सोमवार, 3 अप्रैल 2017

👉 धारा को चीरकर चल पड़ने जैसा पराक्रम

🔵 प्राणी का धर्म है-प्रगति, अग्रगमन। धर्म से यहाँ अर्थ है- स्वभाव। इसके बिना न तो किसी को चैन मिलता है, न सन्तोष, न सुख। कहा जाता है कि प्राणी सुख की खोज में फिरते रहते हैं। यह कथन तब ही सही हो सकता है, जब उसके प्रयासों के साथ सुविधा नहीं, प्रगति भी जुड़ी हुई हो। निम्नस्तरीय प्राणी सुविधा से सन्तुष्ट हो सकते हैं, किन्तु जिनका अन्तराल जीवित है, उनका गुजारा प्रगति की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए बिना हो ही नहीं सकता।

🔴 इस स्तर के लोगों को सुविधा नहीं, उस गौरव को अर्जित करने की प्यास रहती है, जो अपनी पीठ आप थपथपा सकें। साहस और पराक्रम के क्षेत्र में अपनी स्थिति सामान्य जन समुदाय की तुलना में अधिक ऊँची, अधिक अच्छी सिद्ध कर सके। प्रगति इसी को कहते हैं। जिन्हें असामान्य कहा जाता है, उनका काम इससे कम में चलता नहीं। वे वर्चस्व प्रकट किये बिना रह भी नहीं सकते। सुविधाएँ उनका प्रगति पथ कभी अवरुद्ध नहीं करती, न ही वे सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं।
  
🔵 वरिष्ठता सिद्ध करने की उत्कण्ठा यदि उथलेपन की स्थिति में हुई, तो वह भोंड़े प्रदर्शन एवं एक कदम आगे बढ़ने की उद्दण्डता के रूप में प्रकट होने लगती है। अहमन्यता अपना उद्धत प्रदर्शन न कर पाए, इसके लिए तत्त्ववेत्ता-दूरदर्शियों ने मानवी मनोविज्ञान को समझते हुए इस प्रवृत्ति को उत्कृष्टता के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने आत्मोत्कर्ष के लिए कुछ उपयोगी क्षेत्र निर्धारित कर यह सिद्ध किया कि उस राजमार्ग पर चलने में दूसरों को चकाचौंध करने वाला, साधक अपनी अन्तरात्मा को गौरवान्वित करने वाला श्रेय-सन्तोष परिपूर्ण मात्रा में प्राप्त कर सकता है।

🔴 वैभव तो चतुराई से कम किया भी जा सकता है किन्तु व्यक्तित्त्व का निर्माण तो मनुष्य की अपनी कलाकारिता, सूझबूझ, एकाग्रता और ऐसे पराक्रम का प्रतिफल है जो संसार के अन्यान्य उपार्जनों की तुलना में कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रयत्न साध्य है। उसमें संकल्प शक्ति, साहसिकता और दूरदर्शिता का परिचय देना पड़ता है। जनसाधारण द्वारा अपनायी गयी रीति-नीति से ठीक उस दिशा में चलना उस मछली के पराक्रम जैसा है, जो प्रचण्ड प्रवाह को चीरकर उसके विपरीत चलती है। ऐसे नरपुंगवों को ही विश्वविजेता की उपमा दी गयी है, जो महानता को अंगीकार कर प्रतिकूलताओं से टकराते हुए आगे-सतत आगे ही बढ़ते रहते हैं। इस मार्ग को अपनाना ही मनुष्य की सबसे बड़ी दूरदर्शिता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 महान कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द (भाग 2)

🔴 परमहंस देव के इहलीला संवरण करने के पश्चात् जब परिव्राजक बनकर उन्होंने देश भ्रमण किया तो मार्ग में अलवर, खेतड़ी, लिम्बडी, मैसूर, रामनद...