बुधवार, 4 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 14)

🌞  हिमालय में प्रवेश

चाँदी के पहाड़

🔵 सोचता हूँ बचपन में मनुष्य की बुद्धि कितनी अविकसित होती है कि वह बर्फ जैसी मामूली चीज को चाँदी जैसी मूल्यवान् समझता है। बड़े आदमी की सूझ- बूझ ऐसी नहीं होती, वह वस्तुस्थिति को गहराई से सोच और समझ सकता है। यदि छोटेपन में ही इतनी समझ आ जाय तो बच्चों को भी यथार्थता को पहचानने में कितनी सुविधा हो। 

🔴 पर मेरा यह सोचना भी गलत ही है, क्योंकि बड़े होने पर भी मनुष्य समझदार कहाँ हो पाता है। जैसे ये दोनों बच्चे बर्फ को चाँदी समझ रहे थे, उसी प्रकार चाँदी- ताँबे के टुकड़ों को इन्द्रिय छेदों पर मचने वाली खुजली को, नगण्य अहंकार को, तुच्छ शरीर को बड़ी आयु का मनुष्य भी न जाने कितना आधिक महत्त्व दे डालता है और उसकी ओर इतना आकर्षित होता है कि जीवन लक्ष्य को भुलाकर भविष्य को अन्धकारमय बना लेने की परवाह नहीं करता।  

🔵 सांसारिक क्षणिक और सारहीन आकर्षणों में हमारा मन उनसे भी अधिक तल्लीन हो जाता है जितना कि छोटे बच्चों का मिट्टी के खिलौने के साथ खेलने में, कागज की नाव बहाने में लगता है। पढना- लिखना, खाना- पीना छोड़कर पतंग उड़ाने में निमग्न बालक को आभिभावक उसकी अदूरदर्शिता पर धमकाते हैं पर हम बड़ी आयु वालों को कौन धमकाए? जो आत्म स्वार्थ को भुलाकर विषय विकारों के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली बने हुए हैं। बर्फ चाँदी नहीं है, यह बात मानने में इन बच्चों का समाधान हो गया था, पर तृष्णा और वासना जीवन लक्ष्य नहीं है, हमारी इस भ्रांति का कौन समाधान करे?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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