मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 59)

🌹 लक्षपूर्ति की प्रतीक्षा

🔵 लगा कि नीचे पड़ी शिला की आत्मा बोल रही है उसकी वाणी कम्बल को चीरती हुई, कानों से लेकर हृदय तक प्रवेश करने लगी। मन तंद्रित अवस्था में भी उसे ध्यानपूर्वक सुनने लगा।

🔴 शिला की आत्मा बोली—‘‘साधक! क्या तुझे आत्मा में रस नहीं आता, जो सिद्धि की बात सोचता है? भगवान् के दर्शन से क्या भक्ति भावना में कम रस है? लक्ष प्राप्ति से क्या यात्रा मंजिल कम आनन्द दायक है? फल से क्या कर्म का माधुर्य फीका है? मिलन से क्या विरह में कम गुदगुदा है? तू इस तथ्य को समझ। भगवान तो भक्त से ओत-प्रोत ही हैं। उसे मिलने में देरी ही क्या है? जीवन को साधना का आनन्द लूटने का अवसर देने के लिए ही उसने अपने को पर्दे में छिपा लिया है और झांक-झांक कर देखता रहता है कि मेरा, भक्त, भक्ति के आनन्द में सराबोर हो रहा है या नहीं? जब वह उस रस में निमग्न हो जाता है तो भगवान भी आकर उसके साथ रास नृत्य करने लगता है। सिद्धि वह है जब भक्त कहता है—मुझे सिद्धि नहीं भक्ति चाहिये। मुझे मिलन की नहीं विरह की अभिलाषा है। मुझे सफलता में नहीं कर्म में आनन्द है। मुझे वस्तु नहीं भाव चाहिए।’’

🔵 शिला की आत्मा आगे भी कहती ही गई। उसने और भी कहा—साधक! सामने देख, गंगा अपने प्रियतम से मिलने के लिये कितनी आतुरता पूर्वक दौड़ी जा रही है। उसे इस दौड़ में आनन्द है। समुद्र से मिलन तो उसका कब का हो चुका पर उसमें उसने रस कहां पाया? जो आनन्द प्रयत्न में है, भावना में है, आकुलता में है वह मिलन में कहां है? गंगा उस मिलन से तृप्त नहीं हुई, उसने मिलन प्रयत्न को अनन्त काल तक जारी रखने का व्रत लिया हुआ है फिर अधीर साधक, तू ही क्या उतावली करता है। तेरा लक्ष महान् है, तेरा पथ महान् है, तू महान् है, तेरा कार्य भी महान् है। महान् उद्देश्य के लिए महान् धैर्य चाहिए। बालकों जैसी उतावली का यहां क्या प्रयोजन? सिद्धि कब तक मिलेगी यह सोचने में मन लगाने से क्या लाभ?’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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