सोमवार, 3 अप्रैल 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 April

🔴 भजन-पूजन आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ने के लिए एक उपाय है, स्वयं में अध्यात्म नहीं। अध्यात्मवाद का आशय कुछ ऊंचा और विस्तृत है। उसे आत्म-विज्ञान अथवा जीवन-विज्ञान ही मानना चाहिये। अध्यात्म द्वारा ही मनुष्य का आत्म-सुधार, आत्म-विकास हो जाने से मनुष्य के पास सुख-शाँति उसी प्रकार आ जाती है, जिस प्रकार सूर्य उदय होने पर संसार को प्रकाश स्वतः प्राप्त हो जाता है।

🔵 भजन-पूजन का मूल आशय यह होता है कि मनुष्य अपनी बुराइयों तथा विकारों से मुक्त हो। धार्मिक क्रियाओं में निरत होना एक प्रकार से आचरण निर्माण का संकल्प है। जो व्यक्ति पूजा-पाठ करता है, उसके माध्यम से परमात्मा से संपर्क बढ़ाता है, वह उस उच्चादर्श के कारण बाध्य है कि अपनी बुराइयाँ दूर करे और गुण ग्रहण करे। जो ऐसा नहीं करता, वह उस पुण्य क्रिया से वंचित करता है और परमात्मा के उस पवित्र सम्बन्ध का अपमान करता है। ऐसी वंचक उपासना करने वाले लोग आनन्द और सुख के कल्याणकारी परिणाम से वंचित ही रहते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔴 जीवन वीणा की तरह है। यदि इसके तार ज्यादा कस दोगे तो वह टूट जायेगा यदि ढीले छोड़ दोगे तो उसमें से स्वर नहीं निकलेगा। जीवन को यदि विलासमय बनाओगे तो संसार की तृष्णा में फंसे रह जाओगे और यदि अत्यन्त कष्टमय बनाओगे तो जीते जी मर जाओगे अतः मध्य मार्ग अपनाओ। जब तार न ज्यादा कसे होते हैं और न ढीले होते हैं, तभी वीणा बजती है। जीवन के तार भी मध्यम स्तर पर कसो, तभी निर्वाण प्राप्त कर सकोगे।

🌹 महात्मा गौतम बुद्ध

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