मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 1)

🌹 भूमिका  

🔴 व्यक्तित्व का परिष्कार ही प्रतिभा परिष्कार है। धातुओं की खदानें जहाँ भी होती हैं, उस क्षेत्र के वही धातु कण मिट्टी में दबे होते हुए भी उसी दिशा में रेंगते और खदान के चुम्बकीय आकर्षणों से आकर्षित होकर पूर्व संचित खदान का भार, कलेवर और गौरव बढ़ाने लगते हैं। व्यक्तित्ववान अनेकों का स्नेह, सहयोग, परामर्श एवं उपयोगी सान्निध्य प्राप्त करते चले जाते हैं। यह निजी पुरुषार्थ है।       

🔵 अन्य सुविधा-साधन तो दूसरों की अनुकम्पा भी उपलब्ध करा सकता है; किन्तु प्रतिभा का परिष्कार करने में अपना संकल्प, अपना समय और अपना पुरुषार्थ ही काम आता है। इस पौरुष में कोताही न करने के लिए गीताकार ने अनेक प्रसंगों पर विचारशीलों को प्रोत्साहित किया है। एक स्थान पर कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु और स्वयं ही अपना मित्र है। इसलिए अपने को उठाओ, गिराओ मत।  

🌹 इस पुस्तक में हम पढेंगे       
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1. सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा

2. प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं

3. परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान

4. प्रचंड मनोबल की प्रतिभा में परिणति

5. आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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