रविवार, 22 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 31)

🌞  हिमालय में प्रवेश

सीधे और टेड़े पेड़

🔵 रास्ते भर चीड़ और देवदारु के पेड़ों का सघन वन पार किया। यह पेड़ कितने सीधे और ऊंचाई तक बढ़ते चले गये हैं उन्हें देखकर प्रसन्नता होती है। कोई-कोई पेड़ पचास फुट तक ऊंचे होंगे। सीधे ऐसे चले गये हैं मानो ढाल कर लट्ठे गाढ़ दिये हैं। मोटाई और मजबूती भी काफी है।

🔴 इनके अतिरिक्त तेवार, दादरा, पिनखू आदि के टेढ़े-मेढ़े पेड़ भी बहुत हैं जो चारों ओर छितराये हुए हैं इनकी बहुत डालियां फूटती हैं और सभी पतली रहती हैं। इनमें से कुछ को छोड़कर शेष ईंधन के काम आते हैं। ठेकेदार लोग इन्हें जलाकर कोयला भी बना ले जाते हैं यह पेड़ जगह तो बहुत घेरते हैं पर उपयोग इनका साधारण है। चीड़ और देवदारु से जिस प्रकार इमारती और फर्नीचर का काम होता है वैसा इन टेड़े तिरछे पेड़ों से बिलकुल भी नहीं होता। इसलिये इनकी कोई पूछ भी नहीं करता, मूल्य भी इनका बहुत सस्ता होता है।

🔵 देखता हूं जो पेड़ लम्बे गये हैं उनने इधर-उधर शाखायें नहीं फोड़ी हैं, ऊपर को एक ही दिशा में सीधे बढ़ते गये हैं। इधर-उधर मुड़ना इनने नहीं सीखा। शक्ति को एक ही दिशा में लगाये रहने से ऊंचे उठते रहना स्वाभाविक भी है। चीड़ और देवदारु के पेड़ों ने यही नीति अपनाई है, वे अपनी इस नीति की सफलता का गर्वोन्नत मस्तक से घोषणा कर रहे हैं। दूसरी ओर वे टेड़े तिरछे पेड़ हैं जिनका मन अस्थिर चित्त चंचल रहा। एक ओर टिका ही नहीं, विभिन्न दिशाओं का स्वाद चखना चाहा और यह देखना चाहा कि देखें किस दिशा में ज्यादा मजा है, किधर जल्दी सफलता मिलती है। इस चंचलता में उन्होंने अनेक दिशाओं में अपने को बांटा, अनेक अनेक शाखायें फोड़ी। छोटी-छोटी टहनियों से उनका कलेवर फूल गया, वे प्रसन्न भी हुए कि हमारी इतनी शाखायें हैं इतना फैलाव-फुलाव है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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