बुधवार, 4 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 62)

🌹 युग-निर्माण की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

🔴 युग-निर्माण की पृष्ठभूमि राजनैतिक एवं सामाजिक नहीं वरन् आध्यात्मिक है। उतना महत्वपूर्ण कार्य इसी स्तर पर उठाया या बढ़ाया जा सकता है। राजनैतिक एवं सामाजिक स्तर पर किये गये सुधार प्रयत्नों में वह श्रद्धा, भावना, तत्परता एवं गहराई नहीं हो सकती, जो आध्यात्मिक स्तर पर किये गये प्रयत्नों में सम्भव है। हम इसी स्तर से कार्य आरम्भ कर रहे हैं। इसलिये हम सबको उपासना, तपश्चर्या एवं आध्यात्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत होना चाहिए, तथा योजना के सम्पर्क में आने वाले दूसरे लोगों को भी इसी भावना से प्रभावित करना चाहिए। हमारे सुधार आन्दोलन आध्यात्मिक लक्ष्य की पूर्ति के लिये एक साधन मात्र हैं इसलिये साधन के साथ साध्य को भी ध्यान में रखना ही होगा। हमारे छह आध्यात्मिक कार्यक्रम नीचे प्रस्तुत है:—

🔵 95. गायत्री उपासना— संस्कृति का मूल उद्गम गायत्री महामन्त्र है। उसमें जीवनोत्कर्ष की समस्त शिक्षायें बीज रूप से मौजूद हैं। उपासना का मूल उद्देश्य, भावनाओं और प्रवृत्तियों का सन्मार्ग की ओर प्रेरणा प्राप्त करना ही तो होता है। यह आधार गायत्री में है और उसकी उपासना में वह शक्ति भी है कि अन्तःकरण को इसी दिशा में मोड़े। इस दृष्टि से गायत्री सर्वांगपूर्ण एवं सार्वभौम मानवीय उपासना कहीं जा सकती है। उसके लिए हमें नित्य नियमित रूप से कुछ समय निकालना चाहिये, चाहे वह समय पांच मिनट ही क्यों न हो। 108 गायत्री मन्त्र जपने में प्रायः इतना ही समय लगता है। प्रयत्न यह होना चाहिये कि अपने घर, परिवार, सम्बन्ध समाज और परिचय-क्षेत्र के सभी लोग गायत्री उपासना में संलग्न रहें। इससे अतिरिक्त उपासनाएं जो करते हैं वे उन्हें भी करते हुए गायत्री जप कर सकते हैं।

96. यज्ञ की आवश्यकता— जिस प्रकार गायत्री सद्भावना की प्रतीक है उसी प्रकार यज्ञ सत्कर्मों का प्रतिनिधि है। अपनी प्रिय वस्तुओं को लोकहित के लिए निरन्तर अर्पित करते रहने की प्रेरणा यज्ञीय प्रेरणा कहलाती है। हमारा जीवन ही एक यज्ञ बनना चाहिये। इस भावना को जीवित जागृत रखने के लिये यज्ञ प्रक्रिया को दैनिक जीवन में उपासनात्मक स्थान दिया जाता है। हमें नित्य यज्ञ करना चाहिए। यदि विधिवत् यज्ञ करने में समय और धन खर्च होने की असुविधा हो तो चौके में बने भोजन के पांच छोटे ग्रास गायत्री मन्त्र बोलते हुए अग्निदेव पर होमे जा सकते हैं। अथवा भोजन करते समय इसी प्रकार का अग्नि पूजन किया जा सकता है। घी का दीपक एवं अगरबत्ती जलाना भी यज्ञ विधि का ही एक रूप है। इसमें से जिसे जैसी सुविधा हो वह यज्ञ क्रम बना ले, पर यह प्रथा ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के हर घर में जीवित अवश्य ही रहनी चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लक्ष्मीजी का निवास

🔶 एक बूढे सेठ थे। वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव। आज यहाँ तो कल वहाँ!! 🔷 सेठ ...