मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 17)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभा

🔴 इससे वे चिकित्सा के क्षेत्र में आन्तरिक स्थिति का लाभ उठाने के विषय में काफी पिछड़ गये। चिकित्सक अब धीरे धीरे इस बात का महत्व समझने और चिकित्सा में मनोदशाओं का समावेश करने लगे हैं। मानस चिकित्सा का एक शास्त्र ही अलग बनता और विकास करता हुआ जा रहा है। अनुभवी लोगों का विश्वास है कि यदि यह मानस चिकित्सा शास्त्र पूरी तरह विकसित और पूर्ण हो गया तो कितने ही रोगों में औषधियों के प्रयोग की आवश्यकता कम हो जायेगी। लोग अब यह मानने के लिए तैयार हो गये हैं कि मनुष्य के अधिकांश रोगों का कारण उसके विचारों तथा मनोदशाओं में नियत रहता है। यदि उनको बदला जाय तो वे  रोग बिना औषधियों के ही ठीक हो सकते हैं। वैज्ञानिक इसकी खोज, प्रयोग तथा परीक्षण में लगे हुए हैं।

🔵 शरीर रचना के सम्बन्ध में जांच करने वाले एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने  अपनी प्रयोगशाला में तरह-तरह के परीक्षण करके यह निष्कर्ष निकला है कि मनुष्य का शरीर अर्थात् हड्डियां, मांस, स्नायु आदि मनुष्य की मनोदशा के अनुसार एक वर्ष में बिल्कुल परिवर्तित हो जाते हैं और कोई-कोई भाग तो एक दो सप्ताह में ही बदल जाते हैं।

🔴 इसमें सन्देह नहीं कि चिकित्सा के क्षेत्र में मानसोपचार का बहुत महत्व है। सच बात तो यह है कि आरोग्य प्राप्ति का प्रभावशाली उपाय आन्तरिक स्थिति का अनुकूल प्रयोग ही है। औषधियों तथा तरह-तरह की जड़ी-बूटियों का उपयोग कोई स्थाई लाभ नहीं करता, उनसे तो रोग के बाह्य लक्षण दब भर जाते हैं। रोग का मूल कारण नष्ट नहीं होता। जीवनी शक्ति जो आरोग्य का यथार्थ आधार है, मनोदशाओं के अनुसार बढ़ती-घटती रहती है। यदि रोगी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाय कि वह अधिक से अधिक प्रसन्न तथा उल्लसित रहने लगे तो उसकी जीवनी-शक्ति बढ़ जायेगी, जो प्रभाव से रोग को निर्मूल कर सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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