शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 28) 5 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र-   
🔴 उपासना पक्ष के चार चरण पिछले पृष्ठों पर बताये जा चुके हैं- (१) प्रात:काल आँख खुलते ही नया जन्म, (२) रात्रि को सोते समय नित्य मरण, (३) नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद जप ध्यान वाला भजन, (४) मध्याह्न के बाद मनन के क्रम में अपनी स्थिति का विवेचन और उदात्तीकरण। कुछ दिन के अभ्यास से इन चारों को दिनचर्या का अविच्छिन्न अंग बना लेना सरल सम्भव हो जाता है।                   

🔵 इष्टदेव के साथ अनन्य आत्मीयता स्थापित कर लेना, उसके ढाँचे में ढलने का प्रयत्न करना, यही सच्ची भगवद्भक्ति है। द्वैत को अद्वैत में बदलना इसी आधार पर बन पड़ता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय परमात्मा के साथ लिपटने की वास्तविकता को इसी आधार पर परखा जा सकता है। जीवन क्रम में शालीनता, सद्भाव, उदारता, सेवा-संवेदना जैसी उमंगें अन्तराल में उठती हैं या नहीं। आग के सम्पर्क में आकर ईंधन भी अग्नि बन जाता है। ईश्वर भक्त में अपने इष्टदेव की अनुरूपता उभरनी चाहिये।

🔴 इस कसौटी पर हर किसी की भक्ति भावना कितनी यथार्थता है- इसकी जाँच-परख की जा सकती है। भगवान का अनुग्रह भी इसी आधार पर जाँचा जाता है। जहाँ सूर्य की किरणें पड़ेंगी वहाँ गर्मी और रोशनी अवश्य दृष्टिगोचर होगी। ईश्वर का सान्निध्य निश्चित रूप से भक्तजनों में प्रामाणिकता और प्रखरता की विभूतियाँ अवतरित करता है। इस आधार पर उसका चिन्तन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्ट आदर्शवादिता की हर कसौटी पर खरा उतरता चला जाता है। सच्ची और झूठी भक्ति की परीक्षा हाथोंहाथ प्राप्त होती चलती है। यह प्रतीत होता रहता है कि समर्थ सत्ता का अनुग्रह हाथोंहाथ प्राप्त होने की मान्यता पर उपासना खरी उतरी या नहीं।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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