मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

👉 उपासना के तत्व दर्शन को भली भान्ति हृदयंगम किया जाय (भाग 3)

🔵 आत्मा−परमात्मा के निकट पहुँचने पर भौतिकी का ऊर्जा स्थानान्तरण वाला सिद्धान्त ही सार्थक होता है। गरम लोहे को ठण्डे के साथ बाँध देने पर गर्मी एक से दूसरे में जाती है और थोड़ी देर में तापमान एक सरीखा हो जाता है। दो तालाबों को यदि परस्पर सम्बद्ध कर दिया जाय तो अधिक पानी वाले तालाब का जल दूसरे कम पानी वाले तालाब में पहुँचकर दोनों का स्तर समान कर देता है। उपासना के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से सम्बन्धित करने का प्रयास किया जाता है।

🔴 यों तो वह हर समय, हर एक के पास, हर स्थिति में कोई भी काम करते समय बना रहता है। किन्तु सामान्य व्यक्ति उसके सान्निध्य की अनुभूति नहीं कर पाते। यदि मनुष्य अपने हर काम को परमात्मा को सौंप दे, हर काम उसी को जान समझ कर करे और हर क्रिया को उपासना जैसी श्रद्धा व आस्था से करे तो मनुष्य के साधारण नित्य नैमित्तिक कार्य भी ईश्वरोपासना के रूप में बदल जाये व वैसी ही शाँति–सन्तोष–आनन्द के पुण्यफल देने लगे।

🔵 ऋषियों और सन्त भक्तों के जीवन इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने अपार आत्म−शान्ति पाई, अपने आशीर्वाद और वरदान से असंख्यों के भौतिक कष्ट मिटाये, अन्धकार में भटकतों को प्रकाश दिया और उन दिव्य विभूतियों के अधिपति बने जिन्हें ऋद्धि एवं सिद्धि कहा जाता है। नाम गिनाये जायें तो रैदास, दादू, नानक, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम ऐसे अनेकों हैं जिन्होंने गृही और विरक्त सन्त का जीवन जिया। इनके जीवन–चरित्रों को कसौटी पर कसा जा सकता है और देखा जा सकता है कि कोल्हू के बैल की तरह ढर्रे का नीरस जीवन बिताने की अपेक्षा यदि उनने ईश्वर का आश्रय लेने का निर्णय लिया तो वे घाटे में नहीं रहे।

🔴 कम लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ का व्यापार करना बुद्धिमत्ता ही कहा जायेगा। फिर उपासना का अवलम्बन लेना क्यों अदूरदर्शिता माना जाय? निस्सन्देह यही सही जीवन की रीति−नीति है कि शरीरगत स्वार्थों का ध्यान रखने के अतिरिक्त आत्म−कल्याण की भी आवश्यकता समझी जाय और उपासना का आश्रय इसके लिये लिया जाय। इसे नियमित दिनचर्या का अंग बनायें तो हर व्यक्ति अनुपम लाभ प्राप्त कर सकता है।

🌹 -क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 -अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 3

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