बुधवार, 4 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 14) 5 Jan

🌹गायत्री का जातिगत अधिकार

🔴 उसके यौवन, श्रम, तथा मनोबल के मनमाने उपयोग के लिए ऐसी व्यवस्थाएं गढ़ी गईं, जिससे पददलितों का मनोबल टूटे और वे सहज शरणागति स्वीकार करलें। सामन्तों और पंडितों की इस मिली भगत ने स्त्री, शूद्रों को कुचलने में ऐसे प्रतिपादन खड़े किये जिन्हें धर्म परम्परा का बाना पहनाया जा सके। देशी और विदेशी आततायी अपनी-अपनी गतिविधियों की निर्वाध गति से देर तक चलाने के लिए दमन और शमन के दुहरे आक्रमण करते रहे। नारी वर्ग को आसूर्यम्पश्या—पर्दे के भीतर रहने वाली कठपुतली, चरणदासी बनी रहने, सती होने, पति को ही परमेश्वर मानकर उसके हर अनौचित्य को शिरोधार्य करने जैसे शमन-प्रयोग उसी षड्यन्त्र के अंग हैं। स्त्रियों को जन्म जात निकृष्ट ठहराने का एक प्रमाण यह भी प्रस्तुत किया गया कि वे दीन-हीन होने के कारण ही गायत्री मंत्र जैसी श्रेष्ठ उपासना करने की भी अधिकारिणी नहीं हैं।

🔵 प्राचीन काल के इतिहास एवं शास्त्र अनुशासन को देखने से स्पष्ट है कि भारतीय धर्म में नर और नारी के अधिकारों में कहीं रत्ती भर भी अंतर नहीं है। यदि कहीं है भी तो उसमें नारी को नर से ही वरिष्ठ सिद्ध किया गया है और उसे पूजा योग्य ठहराया गया है। प्राचीन काल में ऋषियों की तरह ऋषिकाएं भी समस्त धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रयोजनों में समान रूप से सहभागिनी रही हैं। उनके द्वारा वेद संहिता की अनेकों ऋचाओं का अवतरण हुआ है। योग-तप एवं धर्म कृत्यों में उनके समान सहयोग के प्रमाणों से अतीत का समस्त घटनाक्रम एवं वातावरण पूरी तरह साक्षी है। यज्ञ में नारी का साथ होना आवश्यक है। विवाह आदि संस्कारों में यज्ञ भी होता है और मन्त्रोच्चार भी। इसमें नर-नारी दोनों का ही समान भाग रहता है।

🔴 गायत्री की प्रतिमा स्वयं नारी है। नारी की उपासना नारी नारी भी न करें—माता से बेटी दूर रखी जाय इसका किसी भी दृष्टि से औचित्य नहीं है। नर और नारी दोनों को ही समान रूप से गायत्री-उपासना समेत समस्त धर्मकृत्यों का अधिकार है। इसके विरुद्ध अनर्गल प्रलाप किये जाते हैं—काने, कुबड़े प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं, उन्हें भारतीय धर्म की आत्मा के सर्वथा प्रतिकूल ही माना जाना चाहिए। तथ्यहीन प्रतिगामिता की उपेक्षा करना ही श्रेयस्कर है। पुरुषों की भांति स्त्रियां भी गायत्री उपासना की परिपूर्ण अधिकारिणी हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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