शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 42)

🌞  हिमालय में प्रवेश (तपोवन का मुख्य दर्शन)

🔵 भगवती भागीरथी के मूल उद्गम गोमुख के दर्शन करके अपने को धन्य माना। यों देखने में एक विशाल चट्टान में फटी हुई दरार में से दूध जैसे स्वच्छ जल का उछलता हुआ झरना बस यही गोमुख है। पानी का प्रवाह अत्यन्त वेग वाला होने से बीच में पड़े हुए पत्थरों से टकरा कर वह ऐसा उछलता है कि बहुत ऊपर तक छींटें उड़ते हैं। इस जल कणों पर जब सूर्य की सुनहरी किरणें पड़ती हैं तो वे रंगीन इन्द्रधनुष जैसी बहुत ही सुन्दर दीखती हैं।

🔴 इस पुनीत निर्झर से निकली हुई माता गंगा लाखों वर्षों से मानव जाति को जो तरण-तारण का संदेश देती रही है, जिस महान् संस्कृति को प्रवाहित करती रही है उसके स्मरण मात्र से आत्मा पवित्र हो जाती है। इस दृश्य को आंखों में बसा लेने को जी चाहता है।

🔵 चलना इससे आगे था। गंगा वामक, नंदनवन, भागीरथ शिखर, शिवलिंग पर्वत से घिरा हुआ तपोवन यही हिमालय का हृदय है। इस हृदय में अज्ञात रूप में अवस्थित कितनी ऊंची आत्माएं संसार के तरण-तारण के लिए आवश्यक शक्ति भण्डार जमा करने में लगी हुई हैं इनकी चर्चा न तो उचित है न आवश्यक। वह असामयिक भी होगी इसलिए उस पर प्रकाश न डालना ही ठीक है।

🔴 यहां से हमारे मार्ग दर्शक ने आगे का पथ-प्रदर्शन किया। कई मील की विकट चढ़ाई को पार कर तपोवन के दर्शन हुए। चारों ओर हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं अपने सौन्दर्य की अलौकिक छटा बिखेरे हुए थीं। सामने वाला शिवलिंग पर्वत का दृश्य बिलकुल ऐसा था मानो कोई विशालकाय सर्प फन फैलाए बैठा हो। भावना की आंखें जिन्हें प्राप्त हों वह भुजंगधारी शिव का दर्शन अपने चर्म चक्षुओं से ही यहां कर सकता है। दाहिनी ओर लालिसा लिए हुए सुमेरु हिम पर्वत है। कई और नील आभा वाली चोटियां ब्रह्मपुरी कहलाती हैं। इससे थोड़ा और पीछे हटकर बांई तरफ भागीरथ पर्वत है। कहते हैं कि यहीं बैठकर भागीरथ जी ने तप किया था जिससे गंगावतरण सम्भव हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Who is Religious?

🔷 Love, compassion, generosity, kindness, devotion, zeal, honesty, truthfulness, unflinching faith in divine values, etc – are the natu...