रविवार, 22 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 16) 23 Jan

🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निभाया जाना चाहिये, पर उस कीचड़ में इतनी गहराई तक नहीं फँसना चाहिये कि उबर सकना सम्भव न हो सके। मोह को भव बन्धनों में से प्रमुख माना गया है। उसी संकीर्ण दायरे में जकड़े हुए लोग, लोकमंगल का कर्तव्य पालन कर ही नहीं पाते। जिन्हें सभी के प्रति पारिवारिकता का भाव अपनाने का अवसर मिलता है, उनके लिये हर किसी को आत्मा मानने का, सभी की सेवा-सहायता करने का आनन्द मिलता है।             

🔵 अहंकार मोटे अर्थों में घमण्ड समझा जाता है। अकड़ना, उद्धत-अशिष्ट व्यवहार करना, क्रोधग्रस्त रहना अहंकार की निशानी है। पर वस्तुत: वह और भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक है। फैशन, सजधज, श्रृंगार, ठाठ-बाट अपव्यय, सस्ता बड़प्पन आदि अहंकार परिवार के ही सदस्य हैं। लोग शेखीखोरी के लिये ढेरों समय, श्रम और पैसा खर्च करते देखे जाते हैं। यह भी एक प्रकार का नशा है, जिसमें अपने को भले ही मजा आता हो, पर हर विचारशील को इसमें क्षुद्रता की, बचकानेपन की ही गन्ध आती है। 

🔴 इस विडम्बना के लिये चित्र-विचित्र प्रवंचनायें रचनी पड़ती हैं। ईर्ष्या, द्वेष उत्पन्न करने में भी अहंता की ही प्रमुख भूमिका रहती है। कलह और विग्रह प्राय: उसी कारण उत्पन्न होते हैं। आदमी की विशिष्टता अपनी विनयशीलता एवं दूसरों के सम्मान में निहित है। उसी कसौटी पर किसी की सज्जनता परखी जाती है। अहंकारी से उन सद्गुणों में से एक भी नहीं निभ पाता। अहंभाव को आत्मघाती शत्रु माना गया है। ऐसे लोगों से आत्मसाधना तो बन ही नहीं पाती। उन पर उद्दण्डता व दूसरों को नीचा दिखाने का भूत सदैव चढ़ा रहता है और दूसरों को गिराने एवं नीचा दिखाने की ही ललक उठती रहती है। ऐसे लोग अपनी प्रशंसा और दूसरों की निन्दा करने में ही लगे रहते हैं। इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्मपरिष्कार कैसे बन पड़े?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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