मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

👉 न्याय सबके लिए एक जैसा

🔵 राज-कर्मचारियों को विशेष अधिकर मिलते है, वह पद का कर्तव्य सुविधापूर्वक निभा सकने के लिये होते हैं। व्यक्ति की प्रतिष्ठा से उन अधिकारों का कोई संबध नहीं रहता। इस तथ्य को सिद्धांत रूप में मानने वाले अधिकारीगण ही अपने कर्तव्यों का पालन नेकी और ईमानदारी से कर सकते हैं। अधिकारों से अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता या प्रतिष्ठा को ऊंचा दिखाने की स्वार्थपूर्ण भावना के कारण ही भ्रष्टाचार बढ़ता है और जन-साधारण में बुराइयों के प्रसार का साहस बढ़ता है।

🔴 लोकतंत्र मे कर्तव्य के पालन की अवहेलना की जाती है, तभी वह जनता के लिए घातक बनता है। इसलिए उसकी सफलता का सारा भार उन अधिकारियों पर आता है, जो कानून और व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के लिए नियुक्त किए जाते हैं। इनमे जितनी अधिक ईमानदारी और इंसाफ पसंदगी होगी लोकतंत्र उतना ही खुशहाल होगा, उतना ही अधिक जनता को सुविधाएं मिलेंगी। राष्टीय जीवन में व्यापक तौर पर नैतिकता का प्रसार भी बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि अधिकारी वर्ग अपने उत्तरदायित्वों का पालन किस निष्ठा के साथ करते हैं?

🔵 ऐसे उदाहरणों में एक उदाहरण कोंडागिल (मद्रास) के सत्र न्यायाधीश श्री के० एम० सजीवैया का भी है, जिन्होंने कर्तव्य पालन में सर्वोत्कृष्ट ईमानदारी का परिचय दिया। कसौटी का समय तय आया, जब उनकी अदालत में एक ऐसा अभियुक्त पेश किया गया जो उन्हीं का पुत्र था और एक मित्र के फर्म में चोरी करने के आरोप में पकडा गया था। अभियुक्त की पैरवी उसके चाचा कर रहे थे। पुलिस केस था, इसलिये मामले का सारा उत्तरदायित्व भी सरकार पर ही था।

🔴 सरकारी वकील ने मुकदमा प्रारंभ होने पर आपत्ति कि चूँकि अभियुक्त का सबंध सीधे जज महोदय से है इसलिये उसे दूसरी अदालत में बदल दिया जाना चाहिए। माननीय जज के लिये यह परीक्षा का समय था। उन्होंने विचार किया कि यदि अपने प्रभाव का उपयोग करना हो तो वह दूसरी अदालत में भी संभव है, पर यदि ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्य पालन की परीक्षा ही होती है तो अभियुक्त के रूप मे भले ही उनका पुत्र प्रस्तुत हो, उन्हें मुकदमा करना चाहिए और उसमें उतनी ही कठोरता बरती जानी चाहिए जितनी अन्य अभियुक्तों के साथ होती है।

🔵 विद्वान जज ने दलील दी कि मामला दूसरी अदालत में तभी जा सकता है, जब यहाँ का फैसला असंतोषजनक हो, अपने कार्य को दूसरे पर टालने की अनावश्यकता का उन्होंने विरोध किया, जिससे मामले की सुनवाई उसी अदालत में हुई। प्रत्येक तारीख के बाद जब जज साहब घर लौटते तो उनकी धर्मपत्नी आग्रह करती- ''आपका ही पुत्र है, इसे बचाने की जिम्मेदारी भी तो आप पर ही है।'' अपने उत्तर में जज साहब हलकी-सी मुस्कान के साथ आश्वासन देते, वे इसके लिए प्रयत्नशील रहेंगे।

🔴 आखिर वह दिन आया जब फैसले की तिथि आ पडी। कचहरी में जज साहब की पत्नी के अतिरिक्त उनके बहुत-से संबंधी भी एकत्रित थे। फैसला करने से पहले उन पर दबाव भी डाला गया, पर जब उन्होंने अपराधी बेटे को २ वर्ष सख्त कैद की सजा सुनाई तो सारे कोर्ट मे सन्नाटा छा गया। न्यायालय की कार्यवाही पर सरकारी कर्मचारियों ने जहाँ संतोष व्यक्त किया और जज साहब की न्यायप्रियता की प्रशंसा हुई, वही उनकी धर्मपत्नी और संबंधियो ने उन पर तीखे आक्षेप भी किए। जज साहब ने अपने कुटुंबियों से कहा-अभियुक्त का पिता होने के कारण मेरी उसके साथ सहानुभूति थी, किंतु न्यायालय में मेरा उसका सबंध अपराधी और न्यायाधीश का होता था। वह स्थान मुझे न्याय के लिए मिला है, उसमे अपने-पराये का प्रश्न नही उठता।। सब चुप हो गये। सभी ने जज साहब के कर्तव्य पालन पर संतोष ही अनुभव किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 119, 120

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