शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

👉 एक विशेष समय (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 पहला कदम आपको जो बढ़ाना पड़ेगा, वो यह बढ़ाना पड़ेगा कि जिस तरीके से सामान्य मनुष्य जीते हैं, उसी तरीके से जीने से इन्कार कर दें और यह कहें-हम तो विशेष व्यक्ति और महामानवों के तरीके से जीयेंगे। पेट तो ऐसे ही भरना है। केवल मात्र पेट ही भरना रहा तो गन्दे तरीके से हम क्यों भरें? शेष तरीके से हम क्यों न भरें? हम जो बाकी पेट भरने के अलावा कार्य कर सकते हैं, वह क्यों न करें? यह प्रश्न हमारे सामने ज्वलंत रूप से आ खड़ा होगा और हमको यह आवश्यकता मालूम पड़ेगी कि हम अपनी मनःस्थिति में हेर-फेर कर डालें, अपनी मनःस्थिति को बदल डालें और हम लौकिक आकर्षणों की अपेक्षा ये देखें कि इन्हीं में भटकते रहने की अपेक्षा भगवान् का पल्ला पकड़ लेना ज्यादा लाभदायक है। भगवान् का सहयोगी बन जाना ज्यादा लाभदायक है। भगवान् को अपने जीवन में रमा देना ज्यादा लाभदायक है। संसार का इतिहास बताता है कि भगवान् का पल्ला पकड़ने वाले और भगवान् को अपना सहयोगी बनाने वाले कभी घाटे में नहीं रहे और न रहेंगे। ये विश्वास करें तो यह एक बहुत बड़ी बात है। जानना चाहिये, हमने एक बहुत बड़ा प्रकाश पा लिया।

🔵 अगर हम यह अनुभव कर सकें कि अब मनःस्थिति बदलनी है और सांसारिकता का पल्ला पकड़े रहने की अपेक्षा भगवान् की शरण में जाना है। ये हमारा दूसरा कदम होगा, ऊँचा उठने के लिये। तीसरा वाला कदम आत्मिक उत्थान के लिये हमारा ये होना चाहिये कि हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ, हमारी कामनाएँ, हमारी इच्छाएँ बड़प्पन के केन्द्र से हटें और महानता के साथ जुड़ जायें। हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ ये नहीं होनी चाहिए कि हम वासनाओं को पूरा करते रहेंगे जिन्दगी भर और हम तृष्णा के लिये अपने समय, बुद्धि को खर्च करते रहेंगे और हम अपनी अहंता को, ठाठ-बाट को, रौब को और बड़प्पन को लोगों के ऊपर रौब-गालिब करने के लिये तरह-तरह के ताने-बाने बुनते रहेंगे। अगर हमारा मन इस बात को मान जाये और हमारा अंतःकरण स्वीकार कर ले, ये बचकानी बातें हैं, छिछोरी बातें हैं, छोटी बातें हैं। छिछोरापन, बचकानापन और ये छोटापन, क्षुद्रता का अगर हम त्याग कर सकें तो एक बात हमारे सामने खड़ी होगी कि अब हमको महानता ग्रहण करनी है।

🔴 महापुरुषों ने जिस तरीके से आचरण किये थे, महापुरुषों का चिंतन करने का जो तरीका था, वही तरीका हमारा होना चाहिये और हमारी गतिविधियाँ उसी तरीके से होनी चाहिये, जैसे कि श्रेष्ठ मनुष्यों की रही हैं और रहेंगी। ये विश्वास करने के बाद में हमको अपनी क्रियापद्धति में, दृष्टिकोण में ये मान्यताएँ ले आने के पश्चात्, इच्छाओं और आकांक्षाओं का केन्द्र बदल देने के बाद हमको व्यावहारिक जीवन में भी थोड़े से कदम उठाने चाहिये। साधकों के लिये यही मार्ग है। 

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/ek_vishesh_samay

👉 भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें (भाग 1)

🔶 भावनाओं की शक्ति भाप की तरह हैं यदि उसका सदुपयोग कर लिया जाय तो विशालकाय इंजन चल सकते हैं पर यदि उसे ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाय तो वह...