बुधवार, 4 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 8) 5 Jan

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 भूमध्य सागर में इटली के निकट एक छोटे से द्वीप में जन्म लेने वाला नेपोलियन 16 वर्ष की आयु में ही अनाथ हो गया। छोटे कद लम्बे चेहरे बेडौल शरीर की आकृति वाले इस बच्चे को कभी भी साथियों से प्यार प्रोत्साहन नहीं मिला। सदा उपहास और तिरष्कार ही सहना पड़ा। बुद्धि की दृष्टि से भी यह सामान्य बच्चों की तुलना में मन्द था। पर लगन और आत्म विश्वास की पूंजी उसके पास प्रचुर मात्रा में थी, जिसको लेकर वह एकाकी ही बढ़ता चला गया। एक अनाथ असहाय लड़का विश्व विजयी बना यह उसके संकल्प पुरुषार्थ और आत्म विश्वास का ही प्रतिफल था।

🔴 माजस्किलो दोवास्का नामक बालिका को अपने गुजारे के लिए एक कुलीन परिवार में नौकरी करनी पड़ी। बच्चों की देखभाल घर की सफाई जैसे काम करने पड़े। उसी परिवार के एक युवक ने ‘मार्जा’ से विवाह करने की इच्छा अपने माता-पिता से व्यक्त की। फलस्वरूप उसके माता पिता ने ‘मार्जा’ को नौकरी से निकाल दिया इस अपमान से उसकी दिशा धारा बदल गई। बालिका ने निर्वाह के लिए छोटे-छोटे काम करते रहने के साथ-साथ अध्ययन आरम्भ किया आगे चलकर उसने पीयो क्यूरी नामक एक युवक से विवाह कर लिया। दोनों ने मिलकर रेडियम नामक तत्व खोजकर विज्ञान जगत को एक अनुपम भेंट प्रस्तुत की। इस बालिका को आज भी दुनिया मैडम क्यूरी के नाम से जानती है।

🔵 यों तो हिटलर को एक खूंखार अहं केन्द्रित तानाशाह के रूप में ख्याति मिली है। फिर भी उस ख्याति और जीवन में प्राप्त सफलताओं के लिए उसे कठोर संघर्ष करना पड़ा तथा भारी मूल्य चुकाना पड़ा। बचपन में ही माता-पिता दिवंगत हो गये। मजदूरी करके उसे अपना निर्वाह करना पड़ा। पर सामान्य से असामान्य बनने की महत्वाकांक्षा और तदुपरान्त प्रयास एवं पुरुषार्थ के कारण वह सफल होता चला गया। रूस के लौह पुरुष स्टालिन का जन्म जार्जिया प्रान्त में एक गरीब परिवार में हुआ। माता-पिता गुलाम थे इन दिनों गुलामों का पढ़ना लिखाना भी अपराध घोषित था। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी यह बालक अध्ययन में जुटा रहा। अपनी देश भक्ति सिद्धान्तवादिता एवं ध्येय निष्ठा के बल पर वह रूस का भाग्य विधाता बना।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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