शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 48)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 यह जागृत था या स्वप्न? सत्य था या भ्रम? मेरे अपने विचार थे या दिव्य संदेश? कुछ समझ नहीं पा रहा था। आंखें मलीं सिर पर हाथ फिराया। जो सुना, देखा था, उसे ढूंढ़ने का पुनः प्रयत्न किया। पर कुछ मिल नहीं पा रहा था, कुछ समाधान हो नहीं रहा था।

🔴 इतने में देखा कि उछलती हुई लहरों पर थिरकते हुये अनेक चन्द्र प्रतिबिम्ब एक रूप होकर चारों ओर से इकट्ठे हो रहे हैं और मुसकराते हुए कुछ कह रहे हैं। इनकी बात सुनने की चेष्टा की तो नन्हे बालकों जैसे वे प्रतिबिम्ब कहने लगे—हम इतने चन्द्र तुम्हारे साथ खेलने के लिये, हंसने-मुस्कराने के लिये मौजूद हैं। क्या तुम हमें अपना सहचर न मानोगे? क्या हम अच्छे साथी नहीं हैं? मनुष्य! तुम अपनी स्वार्थी दुनिया में से आये हो, जहां जिससे जिसकी ममता होती है, जिससे जिसका स्वार्थ सधता है वह प्रिय लगता है। जिससे स्वार्थ सधा वह प्रिय, वह अपना। जिससे स्वार्थ न सधा वह पराया, वह बिराना। यही तुम्हारी दुनिया का दस्तूर है न उसे छोड़ो। हमारी दुनिया का दस्तूर सीखो। यहां संकीर्णता नहीं, यहां ममता नहीं, यहां स्वार्थ नहीं, यहां सभी अपने हैं। सब में अपनी ही आत्मा है ऐसा सोचा जाता है। तुम भी इसी प्रकार सोचो। फिर हम इतने चन्द्र बिम्बों के सहचर रहते तुम्हें सूनापन प्रतीत ही न होगा।

🔵 तुम तो यहां कुछ साधन करने आये हो न! साधना करने वाली इस गंगा को देखते नहीं, प्रियतम के प्रेम में तल्लीन होकर उससे मिलने के लिये कितनी तल्लीनता और आतुरता से चली जा रही है। रास्ते के विघ्न उसे कहां रोक पाते हैं? अन्धकार और अकेलेपन को वह कहां देखती है? लक्ष की यात्रा से एक क्षण के लिये भी उसका मन कहां विरत होता है? यह साधना का पथ अपनाना है, तो तुम्हें भी यही आदर्श अपनाना होगा। जब प्रियतम को पाने के लिए तुम्हारी आत्मा भी गंगा की धारा की तरह द्रुतगामी होती तो कहां भीड़ में आकर्षण लगेगा और कहां सूनेपन में भय लगेगा? गंगा तट पर निवास करना है तो गंगा की प्रेम-साधना भी सीखो—साधक!

🔴 शीतल लहरों के साथ अनेक चन्द्र बालक नाच रहे थे। मानों अपनी मथुरा में कभी हुआ—रास, नृत्य प्रत्यक्ष हो रहा हो। लहरें गोपियां बनीं, चन्द्र ने कृष्ण का रूप धारण किया, हर गोपी के साथ एक कृष्ण! कैसा अद्भुत रास-नृत्य यह आंखें देख रही थीं। मन आनन्द से विभोर हो रहा था। ऋतम्भरा प्रज्ञा कह रही थी—देख, देख अपने प्रियतम की झांकी देख। हर काया में एक आत्मा उसी तरह नाच रही है जैसे गंगा की शुभ लहरों के साथ एक ही चन्द्रमा के अनेक बिम्ब नृत्य कर रहे हैं। सारी रात बीत गई। ऊषा की अरुणिमा प्राची से प्रकट होने लगी। जो देखा वह अद्भुत था। सूनेपन का भय चला गया। कुटो की ओर पैर धीरे-धीरे लौट रहे थे। सूनेपन का प्रश्न अब भी मस्तिष्क में मौजूद था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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