सोमवार, 3 अप्रैल 2017

👉 उपासना के तत्व दर्शन को भली भान्ति हृदयंगम किया जाय (भाग 2)

🔵 चन्द्रमा तभी चमकता है जब वह सूर्य का प्रकाश पाता है। अपने आप में वह प्रकाशवान नहीं, उसकी अकेली कोई सत्ता नहीं। सूर्य का आलोक जब उसे प्राप्त नहीं होता तो अमावस्या के दिन चन्द्रमा के यथा स्थान रहते हुए भी उसका अस्तित्व लुप्त प्रायः ही रहता है। परमात्मा वह दिव्य शक्ति आलोक से भरा प्रकाश पुंज है जिससे हम सभी अनुप्राणित प्रकाशवान होते हैं। उपासना हमें उसके समीप ले जाकर स्थायी बल प्राप्त कराती है। जितना सामीप्य हमें ईश्वर का–परमात्मा सत्ता का–मिलता है, उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती चली जाती हैं। इसी अनुपात में हमारी आत्मिक शाँति–प्रगति का पथ–प्रशस्त होता चला जाता है।

🔴 उपासना का बहिरंग स्वरूप क्या हो– इसके विस्तार में अभी न जाकर यह देखा जाय कि परमेश्वर साधक के आन्तरिक स्तर को कैसा चाहता है? रामकृष्ण परमहंस कहते थे–”ईश्वर का दर्शन तब होता है जब पाँच सत्प्रवृत्तियाँ अन्दर प्रवेश पाने व फलने–फूलने लगती है। ये पाँच सत्प्रवृत्तियाँ हैं–उत्कृष्टता, निर्मलता, सहृदयता, उदारता, आत्मीयता। ये ही परमात्मा के–ईश्वरीय सत्ता के–भी गुण हैं। जैसे −जैसे इन गुणों का अनुपात अपने अन्दर बढ़ने लगता है, समझना चाहिए जीव उतना ही ईश्वर के समीप पहुँच गया है।”

🔵 इन पाँच सत्प्रवृत्तियों को परमेश्वर का प्रतिनिधि–पंचदेव भी कह सकते हैं। इन्हीं पाँच पाण्डवों को आजीवन आँतरिक असुर कौरवों से लड़ना होता है। जब असुरता के उन्मूलन का हृदय मंथन आक्रोश पूर्वक हो रहा हो–स्पष्ट मान लेना चाहिये कि जीव रूपी अर्जुन ने गीता का ज्ञान स्वीकार कर लिया और वह कृष्ण की आज्ञा मान कर्त्तव्य पारायण–सच्चा योगी–ईश्वर भक्त हो गया। उपासना स्थली पर बैठकर इन सद्गुणों के सम्वर्धन का ही ध्यान किया जाय तो उल्टे ऋषिकेश को ही पार्थ अर्जुन का रथ चलाने–सफलता का पथ–प्रशस्त करने आना पड़ता है। भक्त और भगवान के बीच अनादिकाल से यही क्रम चलता आया है व चलता रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 -अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 2

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