रविवार, 22 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 80)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 9.बेटी को विदाई उपहार:- कन्या के माता-पिता अपनी बच्ची की विदाई के समय उसे कुछ कपड़ा, जेवर, बर्तन, फर्नीचर, मिठाई पैसा आदि दें तो वह लड़की का विशुद्ध रूप से ‘‘स्त्री-धन’’ माना जाय। उसका न तो कोई प्रदर्शन हो और न लेखा-जोखा।

🔵 बाप-बेटी के व्यक्तिगत स्नेह सौजन्य एवं विदाई उपहार से ससुराल वालों को जरा भी दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए। यह विशुद्ध रूप से बाप-बेटी के बीच का मामला है। उसमें औरों के दखल देने या नुक्ताचीनी करने की कोई आवश्यकता नहीं है। साधारणतया रस्म के रूप में नाक और कान के छोटे दो जेवर ही लड़की को उसके अभिभावकों के द्वारा विवाह समय पर दिए जाने चाहिए। ताकि नकदी के रूप से हटकर जेवर के रूप में दहेज का पिशाच फिर नया रूप बना कर सामने न आ खड़ा हो। बाप यदि अपनी बेटी को कुछ अधिक देना चाहता है तो वह विवाह संस्कार के एक-दो महीने बाद दें और ससुराल वाले स्त्री-धन के रूप में उसे लड़की के पास ही रहने दें। उसे बहू से मांगना, बच्चों के पैसे छीनने जैसा निष्ठुर कृत्य माना जायगा।

🔴 10. लड़की का स्त्री-धन:- पिता के यहां से जो कन्या को दिया गया है तथा ससुराल आने पर प्रत्येक सम्बन्धियों ने तथा सास-ससुर ने जो उपहार दिए हों वे वधू की सुरक्षित पूंजी माने जांय। उसे ससुराल वाले छीनने का लालच न करें।

🔵 ‘स्त्री-धन’ की एक छोटी पूंजी वधू के पास रहनी चाहिए जो किसी विशेष आपत्ति के समय काम आ सके या उसके बुढ़ापे तक बनी रहे सके। इस पावन पूंजी का स्वामित्व लड़की का ही हो और उसी के संरक्षण में ही रहे। अच्छा हो उसे लम्बे समय के सार्टीफिकेटों में लगा दिया जाय जिससे ब्याज भी बढ़ती रहे। जेवर कपड़ों का उपहार देने की अपेक्षा दोनों पक्ष के लोग नव वधू को कुछ धन दें और उसे उसकी सुरक्षित पूंजी बना दें। विवाह के समय मिला हुआ यह उपहार लड़की के उत्साह बढ़ाने का एक अच्छा माध्यम हो सकता है। यथा शक्ति हर विवाह में यह किया जाय। पर इसका कोई दिखावा या शर्त न हो। वरना यह भी दहेज का ही एक दूसरा रूप बन जायगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...