गुरुवार, 16 मार्च 2017

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 22)

🌹 परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान  

🔴 इंग्लैण्ड की एक महिला कैंसर रोग से बुरी तरह आक्रान्त थी। डॉक्टरों ने उसे जवाब दे दिया कि अब छ: महीने से अधिक जीने की गुञ्जाइश नहीं है। जिस मशीन से उपचार हो सकता था, वह करोड़ों मूल्य की थी, जिसे अपने यहाँ रखने में कोई डॉक्टर समर्थ नहीं था। रोगी महिला ने नए सिरे से नया विचार किया। जब छ: महीने में मरना ही है, तो अन्य अपने जैसे निरीहों के प्राण बचाने की कोशिश क्यों न करें? उसने टेलीविजन पर एक अपील की कि यदि तीन करोड़ रुपए का प्रबन्ध कोई उदारचेता कर सके, तो उस मशीन के द्वारा उस जैसे निराशों को जीवन-दान मिल सकता है। पैसा बरसा। उससे एक नहीं तीन मशीनें खरीद ली गई और इतना ही नहीं कैंसर का एक साधन-सम्पन्न अस्पताल भी बन गया। रोगिणी इन्हीं कार्यों में इतने दत्तचित्त और मस्त रही कि उसे अपने मरने की बात का स्मरण तक न रहा। कार्य पूरा हो जाने पर उसकी जाँच-पड़ताल हुई, तो पाया गया कि कैंसर का एक भी चिह्न उसके शरीर में बाकी नहीं रहा है।                      

🔵 अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े वाल्टेयर ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की थी। कालिदास और वरदराज की मस्तिष्कीय क्षमता कितनी उपहासास्पद थी, इसकी जानकारी सभी को है, पर वे जब नया उत्साह समेटकर नए सिरे से विद्या पढ़ने में जुटे, तो मूर्धन्य विद्वानों में गिने जाने लगे। व्यक्ति की अन्त:चेतना, जिसे प्रतिभा भी कहते हैं, इतनी सबल है कि अनेकों अभावों और व्यवधानों को रौंदती हुई, वह उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचने में समर्थ होती है। प्रतिभा वस्तुत: वह सम्पदा है, जो व्यक्ति की मनस्विता, ओजस्विता, तेजस्विता के रूप में बहिरंग में प्रकट होती है। यदि प्रसुप्त को उभारा जा सके, स्वयं को खराद पर चढ़ाया जा सके, तो व्यक्ति असम्भव को भी सम्भव बना सकता है। यह अध्यात्म-विज्ञान का एक सुनिश्चित सिद्धान्त एवं अटल सत्य है।        
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धैर्य से काम

🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे। 🔷 एक ब...