मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 33)

🌹 बड़े प्रयोजन के लिये प्रतिभावानों की आवश्यकता

🔵 इन दिनों औसत आदमी संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति में एड़ी से चोटी तक डूबा प्रतीत होता है। उनकी आँखें न सृजन होकर इर्द-गिर्द बिखरे हुए पतन-पराभव को देखती हैं और न ऐसा कुछ सूझता है कि अवाँछनीयता को औचित्य में बदलने के लिये उनसे क्या कुछ बन पड़ सकता है। जिनके कानों में कराह की पुकार ही नहीं पहुँचती है; जिन्हें घुँघरू के बोल ही सुहाते हैं, वे युग की पुकार और ईश्वर की वाणी सुन सकने में किस प्रकार समर्थ हो सकते हैं!

🔴 मानवीय भाव-संवेदना जहाँ से पलायन कर जाती है और जहाँ मरघट जैसी नीरवता और नीरसता ही छाई रहती है, वहाँ शालीनता का स्नेह-सद्भाव कैसे बन पड़ेगा! कैसे उस दिशा में उनके कुछ कदम उठ सकेंगे! ऐसे वातावरण में यदि कोई पुण्य-परमार्थ को वरण करने की बात सोचता है तो समझना चाहिये इसी आकाश में उदीयमान नक्षत्रों की चमक प्रारंभ हुई और रात्रि को भी रत्नजड़ित चाँदनी से सजा देने वाली मंगलमयी वेला का आगमन शुरू हुआ।                        
 
🔵 आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा है, समझना चाहिये कि वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है। बड़े काम बड़े लोग कर पाते हैं। हाथी का वजन हाथी ही उठाता है। गधे की पीठ पर यदि उसे लाद दिया जाए तो बेचारे की कमर ही टूट जाए। क्षुद्र कृमि-कीटक मात्र अपना अस्तित्व बनाये रहने की परिधि में ही क्षमताओं को खपा देते हैं। उनसे यह बन नहीं पड़ता कि आदर्शों की बात सोचें, उत्कृष्टता अपनाएँ और विश्वकल्याण के क्रियाकलापों में रुचि लेकर कुछ ऐसा करें जिसकी युगधर्म ने पुकार लगाई और गुहार मचाई है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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