बुधवार, 4 जनवरी 2017

👉 सतयुग की वापसी (भाग 29) 5 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें  

🔴 युद्धोन्माद का वातावरण बनाने और सरंजाम जुटाने में किसी वर्ग विशेष को लाभ-ही-लाभ सूझा होगा अन्यथा उस आक्रमण-प्रत्याक्रमण के माहौल से असंख्यों मनुष्यों की, परिवारों की भयंकर बरबादी सूझ ही न पड़ती, ऐसी बात नहीं है। अपने को सर्वसमर्थ, सर्वसम्पन्न बनाने के लिए उभरे उन्माद ने शोषण से लेकर आक्रमण तक के अनेकों कुचक्र रचे हैं। इतना दुस्साहस तभी बन पड़ा, जब उसने अपनी चेतना को इतना निष्ठुर बना लिया। अन्यान्यों को इस त्रास से भारी कष्ट सहना पड़ सकता है, इसको दरगुजर करने के उपरान्त ही अपराधी, आक्रामक एवं आतंकवादी बना जा सकता है।          

🔵 नशों के उत्पादक एवं व्यवसायी, तस्कर आदि यदि अनुमान लगा सके होते कि उनका व्यक्तिगत लाभ किस प्रकार असंख्य अनजानों का विनाश करेगा, यदि संवेदना उनके अन्तराल में उमगी होती तो निश्चय ही वे इस अनर्थ से हाथ खींच लेते और गुजारे के लिए हजार साधन खोज लेते।   

🔴 पशु-पक्षियों को उदरस्थ करते रहने वालों के मन में यदि ऐसा कुछ सूझ पड़ा होता कि उन निरीहों की तरह हम इतनी भयंकर पीड़ा सहते हुए जान गँवाने के लिए बाधित किए गए होते, तो कैसी बीतती? उस छटपटाहट को निजी अनुभूति से जोड़ सकने वाला कदाचित् ही छुरी का निर्दय प्रयोग कर पाता।

🔵 नारी पर प्रजनन का असाधारण भार लादने वाले तथाकथित पति महोदय, यदि अपनी सहचरी के प्रति किए जा रहे उत्पीड़न को भी ध्यान में रख सके होते, तो उन्हें अपने इस स्वेच्छाचार पर अंकुश लगाना ही पड़ता। निजी मस्ती उतारने से पूर्व उसका भावी परिणाम क्या होगा, यह भी विचारना पड़ता। अपनी आर्थिक बरबादी और बच्चों की अनगढ़ जिन्दगी के लिए भी अपने को उत्तरदायी ठहराते हुए स्वेच्छाचार पर अंकुश लगाने के लिए सहमत होते।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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