गुरुवार, 16 मार्च 2017

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 20)

🌹 प्रगति के कदम-प्रतिज्ञाएँ

🔴 दो कदम जीवन की उन्नति और प्रगति के लिए हैं। उनमें से एक- एक कदम उसी समय बढ़ा लेना चाहिए   

🔵 १- पाप घटाएँ- विचार करना चाहिए कि हमारे शारीरिक- मानसिक और आध्यात्मिक पाप क्या- क्या हैं? और जो पाप अब तक हम करते रहे हैं? उनमें से एक पाप को छोड़ ही देना चाहिए।  

🔴 शारीरिक पापों में मैं हमेशा ऐसे तीन पापों को प्रमुखता देता रहा हूँ। एक पाप- मांस खाना। मांस खाना मनुष्यता के विरुद्ध है। हृदयहीन मनुष्य ही मांस खा सकता है। हृदयवान व्यक्ति और दयावान व्यक्ति मांस नहीं खा सकता है। इसीलिए मांस खाना छोड़ना चाहिए। दूसरे पाप भी इसी तरह के हैं, जो मनुष्य को खोखला बनाते हैं। मनुष्य को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति से कमजोर करते हैं, आदमी को इससे कुछ फायदा नहीं है। नशे की बात और माँसाहार की बात, व्यभिचार की बात, स्त्रियों को पतिव्रता होना चाहिए और पुरुषों को पत्नीव्रत होना चाहिए।

🔵 शारीरिक पाप ! शारीरिक पापों में समय का दुरुपयोग करना और आलसी आदमी के तरीके से पड़ा रहना। आलस्य एक बहुत बुरे किस्म का पाप है। इससे समाज का उत्पादन घटता है, मनुष्य की क्षमताएँ नष्ट होती है और समय का अपव्यय होता है। एक- एक साँस और एक- एक क्षण भगवान् ने जो हमको जीवन हीरे और मोतियों के तरीके से दिया है, उन्हें हम पैरों के तले रौंद डालते हैं और हम आलसी के तरीके से जीते हैं और समय का अपव्यय करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/d.2

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