सोमवार, 3 अप्रैल 2017

👉 राष्ट्र निर्माण के लिए राष्ट्र भाषा की प्रगति अनिवार्य है

🔵 बाबू राजेंद्र प्रसाद का विद्यारंभ संस्कार उस समय के अनुसार एक मौलवी के पास उर्दू-फारसी में कराया गया था। नतीजा यह हुआ कि वे स्कूल और कालेज में भी इंटर तक अंग्रेजी के साथ उर्दू-फारसी ही पढ़ते चले गए। पर जब वे कलकत्ता जाकर बी० ए० में भर्ती हुए, तो उनके सामने कई भाषाओं में से एक चुनने का प्रश्न आया। यद्यपि उन्होंने अब तक हिंदी नही पढी़ थी और कालेज में हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था नहीं थी, तो भी उनका सुझाव विशेष रूप से हिंदी की ही तरफ हुआ। संभवत: इसका कारण उनकी राष्ट्रीय और जातीय भावनाएँ ही थी। उनके कई मित्रों ने कहा कि तुम हिंदी लेकर बडी़ गलती कर रहे हो। जब अब तक तुमने हिंदी नहीं पढी़ तब एकाएक बी० ए० में लेने का नतीजा यह होगा कि तुम्हे बहुत कम नंबर मिलेंगे और तुम्हारा डिवीजन खराब हो जायेगा। पर राजेंद्र बाबू ने उनका समाधान यह कहकर दिया कि हिंदी तो हमारी मातृभाषा है उसके न सीख सकने या नंबर कम आने का संदेह करना व्यर्थ है। हमको आखिर अपनी इस मातृभूमि और मातृभाषा की हृदय से सेवा करके अपना कर्तव्य पालन करना ही होगा। तब उसको बिना सीखे किस प्रकार काम चल सकता है ?

🔴 उन्होंने सब विचार त्यागकर हिंदी ही ली और घर पर निजी तौर पर अध्ययन करके बहुत अच्छे नंबरों से पास हो गये।

🔵 राजेद्र बाबू ने जैसा सोचा था, वही कुछ समय पश्चात् सामने आया। राष्ट्रीय आंदोलन के साथ देश में राष्ट्रभाषा की आवश्यकता और उसके प्रचार के लिये प्रयत्न करने की तरफ नेताओं का ध्यान गया। श्री पुरुषोत्तमदास जी टंडन तथा उनके सहयोगियों ने प्रयाग मे हिंदी-साहित्य सम्मेलन की स्थापना की जिसका उद्देश्य राष्ट्रभाषा के रूप मे समस्त भारत में हिंदी का प्रचार करना था।

🔴 सम्मेलन का तीसरा वार्षिकोत्सव सन् १९१३ मे कलकता में हुआ और राजेंद्र बाबू को स्वागत समिति का प्रधानमंत्री बनाया गया। उसी समय पटना में आल इंडिया कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था,। पर आप हिदी साहित्य सम्मेलन की व्यवस्था में इतने व्यस्त रहे कि पटना न जा सके। सन् १९२३ में "हिंदी साहित्य सम्मेलन" के , सभापति भी बनाए गए। प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलनों के कई अधिवेशनों में आपने अध्यक्षता की थी।

🔵 आपने जो हिंदी प्रचार का काम १९१३ मे उठाया था वह आजन्म चलता ही रहा। आगे चलकर आप ही सम्मेलन की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष बनाए गए और उसके द्वारा मदास तथा आसाम जैसे दूरवर्ती प्रांतो में वर्षों तक हिंदी के पठनपाठन और प्रचार की व्यवस्था की गई। कुछ लोग उस समय इस प्रचार की उपयोगिता न समझकर, उसकी विपरीत आलोचना करते थे। ऐसे लोगों को उत्तर देते हुए आपने लिखा था- "राष्ट्र के लिये राष्ट्रभाषा आवश्यक है और वह भाषा हिंदी ही हो सकती है।" इसमें दक्षिण वालों ने पूरा सहयोग दिया। इधर कई वर्षों से इस कार्य में होने वाला वहाँ का सारा खर्च वहाँ के लोगों से ही मिल जाता है और उत्तर भारत से वहाँ पर धन नहीं भेजना पडता। मैं समझता हूँ कि इसी प्रकार अन्य हिंदी प्रांतों में भी कुछ दिनों काम करने के बाद हमारा वैसा ही अनुभव होगा। हिंदी-प्रचार को मैं भीख की झोली नही मानता और न यह मानता हूँ कि इसके पीछे कोई द्वेष बुद्धि है। इसका एक उद्देश्य है सारे देश के लिए एक राष्ट्रभाषा का प्रचार। किसी भी प्रांतीय भाषा को मिटाने ता कमजोर करने की इच्छा किसी के दिल में स्वप्न में भी नहीं आई और न आएगी। हम राष्ट्र के प्रति अपना कर्त्तव्य मात्र कर रहे है और उसे करते रहने में ही हमारा और देश का कल्याण है।''

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 118, 119

👉 उपयोगिता की समझ

🔶 एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था। उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था। 🔷 कुत्ते ने कभी नौका में ...