शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

👉 हम अपने भीतर झाँक ना सीखें

🔵 व्यक्ति दूसरों के विषय में अधिकाधिक जानने का प्रयास करे अथवा उनकी भावनाओं से परिचित होना चाहे, उससे पहले अपने विषय में अधिकाधिक जान लेना चाहिए। अपने मन की भाषा को, आकांक्षाओं को-भावनाओं को बहुत स्पष्ट रूप से समझा, सुना और परखा जा सकता है। अपने बारे में जानकर अपनी सेवा करना, आत्म सुधार करना अधिक सरल है, बनिस्बत इसके कि हम औरों को-सारी दुनिया को बदलने का प्रयास करें। जितना हम अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लेंगे, यह संसार हमें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होने लगेगा।

🔴 हम दर्पण में अपना मुख देखते हैं एवं चेहरे की मलिनता को प्रयत्नपूर्वक साफ कर उसे सुन्दर बना डालते हैं। मुख उज्ज्वल-साफ और अधिक सुन्दर निकल आता है। मन की प्रसन्नता बढ़ जाती है। अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और उसे भली-भाँति परखने से उसकी मलिनताएँ भी दिखाई देने लगती हैं, साथ ही सौन्दर्य भी। कमियों को दूर करना, मलिनता को मिटाना और आत्म निरीक्षण द्वारा पर्त दर पर्त्त गन्दगी को हटाकर आत्मा के अनन्त सौन्दर्य को प्रकट करना ही सच्ची उपासना है। जब सारी मलिनताएँ निकल जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है। फिर बहिरंग में सभी कुछ अच्छा-सत्, चित् आनन्दमय नजर आने लगता है।

🔵 हमें अपने आपसे प्रश्न करना चाहिए-क्या हमारे विचार गन्दे हैं? कामुकता के चिन्तन में हमारा मन रस लेता है, क्या हमें इन्द्रियजन्य वासनाओं से मोह है, क्या हम उस परमसत्ता के हमारे बीच होते हुए भी भयभीत हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो हमें अपने सुधार में जुट जाना चाहिए। वस्तुतः अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन हमें अपने ऊपर के प्रश्नों का उत्तर नहीं में मिलने लगेगा, उस दिन से हम संसार के सबसे सुखी व्यक्ति बन जाएँगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 11

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...