गुरुवार, 16 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 38)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार
🔴 इसी सन्दर्भ में एक गुरु ने अपने एक अविश्वासी शिष्य की शंका दूर करने के लिए उसे प्रायोगिक प्रमाण दिया—उन्होंने उस शिष्य को बड़े-बड़े सींगों वाला एक भैंस दिखाकर कहा कि इसका यह स्वरूप अपने मन पर अंकित करके और इस कुटी में बैठकर निरन्तर उसका ध्यान तब तक करता रहे जब तक वे उसे पुकारें नहीं। निदान शिष्य कुटी में बैठा हुआ बहुत समय तक उस भैंसे का और विशेष प्रकार से उसके बड़े-बड़े सींगों का स्मरण करता रहा। कुछ समय बाद गुरु ने उसे बाहर निकलने के लिए आवाज दी।

🔵 शिष्य ने ज्यों ही खड़े होकर दरवाजे में शिर डाला कि अटक कर रुक गया। ध्यान करते-करते उसके सिर पर उसी भैंसे की तरह बड़े-बड़े सींग निकल आये थे। उसने गुरु को अपनी विपत्ति बतलाई और कृपा करने की प्रार्थना की। तब गुरु ने उसे फिर आदेश दिया कि वह कुछ समय उसी प्रकार अपने स्वाभाविक स्वरूप का चिन्तन करे। निदान उसने ऐसा किया और कुछ समय में उसके सींग गायब हो गये।

🔴 आख्यान भले ही सत्य न हो किन्तु उसका निष्कर्ष अक्षरशः सत्य है कि मनुष्य जिस बात का चिंतन करता रहता है, जिन विचारों में प्रधानतया तन्मय रहता है वह उसी प्रकार का बन जाता है।

🔵 दैनिक जीवन के सामान्य उदाहरणों को ले लीजिए। जिन बच्चों को भूतप्रेतों की काल्पनिक कहानियां तथा घटनायें सुनाई जाती रहती हैं वे उनके विचारों में घर कर लिया करती हैं, और जब कभी वे अंधेरे उजाले में अपने उन विचारों से प्रेरित हो जाते हैं तो उन्हें अपने आस-पास भूत-प्रेतों का अस्तित्व अनुभव होने लगता है जबकि वास्तव में वहां कुछ होता नहीं है। उन्हें परछाइयों तथा पेड़-पौधों तक में भूतों का आकार दिखलाई देने लगता है। यह उनके भूतात्मक विचारों की ही अभिव्यक्ति होती है जो उन्हें दूर पर भूतों के आकार में दिखलाई देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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