शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Feb 2017

🔵 परिवार में और समाज में नारी का महत्त्वपूर्ण, अडिग, अक्षय और अनिवार्य स्थान है। उसे यदि जीवन से हटा दिया गया तो विकास की सारी प्रक्रिया ही अवरुद्ध हो जाएगी। कृष्ण पत्नी रुक्मिणी, बुद्ध पत्नी यशोधरा, मोहम्मद की अर्धांगिनी, चंद्रगुप्त की धर्मपत्नी साम्राज्ञी विशाखा, अशोक की गृहिणी, महात्मा गाँधी की कस्तूरबा, नेहरूजी की कमला, लालबहादुर शास्त्री की ये ललिता जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन्होंने अपनी योग्य और सुसंस्कारी गृहिणियाँ के सहयोग से अभीष्ट मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त की और टूटते साहस को पुनः स्थिर किया।

🔴 शिक्षित महिलाओं को अपने घरों के वातावरण में धार्मिकता का समावेश करना चाहिए। विलास, सज्जा, आपाधापी, आलस्य, अपव्यय, असहयोग, अहंकारिता का स्वेच्छाचार दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती रहे तो समझना चाहिए सुख-सुविधाओंके भरे-पूरे रहने पर भी उसमें पलने वालों का भविष्य अंधकारमय बनने जा रहा है। व्यक्तित्व घटिया रहा तो फिर मनःस्थिति और परिस्थिति सर्वथा असंतोषजनक ही रहेगी और विग्रहों का-संकटों का, समस्याओं का घटाटोप खड़ा ही रहेगा। इसलिए यह भी देखा जाय कि सुसंस्कारिता उभारने वाला प्रयास चल रहा है या नहीं।

🔵 दुष्ट प्रचलनों में सर्वनाशी है- विवाहोन्माद। खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। दहेज के लेन-देन में कितने घर-परिवार बर्बाद हुए और दर-छर के भिखारी बने हैं इसका बड़ा मर्मभेदी इतिहास है। बारात की धूमधाम, आतिशबाजी, गाजे-बाजे, दावतें, दिखावे, प्रदर्शन में इतना अपव्यय होता है कि एक सामान्य गृहस्थ की आर्थिक कमर ही टूट जाती है। लड़की का माँस बेचने वाला दहेज के व्यवसायी अपने मन में भले ही प्रसन्न होते और नाक ऊँची देखते हों, पर यदि विवेक से पूछा जाय तो इन अदूरदर्शियों के ऊपर दसों दिशाओं से धिक्कार ही बरसती दिखेगी। विवेकवान् युवकों का कर्त्तव्य है कि दहेज न लेने, धूमधाम की शादी स्वीकार न करने की प्रतिज्ञा आन्दोलन चलायें और उस व्रत को अभिभावकों की नाराजगी लेकर भी निभायें।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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