मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (भाग 6)

🔴 मित्रों! हम ये कह रहे थे कि आप गलत सोचने का तरीका अपना बदल लें जो साधन सामग्री आप के पास है, रुपया पैसा चाँदी जमीन है, अक्ल है, इनका सदुपयोग आप करना सीख लें। आपके कमाने का क्या तरीका है? मुझे नहीं मालूम । पर आप एक बात का जवाब दीजिए कि आप इन्हें खर्च कैसे करते हैं? किस आदमी ने कैसे कमाया ये हिसाब मैं नहीं करता। मैं तो अध्यात्म की दृष्टि से विचार करता हूँ कि किस आदमी ने कैसे खर्च किया? जो कमाया वह खर्च कहाँ हुआ? मुझे खर्च का ब्यौरा दीजिए।

🔵 बस! अगर आप खर्च अपव्यय में करते हैं गलत कामों में करते हैं, फिजूल खर्ची करते हैं तो मैं आध्यात्मिक दृष्टि से आपको बेईमान कहूँगा। आप कहेंगे, यह हमारी कमाई है। हाँ आपकी ही कमाई है, पर आप खर्च कहाँ करते हैं यह बताइए आपका धन, आपकी अकल, आपके साधन, श्रम किन कामों में खर्च होते हैं, इनका ब्यौरा लाइए, उसकी फाइल पेश कीजिए हमारे सामने।

🔴 आपने बेटे को खैरात में बाँट अय्याशी में उड़ा दिया, जेवर बनवाने में खर्च कर दिया तो हम आपको आध्यात्मवादी कैसे कहें? खर्च के बारे में भगवान का बड़ा सख्त नियंत्रण है। आदमी को हम अध्यात्म का अंकुश लगाते हुए ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसा जीवन जीने को कहते हैं। आपको 500 रुपये तनख्वाह मिलती होगी, मिले। लेकिन आप उसे औसत नागरिक के नाते खर्च कीजिए। विद्यासागर की तरह 50 रुपयों में अपनी गृहस्थी का गुजारा करें व 450 रुपयों में अन्यों के लिए समाज के लिए दुखी-अभावग्रस्तों के लिए सुरक्षित करिए।

🔵  उनके साढ़े चार सौ रुपयों से हजारों विद्यार्थी निहाल हो गए। जो फीस नहीं दे सकते थे, जो कापी नहीं खरीद सकते थे, जिनके पास मिट्टी का तेल नहीं था उनके लिए सारी व्यवस्था विद्यासागर ने अपने यहाँ कर रखी थी। इसे क्या कहते हैं- यह अध्यात्म है। अध्यात्मवादी आप कब होंगे, मैं यह नहीं जानता किन्तु जिस दिन अध्यात्मवादी बनने का सिलसिला शुरू हो जाएगा, तब फिर मैं आपको भगवान की शपथ देकर अपने अनुभव की साक्षी देकर विश्वास दिलाऊँगा कि अध्यात्म के बराबर नगद फल देने वाली चमत्कारी विद्या कोई नहीं हो सकती। लाटरी लगाने, जेब काटने से भी ज्यादा फायदेमंद दूरदर्शिता भरा रास्ता है अध्यात्म का। यह आप समझ गए तो आपका मानसिक कायाकल्प आध्यात्मिक भावकल्प हो जाएगा व नवरात्रि साधना सफल मानी जाएगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1992/April/v1.57

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