजाकर आगे रखता है ताकि देखने वालों को प्रसन्नता हो। रास्ता चलते व्यक्ति को भले ही उस दुकान से कुछ खरीदना न हो पर उस सजावट से नेत्रों को तृप्त करता है और मन ही मन प्रसन्न होता जाता है। आप अपने को उस से अधिक बुद्धिमान समझते हैं तो अपने सद्गुणों को दुनिया की दुकान मे इस प्रकार सजावट के साथ रखिए कि देखने वाले उसके सौंदर्य से कुछ आनंद अनुभव करते जावें। अपने कमरे को सजाकर रखने में आप कुशल हैं त्यौहार और उत्सवों के अवसर पर शरीर और घर की सजधज करना खूब जानते हैं फिर क्या ऐसा नहीं कर सकते कि अपनी उत्तमताओं को कलापूर्ण ढंग से सजाकर एक मनमोहक चित्रशाला बना दें और विश्व सौंदर्य में एक और मात्रा जोड़ देने का यश ग्रहण करें।

हम कहते हैं कि आप झूँठी झिझक संकोच, ' नम्रता को छोड दीजिए। यह विनय का बहुत वीभत्स रूप है कि अपने को दीन, रोगी, अयोग्य कह कर सुनने वाले को यह जताया जाए कि हम नम्र हैं। आप सचमुच ही बहुत अधिक मात्रा में उत्तम, भले एवं सुयोग्य हैं, अपनी अच्छाइयों को प्रकाश में लाइए दूसरों को उन्हें जानने दीजिए उत्तमता को प्रकट होने दीजिए। इससे आपको सन्मार्ग पर चलने में प्रोत्साहन, प्रगति और प्रकाश की प्राप्ति होगी। आदर, प्रतिष्ठा और श्रद्धा के भाजन बनने से आपका अंतःकरण ऊर्ध्वमुखी होकर परमार्थ की ओर अग्रसर होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३६

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

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