मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

👉 आदर्श पर अडिग- श्री विद्यासागर

🔵 बंगाल के लैफ्टिनेंट गवर्नर सर फ्रेड्रिक हैडिले अपनी बैठक में उद्विग्न से टहल रहे थे। उनके मन में तरह-तरह के संकल्प विकल्प उठ रहे थे। श्री ईश्वरचंद्र विद्यासागर को दिए हुए उनके आश्वासन के शब्द उन्हें बार-बार याद आ रहे थे। भारत के वायसराय लार्ड एलेनबरा के आज के पत्र ने उनको परेशानी में डाल दिया था। थोडी देर टहलने के बाद उन्होंने अपने प्राईवेट सेक्रेटरी को बुलाकर श्री विद्यासागर जी को बुलावा भिजवा दिया।

🔴 ईश्वरचंद्र जी की शिक्षण संबंधी सूझ-बूझ तथा व्यवहारिक योजनाओं से सारा देश परिचित हो चुका था। शिक्षा निदेशक से कुछ सैद्धांतिक मतभेद हो जाने के कारण उन्होंने सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया था। उनकी योग्यता से प्रभावित गवर्नर फ्रैड्रिक ने उन्हें समझाकर समझौता कराने का प्रयास किया। वह इतने दुर्लभ व्यक्ति को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे, किंतु ईश्वरचंद्र सैद्धांतिक व्यक्ति थे। उन्होंने नम्रतापूर्वक समझौते की बात से इन्कार कर दिया। उनका कहना था कि-कार्य-पद्धति में हेर-फेर किया जा सकता है-सिद्धांतो में नहीं। अनुशासन के नाते मुझको बडे अधिकारी की बात माननी चाहिए, किंतु अपनी आंतरिक प्रेरणा की उपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है, अतः अकारण अप्रिय प्रसंगों से वातावरण विषाक्त बनाने की अपेक्षा मैंने स्वयं मार्ग से हट जाना ही अच्छा समझा। इस विषय में मुझ पर दबाव न डाला जाए यही ठीक होगा। वैसे मैं हर सेवा के लिए तैयार हूँ।''

🔵 हारकर सर फ्रैड्रिक उनसे बंगाल में शिक्षा-प्रसार के लिए कोई अच्छी योजना बनाने का आग्रह कर रहे थे। योजना को राजकीय स्तर पर कार्यान्वित करने का अपना विचार भी उन्होंने व्यक्त कर दिया। ईश्वरचंद जी ने यह कार्य सहर्ष स्वीकार भी कर लिया। एक विषय में किसी से मतभेद होने का यह अर्थ तो नहीं होता कि अन्य संभावित सहयोग के कार्यो में भी विरोध किया जाए विचारक का विचार साधन-संपन्नों द्वारा प्रसारित किया जाना लाभकारी ही है। देश के उत्थान के लिए यदि विरोधी के साथ मिलकर भी कार्य करने में लाभ दिखता है तो किसी विचारशील को हिचकना नहीं चाहिए। विरोध व्यक्तियों से नहीं, विचारों से ही मानना उचित है। दस विचारों में मतभेद होने पर भी यदि एक में साम्य है, तो कोई कारण नहीं कि उसकी पूर्ति हेतु सम्मिलित प्रयास न करें। यह बात यदि आज के कथित देशसेवियों की समझ में आ सके तो आधी से अधिक समस्याओं का समाधान देखते-देखते निकल आए।

🔴 श्री ईश्वरचंद्र जी ने बडी मेहनत के साथ एक योजना बनाकर गवर्नर साहब को दी। गवर्नर साहब ने उसे देखा तो बहुत प्रसन्न हुए। योजना की व्यवहारिकता देखकर उन्होंने आश्वासन दे दिया कि इसे राज्य के व्यय पर क्रियान्वित किया जा सकेगा और उस योजना को स्वीकृति हेतु वायसराय के पास भेज दिया। उन्हें पूरी आशा थी कि इतनी अच्छी योजना अवश्य स्वीकार कर ली जायेगी।

🔵 किंतु उनकी आशा के विपरीत जब वायसराय ने उस पर नकारात्मक आदेश लिख दिया तो उन्हें बहुत चोट पहुँची। ईश्वरचंद्र जी ने उन्हें सांत्वना दी और कहा-''आप दुःख न मानो। मेरे कार्य अपनी सचाई के आधार पर स्वयं खडे हो सकते हैं।" मेरी योजना में समाज के हित की शक्ति होगी तो वह अपने बल पर भी चल जायेगी और वास्तव में उनकी सार्वजनिक घोषणा पर उस योजना का जनता ने भारी स्वागत किया। शिक्षा प्रेमियों ने भी अपना हर प्रकार का सहयोग उस हेतु दिया। योजना में बंगाल में शिक्षा का व्यापक प्रसार भी हुआ। उपयोगी योजना ने अपना मार्ग स्वयं बना लिया। ईश्वरचंद्र की वह बात आज भी सही है। अपने लाभ की बात जनता अभी भी स्वीकार कर सकती है। आवश्यकता है ऐसी योजना बनाने तथा उसे जनता को समझाने की।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 132, 133

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