गुरुवार, 16 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 78)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते हुए- ''आत्मवत सर्वभूतेषु'' की किरणें फूट पड़ीं। मातृवत पर दारेषु और परद्रव्येषु लोष्ठवत की साधना अपने काय कलेवर तक सीमित थी। दो आँखों में पाप आया तो तीसरी विवेक की आँखे खोलकर उसे डराकर भगा दिया। शरीर पर कड़े प्रतिबन्ध लगा दिये और वैसी परिस्थितियाँ बनने की जिनमें आशंका रहती है उनकी जड़ काट दी, तो दुष्ट व्यवहार असम्भव हो गया। मातृवत परदारेषु की साधना बिना अड़चन के सध गई। मन ने सिर्फ आरम्भिक दिनों में ही हैरान किया। शरीर ने सदा हमारा साथ दिया।      

🔵 मन ने जब हार स्वीकार कर ली तो वह हताश होकर हरकतों से बाज आ गया। पीछे तो वह अपना पूरा मित्र और सहयोगी ही बन गया। स्वेच्छा से गरीबी कर लेने- आवश्यकताएँ घटाकर अन्तिम बिन्दु तक ले जाने और संग्रह की भावना छोड़ने से ''परद्रव्य'' का आकर्षण चला गया। पेट भरने के लिए, तन ढकने के लिए जब स्व- उपार्जन ही पर्याप्त था तो ''परद्रव्य'' के अपहरण की बात क्यों सोची जाय ?? जो बचा, जो मिला- सो देते बाँटते ही रहे। बाटने और देने की चस्का जिसे लग जाता है, जो उस अनुभूति का आनन्द लेने लगता है उसे संग्रह करते बन नहीं पड़ता।

🔴 फिर किस प्रयोजन के लिए परद्रव्य का पाप कमाया जाय ?? गरीबी का, सादगी का अपरिग्रही ब्राह्मण जीवन अपने भीतर एक असाधारण आनन्द, सन्तोष और उल्लास भरे बैठा है। इतनी अनुभूति यदि लोगों को हो सकी होती तो शायद ही किसी का मन परद्रव्य की पाप पोटली सिर पर लादने को करता। अपरिग्रही कहने भर से नहीं वरन उसका अनुदान देने की प्रतिक्रिया अन्त:करण पर कैसी अनोखी होती है, उसे कोई कहाँ जानता है ?? पर अपने को तो यह दिव्य विभूतियों का भण्डार अनायास ही हाथ लग गया। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamare_drash_jivan

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