शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

👉 निर्बुद्धि संत और विद्वान बुढ़िया

🔴 एक दिन संत कन्फ्यूशियस के पास उनके कुछ शिष्य जाकर बोले गुरुदेव सच्चा झानी कौन होता है ?''

🔵 कन्फ्यूशियस ने कहा सब लोग बैठ जाओ, अभी बताते हैं-यह कहकर उन्होंने अपनी शेष दिनचर्या पूरी की और कपडे पहने फिर सब शिष्यों को लेकर एक ओर चल पडे।

🔴 सब लोग एक गुफा के अंदर प्रविष्ट हुए। वहाँ एक महात्मा निवास करते थे। जप, तप और चिंतन में अपना समय बिताया करते थे। कन्फ्यूशियस ने उनके प्रणाम किया और एक ओर बैठ गये फिर शांत होकर पूछा-भगवन! हम लोग आपके पास ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करने आए है बताइए यह कौन है? क्या है? कहाँ रहता है ?

🔵 महात्मा बिगड उठे "तुम लोग यहां मेरी शांति भंग करने क्यों आ गये, भागो मेरे भजन में विघ्न पड़ता है।" कन्फ्यूशियस शिष्यों को लेकर बाहर निकल आए। उन्होंने कहा एक ज्ञानी तो यह है कि जिन्होंने संसार से आँखें मूँद ली है। संसार में सुख-दुःख की परिस्थितियों से अलग एकांत मे शांति का इच्छा रखने वाले यह संत छोटे दर्ज के ज्ञानी हुए।''

🔴 और अब वे गांव में पहुँचे जहाँ एक तेली कोल्हू चला रहा था। बैल की आँखें बँधी थीं, वह अपनी मस्त चाल में उतना दायरा न मालूम कब से नाप रहा था और तेली कोल्ह पर बैठा कोई गीत गुनगुना रहा था।

🔴 कन्फ्यूशियस ने कहा- "भाई मैंने सुना है कि तुम ब्रहाज्ञानी हो, हमें भी थोडा ब्रह्म का उपदेश कीजिए।" तेली ने हँसकर उत्तर दिया- "भाई यह बैल ही मेरा ब्रह्म, मेरा परमात्मा है। इसकी सेवा मैं करता हूँ, यह मेरी सेवा करता है। बस हम दोनों सुखी हैं, सुख ही ब्रह्म है।''

🔵 गुरुदेव बाहर निकले और शिष्यों को संबोधित कर कहा- 'मध्यम ज्ञानी प्रबुद्ध गृहस्थ के रूप में यह तेली है, जिसके मन में ज्ञान-प्राप्ति की आकांक्षा है, यह धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ रहा है।''

🔴 अब वे फिर आगे बढे़। उन्होंने कहा- 'संसार की खुली परिस्थितियों का अध्ययन करने से स्थिति का उतना अच्छा ज्ञान हो सकता है जितना कि पुस्तको के पढ़ने अथवा महात्माओं के प्रवचन से नहीं हो सकता। पुस्तक तो एक व्यक्ति का दृष्टिकोण होती है, प्रवचन एक व्यक्ति की ज्ञान-साधना का निष्कर्ष इसलिये संसार को देखो और यह पता लगाओ कि स्पष्ट स्थिति कहाँ है और भ्रम कहाँ जो निर्विकार और सही हो उसे तुम्हारी बुद्धि आप स्वीकार करेगी, फिर उसे अपने जीवन में धारण करने से कल्याण हो सकता है।"

🔵 इस तरह बातचीत करते हुए वे एक बुढि़या के दरवाजे पर रुके। कई लड़के बुढ़ि़या के आस-पास शोरगुल कर रहे थे। बुढि़या चरखा कात रही थी। बीच-बीच में किसी बच्चे के माँगने पर पानी पिला देती, कभी किसी नटखट बालक को डांट भी देती। कभी किसी को हँसकर समझाती, फिर बच्चे खेलने लगते तो वह भी अपना चरखा कातने में मग्न हो जाती।

🔴 कन्फ्यूशियस जैसे ही वहाँ पहुँचे सब लड़के भाग गए। उन्होंने पूछा माता जी! आप कृपा कर यह बताइये क्या आपने ईश्वर देखा है ?

🔵 बुढिया मुस्कराई और बोली हाँ-हाँ बेटा। वह अभी यहीं खेल रहा था, आपको देखते ही भाग गया। वह निरर्थक शोरगुल, बच्चों का रूठना, मेरा मनाना फिर हँसी फिर विनोद यही तो ईश्वर था जो तुम्हारे यहाँ आते ही चला गया।"

🔴 कन्फ्यूशियस शिष्यों को साथ लेकर घर लौट पडे़ उन्होंने बताया- निष्काम ज्ञानी के रूप में यह बुढिया ही सच्ची ज्ञानी है जो ज्ञान का संबंध किसी उपयोग या लाभ से नही जोड़ती, उसे उन्मुक्त रखकर स्वयं भी मुक्त-भाव का अनुभव करती है।''

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 9, 10

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